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जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

सुमित चौधरी की कविता

सुमित चौधरी की कविताएँ-

"ओ मेरे आदर्शवादी मन"

'
यह मेरे अजीज कवि पार्टनर मुक्तिबोध द्वारा चित्रित किए गए आदर्शवादी मन के सन्दर्भ में है'

कुछ लोगों का जीवन व्यर्थ होता है
क्योंकि उनके जीवन का कोई अर्थ नहीं होता है
लेकिन है मेरे जीवन का अर्थ 
'
मैंने कमाए हैं कुछ रिश्ते'
गवाएं हैं कुछ रिश्ते
कुछ जीव पाले हैं
और कुछ जीवों की हत्या की है
'
फिर भी मैं समझता हूँ अपने जीवन का अर्थ'

एक दिन अचानक !
एक मित्र से मैं पूंछ बैठा
मित्र ! आपने अपने जीवन में कुछ कमाया है
या अपना जीवन ही बनाया है ?

तब मित्र ने कहा !
मैंने भी कमाए है कुछ रिश्ते
'
जिनका कोई नाम नहीं है'
वो मिल जाते हैं चलते-फिरते

मैं अवाक् सा रह गया !
फिर मैंने पूंछा !
कौन से हैं वो रिश्ते?
जिसका कोई नाम नहीं है!
तब उन्होंने ने दिल का दरवाज़ा खोला
और मुझसे बोला !
देख लीजिए आपको खुद पता चल जाएगा
मैंने उनको गौर से देखा
देख-देख कर ठौर से देखा !
उन्होंने ने कमाए थे कुछ रिश्ते
जो न बचे थे उनके हिस्से
मैंने फिर से हाँक लगाई
क्या अब भी कुछ बची हुई है ख़ुदाई ?
उन्होंने ज़ोर से अंगड़ाई लेते हुए बोला
'
जीवन में हूँ अकेला, रहूँगा भी अकेला'
'
मस्त हूँ अपनी दुनिया में अकेले के नशे में'
किसी से न कुछ लेना है, किसी को न कुछ देना
है 
'
जीवन है फ़क़ीरी का, हौसला है अमीरी का'

मैं फिर से अवाक् रह गया !
याद आ गए कुछ कविगड़
जो पंघत में रह कर 
रचे थे समाज का विधान
इसीलिए वो आज भी हैं महान

मैंने स्वयं को टटोला 
क्योंकि जिन मित्र से बात हो रही है
उन्होंने ने भी बनाया हैं कवियों का एक टोला
और 'रचते रहते हैं समाज का बड़ा-बड़ा चोला'
मैंने इसीलिए उनको भीतर से टटोला
लेकिन हाथ मेरे आया क्या?
एक आदर्शवादी चोला 
फिर भी मैंने उनको भी कमाया है
क्योंकि मैंने उन्हें मित्र बनाया है ?


 

 

"हत्याएं रोज होती हैं"

हत्याएं होती हैं रोज़
कहीं गैस सिलेंडर के नाम पर?
तो कहीं गैस चैम्बर के नाम पर?
कहीं-कहीं वक्ष पर चढ़कर
घोप दिया जाता है ख़ंजर
और काट दिया स्तनों को
बंजर ज़मीन के नाम पर?
और जंघाओं को चिचोर कर योनि में 
डाल दिया जाता है 
पूँजीवादी लोहा, सरकारी तंत्र के कारतूस
और सफेद पोसियों के शब्द !

बंजर ज़मीन जैसी पड़ी मृत शरीर पर 
दूधमुहाँ बच्चा लेटकर निचोहता है माँ के स्तन
और जोर-जोर से माँ को धकियाते हुए रोता है
जबकि वहां कोई नहीं होता है
होता है केवल 
महिलाओं का काला पड़ा शरीर 
जो सुन नहीं सकती किसी की चींखऔर पुकार
भले ही बच्चों की हत्या हो बार-बार

फिर भी देश में खुशहाली है
संसद ने पूँजीवाद से हाथ मिला ली है
औरों की हत्याओं को अंजाम देने की ख़ातिर
देश के प्रकृति को चिचोरने के ख़ातिर

देश के प्रकृति को चिचोरा जा रहा है
लोगों को आग पर जोरा जा रहा है
कोई तो बताए किसका सवेरा जा रहा है
मानवता के नाम पर ढिढ़ोरा जा रहा है

फिर भी हत्याएं होती हैं रोज़
चिचोरी जाती हैं स्त्रियां 
मरे हुए बैल के खाल की तरह
और स्तनों को काट दिया जाता है
बंजर ज़मीन पर उगे हुए दूब की तरह
फिर भी उग जाते है वो
अपनी ज़मीन में रंग भरने के लिए
देश में खुशहाली करने के लिए...

सुमित चौधरी
शोधार्थी-जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
रूम.न.236 झेलम छात्रावास
नई दिल्ली-110067
मो.9654829861
Email.sumitchaudhary825@gmail.com