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जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

अनूप बाली की कविता

 

हत्याओं का युग

 

सनसनीखेज इरादों की

खून से लिथड़ी हुई नींदें

वहशियत की हद्द तक नाचतीं हैं

 

भटकती तलाश में

गिरफ्तार गुमशुदगी

उन्मादी भीड़ के ज़ायके को चखती है

 

बूढी इमारतों-सा कांपता

एक नामालूम हादसा

ज़िंदगियों में ज़हर घोलता है

 

तुम्हारी चुप्पियों के पीछे

छिपन-छपाई खेली जा रही है

लिखे जा रहे हैं

नए युगों के धर्म-ग्रन्थ

तुम्हारी बदनसीबियों के पीछे

 

तुम्हारे होने पर

लगायी जा रही हैं

नयी-नवेली पाबंदियां

तुम्हारी खामोश चीत्कारों में

बज रहा है

बरबादियों के युगों का संगीत

 

हत्याओं के युगों में

दाखिल हो रहें हैं हम

बेगुनाह हत्यारों की तरह

जिनकी मूक आँखों में पर छपे हैं

असंख्य हत्याओं के चित्र !

  • अनूप बाली, सम्पर्क: 9873065824, anupbali350@gmail.com