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जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

दीपक कुमार की कविता

दीपक कुमार विद्यार्थी की कविताएँ

1.

बुद्ध नही ,
शुद्ध नही,
गांधी नही
मानवता नही
सत्य नही
आहिंसा नही
यह सब लुप्त हो चुकें है

केवल 
प्रतिशोद्ध  
हिंसा 
छद्म वीरता , का ,
प्रचंड , डिमांड है, 
टीवी. पर उठती मांग है ।
सीमा पर घटता कांड है ।
चारों और फिरता एक सांढ़ है

(नॉट सांढ़ - पाकिस्तान)

मजदूरों की टोली 

घड़ी में 8 बजते ही निकल पड़ते है 
परिंदे .....
रोजी रोटी की तलाश में । 
कुछ एक साथ मज़दूर चौक पर जमा हो जाते हैं 
कुछ वही अपनी चाय की ठेली लगा लेते है । 
सज जाता है चौक अपने ही भव्य रूप में 
सब अपनी अपनी तैयारियों में लगे है । 
पानी वाला अभी बर्फ फोड़ रहा है ,
चायवाला , बिस्कुट और मट्ठी के पैकेट लगा कर 
चाय के लिये पतीला चढ़ा रहा है ।
चूँकि मौसम गर्मियों का है , 
आइसक्रीम वाले और लस्सी वाले ने अपनी रेहड़ी लगा दी
दोनों ही छतरी लगाने में अभी व्यस्त है ।
इतने मै ही एक गाड़ी आकर रुकी चौराहें पर 
सभी दौड़े , मानो ईश्वर ने दर्शन दियें हों ,
कहने को तो वह ठेकेदार था , लेकिन ,
जिन्हें 3,4 दिन से मजदूरी न मिली हो 
उनके लिये वह भगवान से कम  था क्या ?

इसी तरह मजदूर  छटते  चलें गये 
और घड़ी में 12 बज गये .......... 
जब सबको विश्र्वास हो गया 
के आज भी ख़ाली हाथ ही लौटना है 
तो ,सभी  मजदूरों की टोली जा पहुँची 
चाय की गुंटी पर । 
और एक अंतहीन बात-चीत का आरम्भ हो गया । 
देश के बजट और देश की अर्थव्यवस्था से लेकर
राज्यों में हुए चुनाव के हर परिप्रेक्षय में 
वाद - विवाद होने लगा ,
वह अब मज़दूर का चोला उतार कर
विश्लेषक बन चुकें थें  ।
लगा ही नही की वे बेरोज़गार है 
और आज की दिहाड़ी उन्हें मिलने वाली नही है ।
निश्चन्ति और अपनी ही दुनियां में मग्न ।

 

3

मोची

घण्टों बैठा रहता हूँ ।
एक ग्राहक की तलाश में 
चंद रुपयों की फिराक में ।
क्या पता कोई  भूला -भटका 
आ जाएं दुकान में ।
सुई धागा लिया रहता हूं लिहाफ़ में ।
क्या पता कोई ग्राहक , 
दनदनाते आ जाएं सामने ।
घण्टों बैठा रहता हूँ 
एक ग्राहक की तलाश में ।

तपती दुपहरी और चमकतें सूरज की छावं में , 
बैठा रहता हूँ मैं इंतज़ार में ।
किसी की सैंडल टूटी होगी ,
किसी के जूतें फटे होंगें  , 
क्या पता आ जाएं ,
कोई मरम्मत करवानें । 
चमकती सडक़ को देखता रहता हूँ ,
इसी बहाने  ।
घण्टों बैठा रहता हूँ 
एक ग्राहक की तलाश में ।