Notice
जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

आबिदा: शहादत [कहानी]

आबिदा

            नईम नए घर पर चल रहे काम पर से जल्दी ही लौट आया। आकर थोड़ी देर सुस्ताने के बाद वह नहाने चला गया। नहाकर उसने नए कपड़े पहने और फिर अंदर वाले कमरे में जाकर लोही की अलमारी का दरवाज़ा खोलकर उसमें घुस गया। उसने अलमारी के एक कोने में बने छोटे से बक्से को खोला और उसमें रखी सौ-सौ के नोटों की एक गड्डी निकाल ली। गड्डी में से उसने पचास नोट लिए और फिर बाकी रुपये वापस रखकर बाहर निकल आया। वह बरामदे में खड़ा होकर नोटों को दोबारा गिनने लगा। उसकी साफ-धुली चमकदार उंगलियों में नीले-नीले नोट इधर से उधर जा रहे थे। नोटों को गिनते हुए उसकी निगाह पल भर के लिए गांधी जी के बिना बाल वाले सिर, चश्मा पहने पोपले मुंह पर टिकती और फिर अगले नोट पर चली जाती। गांधी जी की तस्वीर को देखकर वह सोचता, कमाल की बात है। गांधी जी हमारे राष्ट्र पिता है। लेकिन जो अहमियत उनकी तस्वीर की इस कागज़ पर है वह ओर पर नहीं। अगर उनकी तस्वीर वाला यह कागज़ नाली में भी गिर जाए तो लोगों दौड़ कर उठा लेंगे। जबकि दूसरे कागज़ों पर बनी तस्वीरों को कूड़ा कहकर घर से बाहर फिंकवा देंगे।

            नोटों को अच्छे से गिनने के बाद उसने उन्हें मोड़कर जेब में रखा और बैंक की ओर चल दिया।

पच्चीस साला एक खूबसूरत और तंदरुस्त जवान नईम हर महीने की पहली तारीख को इसी तरह नहा धोकर, कपड़े बदलकर और फिर अलामारी में से रुपये निकालकर बैंक चला जाता है। बैंक जाकर वह रुपये जमा करने वाला फॉर्म भरता और उस पर रुपये रखकर उस तरफ बैठे व्यक्ति थमा देता है। आज भी उसने ऐसा ही किया। फॉर्म भरा और उस पर रुपये रखकर उस तरफ बैठे अधेड़ उम्र के व्यक्ति, जिसके काले-सफेद बाल खिचड़ी की तरह थे और आंखों पर मोटे लेंस वाली ऐनक चढ़ी थी के हाथों में थमा दिए। उसने पूछा, कितने रुपये जमा कराने है?”

जी पांच हजार।

खाता कौन?”, फिर खुद से जवाब देते हुए कहा, आबिदा।

जी हां, नाम सुनकर मुस्कुराते हुए नई ने जवाब दिया।

            ऐनकधारी व्यक्ति ने अनुभवी हाथों से जल्दी-जल्दी नोट गिने और फिर उनकी अच्छी तरह एक पतली सी गड्डी बनाकर, उस पर रबड का छल्ला चढ़ाकर नीचे दराज में रख दिया। फिर उसने फॉर्म पर दाएं-बाएं एक मोहर लगाए और फॉर्म का दाएं तरफ का एक छोटा सा हिस्सा फाड़ कर उसे दे दिया। नईम ने वह टुकड़ा पकड़ा और बैंक से बाहर निकल गया। सड़क पर चलते हुए उसे एक बार फिर बैंक बाबू का लिया हुआ नाम याद आया, आबिद और वह मुस्कुरा दिया।

            आबिदा, नईम की महबूबा थी। जिससे वह दिलो-जान से मौहब्बत करता थी। वह शादी-शुदा थी और दो बच्चों की माँ भी। वह छोटे कद की एक नाटी और निहायत ही खूबसूरत औरत थी। उसकी आँखें बड़ी-बड़ी, गहरी और बादामी थी। रंग गोरा और लंबे, काले बाल। उसके स्तन बड़े, फैले हुए और कंधे बेमिसाल थे। उसकी देह गदराई हुई थी, लेकिन स्वस्थ और मजबूत होने के कारण वह मोटी दिखने की बजाय, गोल-मटोल दिखती थी।

आबिदा के शौहर का नाम इदरीस था। वह शहर में रिक्शा चलाया करता था। हालाँकि जब आबिदा की उससे शादी हुई थी तो उसकी ससुराल वाले बहुत अमीर हुआ करते थे और उनका खुद का घर भी था। लेकिन इदरीस अव्वल दर्जे का निकम्मा और जुआरी आदमी था। वह हर सुबह अपने बाप से रुपये लेता और जुआ खेलने निकल जाता। इसके बाद वह तभी आता जब सारा रुपये जुए में हार जाता या फिर कभी-कभी जीत भी लाया करता था। जब वह जीत कर आता था तो अपने यार-दोस्तो को खूब खिलाया-पिलाया करता था और तभी घर में घुसता था जब सारे रुपये खत्म हो जाते थें।

            फिर एक दिन उसके बाप की मौत हो गई और इसके साथ ही उसे रुपये मिलने भी बंद हो गए। तो वह लोगों से कर्ज लेकर जुआ खेलने लगा। जिसमें वह अक्सर हार जाता था। अगर कभी जीत भी जाता तो कर्जदारों का रुपया नहीं लौटाता था। इस तरह उनका कर्ज सैकड़े से हजार में और हजार से दस हजार में बदल गया था। किसी-किसी का तो पचास हजार तक चला गया था। पर उसने किसी का रुपया नहीं लौटाया। इस पर कर्जदार उसके घर आने लगे। जब रुपये लौटाने का उसे कोई साधन नहीं नज़र आया तो उसने घर बेच दिया और उससे मिले रुपयों से पहले कर्जदारों से पीछा छुड़ाया और फिर बाकी बचे रुपयों से एक छोटा घर खरीद लिया।

इसी दरमियान आबिदा को लडका पैदा हुआ था। पर वह बहुत कमज़ोर था और इलाज के अभाव में ज्यादातर बीमार ही रहता था। फिर एक दिन उसे तेज़ बुखार आया और वह उसी में मर गया था।

            घर खरीदने के बाद भी इदरीस के पास थोड़े रुपये बच गए थे। पर वह उन्हें भी जुए में हारता चला गया। ओर जब वह रुपये भी खत्म हो गए तो उसने फिर लोगों से कर्ज लिया और खेलना चालू रखा। इसके बाद जब वह उनका कर्ज नहीं लौटा सका तो उसने फिर घर बेच दिया और उससे मिले रुपयों से पहले कर्जदारों का कर्ज चुकाया और फिर बाकी बचे रुपयों से एक दूसरा, पहले से भी छोटा घर खरीद लिया।

            इस बार फिर उसके पास कुछ रुपये बचे और उसने उन्हें भी जुए में गवा दिया। इदरीस लगातार लोगों से कर्ज लेता रहा था और उसे जुए में हारता चला गया था। उनका कर्ज लौटाने के लिए उसे फिर से घर बेचना पड़ा था और इस बार उसे घर के बदले इतने ही रुपये मिले थे कि वह कर्जदारों का कर्ज चुका सके। इसके बाद उसने किराये पर एक घर लिया और अपनी बीवी और एक बेटी के साथ उसमें रहने लगा। वह न तो पढ़ा-लिखा था और न ही उसने कोई ओर काम ही सीखा था। इसलिए घर चलाने के लिए उसने बीस रुपये रोज किराये पर एक रिक्शा ली और उसे चलाने लगा था। हालाँकि उसकी जुआ खेलने की उसकी आदत अब भी नहीं गई थी। पर अब उसके पास इतने रुपये ही नहीं होते थे कि वह खेल सके। अब तो उसे घर चलाने के लिए भी कर्ज लेना पड़ता। लेकिन अब लोग उसे कर्ज भी नहीं देते थे। अगर वह किसी मजबूरी में भी उनसे कर्ज मांगता तो वह साफ इंकार कर देते। जब वह ज्यादा खुशामद करने लगता तो वह उसे गारंटर लाने के लिए कहते। गारंटर के लिए वह अपने कुछ पुराने दोस्ती की खुशामद करता और उन्हें गारंटर बनने के लिए राजी कर लिया करता था।

            ऐसे ही उसका एक गारंटर दोस्त था मालिकी उर्फ पप्पू। पप्पू रुपये दिलवाने में उसका कई बार गारंटर बन चुका था और वह उसके पहले घर का पड़ोसी भी था। इसलिए उसके यहां वह अक्सर आया करता था। पप्पू रिश्तेदारी में नईम की फूप्पो का बेटा था। इसलिए शाम के वक्त जब पप्पू इदरीस के घर आया करता था तो नईम भी कभी-कभी उसके साथ आ जाया करता था।

            आबिदा भी पप्पू को जानती थी। वह जब भी इदरीस से मिलने आया करता था तो वह उसके सामने इदरीस की शिकायतों की एक लंबी झड़ी लगा दिया करती थी। साथ ही वह उसको इदरीस को समझाने के लिए कहती थी कि वह अपनी बीवी-बच्चों और घर पर ध्यान दिया करे। वक्त पर सामान लाकर दिया करे और मुझे भी कुछ घर-खर्च के लिए दिया करे।

            लेकिन जब नईम पप्पू के साथ होता था तो वह उससे कुछ नहीं कहती थी। वह बस पप्पू से चाय-पानी का पूछती और जो वह कहता देता था वहीं बनाकर दे दिया करती थी। इसके बाद वह एक ओर हल्का घूँघट निकाल कर कुर्सी पर बैठ जाया करती और उनकी बातें सुनती रहती थी। जिसमें वह अधिकतर इदरीस के काम के बारे में और कुछ इधर-उधर की बातें किया करते थें। बीच-बीच में वह आबिदा से भी कुछ पूछ लिया करते थे और वह जवाब दे दिया करती थी।

            नईम खुद तो ज्यादा बोलता नहीं था पर वह पप्पू की बातों का लगातार जवाब देता रहता था और साथ ही कोने में कुर्सी पर बैठी आबिदा को देखता रहता था। हालाँकि घूँघट की वजह से उसे उसका पूरा चेहरा दिखाई नहीं देता था। दिखता तो बस, उसकी चमकदार आँखों की हिफाज़त करती लंबे और मुलायम पलके, उसकी छोटी सी नाक, छोटे और पतले-पतले लाल होंठ... उनके पीछे मोती की तरह चमकते सफेद दाँत... और गोल ठुड्डी।

            उसे आबिदा का यह अधूरा चेहरा ही इतना प्यारा लगता था कि कई बार उसमें ही खो जाता था। पर पप्पू को जब अपनी बातों के जवाब नहीं मिलते तो वह उसके पट्ट पर हाथ मारकर कहता, कहा खोए यार... कुछ बोलत क्यों नहीं...?”

कहीं नहीं... तुम बोलो... मैं सुन रहा हूं..., ओर फिर वह पप्पू के सवालों का जवाब देने लगता था।

            आबिदा को भी नईम के इस तरह खो जाने के बारे में पता था। वह कई बार उसे अपनी ओर एकटक देखते देख चुकी थी। लेकिन उसने कभी कहा कुछ नहीं था।

            एक बार जब नईम लगभग एक महीने तक उसके यहां नहीं आया तो उसने पप्पू से उसके बारे में पूछ लिया था। पप्पू ने यहीं बात जाकर नईम को बता दी थी। जब नईम ने यह सुना कि आबिदा उसे पूछ रही थी तो वह ऐसे खुश हुआ कि जैसे उसे जन्नत का पैगाम मिल गया हो। खुशी से उसका दिल झूम उठा था। वह इतना खुश हुआ कि उसने खुशी-खुशी में पप्पू को गले लगा लिया और उसके गाल को चूम लिया।

            अगले दिन नईम अकेला ही आबिदा के घर जा पहुँचा। उस वक्त दोपहर ढल रही थी और लोग अपने घरों में आराम कर रहे थे। आबिदा पलंग पर बैठी अपनी सोती हुई बेटी को हाथ के पंखे से हवा कर रही थी। नईम को आया देख वह उठकर खड़ी हो गई। नईम आकर जहां खड़ा हुआ था वहीं खड़ा रहा और उसे देखता रहा। आबिदा ने एक कदम आगे बढ़ाया तो नईम ने उसे अपनी बांहों में भरकर उसके होंठों को चूम लिया था।

            अब वह तकरीबन हर रोज आबिदा के घर आया करता था। वह भी अकेला। ज्यादातर उस वक्त जब इदरीस घर पर नहीं होता था। वैसे भी इदरीस घर पर होता ही नहीं था। उसने बहुत से लोगों से कर्ज ले रखा था और अब वह उसे चुका नहीं पा रहा था। कर्जदार रात-दिन उसके घर के चक्कर लगाया करते थे और जब उसे वहां न पाते तो वह उसके घर के सामने खड़े होकर उसे अच्छी-मंदी गाली दिया करते थे और जल्द से जल्द रुपये लौटाने का कहकर चले जाते थें।

            उस दिन भी एक कर्जदार आया था। उसने जब इदरीस को आवाज़ लगाई तो आबिदा ने पर्दे के पीछे से कहा था, वह घर पर नहीं है... बाहर गए हुए है...।

वह साला घर पर होता ही कब है...? जब देखों बाहर-बाहर... बाहर उसके कौन से मील सिट्टी मार रे...? उस मादरचोद को कह दियों कि शाम उसके अपने बाप के रुपये दे आवेगा... नहीं तो एक रात के लिए तुझे मेरे साथ चलना पड़ेगा...।

            उसके जाने के बाद आबिदा खूब रोई थी। जब नईम आया तो वह तब भी रो रही थी। नईम ने उससे रोने का कारण पूछा तो उसने उसे सब बता दिया था। आबिदा की बात सुनकर फिर नईम वहां रुका नहीं। वह सीधा अपने घर गया और हजार-हजार के सौ नोटो की एक गड्डी लाकर उसे थमाते हुए कहा था, आज के बाद मैं तुम्हारी आँखों में कोई आँसू नहीं देखना चाहता...।

            इसके बाद उसने सुनार के यहाँ रखे आबिदा के उन गहनों को भी छुडा दिया था जिन्हें इदरीस ने तंगी के हालात में गिरवी रख दिया था। फिर उसने पप्पू से कहकर इदरीस को भी एक टैंट वाले के यहाँ पाँच हजार रुपये महीना की तनख्वाह पर नौकर रखवा दिया था।

इदरीस काम पर तो रेगुलर जाता था पर घर एक भी रुपया नहीं देता था। जब मन होता तो कुछ राशन का सामान ले आता, नहीं सारे रुपये जुए मैं हरा देता। इस पर नईम हर महीने कुछ ना कुछ रुपये आबिदा को घर चलाने के लिए दे दिया करता था।

नईम की सगाई हो चुकी थी और अब उसकी शादी होने वाली थी। शादी से पहले उसने आबिदा से कहा था, तुम यह मत समझना की शादी के बाद तुम्हारे प्रति मेरी मौहब्बत में कोई कमी आ जाएगी... मैं तुम्हें शादी के बाद उसी तरह प्यार करता रहूँगा जैसे अब करता हूँ...।

पर आबिदा ने कोई जवाब नहीं दिया। वह सामने दिवार को ताकती खामोश बैठी रही। उसे इस तरह चुप बैठी देखकर नईम ने कहा था, अगर तुम इस तरह चुप रहोगी तो मैं सेहरा नहीं बाँध पाऊँगा... ओर न ही निकाहनामे पर दस्तख्त कर पाऊँगा...। आबिदा ने उसे अपनी सहमति दे दी थी। पर नईम जब निकाह के लिए बैठा था तो उस वक्त भी उसने आबिदा को फोन करके पूछा था कि वह निकाह के लिए हाँ कहे या ना... ओर जब आबिदा ने उसे हाँ कहने के लिए कहा तो ही उसने मोलाना से कबूल है कहा था। 

आबिदा के दो बहने ओर थीं। दोनों की शादी हो चुकी थी। पर उनके कोई भाई नहीं था। उसके बूढ़े माँ-बाप अकेले रहते थें। आबिदा के दोनों बहनोई मेहनती थे। इसलिए उसके माँ-बाप ने आबिदा की गुरबत को देखते हुए उसे अपने पास रहने के लिए बुला लिया था।

जब नईम को उसके जाने के बारे में पता चला तो उसे बहुत दुख हुआ था। उसने आबिदा का हाथ पकड़कर कहा, क्यों जा रही हो तुम वहां...? तुम्हें अपना खुद का घर चाहिए ना... तो मैं तुम्हें नया घर खरीद दूँगा... पर तुम वहां मत जाओ... मेरे पास रहो... मेरे दिल की करीब..., ओर उसने आबिदा को अपनी बांहों में भर लिया था।

इस पर आबिदा ने कहा, नहीं, ऐसी बात नहीं नहीं है। वहां अम्मी-अब्बू अकेले होते हैं... मैं भी यहां अकेली ही रहती हूं। उनके साथ रहूंगी तो अच्छा लगेगा। तुम चाहों तो वहां भी मुझसे मिलने आ सकते हो?”

यह सुनकर नईम ने एक बार उसे देखा और उसके प्रस्ताव पर मुस्कुराते हुए पूछा, ओर वहां घर-खर्च कैसे चलाओगी?”

कोई काम कर लूंगी... अपने मां-बाप के साथ खेतों पर चली जाया करुंगी।

नहीं, तुम वहां कोई काम नहीं करोगी। न ही खेतों पर जाओगी। मैं हर महीने तुम्हें पांच हजार रुपये भेज दिया करुंगा।

उसके इतने कहते उसके सामने बैठी आबिदा उसकी गोद में लुढ़क गई थी। नईम ने प्यार से उसका माथा चूम लिया था।

आबिदा के जाने के बाद वह उससे मुश्किल से दो-तीन बार ही मिलने गया था। पर वह हर महीने की पहली तारीख को मुस्तैदी से उसके खाते में पांच हजार रुपये जमा करवा दिया करता था।

घर आते-आते रास्ते में ही मौसम खराब होने लगा था। आसमान पर काले बादल उमड़ आए थे और नीचे धूल भरी आंधी चल रही थी। नईम ने घर आकर मुंह धोया और फिर अंदर जाकर बैठ गया। उसकी बीवी ने उसे पानी का गिलास लाकर दिया और खाने के बारे में पूछा। उसने पानी पी लिया और खाने को मना कर दिया। उसके जाने के बाद वह लेट गया। लेटते ही उसे नींद आ गई।

जब वह सोकर उठा तो शाम के चार बज रहे थे। आसमान साफ, पर फिर भी बारिश के बाद का अंधेरा छाया हुआ था और ठंडी हवा चल रही थी। उसने बीवी से पूछा तो उसने बताया कि अभी बहुत तेज बारिश होकर रुकी है। वह उठा और बाथरुम में जाकर मुंह हाथ धो आया। उसके बीवी ने उसे खाना लाकर दे दिया।

खाना खाने के बाद वह कुछ देर बैठा अपनी बीवी से इधर-उधर की बातें करता रहा और फिर उठकर नए घर की ओर चल दिया।   

यह घर उसकी शादी के बाद उसके माँ-बाप उसे बनाकर दे रहे थे। घर लगभग पूरी तरह से तैयार हो गया था पर उसमें बिजली और टंकी फिटिंग का कुछ काम बचा हुआ था। उस वक्त छत पर बैठा नईम बिजली के ही काम में लगा हुआ था। पर उसका ध्यान कहीं ओर था। इसी बे-ध्यानी में उसके हाथ में अर्थ का तार आ गया और उसे बिजली ने पकड़ लिया। वह तब तक तार से चिपका रहा जब कि उसका सारा खून नहीं सूख गया।

उसके छोटा भाई जब छत पर आया तो उसने नईम को छत पर मुंह बाए पड़ा देखा। उसे देखकर उसी चीख निकल गई। नईम मर चुका था। वह एक अमीर किसान का बेटा था इसलिए उसकी मौत की ख़बर सुनते ही आधा शहर उनके घर के सामने जमा हो गया। दूर-दूर से रिश्तेदार, दोस्त, जाननेवाले और पहचान वाले जनाज़े में शरीक होने के लिए टूट पड़े। आबिदा को भी फोन पर पप्पू ने नईम के मरने की ख़बर दी थी। पर आबिदा नहीं आई थी।– 7065710789।

 

शहादत

रेख़्ता (ए उर्दू पोएट्री साइट) में कार्यरत।

मोबाईल- 7065710789

दिल्ली में निवास।

कथादेश, नया ज्ञानोदय, स्वर्ग विभा, समालोचना और ई-माटी आदि पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित।