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जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

शहंशाह आलम की कविता

शहंशाह आलम की कविताएँ

     तलघर

 

तुमने सूनेपन को अपना बनाते

बनाया है यह तलघर बड़े जतन से

जिसमें रहते हो अपनी पसंद के रंगों के साथ

जिसमें रहता है राग-विराग तुम्हें अपना जानते

 

तुम्हारे रहने का यह तरीक़ा मेरी समझ से परे है

साथ तुम्हारे सारे रंग हैं राग और विराग भी

इस तहख़ाने में जिसे तुम अपना सच्चा साथी कहते हो

 

तुम्हारे मन में ना सही मेरे मन में बार-बार प्रश्न उठा करते हैं

कै दिन रह पाओगे सूनेपन को अपना वसंत मानते

कै दिन बिता पाओगे मेरी देह की लपट के बग़ैर अपनी रातें

इसलिए कि घर घर होता है तलघर तलघर होता है

 

मैं तो यही कहूँगा तलघर तुम्हारे रहने की जगह नहीं है

जो सिहरता रहता है अपने एकांत से अपने सूनेपन से

 

तुम्हारा घर है अँधेरे को मार भगाते चिड़ियों के साथ

तुम्हारा घर है मेरे आलिंगन में लिपटे बाजरे के पौधों के बीच

 

तुम्हारा तलघर सच नहीं है सच मेरा प्रेम है अनगिन दिनों का।

 

   कोई है जो...

 

कोई है जो रोज़ लौटना चाहता है मेरे ख़्वाब में

 

अजीब त्रासदी है जब शहर के शहर गिर रहे हैं

घर जंगल बनते जा रहे हैं मौत के दुःख के बुराई के

कोई है जो रहना चाहता है मेरे ख़्वाब में अब भी

 

कौन है कैसा है जो मेरे तारीकी से अँधेरे से भरे ख़्वाब में

रहना चाहता है रौशन करना चाहता है मेरे ख़्वाब को

 

मैं जो डरा हुआ हूँ इन गिर रहे ढह रहे शहरों को देखकर

उसके लौट आने पर ख़ुश होऊँ या ग़मज़दा आप बताएँ

 

सदियों से अपने ऊपर किए जा रहे ज़ुल्मो-सितम के बारे में आपने

कहाँ कुछ कहा है बस किसी मोजज़ा का किसी चमत्कार का

इंतज़ार करते रहे हैं अपने पेट की भूख को दबाए रोटी के लिए परेशाँ

आप क्या बताएँगे कहाँ से बताएँगे मेरे ख़ौफ़ से निजात का रास्ता

 

तब भी कोई है जो मेरे लिए मौसम को हरा करना चाहता है

कोई है जो ओस के कतरे से मेरे सूखे होंठ गीले करना चाहता है।

 

     हज़ार सदियाँ

मैंने जब कभी हँसना चाहा ठट्टा मारकर

हज़ार सदियों की परेशानियाँ आकर लिपट जाती हैं

मैं कोई देवता नहीं आदमी जो ठहरा निरा बुद्धिहीन

 

सुना है तुम्हारे लिए बाहें फैलाती हैं देवस्त्रियाँ

समुन्दर से समुन्दर जितनी ख़ुशियाँ भर-भरकर

मेरे लिए जेठ की धूप जितनी त्रासदी बची रह जाती है

 

यह मेरा रुदन है हज़ार सदियों का तुम्हारा ही दिया

तुम जो मेरा क़त्ल करते हो मेरी इज़्ज़त लेते हो बार-बार

फिर मुझे ही गुनहगार ठहराते हो हर लम्हे अपनी दलीलों से

 

तब भी हज़ार सदियों से मैं ही ज़िंदा हूँ तुम्हारा मुँह चिढ़ाते हुए।

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      झुंड से अलग होने की कथा

 

पागल राजा घात लगाए बैठा है

कब उसके देश की जनता झुंड से अलग हो

कब वह झुंड से अलग हुओं पर हमला करे

जिस तरह कोई आदमख़ोर हमला करता है

झुंड से अलग हुए हिरण पर हर बार

 

जानता हूँ ख़ूब अच्छी तरह जानता हूँ

समझता भी हूँ ख़ूब अच्छी तरह से कि

राजा के मन में क्या चल रहा है इन स्याह रातों में

 

राजा इन स्याह रातों में मेरे मारे जाने का शोकगीत नहीं

अपना आत्मगौरव खुदवा रहा है अपने शिलालेख में

 

हद है हद है हद है तब भी हम झुंड से अलग हो रहे हैं

और मारे जा रहे हैं राजा के हाथों पूरी सादगी से।