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जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

डॉ. उषा रानी राव की कविता

डॉ. उषा रानी राव की कविताएँ

 

त्याज्या

"अलग ढूंढ़ लो अपने लिए अम्मा!

अब घर हुआ मेरा

भरें हैं गिरवी के रुपये मैंने "

चौंकी वह

बेटे की आवाज़ सुनकर

बर्फ का गोला-सा

सिर से पाँव तक गुज़र गया ..

मन के अगोचर कोने में खड़ी वह

लाज से भरी

विवस्त्र होने से भी अधिक

असहाय दशा में

ठंडी पड़ चुकी आवाज़ में

बोली -जाऊँ कहाँ मैं?

शरीर के एक हिस्से से

गूंद ,माड़ कर गढ़ा है मैंने तुमको

कब अौर क्यों तुमने

उँगली छोड़नी चाही

नही जानती ...

कितना सुखद है.

देवकी होना..

यशोदा होना ..

कितना दुस्तर है

त्याज्या माँ कहलाना !

क्या अंत नही ममत्व का ?

निर्वासन में ..

अपमान में ..

तुम्हारे अस्वीकार में !

निर्मम है सच....



उस पार

दूर..अनंत जलराशि के उस. पार ..परदेश में ..

..और ज्यादा पैसा होगा .

सुविधाओं से

संपन्न जीवन

खाने-पहनने की

कोई कमी नही..

खुशनुमा तस्वीरें ..उजागर होने लगतीं ...

गाँव की छाती पर

खड़े ...

कई नये

मकान ..

परदेस से कमाये गये पैसों से..

वह जो परदेस से

लौट रहा होता

है ..अपनों की झलक

के लिए

गाँव की जमीन पर पाँव रखते

ही ..

बाबुल के घर -सा अहसास से

भर उठता है..

यहाँ त्योहार में गाँव का गाँव

हुलस जाता ..

गाँव -डगर में उड़ती धूल

नाच -गाने में बजते ढोल ..

धान के खेत की महक ...

कितना ...मनभावन ?

जाने कैसे ?..सोचा होगा

परदेस में बसने का...

अभी भी गरीब की

मिट्टी सूखी है..

सपने नम हैं...यहाँ ..

बाज़ारी तिलस्म में लूटेरे

हैं ..पहरेदार !

सत्ता की ..

नीतियों का अंदाज़

है.. हमलावर ...

लौटें तो क्या होगा हासिल ?

दो दिशाओं में खुलते हैं दरवाज़े

हमेशा ...

जितना अंदर जाने के लिए ..

उतना बाहर आने के

लिए.....



 

 

 

 

 

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