Notice
जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

प्रेम कुमार की कविता

    प्रेम कुमार की कविताएँ

 

  1. अबोध बालिकाएँ

 

क्या अपराध होता है

उन अबोध बालिकाओं का

जो खेलती हैं घर में

चहकती हैं आँगन में

उड़ती फिरती हैं तितलियों सी

गलियों में

 

जिन्हें उनके मामा, चाचा

या पड़ोस का कोई अंकल

देकर चंद टॉफी, चॉकलेट का लालच

ले जाते हैं धोखे से

बंद दरवाजों के पीछे

अँधियारे कमरों में

 

नोंच लेते हैं बलात

उनके उभरते पंखों को

घुट जाती हैं उनके

गले में चीखें

उभर आते हैं देह से ज्यादा

मन पर जख्म

छाया रहता है मस्तिष्क पर

काली परछाईं का बोझ

 

देखकर अपने बाग के 

मुरझाते नन्हें फूल को

तुतलाती जुबान से सुनकर

पूरी कहानी

क्यों नहीं करते माँ-बाप

जालिम के खिलाफ कोई कार्यवाही

 

करने लगती हैं कई नजरें

अबोध बालिका की चौकशी

सीमित कर देते हैं गलियारा

मूँद देते हैं खिलते फूल को

करते हैं अपनी

अबोध बालिकाओं के खिलाफ कार्यवाही

 

मसलने के लिए

किसी नए नन्हें फूल की फिराक में

जेबों में भर टॉफी, चॉकलेट

स्वच्छंद घूमता है अपराधी

 

 

  1. सड़क पार करते वृद्ध

 

समय के साथ

गति कम हो गई है

सड़क पार करते वृद्धों की

उनके हाथ की छड़ी

बन गई है सहारा

 

सड़क पर दौड़ रहे हैं

तेज रफ्तार से वाहन

अंधाधुंध ...

 

कैसे करें वृद्ध

सड़क पार

 

 

 

 

 

  1. शवों के ढेर में

शवों के ढेर में

कातिल ढूँढ रहा है

किसी अपने की लाश

 

उसे बर्गलाया था

धर्म के ठेकेदारों ने

मूर्ख बन उनकी बातों में

सिर पर वहशी जुनून

और लेकर हाथों में तलवार

वह बन गया था भीड़ का हिस्सा

 

मस्तिष्क पर छाए जुनून में

वो भूल गया था कि

सगे नहीं होते हैं

आग बारूद और तलवार की धार

इनकी नहीं होती हैं आँखें

नहीं करते हैं कोई पक्षपात

गिरा देते हैं अपनों की लाश

 

क्या पाया तूने ये सब कर

जलाकर अपना ही घर परिवार

आज लाश बनकर बैठा है

लाश के ढेर पर

 

शोधार्थी- पी-एच॰ डी॰ तुलनात्मक साहित्य

म॰ गां॰ अं॰ हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र

ई-मेल premkumar2169@gmail.com

दूरभाष -  7038096327, 9990418965