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जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

नवगीत: डॉ. हीरालाल प्रजापति

नवगीत: डॉ. हीरालाल प्रजापति  

 

माँगता हूँ जो वही साथी मुझे देना ॥

और जितना चाहूँ उतना ही मुझे देना ॥

तितलियाँ माँगूँ तो देना तितलियाँ लाकर ।

चीटियाँ माँगूँ तो देना चीटियाँ लाकर ।

सौंपना चूहा ही यदि चूहा मंगाऊँ मैं ,

मत कभी उसकी जगह हाथी मुझे देना ॥

माँगता हूँ जो वही साथी मुझे देना ॥

और जितना चाहूँ उतना ही मुझे देना ॥

फूल माँगा जाए तो कलियाँ न ले आना ।

फल मंगाया जाए तो फलियाँ न ले आना ।

चाहिए कोंपल तो देना मत मुझे पत्ता ,

मैं तना माँगूँ तो मत डाली मुझे देना ॥

माँगता हूँ जो वही साथी मुझे देना ॥

और जितना चाहूँ उतना ही मुझे देना ॥

ऊन माँगूँ ऊन के गोले बना लाना ।

सूत माँगूँ सूत के लच्छे बना लाना ।

टाट माँगूँ तो न देना तुम मुझे मख़मल ,

’ न रेशम की जगह खादी मुझे देना ॥

माँगता हूँ जो वही साथी मुझे देना ॥

और जितना चाहूँ उतना ही मुझे देना ॥

यदि कहूँ लोहा तो लोहा ला पटकना तुम ।

यदि कहूँ पीतल तो पीतल आ के रखना तुम ।

मैं खरा सोना जो चाहूँ तुमसे रत्ती भर ,

उसके बदले मत किलो चाँदी मुझे देना ॥

माँगता हूँ जो वही साथी मुझे देना ॥

और जितना चाहूँ उतना ही मुझे देना ॥

यदि कहूँ मैं चर्च चलने चर्च चल पड़ना ।

यदि कहूँ गुरुद्वारा गुरुद्वारे निकल पड़ना ।

मैं मदीना चाहूँ तो देना न तुम मक़्क़ा ,

मथुरा के एवज़ मुझे काशी नहीं देना ॥

माँगता हूँ जो वही साथी मुझे देना ॥

और जितना चाहूँ उतना ही मुझे देना ॥