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जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

कुमारी अर्चना की कविता

"पत्रों का घर"


मैं पत्रों का जमा घर हूँ
सब मुझे डाकघर कहते है
छोटा सा लाल मटोल दिखता हूँ
छोटा सा लाल मटोल दिखता हूँ !

लेकिन लोगों के जीवन के सातों रंगों के पत्रों को संभालता हूँ
आंधी हो या तूफान
धूप हो या छाँव
गर्मी हो या जाड़ा
एक ही जगह दँटा हुआ रहता हूँ
तुम्हारे पत्रों के इन्जार में !

बच्चों से लेकर युवा व वृद्ध
सभी वर्ग के लोंग अपनों और परायों को पत्र लिखते है
लेकिन मोबाईल और ईमेल के आने से
यारों
मैं पुराने जमाने की बात हो गया हूँ
अब बस लोग कूरियर और स्पीड पोस्ट के लिए आते मेरे पास
आजकल नोटबंदी होने पर रूपये परिवर्तन कराने आते
बड़े दूर दराज के लोग भी
जो कल तक मुझे भूल चुके थे !

कभी बेटी अपने पिता को खत लिखा करती थी
जब पत्र में प्रेमिका अपने प्रेमी को
मिलने खेतों की मुढ़ेढ पर बुलाया करती थी
नयी नवेली दुल्हन अपने सजना को
केवल पत्र में प्रेम दिखाया करती थी
रूठना मनाना बस पत्रों में हुआ करता था
जब कोई बेटा दूर प्रदेश को जाया करता था
आखों में माँ बाप का चेहरा याद आया करता था
जब पत्र लिख कुशलक्षेम पूछा करता था
घर वापस आउँगा माँ लिखा करता था
माँ बाप की जान में जान फिर आ जाया करती थी !

कभी भरा भरा रहता था मैं पत्रों  से
आज खाली खाली सा रहता हूँ
मैं  बिन पत्रों के !

डाकिया खुश हो जाया करता था
तुम्हारे पत्रों को देखकर
कभी कभी उनकों पढ़कर भी
त्योंहारों में नेक भी तुमसे पाता था
पर अब मैं और डाकिया दोनों तुम्हारे पत्रों के इन्तजार में रहते है !

कि तुम फिर से पत्र लिखोंगे अपने को
भूले से याद करोंगें किसी पड़ोसी को
क्या तुम एक बार फिर से पत्र लिखोंगे
फिर से  वही मुस्कान आएगी मेरे चहरे पे
जैसे पहले आया करती थी
आज भी बड़ा सस्ता लिफ्फा मिलता और पोस्टकार्ड मिलता है 
बस एक खत डालों तो
फिर खत लिखने का सिलसिला चल पड़ेगी
पीढियों से चली आ रही परम्परा बच जाएगी...

कुमारी अर्चना
पूर्णियाँ,बिहार