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जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

शांति और सुरक्षा की चुनौतियाँ (भारत के माओवाद प्रभावित राज्यों का एक अध्ययन

शांति और सुरक्षा की चुनौतियाँ

(भारत के माओवाद प्रभावित राज्यों का एक अध्ययन)

अम्बिकेश कुमार त्रिपाठी

सहायक प्राध्यापक (राजनीति विज्ञान विभाग)

राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, द्वारहाट

अल्मोड़ा, उत्तराखंड

9450308057

 

सारांश

                   प्रस्तुत आलेख माओवादी हिंसा के कारणों के सैद्धांतिक विमर्श के परिप्रेक्ष्य पर बहस करते हुए वैकल्पिक सैद्धांतिक आधार ढूँढने का प्रयत्न करता है। शांति और सुरक्षा की स्थापना में चुनौती बन रही माओवादी हिंसा से किस प्रकार निपटा जाए इस सवाल पर विचार करते हुए राज्य के लिए वैकल्पिक नीति विकसित करने का प्रयास करता है।

                   प्रमुख शब्द: माओवाद, हिंसा, आदिवासी, राज्य, तुलनात्मक वंचना, क्रांति, सशस्त्र-संघर्ष।

   

            आज़ादी के बाद से ही मानव जीवन की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं संबंधी चिंताएँ देश के बुद्धिजीवियों और नीति-नियंताओं के बीच गंभीर विमर्श का विषय रही हैं, लेकिन हाल के वर्षों में संघर्ष, शांति और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों ने भारत के बौद्धिक वर्ग के लिए आंतरिक सुरक्षा के क्षेत्र में विचार के लिए नए आयाम व चुनौतियों को जन्म दिया है। इस संदर्भ में कम से कम तीन ऐसे तत्व चिन्हित किए जा सकते हैं जो राष्ट्रीय-सुरक्षा के साथ-साथ मानव-सुरक्षा के लिए भी खतरा बनते जा रहे हैं। ये तत्व क्रमशः वामपंथी अतिवाद (माओवाद), संप्रदायवाद और भ्रष्टाचार हैं। पिछली यूपीए सरकार में प्रधानमंत्री रहे डॉ. मनमोहन सिंह ने जहां माओवाद को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बताया था वहीं काँग्रेस पार्टी की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी ने संप्रदायवाद को बड़ी चुनौती कहा है। इन चुनौतियों के संदर्भ में भ्रष्टाचार की अनदेखी नहीं की जा सकती है। वर्तमान एनडीए सरकार का प्रमुख एजेंडा व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त करना है। इस हेतु भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कई कदम भी उठाए जा रहे हैं ताकि जनतंत्र की संस्थाओं और एजेंसियों को अधिक पारदर्शी और उत्तरदायी बनाया जा सके। प्रस्तुत आलेख में माओवादी चुनौती के संदर्भ में द्वितीयक स्रोतों से उपलब्ध आंकड़ों द्वारा भारत में शांति और सुरक्षा के विविध आयामों पर चर्चा का प्रयास किया जाएगा।

            उदार भारतीय बुद्धिजीवियों का वर्ग इस बात से सहमत है कि उत्तर-औपनिवेशिक भारत में सशस्त्र हिंसा की निरंतरता का प्रमुख कारण सामाजिक-आर्थिक विकास के संकेतकों में प्रतिगमन, प्रभावित क्षेत्रों में अपर्याप्त एवं दयनीय जनतान्त्रिक माहौल और सामाजिक-आर्थिक समावेशन की सुस्त-चाल है, जिसने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से वंचना और हाशिएकरण की प्रक्रिया को बढ़ाया है। यह सत्य है कि जो क्षेत्र आर्थिक रूप से पिछड़े और अल्पविकसित हैं, माओवादी हिंसा वहीं सबसे ज्यादा फल-फूल रही है, जबकि ये क्षेत्र खनिज संपदाओं की दृष्टि से भारत के सर्वाधिक सम्पन्न क्षेत्र हैं[1]। भारत के बारे में दिलचस्प तथ्य यह है कि उसकी धरती समृद्ध है और लोग गरीब[2]। देश की प्राकृतिक संपदा और उसकी अंतर्निहित क्षमता आबादी को खुशहाल बनाने के लिए पर्याप्त है[3], लेकिन यह विडंबना ही है कि समृद्धिशाली भूमि पर निवास करना एक बड़ी आबादी के लिए उसकी वंचना और अनेक प्रकार की हिंसा का कारण बन रहा है।

            भारत का माओवादी आंदोलन अपने जन्म से ही संसाधनों पर स्वामित्व के बरक्स उनके न्यायपूर्ण वितरण की लड़ाई का आंदोलन रहा है। हम में से अधिकांश के लिए जीवन की रोज़मर्रा की जरूरतों की पूर्ति हेतु प्राकृतिक संसाधनों के लिए संघर्ष दैनिक जीवन का हिस्सा नहीं हो सकता लेकिन यह उन लोगों के लिए उतना ही सत्य है जिनका जीवन जल, जंगल और जमीन पर निर्भर है। जनजातीय लोगों के लिए जंगल और जमीन उनकी आजीविका के प्राथमिक स्रोत हैं। वे फसल और सब्जियाँ उगाते हैं, फल और कंदमूल इकठ्ठा करते हैं, अपने मवेशियों के लिए भोजन प्राप्त करते हैं। इसी तरह जंगल से उन्हें घरेलू उपयोग के लिए जरूरी लकड़ी और पत्थर आदि मिलते हैं[4]। इस तरह जमीन और जंगल जनजातीय लोगों की आजीविका का आधार हैं। लेकिन राज्य के ड्रेकोनियन क़ानूनों ने जमीन और जंगल से उनकी बेदख़ली की प्रक्रिया को त्वरित किया है। विकास-जनित वंचना हमेशा हिंसक संघर्षों का कारण रही है और यह पूंजीवादी जनतान्त्रिक राज्य की भूमिका को संदेह के दायरे में लाती है।

            आधुनिक राज्य की प्राथमिक ज़िम्मेदारी शांति और सुरक्षा सुनिश्चित कारण है और केवल यही उसके अस्तित्व का वैध आधार भी है। प्रस्तुत आलेख में भारत के माओवाद प्रभावित राज्यों में, शांति और सुरक्षा की नई संकल्पनाओं के आलोक में, राज्य की उपरोक्त जिम्मेदारियों और उसके कार्य-संस्कृति का विश्लेषण किया जाएगा। चूंकि भारतीय राज्य माओवाद को आंतरिक सुरक्षा के लिए एकमात्र सबसे बड़ा खतरा मानता है, सुरक्षा सुनिश्चित करने औए शांति स्थापित करने के उसके प्रयासों के दरम्यान किए जा रहे विकासात्मक कार्यों का पुनरीक्षण किया जाना जरूरी है, क्यूंकि विकास के प्रयासों के बावजूद भी हिंसा कम नहीं हो रही है। विकास और शांति दोनों सहगामी हैं और एक दूसरे को परस्पर प्रतिपूरित करते हैं। एक ओर जहां विकास के अभाव में शांति की कल्पना नहीं की जा सकती वहीं दूसरी ओर विकास के लिए शांति आवश्यक है। अफ्रीकी महाद्वीप के अनेक देशों में व्याप्त जातीय-हिंसा उनके विकास और जनतंत्र-निर्माण की प्रक्रिया में बड़ी बाधा है जबकि ये देश प्राकृतिक संसाधन सम्पन्न देश हैं और जनतांत्रिक विकास के मॉडल को अपनाकर संपोषणीय शांति और खुशहाली के स्थापना की पर्याप्त संभाव्यता भी है। भारत के माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा और शांति कैसे स्थापित की जाए? क्या राज्य की वर्तमान भूमिका पर्याप्त है या और भी कुछ किया जाना जरूरी है? क्या संरचना में निहित हिंसा माओवाद को फलने-फूलने में मदद करता है? इन सवालों पर चर्चा के बाद मैं माओवादी हिंसा के समाधान हेतु नीतिगत विकल्प के रूप में अपना प्रचुरता में वंचना दृष्टिकोण प्रस्तुत करूंगा।

शांति और सुरक्षा की नई अवधारणाएँ:

            शताब्दियों से शांति और सुरक्षा के प्रश्न मानवीय जीवन में केंद्रीय महत्व के रहे हैं। सभी सभ्यताएं और संस्कृतियाँ अलग-अलग प्रकार से इन प्रश्नों से जूझती रही हैं। आधुनिक कहे जाने वाले आज के समाजों के लिए भी ये प्रश्न उतने ही ज्वलंत और प्रासंगिक हैं जितने ये आदिम, असभ्य और बर्बर समाजों में थे। स्थायी शांति और मानव-सुरक्षा आज की विशेष चिंता का विषय है और यही कारण है कि ये मुद्दे आधुनिक अनुशासनों मसलन राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र और अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन के महत्वपूर्ण विषय हैं।

            परंपरागत समझ में शांति को प्रत्यक्ष हिंसा या युद्ध के अभाव की दशा के रूप में देखा जाता रहा है। एक ऐसी स्थिति जहां व्यक्ति, समाज, या राज्य द्वारा किसी व्यक्ति या समुदाय को क्षति पहुंचाने के लिए किसी भी प्रकार का कोई शारीरिक बल प्रयोग न किया जाए’, शांति की अवस्था है। अतः स्पष्ट है कि बल-प्रयोग के अभाव को, पारंपरिक दृष्टिकोण में, शांति माना जाता है। लेकिन 60 के दशक में, सुरक्षा और शांति अनुसंधान एक स्वतंत्र अनुशासन के रूप में विकसित हुआ और इस क्षेत्र के विद्वानों द्वारा शांति और सुरक्षा की परंपरागत समझ और अवधारणाओं को पुनर्परिभाषित एवं उन्न्त किया गया। शांति की परंपरागत अवधारणा को ‘नकारात्मक-शांति’ बताते हुए इन विद्वानों ने शांति की नई अवधारणा को सामाजिक न्याय, समानता, मानवाधिकार और समवेशी विकास के साथ जोड़ा। जबकि नकारात्मक शांति प्रत्यक्ष-हिंसा के अभाव की दशा है, शांति का यह नया और व्यापक दृष्टिकोण, जिसे ‘सकारात्मक-शांति’ कहा जाता है, सामाजिक सद्भाव, न्याय और समानता हासिल करने के साथ-साथ संरचनात्मक-हिंसा को समाप्त करने की पैरवी भी करता है। इस प्रकार शांति एक प्रक्रिया है[5] न की परिणाम। सकारात्मक शांति की अवधारणा केवल संघर्ष को खारिज नहीं करती बल्कि इसके शांतिपूर्ण और निष्पक्ष निवारण का प्रयास करती है। संक्षेप में, शांति का पारंपरिक दृष्टिकोण प्रत्यक्ष-हिंसा पर जबकि शांति का नया दृष्टिकोण प्रत्यक्ष-हिंसा के साथ-साथ संरचनात्मक और सांस्कृतिक हिंसा पर भी ध्यान केन्द्रित करता है।         

       शांति और सुरक्षा की अवधारणाएँ व्यापक और गहराई से आपस में जुड़ी हुई हैं। शांति की अवधारणा के तरह ही सुरक्षा का विमर्श भी बदल रहा है और समय के साथ विकसित हो रहा है। सामान्य भाषा में “सुरक्षा” शब्द विभिन्न प्रकार के जोखिमों के अभाव की दशा को दर्शाता है। इसका बुनियादी अर्थ खतरों से आज़ादी में निहित है। ऑक्सफोर्ड इंग्लिश शब्दकोश में सुरक्षा शब्द को खतरा न होने की दशा; सुरक्षा, देखभाल, चिंता या आशंका से आज़ादी की भावना या खतरे का अभाव के रूप में परिभाषित किया गया है।

            सुरक्षा के पारंपरिक दृष्टिकोण में राज्य की सुरक्षा पर विशेष बल दिया गया है और वाह्य आक्रमणों एवं आंतरिक सशस्त्र संघर्षों को राज्य की संप्रभुता के लिए खतरे के रूप में चिन्हित किया गया। इन खतरों से निपटने के लिए सैन्य शक्ति के उपयोग को एकमात्र विकल्प के रूप में देखा गया। जिसके परिणामस्वरूप राज्य द्वारा सीधी हिंसा के प्रयोग को वैधता भी मिली। इस प्रकार सुरक्षा संबंधी शुरुआती चिंतन राज्य के सीमाओं और आंतरिक विद्रोहों से राज्य की संप्रभुता को सुरक्षित रखने तक सीमित था, यही कारण है कि इस दृष्टिकोण को सुरक्षा का राज्य केन्द्रित दृष्टिकोण भी कहा जाता है। इस दृष्टिकोण में सुरक्षा के परंपरागत प्रत्ययों जैसे कि सैन्य-आधुनिकीकरण, शस्त्रों की होड़ और रक्षा बजट में वृद्धि आदि पर विशेष ध्यान दिया गया।

            20 वीं सदी के सत्तर के दशक से सुरक्षा की परंपरागत अवधारणा पर विद्वानों द्वारा सवाल उठाए जा रहे है। शीत-युद्ध के अंत के बाद से ही सुरक्षा की यह अवधारणा विद्वानों द्वारा आलोचना के केंद्र में है। व्यक्तियों के बजाय राज्य की सुरक्षा पर अधिक बल देने के इस दृष्टिकोण की गंभीर आलोचनाएँ हुईं और इसे सुरक्षा का संकुचित दृष्टिकोण कहा गया। इन विद्वानों ने आलोचनाओं के साथ सुरक्षा की अवधारणा के क्षेत्र में सर्वथा नवीन विमर्श प्रस्तुत किया जिसे ‘मानव-सुरक्षा’ के नाम से जाना जाता है[6]। अब यह स्वीकार किया जाने लगा है कि कुछ नए अंतर्राष्ट्रीय खतरे भी हैं जिनसे सिर्फ सीमाओं के सैन्यीकरण से नहीं निपटा जा सकता है। शीत-युद्ध के बाद की अवधि के इन खतरों की पहचान आंतरिक-संघर्ष, गरीबी, भूख, सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरणीय खतरे, कुपोषण, संक्रामक रोग, बाढ़, सूखा, अकाल, संगठित अपराध एवं मानवाधिकार उल्लंघन आदि के रूप में किया गया है। मानव-सुरक्षा का अभिप्राय सुरक्षात्मक है और ऐसे खतरों की पहचान करता है जो व्यक्ति और समुदाय के नियंत्रण से परे हैं। वित्तीय संकट, हिंसक संघर्ष, एड्स, राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति का अभाव, आतंकी हमले, जल संकट, खाद्यान संकट, पर्यावरण-जनित बीमारियाँ एवं खतरनाक दुर्घटनाएँ ऐसे संकट हैं जो मानव-सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन रहे हैं[7]

            शांति और सुरक्षा के पुराने और नए विमर्शों की परिधि में भारत के माओवादी आंदोलन पर विचार किया जा सकता हैं। नक्सलवादी आंदोलन (आज का माओवादी आंदोलन) की शुरुआत में राज्य-मशीनरी द्वारा इस आंदोलन को कानून और व्यवस्था की समस्या के तौर पर देखा गया और परंपरागत सुरक्षा की संकल्पनात्मक परिधि में इसे नियंत्रित करने का प्रयास किया गया। अर्द्ध-सैनिक बलों और स्थानीय पुलिस द्वारा इस आंदोलन को कुचल भी दिया गया और 1972 तक यह आंदोलन अपने राजनीतिक स्वरूप में पूर्णतः समाप्त भी हो गया था। लेकिन 80 के दशक से इस संघर्ष ने एक बार फिर सिर उठाया और अभी तक जारी है। कानून और व्यवस्था की स्थापना और इस आंदोलन को कुचलने की प्रक्रिया में राज्य की बलमूलक संस्थाओं द्वारा बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों का उल्लंघन किया था और इस पूरे आंदोलन की लामबंदी के पीछे काम कर रही सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों की अनदेखी की गई जबकि इस आंदोलन के पीछे कुछ ऐसे सामाजिक-आर्थिक कारण न भी हैं जो इसे मानवाधिकार उल्लंघन, वंचना और मानव-असुरक्षा के व्यापक मुद्दों से संबंधित करते हैं। अतः यह आवश्यक हो गया है कि इस संघर्ष को मानव-सुरक्षा के प्रतिमान के तहत विश्लेषित किया जाए[8]

            जाहिर तौर पर राष्ट्रीय-सुरक्षा दृष्टिकोण की असफलता ने यह सिद्ध कर दिया है कि जब-तक शांति और सुरक्षा के नए और व्यापक दृष्टिकोण को नहीं अपनाया जाता माओवादी आंदोलन से निपटा नहीं जा सकता। संपोषणीय शांति की स्थापना के लिए मानव-सुरक्षा दृष्टिकोण अपनाया जाना जरूरी है, जिसके द्वारा संरचना में निहित अन्यायों और असमानताओं को मिटाकर संघर्ष को समाप्त किया जा सके। व्यक्ति-केन्द्रित सुरक्षा या सुरक्षा का मानवीय दृष्टिकोण के रूप में संदर्भित मानव-सुरक्षा दृष्टिकोण दो अवधारणात्मक वाक्यांशों द्वारा परिभाषित किया जाता है: भय से स्वतन्त्रता और भूख से स्वतन्त्रता। भय से स्वतन्त्रता सुरक्षा की प्राथमिक पहचान है जबकि भूख से स्वतन्त्रता का उद्देश्य व्यक्ति के कुशल-क्षेम को बढ़ाना है[9] ताकि व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का समुचित विकास कर सके। मानव-सुरक्षा की ये दोनों अवधारणाएँ बेहद करीब से माओवादी संघर्ष का विश्लेषण करती हैं। एक तरफ माओवादियों ने अपने आंदोलन के लिए हिंसा के साधनों का इस्तेमाल करके भय का वातावरण बनाया है तो दूसरी तरफ वे सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का विरोध करते हैं और स्कूल, अस्पताल आदि को नष्ट करके आम स्थानीय लोगों के कुशल-क्षेम को नुकसान पहुंचा रहे हैं। मानव-सुरक्षा की अवधारणा माओवादियों के साथ-साथ राज्य की भूमिका और उसके उत्तरदायित्वों का भी परीक्षण करती है। माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा-बलों द्वारा स्थानीय लोगों की हत्या, जबरन उठाना, प्रताड़ना, स्त्रियॉं के साथ बलात्कार आदि रोज़मर्रा की घटनाएँ हैं। इसके अलावा राज्य द्वारा पूंजीपति वर्ग के हितों के लिए स्थानीय लोगों को उनके ज़मीन और जंगल से बेदखली की प्रक्रिया का शुरू किया जाना उनके जीवन-सुरक्षा के खिलाफ दोहरी मार है। राज्य की यह वर्गीय भूमिका शोषितों के हिंसक संघर्ष में ईधन का काम करती हैं। आधुनिक लोकतांत्रिक राज-व्यवस्थाओं के दौर में शांति, सुरक्षा और विकास के मुद्दे को राज्य के मामलों से अलग नहीं किया जा सकता है। संघर्ष और हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में राज्य की यह भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि राज्य और इसकी एजेंसियां कमजोर होंगी और खराब तरह से कार्य करेंगी तो गरीब और कमजोर सबसे ज्यादा पीड़ित होंगे।

संरचनात्मक खामियाँ और हिंसा:

            काफी हद तक संघर्ष की स्थिति के लिए संरचना में निहित खामियाँ जिम्मेदार हैं। ये खामियाँ राज्य की एजेंसियों की असंगतता, अक्षमता, और अप्रभाविता से संबंधित हैं जो राज्य की खराब नीतियों और कु-प्रशासन के रूप में परिलक्षित होती हैं। ये सामाजिक जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से संघर्षों को जन्म देती हैं। भारत में माओवादी संघर्ष और भूमि-सुधार के मामले ऐसे ही हैं जिसमें दूसरा पहले का कारण है। स्वतन्त्रता पश्चात देश में भूमि सुधार के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किया गया, जो प्रयास हुये हैं वो अधूरे और कानूनी अड़चनों में सिमट कर रहा गए। ग्रामीण-प्रभुत्व-संरचना भू-स्वामित्व से जुड़ा हुआ है जो शक्ति और अवसरों तक व्यक्ति की पहुँच को तय करता है और भूमि के अभाव में यह संरचना श्रमिक वर्ग के शोषण और वंचना का कारण बन जाती है[10]। कृषक समाजों में सामाजिक स्तरीकरण और सामाजिक –आर्थिक संबंध भू-स्वामित्व और अन्य उत्पादक संपत्तियों तक पहुँच द्वारा निर्धारित होता है। चूंकि दलित और जनजातीय समुदाय के लोग ज़्यादातर भूमिहीन हैं इसलिए उन्हें सामाजिक संरचना में सबसे निचले पायदान पर जगह मिलती है। दलितों की एक बड़ी आबादी अभी तक भूमिहीन है और इनमें भी एक बड़ी संख्या ऐसी है जिनके पास रहने के लिए सुरक्षित घर तक नहीं है। माओवाद के संदर्भ में यह देखना प्रासंगिक होगा कि वंचना की ऐसी स्थिति किस प्रकार से संघर्ष को बढ़ाने में योगदान दे रही है। रोजगार के अवसरों में कमी के कारण ग्रामीण दलित अपनी आजीविका के लिए भू-स्वामियों पर निर्भर हैं।

          कृषक समाज की शोषणकारी संरचना का स्पष्ट परिलक्षण किसानी की बटाई व्यवस्था में होती है, जिसमें भूमिहीन व्यक्ति भू-स्वामी से खेती करने के लिए भूमि किराए या बटाई पर लेता है। वैकल्पिक रोजगार के अभाव में भूमिहीनों के पास अपनी आजीविका का एकमात्र स्रोत खेती ही है। असमान सामाजिक-आर्थिक स्थिति के कारण किसान भू-स्वामियों से सौदा करने की स्थिति में नहीं होते और सारी मेहनत और लागत लगाने के बाद भी उसे उपज के बहुत छोटे से हिस्से से संतोष करना पड़ता है। इस प्रकार की शोषणकारी शर्तों ने भूमिहीन गरीब किसानों के बीच बहुस्तरीय हताशा को जन्म दिया है। हालांकि मनरेगा जैसे कार्यक्रमों के आने के बाद और शहरीकरण बढ़ने से हालात कुछ सुधरे जरूर हैं। यहाँ यह बात यौक्तिक है कि नक्सलवादी आंदोलन का एक प्रसिद्ध नारा था – लैंड टू टिल्लर’, अर्थात जमीन उसकी जो जोते।               

             भारत में हाशिएकरण का सर्वाधिक शिकार समुदाय जनजातीय समुदाय है। उनको सक्षम बनाने के विशेष संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद भी उनके भूमि और संपत्ति संबंधी अधिकार लगातार खतरे में हैं। इस समुदाय की उनके जमीन से बेदखली की जो प्रक्रिया औपनिवेशिक शासन काल में शुरू हुई थी वह उत्तर-औपनिवेशक काल में भी जारी है और नव-उदारवादी आर्थिक प्रणाली के दौर में यह और तीव्र हुई है। यह स्वीकार किया जाना चाहिए के नई विकास नीतियों के परिणामस्वरूप जनजातियों का जमीन से बेदखली की प्रक्रिया सीधे तौर पर तेज़ हुई है है और विकास के नाम पर वंचना के वे सबसे ज्यादा शिकार हो रहे हैं। विकास की बड़ी-बड़ी परियोजनों के कारण जनजातीय समुदाय की आजीविका के साथ-साथ उनके सांस्कृतिक पहचान का संकट भी खड़ा हो गया है[11]

            भूमि, जनजातियों के लिए, न केवल आजीविका का स्रोत है बल्कि यह उनके इतिहास की समझ से जुड़ा और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक है[12]। यह उनके आर्थिक जीवन का प्रमुख पहलू है। अपनी भूमि से उनका विस्थापन भी माओवादी संघर्ष की निरंतरता में योगदान दे रहा है। विकास का हमारा नज़रिया और उसकी कार्य-पद्धति ऐसी होनी चाहिए जो ऐसी संरचनात्मक परिस्थितियाँ विकसित करे ताकि व्यक्ति स्वातंत्र्य में वृद्धि हो। लेकिन विकास की प्रक्रिया का इतिहास इसके विपरीत नज़र आता है। बढ़ रही संरचनात्मक-हिंसा अक्सर विकास से आए सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों का उप-उत्पाद है। औद्योगिकीकरण के कारण बढ़ रही संरचनात्मक-हिंसा इस संदर्भ में बेहतर उदाहरण हो सकता है। जब गरीबी और अभाव बड़े पैमाने पर जारी रहता है तो संघर्ष और हिंसा की संभावना बढ़ जाती है। सारणी संख्या-1 से माओवाद प्रभावित राज्यों के अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के सामाजिक-जनसांख्यिकी और गरीबी की स्थिति का पता चलता है। इन राज्यों में एससी और एसटी की बड़ी जनसंख्या गरीबी के साथ जीवन निर्वाह कर रही है। इन वर्गों में आय-गरीबी की उच्च स्थिति माओवादी हिंसक संघर्ष के लिए उपजाऊ जमीन की तरह है।

सारणी संख्या-1

माओवाद प्रभावित राज्यों की सामाजिक-जनसांख्यिकी और गरीबी की स्थिति (%में)

 

सामाजिक-जनसांख्यिकी*

गरीबी की स्थिति**

 

SS#

DWS##

ग्रामीण

शहरी

 

एसटी

एससी

एससी

एसटी

एससी

एसटी

योग

एससी

एसटी

योग

ओड़ीसा

9.7

3.4

23.6

18.9

50.2

75.6

46.8

72.6

61.8

44.3

बिहार

1.22

11.74

0.92

22.22

64.0

53.3

12.1

67.2

57.2

34.7

छत्तीसगढ़

10.01

1.58

37.54

13.68

32.7

54.7

40.8

52.0

41.0

41.2

झारखंड

9.6

3.8

20.8

19.1

57.9

54.2

46.3

47.2

45.1

20.1

महाराष्ट्र

7.0

4.8

8.4

13.1

44.8

56.6

29.6

43.2

40.4

32.2

प॰ बंगाल

3.8

9.2

5.2

29.2

29.5

42.4

28.6

28.5

25.7

14.8

    स्रोत: सामाजिक-जनसांख्यिकी* के लिए NSS 64th Round, 2007-2008,   # Share of State

               गरीबी की स्थिति** के लिए Planning Commission, 2008, ## Distribution within State

            माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में निवास करने वाले लोग गरीबी, भूख, निम्न गुणवत्ता की शिक्षा, अपर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं, अल्प-स्वच्छता, ऊंची शिशु मृत्यु-दर, उच्च मातृ-मृत्यु-दर, निम्न आय, और निम्न जीवन स्तर के साथ कई अन्य प्रकार की संरचनात्मक हिंसाओं का सामना अपने नित्यप्रति जीवन में करते है। राज्य और माओवादियों के बीच संघर्ष के कारण इन क्षेत्रों में मानव-विकास प्रक्रिया अवरुद्ध हुई है। बहुआयामी गरीबी सूचकांक (एमपीआई) के संबंध में ये क्षेत्र बेहद खराब स्थिति में दिखते हैं। एमपीआई के आंकड़े बताते हैं कि महाराष्ट्र को छोड़कर शेष सभी माओवाद प्रभावित राज्यों की 50% से अधिक एससी और एसटी जनसंख्या गरीब है (देखें सारणी संख्या-2)।

            योजना आयोग के विशेष समूह की एक कमेटी ने देश के माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में विकास की चुनौतियों का अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट डेव्लपमेंट चैलेंजेस इन एक्सट्रीमिस्ट अफेक्टेड एरियास सौपी। यह अध्ययन उन राज्यों के माओवाद प्रभावित और अप्रभावित जिलों से किया गया है जहां माओवाद आज भी बड़ी चुनौती है। सामाजिक सुरक्षा के संकेतों के संदर्भ में यह अध्ययन दिलचस्प आंकड़े प्रस्तुत करता है। सारणी संख्या-3 बताती है कि माओवाद से प्रभावित जिलों में एससी और एसटी की आबादी ज्यादा है और इनके बीच गरीबी और वंचना का स्तर गंभीर रूप से निम्न है। इस अध्ययन का एक पहलू जीवन की गुणवत्ता और हिंसा के बीच सम्बन्धों का परीक्षण करता है। माओवाद प्रभावित जिलों में निम्न साक्षारता-दर, उच्च-शिशु-मृत्यु दर, शहरीकरण की सुस्त प्रक्रिया और कृषि-श्रम पर अत्यधिक निर्भरता अप्रभावित जिलों की तुलना में ज्यादा है। एक अन्य महत्वपूर्ण बात जो यह रिपोर्ट बताती है कि माओवाद प्रभावित जिलों में जंगल-आच्छादन ज्यादा है। घने जंगल वाले क्षेत्र गुरिल्ला युद्ध के लिए आदर्श भौगोलिक परिस्थिति है। अल्प-विकास और जंगल-आच्छादन दोनों मिलकर माओवाद के विकसित होने के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ तैयार करते हैं।    

           

सारणी संख्या-2

माओवाद प्रभावित राज्यों गरीबी रेखा के नीचे की जनसंख्या, 2004-2005 और 2009-2010

राज्य

Poor Persons

(in Lakh)

HCR*

(%)

2004-05

HCR** (%)

2009-10

HCR** (%)

Multi-Dimensionally poor,

2005-06

ओड़ीसा

178.5

46.4

37.0

63.2

बिहार

369.2

41.4

53.5

79.3

छत्तीसगढ़

91.0

40.9

48.7

69.7

झारखंड

116.4

40.3

39.1

74.8

महाराष्ट्र

--

30.7

24.5

37.9

प॰ बंगाल

--

24.7

26.7

57.4

भारत

3,017.0

27.5

29.8

53.7

स्रोत:Computed from Report of the Expert Group to Review the Methodology for Estimation of Poverty, (2009) Planning Commission: New Delhi

*Head Count Ratio, HCR** taken from Table A.3 of Dreze, Jean & Amartya Sen (2013): An Uncertain Glory: India and its Contradictions, Allen Lane (Penguin Books), London

            संरचना में निहित इस प्रकार की खामियाँ संरचनात्मक-हिंसा का कारण हैं; एक ऐसी अज्ञात हिंसा जो अप्रत्यक्ष रूप से आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरों का ईधन बन रही हैं। माओवादी संघर्ष की शुरुआत में राज्य ने इसे कानून और व्यवस्था की समस्या के रूप में देखा और अर्द्ध-सैनिक बलों के उपयोग द्वारा शांति बनाए इस संघर्ष को दबाने और शांति व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास किया गया। लेकिन परंपरागत सुरक्षा दृष्टिकोण से किया गया यह प्रयास नकारात्मक और अस्थाई शांति ही स्थापित कर पाया और अनुकूल अवसर मिलते ही माओवादी संघर्ष ने फिर सिर उठा लिया।   

सारणी संख्या-3

माओवाद प्रभावित और अप्रभावित जिलों में भेद करने वाले कारक

पाँच राज्यों के प्रभावित/अप्रभावित जिलों के आंकड़े

 

ओड़ीसा

झारखंड

छत्तीसगढ़

बिहार

आंध्र प्रदेश

एससी+एसटी जनसंख्या(%)*

65/23

45/36

69/36

19/18

26/22

साक्षारता दर(%)*

44/76

40/51

50/68

46/48

56/68

शिशु मृत्यु दर (1000 जन्म पर

123/73

N/A

76/57

N/A

34/28

शहरीकरण (%)*

17/23

10/37

07/29

12/8.6

24/27

वन क्षेत्र(%) **

39/15

38/16

53/28

08/01

17/14

कृषि श्रम(%)*

35/25

29/20

26/34

52/46

40/51

स्रोत: Adopted from Planning Commission Expert Group (2008), Development Challenges in Extremist Affected Areas, Planning Commission, New Delhi

*figure based on 2001 census, Registrar General of India, New Delhi.

**figure based on Forest Survey of India 2003.

Note: For each state, the table compares four districts were the Naxalite movement is most active (the affected districts) with four districts that are comparatively developed (forward districts). For details about the selected districts see Development Challenges in Extremist Affected Areas, Planning Commission, Pp 21

            माओवादी आंदोलन जो की पूरी तरह से गरीबी, बेरोज़गारी और भूख पर केन्द्रित है, राज्य के खिलाफ जन-संघर्ष को बढ़ाता जा रहा है। चूंकि हमारी लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था संरचनात्मक हिंसाओं का समाधान करने में विफल रही है इसलिए इन क्षेत्रों के लोगों को गरीबी और भुखमरी का सामना करना पड़ रहा। जब तक इन संरचनात्मक खामियों को सुधारा नहीं जाता तब तक माओवादी संघर्ष जारी रहेगा और सकारात्मक शांति एक कल्पना ही रहेगी।

‘प्रचुरता में वंचना’ दृष्टिकोण:

            भारत के माओवादी आंदोलन को समझने के कई सैद्धान्तिक और नीतिगत आधार हैं, जिनमें से कुछ का जैसे की कानून और व्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा दृष्टिकोण और मानव-सुरक्षा दृष्टिकोण पर ऊपर विमर्श किए गया। इनके अलावा लालच और शिकायत (ग्रीड एंड ग्रीवांस) दृष्टिकोण और तुलनात्मक वंचना दृष्टिकोण भी हैं। लालच दृष्टिकोण सीमित परिप्रेक्ष्य में इस आंदोलन की व्याख्या कर पाता है और इसे विद्रोहियों के हितों और स्वार्थों को पूरा करने वाले आंदोलन तक सीमित करता हैं। इस दृष्टिकोण का मुख्य आग्रह इस बात पर है कि प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण हिंसक संघर्षों का मुख्य कारण है। अगर इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो माओवादियों से ज्यादा राज्य प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की प्रक्रिया में लोगों की वंचना और दरिद्रता बढ़ा रहा है। प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण के लिए संघर्ष उन जगहों पर होते हैं जहां संसाधन सीमित हैं और उत्तरजीविता दिन-प्रतिदिन की चुनौती होती है। भारत जैसे प्राकृतिक संसाधन सम्पन्न देश में हिंसक संघर्षों की व्याख्या के लिए यह दृष्टिकोण त्रुटिपूर्ण और अपर्याप्त होगा। इस दृष्टिकोण के साथ-साथ शिकायत दृष्टिकोण भी हिंसक संघर्षों के कारणों की समीक्षा करता है। यह दृष्टिकोण मानता है कि क्षैतिज असमानताएं सामाजिक संघर्षों को जन्म देती हैं। क्षैतिज असमानताओं का संबंध संपत्ति की असमानता, सत्ता में असमानता, गरीबी, सार्वजनिक सेवाओं तक असमान पहुंच, आर्थिक कुप्रबंधन, कमजोर संस्थानों और सार्वजनिक रोजगार तक असमान पहुंच से है। 'क्षैतिज असमानता' की अवधारणा ('आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक आयामों या सांस्कृतिक रूप से परिभाषित समूहों के बीच सांस्कृतिक स्तर में असमानता') भारतीय माओवादी संघर्ष को समझने में अत्यधिक प्रासंगिक है और देश में माओवादी संघर्ष से निपटने के लिए पिछड़े क्षेत्रों के विकास हेतु इस दृष्टिकोण को व्यापक रूप से स्वीकार भी किया गया है। लेकिन इस सिद्धान्त की भी अपनी कुछ सीमाएं हैं जो माओवादी संघर्ष को उसके समग्र आयाम में नहीं देख पाती हैं। सर्वप्रथम, यह सही है कि माओवाद प्रभावित क्षेत्र अत्यधिक पिछड़े हैं और क्षैतिज असमानता वहां मौजूद हैं, लेकिन ऐसे अन्य क्षेत्र भी हैं जहां क्षैतिज असमानताएं हैं लेकिन वहाँ कोई हिंसक विद्रोह नहीं है, जैसे बुंदेलखंड। इस प्रकार शिकायत परिप्रेक्ष्य दो समान परिस्थितियों वाले क्षेत्रों में, एक पूरी तरह से शांतिपूर्ण है और दूसरा में सशस्त्र संघर्ष क्यूँ है की व्याख्या करने में असमर्थ है। दूसरा, शिकायत परिप्रेक्ष्य यह सुझाव देता है कि सशस्त्र संघर्ष के लिए आर्थिक विकास प्रभावी उपाय हो सकता है, लेकिन ऐसा देखा जाता है कि आर्थिक विकास विद्रोह के विकास या नवीकरण में योगदान देता है। उदाहरण के लिए, छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में विकास के लिए किए जा रहे कार्य माओवादी संघर्ष में वृद्धि कर रहे हैं। इसके अलावा क्षैतिज असमानताएं भी सीधे तौर पर माओवाद का कारण नहीं हो सकती। महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ की ह्यूमन डेव्लपमेंट इंडेक्स रैंकिंग में बहुत अंतर है लेकिन दोनों राज्यों में माओवादी सशस्त्र संघर्ष है। विकास प्रेरित विस्थापन माओवादी संघर्ष के प्रमुख कारणों में से एक है। अनियमित आर्थिक विकास उन लोगों के बहिष्कारण को और तेज करता है जो पहले से ही बाहर हैं। तीसरा, आय की असमानता और गरीबी हिंसा के लिए एकमात्र कारण नहीं हैं। कई बार लोग गरीबी के साथ जीने के अभ्यस्त हो जाते है; गरीबी भारत जैसे विकासशील देशों में लोगों के जीवन का हिस्सा है। इसे माओवादी या अन्य सशस्त्र संघर्षों के कारण के रूप नहीं देखा जा सकता है। गरीबी, तुलनात्मक वंचना के व्यापक संदर्भ में, विद्रोह का कारण हो सकता है।

            एक अन्य दृष्टिकोण तुलनात्मक वंचना का है जो संघर्ष का कारण किसी समूह में व्याप्त असमानता को मानता है। तुलनात्मक वंचना के सिद्धांतकारों का मानना है कि 'राजनीतिक हिंसा' और 'राजनीतिक आंदोलन' के कई कारक हैं, लेकिन प्रभावशाली कारक सामूहिकता या लोगों में असमानता की आत्मनिष्ठ समझ है। इसलिए, तुलनात्मक वंचना या सापेक्ष अभाव सिद्धांत का मुख्य तर्क यह है कि संघर्ष केवल समसामयिक सामाजिक घटना नहीं है, बल्कि यह वंचना के मनोवैज्ञानिक अनुभव का अविभाज्य अंग है। संघर्ष की नींव लोगों के मन में होती है। ऐसे लोग या समुदाय जो स्वयं को संसाधनों से वंचित महसूस करते हैं, वे संघर्ष करते हैं। इस दृष्टिकोण के अनुसार, जो लोग कुछ वस्तुओं या सेवाओं से खुद को वंचित महसूस करते हैं, उनके द्वारा अपनी स्थिति में सुधार करने के लिए सशस्त्र संघर्ष शुरू करने की संभावना अधिक होती है। लेकिन व्यावहारिक रूप से इस दृष्टिकोण की भी अपनी कुछ कमियाँ हैं। सापेक्ष अभाव सिद्धांत संघर्ष के अंतर्निहित कारकों पर ध्यान केंद्रित नहीं करता है, जैसे कि संसाधनों की कमी, लोगों की गतिशीलता, विस्थापन, और मान्यताएँ आदि। यह पूरी तरह से संघर्ष के भौगोलिक कारकों और लालच पहलू की भी अनदेखी करता है। यद्यपि माओवादी आंदोलन का मुख्य आधार, मध्य भारत के आदिवासियों के निवास-स्थान भारत के अन्य स्थानों से अपेक्षाकृत वंचित हैं, फिर भी इसका यह मतलब नहीं है कि वे माओवादी संघर्ष का समर्थन करते हैं। इसके अलावा, वंचित होना हमेशा विद्रोही होना नहीं होता। उदाहरण के लिए, मुंबई का धारावी, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती, यह सापेक्ष वंचना का एक अच्छा उदाहरण हो सकता है, लेकिन मुंबई में हिंसक संघर्ष नहीं है।

            प्रश्न यह है कि हम किस प्रकार से भारत के माओवादी आंदोलन को समझे। मैं इसे प्रचुरता में वंचना की दृष्टिकोण से देखता हूँ। सीधे तौर पर हम कह सकते हैं कि हिंसा की संभावना तब बढ़ जाती है जब लोग ऐसी जगह पर रह रहे हो जो प्राकृतिक संपदाओं से सम्पन्न हो और लोगों को गरीबी और वंचना का शिकार होना पड़े। यह दृष्टिकोण भी मानव-सुरक्षा के व्यापक दृष्टिकोण का एक हिस्सा हो सकता है जो इस विचार को और व्यापक बनाता है। भारत में प्राकृतिक संपदा से समृद्ध खनन क्षेत्र हिंसक विद्रोह के बड़े केंद्र भी है और देश की 'आंतरिक सुरक्षा' के लिए एक महत्वपूर्ण खतरा हैं। भारत में खनन, विस्थापन और माओवादी संघर्षों के बीच कारणात्मक संबंध जटिल और फैला हुआ है। ऐसे लोग जिनका जीवन समृद्ध हो सकता हैं उन लोगों के जीवन में व्याप्त गरीबी और वंचना उनको संगठित हिंसा के लिए मजबूर करती हैं। 'प्रचुरता में वंचना दृष्टिकोण- विकासात्मक नीतियां किस प्रकार आदिवासी लोगों को उनके निर्वाह स्तर पर या उससे भी बुरी स्थिति में ला खड़ी कर रही हैं, जबकि उनके निवास-स्थल में प्राकृतिक और खनिज संसाधनों की प्रचुरता से उनके जीवन को समृद्ध होना चाहिए'- एक नए दृष्टिकोण से माओवादी संघर्ष को समझने का एक प्रयास होगा।

            यह देखा गया है कि लोगों में अन्यों की तुलना में गरीब और वंचित होना हमेशा संघर्ष का कारण नहीं होता। अगर ऐसा होता तो देश के सभी शहर हिंसक-संघर्षों की चपेट में होते। दरअसल शहरों की झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले दूसरे शहरी की तुलना में वंचित हैं लेकिन उनकी दैनिक जरूरतें और शौक पूरे हो जाते है। अतः मनोवैज्ञानिक रूप से वे लोग अपनी स्थिति के साथ तारतम्य बैठाकर लगभग शांतिपूर्ण जीवन निर्वाह करते हैं। इस बात में कोई शक नहीं कि भारत का माओवादी आंदोलन के एक संगठित और राज्य के खिलाफ प्रायोजित हथियार बंद आंदोलन है, न की स्वतःस्फुर्त है। लेकिन इस आंदोलन के पैदल सिपाही, भारत का आदिवासी और दलित, तुलनात्मक वंचना के कारण नहीं बल्कि प्रचुरता में अपनी वंचना के कारण खड़े हैं। वास्तव में माओवादी संघर्ष संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण के लिए शुरू किया गया था जो अब भटकाव की दिशा में है। प्रचुर वन संपदा और खनिज से भरी जिस जमीन पर इस आंदोलन को चलाया जा रहा है उसपर निवास करने वाले दुर्भाग्यशाली लोग बेहद दयनीय जीवन-परिस्थितियों का सामना करते हैं, जबकि उनका जीवन सम्पन्न और शांतिपूर्ण होना चाहिए था। यह संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण से संभव हो सकता है। संसाधनों पर आदिवासियों की हकदारी सुनिश्चित किए बिना माओवादी संघर्ष को समाप्त नहीं किया जा सकता।    

 संदर्भ सूची:

 

[1] त्रिपाठी, अम्बिकेश कुमार (2012), माओवादी हिंसा: इतिहास, दर्शन, मनोविज्ञान और परिणाम, जनकृति अंतरर्राष्ट्रीय पत्रिका, वर्ष 2, अंक 23, जनवरी-मार्च, 2017

[2] डार्लिंग, एम॰एल॰ (1925), द पंजाब पीजेंट इन प्रास्पेरिटी एंड डेब्ट, पृष्ठ संख्या 73, रजनी पामदत्त (1970), आज का भारत से उद्धृत, द मैकमिलन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 43

[3] रजनी पामदत्त (1970), आज का भारत, द मैकमिलन, नई दिल्ली,

[4] एक्का, अलेक्स (2012), डिसप्लासमेंट ऑफ ट्राइबल इन झारखंड: ए वाइलेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स, देव नाथन और वर्जिनियस खाखा (संपादित), सोशल एक्सक्लूजन एंड अडवर्स इंक्लूजन: डेव्लपमेंट एंड डेप्रीवेशन ऑफ आदिवासी इन इंडिया, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या- 53-54 

[5] उपाध्याय, प्रियंकार (जून 21, 2016), पीस इज़ ए प्रोसैस, बीज वक्तव्य, जेनेवा कंसल्टेटिव मीटिंग https://blogs.prio.org/2016/06/peace-is -a-process/

[6] त्रिपाठी, अम्बिकेश कुमार (2011), माओईस्ट इंसर्जेंसी एज़ अ थ्रेट टु ह्यूमन सेक्युर्टी: द इंडियन एक्स्पेरींसेस, शोध दृष्टि, अंक 2, संख्या 7, अक्टूबर-दिसंबर, 2011, पृष्ठ संख्या 23-27

[7] अलकाइर, सबीना (2003), ए कोन्सेप्चुयल फ्रेमवर्क फॉर ह्यूमन सेक्युर्टी, वर्किंग पेपर 2, सेंटर फॉर रिसर्च ऑन इक्युलिटी, ह्यूमन सेक्युर्टी एंड इथिनिसिटी (सीआरआईएसई), क्वीन एलीज़ाबेथ हाउस, यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड

[8] त्रिपाठी, अम्बिकेश कुमार (2011), माओईस्ट इंसर्जेंसी एज़ अ थ्रेट टु ह्यूमन सेक्युर्टी: द इंडियन एक्स्पेरींसेस, शोध दृष्टि, अंक 2, संख्या 7, अक्टूबर-दिसंबर, 2011, पृष्ठ संख्या 23-27

[9] सहाय, गुरांग आर॰ (2008), नक्सलिज़्म, कास्ट बेस्ड मिलिटियस, एंड ह्यूमन सेक्युर्टी: लेससन फ्रम बिहार, एशियन स्टडीस असोसियशन मेलबोर्न, आस्ट्रेलिया

[10] कुन्नाथ, जार्ज जे॰ (2012), रिबेल्स फ्रम द मॅड हाउसेस: दलित्स एंड द मेकिंग ऑफ द माओईस्ट रेवोलुशन इन बिहार, सोशल साइन्स प्रेस, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या 20-21

[11] अंबगुडिया, जगन्नाथ (2010), ट्राइबल राइट्स, डिस्पोसेसन एंड द स्टेट इन ओड़ीसा, इकनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली, अंक 45, संख्या 33, अगस्त 14, 2010, पृष्ठ संख्या 60-67 

[12] एल्विन, वेरियर (1963), न्यू डील फॉर ट्राइबल इंडिया, मिनिस्टरी ऑफ होम अफेयर्स, गवर्नमेंट ऑफ इंडिया, न्यू डेलही