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जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

तीसरा प्रेम: मोबिन जहोरोद्दीन [कहानी]

तीसरा प्रेम

बैठ जा....महाराजा!” कीचड से सने जूतों समेत पैर टेबल पर रखते हुए सब-इन्सपेक्टर ने राकेश से कहा । घोड़े की तरह नाक साफ करते हुए उसने आगे रखी सिगरेट की पैकेट उठा बेतहाशा धुआँ उड़ाने लगा ।

            चिंइइईईई....। राकेश ने कुर्सी खींच उस पर सिमट गया । बालों से होते हुए भौंहों पर आनेवाले पानी को वह बार-बार पोछता । उसी पानी से कुछ पानी जबान पर लगने से पता चला कि पसीना भी बारीश के पानी में मिलकर एकाकार हो गया । आँसू, पसीने और पानी में अन्तर केवल स्वाद का ही होता है ।  नमक का जीवन में बहुत अधिक मूल्य होता है, इसलिए पसीने की कमाई गाढ़ी होती है और अपने प्रेमपात्र के आँसू हम नहीं देख पाते हैं । मानो समुद्र से नमक उधार लेकर प्रकृति ने मानवीय जीवन का सार भर दिया है । देह की मिट्टी में रीस गया है समुद्र का कुछ अंश । कितने सारे अंश है समुद्र के । एक समुद्र कभी दूसरे में समा जाता है, कभी एक से दूसरे का जन्म होता है । समुद्र न होते तो दूर तक क्या धरती ही होती? बड़ी एकरस होती दुनिया, समुद्र के बगैर ।   

            थाने की नीम-रौशनी में भी उसने एक सरसरी नज़र में ही थाने की दुनिया देख ली । दरवाजे पर दो हवालदारों की बीडियों का धुँआ बारीश की बूँदों में एकाकार हो रहा था । दोनों पीछली रात किसी रंडीखाने पर की गई कारवाई की, रस लेकर चर्चा कर रहे थे । उनकी पुलिसिया हँसी बिजली की कड़कड़ाहट से सुर मिला रही थी । हँसी के कारण अधेड़ मुच्छड़ हवालदार की पैंट तोद से बार-बार फिसल रही थी और वह उसी गति से उसे चढ़ाता जा रहा था । टीन की छत से टपककर पानी दोनों के पौंचे भीगो रहा था, जिससे उनकी पैंट नीचे से भारी होकर नीचे गिरने में जोर लगा रही थी । सीढ़ियों पर पड़े पायदान पर सड़क से कम कीचड़ न था । इन्सानी ख़ून से अपने को तृप्त कर लटकते हुए एकमात्र बल्ब से अपने को गर्माने के प्रयास में मच्छर अंधेरे का हाथ बँटा रहे थे । उन्होंने शायद सलाखों की परछाई के पीछे बैठे बूढ़े को या कि उसकी टाँगों के बीच लेटे बीसेक बरस के लड़के की उभरी नसों में बहती गर्माहट को अपने में भर लिया था । जीवन को खा जाने के बाद अब उसकी हड्डियाँ मानो उसकी चमड़ी को भी खाने के लिए अन्दर खींच रही थी । नसें बीच-बचाव करती हुई इतनी अधिक उभरी थी कि शरीर पर उन्हीं का अस्तित्व दिखाई देता था । उसका एक हाथ कभी लड़के के देह पर बैठे मच्छरों को भगाता तो कभी अपने पिंजर पर ध्यान देता । सालाखों के बीच से गुजरती हुई रौशनी में वह आधा ही नज़र आ रहा था । राकेश से उसकी तरफ देखा न गया । उसने नज़र फेर ली ।

              उसका ध्यान बरबस छत से उलटी लटकी छिपकली की तरफ गया । वह बल्ब के पास मँडराती हुई जंगली तितली का धड़ निगल रही थी । तितली का फड़फड़ाता एक पंख हवा के साथ होकर राकेश के जख़्मी अंगूठे पर आ गिरा । वही पंख जो हवाओं पर विजय पाने का हौसला रखता था, हवाओं के साथ बह चला । निर्जीव, निरीह । धड़ से अलग । उसने उसे झटकते हुए अपने पैर मेज़ के नीचे सरका दिए । उसे पैर की ऊँगलियों के बीच अधिक चिपचिपाहट महसूस हुई । कुछ दर्द भी । पर वो कराह भी नहीं सकता था । शायद देखने से दर्द और अधिक बढ़ जाता । उसका अहसास हो जाता । उसने पैरों से ध्यान हटा देना बेहतर समझा ।

            कई परछाइयाँ अपने रेनकोट उतारकर खुँटियों से लटका रही थी । एकबारगी उसे लगा दीवार की तरफ चेहरा किए कई धड़ प्रार्थना कर रहे हैं । रायफलों को रखते हुए चर्चा हो रही थी-

“तुम्हारे कितने हुए?”

“मेरे तीन राउण्ड हुए ।”

“मेरे चार हुए, चार ।”

“एक तो मेरे कमीज को छूकर निकल गई...”

“सच? दिखाओ ।”

“अबे चुतिया, किसे बनाता है!, ये दीवार के घिसटने का है ।”

“नहीं रे कसम से, बायको शप्पथ ।”

“ठीक है, जो कुछ भी हो, अब नया कमीज़ तो सिलवाना ही पड़ेगा ।”

“हां यार, देख न....बेकार की मुसिबत”

“ठीक है, कल देखेंगें, अब चल, साब को हिसाब-किताब देते हैं” - दोनों और भी अंधेरे कमरे की ओर चले । कई अस्पष्ट आवाजों ने महौल को गर्म कर रखा था । पूरा संसार एक साथ बोल उठा । राकेश के भीतर की आवाजें और बाहर की आवाजों में अन्तर था । भीतर केवल दो आवाजें थी, बाहर अनन्त ।

          बिजलियाँ केवल कड़कड़ाती ही नहीं थी, बीच-बीच में इन परछाइयों को अधिक स्पष्ट उभारती थीं । उनके कपड़ों का रंग भी पलभर के लिए दिख जाता था । रेनकोट-जूतों और बालों से होता हुआ फर्श पर फैला पानी बिजली की रौशनी का उसी तीव्रता से प्रत्युत्तर दे रहा था । “टप्प...टप्प...” लटकते रेनकोटों से टपकती बूँदें लक्ष्य से टकराकर अगणित बूँदों में बँट जाती, फिर एकाकार हो जाती ।

            “ये लो काका....ऐश करो ।” सेल में बंद बूढ़े की तरफ बीड़ी का बंड़ल फेंकते हुए युवा हवालदार ने कहा । उसने लपकर उठा लिया । सेल के दूसरे कोने में कुछ रौशनी हुई । फिर रह-रहकर एक लाल बिंदी के चमकने के साथ धुँए का गुबार उठता और रौशनदान से आती हवा के कारण सब-इन्सपेक्टर के सिगरेट के धुँए से आकर मिल जाता ।

            अपने भीगे बालों में राकेश बार-बार उँघलियाँ फेरता रहा । उसकी कुर्सी के चारों पायों के साथ दोनों पैरों में लगे ज़ख़्मों से होता हुआ शरीर का पानी नीचे बिखर रहा था । अचानक उसकी बगल वाली कुर्सी पर एक हवालदार कुछ सादे काग़ज़ और पेन लेकर बैठ गया । इस कुर्सी ने भी प्रतिक्रिया दी - “चि इइइईईई...।”

“कहिए जनाब....आपका नाम?” काग़ज़ मोड़कर कुछ लिखते हुए उसने पूछा ।

जूतों समेत अपने पैर नीचे रखते हुए सब-इन्सपेक्टर राकेश को घूरने लगा । “हाँ...बताइए...” हवालदार की ओर गर्दन से इशारा कर सिगरेट को ऍश-ट्रे में मसलते हुए कहा ।

“र..र...रा....केश” जैसे वह नींद से जागा ।

“काम?” हवालदार का दमदार लहजा गुर्राया ।

“क्या? - वह समझा नहीं था ।

“काम...काम...क्या करते हो? - गर्दन उठाकर उसने सख़्ती से दोहराया ।

“सिविल-इंजीनीयर, वरदविनयाक कन्स्ट्रक्शन कम्पनी में....” शून्य में देखते हुए उसने कहा, जैसे अब भी वह पीली टोपी पहने मज़दूरों को आदेश देता हुआ अपने-आप को देख रहा हो । “....करता था....अब...” उसने वाक्य को एक और टुकड़ा जोड़कर पूरा किया ।

“था?...तो अब? हवालदार ने पेन को हाथ में घुमाते हुए पूछा ।

“कुछ नहीं....निकाल दिया गया....छः महिने पहले” खिड़की के ऊपर मुस्कराती हुई गाँधी जी तस्वीर पर उसकी नज़रें गड़ी हुयी थीं ।

“क्यों?...कोई झोल, चोरी-वोरी या फिर घूस लेते हुए पकड़े गए?” सामने झुकते हुए कुहनियों को टेबल पर टिकाकर हथेलियों पर ठुड्डी को रखते हुए सब-इन्सपेक्टर राकेश की तरफ घूरने लगा ।

 “हाँ..आआआआ....याद आया साब...तभी तो मैं सोच रहा था.... देखा-देखा सा लग रहा है...साब ये तो वही है...हाँ, पक्का वही है...राकेश क्या?...क्या नाम बताया तुमने...?....” कुर्सी के हत्थों पर जोर से हाथ रखकर आराम से बैठते हुए हवालदार ने सवाल दागा ।  “राकेश....क्या राकेश? पाटिल, पटेल, सिंह, मतलब, क्या राकेश?”

            खिड़की से होती हुई बिजलियों की रौशनी सीधे राकेश के चेहरे पर आ रही थी ।

            “राकेश कुमार सिंह ।” सब-इन्सपेक्टर ने उसे पहचानते हुए बिजली की रफ़्तार से कहा ।

            “हाँ साब वही....वही गोलगप्पा छाप राकेश...इसकी कलम नहीं चली तो काग़ज़ पर स्याही उँड़ेल दी...ये बात....सही है साब...ये तो मीडिया के बादशाह निकले...खूब धूम मची थी इनकी...।” झीनी मुस्कान के साथ शुरु किए वाक्य को हवालदार ने ठहाके पर पूरा किया । सेल में सोता हुआ लड़का जागकर एक कोने में सलाखों से सटकर बैठ गया था । बाहर की हँसी के साथ वह और सहम गया । उसने भी हसने की नाकाम कोशिश की । उसकी धँसी आँखें बन्द हो गई ।

 

 

(2)

            राकेश मुंबई की नामी कन्स्ट्रक्शन कंपनी में बतौर साइट इंजीनीयर काम करता है । इतनी कम उम्र में गिने-चुने लोग ही पहुँच पाते थे, उसके मकाम पर । वह ईमानदार था और अक्लमन्द भी कम न था । अपनी मेहनत और लगन न का केवल उसने मालिकों के दिल पर सिक्का जमा लिया था बल्कि अपनी होशियारी और सूजबूझ से ऐसे काम भी निपटा लिया करता था जो उसके ‘प्रोफेशन’ में बिना घूस लिए कोई भी न करता । जाहिर है, मालिक उसे अपने बेशकीमती हीरा मानते थे । उसकी कम्पनी सरकारी योजनाओं को काग़ज़ से लेकर जमीन पर उतारने का काम कई शहरों-कस्बों में किया करती थी । मुंबई में कम्पनी की करीने से बनी साफ़-सुथरी काँलनी में रहनेवाले इंजीनीयर को साइट-इंजीनीयर के बतौर झोपडपट्टी नुमा इलाकों में जाकर लोगों को समझाने जैसे काम भी करने पड़ते थे, तो कभी मज़दूरों से जूझना पड़ता था । इस काम के लिए उसे देश-विदेश के अनेक शहरों के कई-कई चक्‍कर लगाने पड़ते थे । वह चीन में बनी मज़दूरों की सरकारी बस्ती, मास्को में बनी मिल मज़दूरों की बस्ती तो जपान में समुद्र में बने कृत्रिम टापू को देखने जा चुका था । उत्तर-पूर्व से लेकर पूर्व तक, पश्चिम से लेकर उत्तर तक, वह लगभग सारे देश घूम चुका था । पिछले छः सात वर्षों में उसने भारत में बसी शहरी-कस्बाई दुनिया देख ली थी ।

            उसे घर की फिक्र थी नहीं । घर पर था ही कौन? बहन नेहा और घर के काम करने के लिए बुआ । नेहा मुंबई विश्‍वविद्यालय के विधि विभाग में एक वर्ष पढ़ा रही थी । वह चौदह-पन्द्रह बरस की रही होगी, जब माँ गुज़र गयी । नौकरी से ठीक-ठाक कमाई भी होने लगी थी, उसी साल अपनी इन्टनशीप पूरी होकर नौकरी पक्की हो गयी थी ।  माँ के रहते ही बुआ विधवा हो गई थी और साथ रहने मायके आ गई थी । माँ के गुज़रने के बाद नेहा और राकेश को बुआ ने कभी उनकी कमी महसूस न होने दी । वह उतना ही अधिकार जमाती जितना कि अपने बच्‍चों पर । उतना ही प्रेम पाती, जितना उसे अपने देते । बस अपने विदेश चले गए बेटे को याद करके तो कभी-कभार गाँव-गाँववालों को याद कर अफ़सोस करती । पर रोती कभी नहीं । उसे लगता नेहा या राकेश उसे रोता देख कमजोर पड़ जाएँगें । शायद इसीलिए । गाँव में उसे खेत और बाड़ी दोनों में काम करने की आदत थी, इसलिए उसने राकेश को चेता दिया था कि वह नौकर नहीं रखेगा ।

“ज्यौ तुम नुकर रख लियोगे, हम चल दीही...बुझै?” उसने राकेश के रखे ब्वाय को माफी के साथ लौटाते हुए कहा । “नुकर भी केई खान-पान मा पीरेम मिला सकी? बबुआ खान-पान मा नूण कै सौबत पीरत कै भी सइ होना जैरूरी ह । नुकर-फुकर जियादा मूँ लगाई त पियार जियादा डाल दै ही, अउर डाँट-फटकार दै दैही त नूण-नमक जियादा डाल दैंही ।” बुआ का स्पष्ट सिद्धान्त था, “घरै मा नुकर नै रखन चाही अउर इस्सर की किरपा होई तौ मनुस को कदै कोरट, पोलिसिया टेसन और हस्पताल कै दरवाजा कदै नै लाँघनी चाहि, हं... ।” उसने घर में बवाल मचा क्या मचा दिया था, पूरे एक हफ़्ते तक थाली को हाथ तक न लगाया था, जब उसे पता चला कि नेहा कोरटवाली पढ़ाई पढ़ने जा रही है । “कोरट भी कदै पडन की जगै हय ! चोर-उचके, डाकू-शराबखोर कइसे कइसे लोग आते हय । झगड़ा-टंटाखोर-दंगाबाज लोगन की जहे हय । शरीफ लोकन का उहां कै काम?” कितना समझाने पर वो मानी थी ।

“बुआ... लड़नेवालों, चोर-उचक्‍कों जैसे लोगों को भी सुधारना चाहिए ना? शरीफ लोग उन लोगों को वैसे ही छोड़ देंगे तो सोचो दुनिया का क्या होगा?”

“हां...हमार बच्‍चवान नै हि ठेका लै रख्या हय दुनिया जहांन कै? इस्सर न करै कछु हइ जाइ? हाय-हाय...दुनिया-जहांनै अउर कैइ नइ बचा हय का ई काम करन कू....। अरे हम तौ बोलती हूं...दुनिया-जहांन में कोई अउर काम नइ बचा हय का... दुनिया-जहांन में?”

नेहा ने बुआ को कई दिनों तक मनाया कि वो कोर्ट में प्रैक्टिस के दौरान खुश रहेगी । उसका पसन्दीदा काम है वह । उस काम से वह लोगों को न्याय दिला सकेगी...आदि आदि । लेकिन बुआ कहाँ माननेवाली थी । वह तो आमरण अनशन पर बैठ गई थी । राकेश ने दोनों पक्षों में सुलह करवायी । तय हुआ कि कानून की पढ़ाई करने के बाद नेहा कोर्ट में प्रैक्टिस न कर, पढ़ाने का काम करेगी । बुआ का अनशन अस्पताल में जाकर समाप्त हुआ, जिसे वह हस्पताल कहती थी । पूरे दो घंटों बाद होश आया था उन्हें ।

कानून जाननेवाला जब कानून तोड़ता है, तो उसे कोई पकड़ नहीं सकता । आँख वालों को भी वह अंधा साबित कर देता है । और वही कानून पढ़नेवाला जब कानून तोड़नेवालों के पीछे पड़ जाए तो किसी की खैर नहीं । दोनों ही स्थितियों में जीत उसी की होती । नेहा विश्‍वविद्यालय में पढ़ाकर बचे समय में जरूरतमंदों को कानूनी सलाह देने का काम करती थी । इस काम के लिए उसे कोई पैसे नहीं मिलते थे । उसने चाहे भी नहीं । चाहती तो शायद कुछ मिल जाते । उसे जरूरत ही महसूस नहीं होगी । सही हो या गलत, जरूरतमंदों को वह कानून से बचने और न्याय पाने दोनों के रास्ते बताती । कोई तोंदवाला आता तो वह कह देती - “सॉरी मिस्टर, आय ऐम नाट अ लॉयर...आय ऐम जस्ट अ टीचर ।”

बुआ ने एक बार फिर बवाल मचा दिया, जब उन्हें पता चला कि राकेश लॉयर से विवाह करने जा रहा है । जागृति से राकेश का परिचय नेहा के काँलेज के वार्षिक सम्मेलन में हुआ था । हुआ क्या था, नेहा ने जबरदस्ती करवाया था । राकेश तो वार्षिक सम्मेलन में जाना ही नहीं चाहता था । पर नेहा कहाँ माननेवाली थी । एक बार कह दिया तो कह दिया, बस । राकेश भी उसका भाई ठहरा, वह कभी न जाता । लेकिन नेहा ने माँ-बापू न होने और सहेलियों के माता-पिता-भाई के आने की इमोशनल कहानी सुनाई । नेहा के चंगूल में वह पूरी तरह फँस चुका था । उस दिन नेहा ने सारे सहपाठियों को अपने भाई के वार्षिक सम्मेलन में आने की बात फोन करके बताई थी, खासतौर पर जागृति से । उसे खुशी के मारे सबको फोन करता देख राकेश भी उसकी खुशी में शरीक हो गया ।

“मीट माय भैय्या...राकेश ।” उसने जागृति से जोर देकर कहा ।

“हैलो...” जागृति ने होठों को फैलाते हुए कुहनी से हाथ उठाया ।

“हाय...” राकेश उसके कंधे से ऊपर होते हुए पीछे देखने लगा ।

“भैय्या मैं अभी आयी...जस्ट मोमेंट जोग....” कहते हुए लपपकर नेहा इन दोनों को छोड़कर अठखेलियाँ करते हुए झुंड़ की तरफ़ चल दी ।

दोनों तरफ खामोशी थी । शायद सोच भी नहीं रहे थे । राकेश की बुद्धि को तो जैसे लकवा मार गया हो । क्लास प्रैक्टिस में दलीलों से सबके होश उड़ा देनेवाली जागृति को लगा जैसे वह पहली बार डायस के पीछे खड़ी है और उसका दिल सीने में नहीं, गले में आकर धड़कने लगा है । भीतर-बाहर दोनों ओर शोर था । राकेश ने पहल की “सो व्हाट्स नेक्स्ट...पढ़ाई के बाद क्या करेंगी?”

“कुछ नहीं बस...सेशन कोर्ट में प्रैक्टिस । अंकल है मेरे, उन्हीं के अंडर प्रैक्टिस करुँगी ।”

“नेहा तो प्रैक्टिस नहीं कर सकती...यू नो...उसने बताया ही होगा...बुआ एण्ड ऑल?”

नेहा का प्रयास सफल रहा । इसके बाद पूरा सम्मेलन खत्म होने तक दोनों में बातें चलती रही । ज्यादातर भविष्य के बारे में । भविष्य तय हुआ । बुआ की मर्जी की जानकारी राकेश ने जागृति को दी । जागृति ने अपने अंकल को । इस तरह तीन महिने बाद तीन सदस्यों वाला परिवार चार का हुआ । सब खुश । खासकर बुआ ।

 

(3)

हर बार की तरह कम्पनी की गाड़ी से जाने के लिए राकेश ऑफिस से निकला था, लेकिन रास्ते में गाड़ी रोककर वापस लौटा दी और पास के ही एक मॉल में घुस गया । उसकी आदत थी, वह जिस भी शहर जाता, वहाँ से कुछ न कुछ सब के लिए लेते आता । इस बार वो आगरा गया था । सो पेठे पेठे तो बनते थे । रिपोर्ट करने जब वह आज दोपहर ऑफिस पहुँचा तो सहकर्मियों ने सारे पेठे चट कर दिए ।

रास्ते में ही गाड़ी को रोककर वह एक मॉल में दाखिल हुआ । मॉँल की जगमगाहट देखकर उसे ऐसे कई ईमारतों के बनने की कहानी याद आयी । एक विराने को तोड़कर कैसे ये जगमगाहट बनाई जाती है, उसे वह खूब जानता था । आँखों से गुज़रकर दिमाग पर असर करनेवाली रौशनी, ये बल्ब-बिजली कैसे बनते हैं, इसे वह खूब पहचानता था । शराब बनानेवाला भी नहीं बता सकता कि उसमें मिली कौन-सी चीज़ नशा देने का काम करती है । प्रभाव पूरे का होता है । इस्तेमाल करनेवाला भी नहीं जानता । इस चकाचौंध में राकेश को वक्त का पता ही नहीं चला । सबके लिए उसने कुछ चीज़ें खरीदी । अपने लिए खाने के दो पैकेट । वह जानता था उसने घरवालों को अपने आने की खबर नहीं दी थी । उसके लिए घर पर खाना होने का सवाल ही नहीं उठता । वैसे भी घर का खाना अभी तक ठंठा हो चुका होगा, जो उसे बिल्कुल पसन्द नहीं है ।

बाहर हल्की बारिश हो रही थी । उसने टैक्सी को आवाज़ दी - “टेक्सी....इंजीनीयर्स कालोनी चलोगे?”

“नहीं साब...आते वक्त खाली आना पड़ता है...”

“साब क्या है न...उधर बहुत सुनसान रहता है....वापिस आने में...”

“डबल किराया पड़ेगा साएब...और मिडनैट चार्ज अलग से....बोलेतो चलेगा साएब...” आखिरकार एक टैक्सीवाला अपनी शर्तों पर चलने को तैयार हुआ । शहर पीछे छूटता गया । अब सिर्फ सड़क और उसके किनारेवाले अनगिनत झोंपड़ें । शायद उनमें से कहीं बच्‍चों के रोने की आवाज़ें आ रही होंगीं, कहीं से चुड़ियों की खनखनाहट होगी, लेकिन तेज़ी से चलती टैक्सी में बजते एफ.एम. की आवाज़ में  वे सारी आवाज़े गुम हो रही थीं....

“तुझमें रब दिखता है याराँ मैं क्या करूं......”

राकेश ने ड्रायवर से आवाज़ कम करने के लिए कहा । शीशे में राकेश को मोबाइल निकालते हुए देखकर ड्राइवर ने आवाज धीमी कर दी । राकेश ने जाने क्या सोचा, अपने विचारों पर मुस्कराकर उसने फिर मोबाइल वापस बैग में डाल दिया । “अरे, बढ़ाओ भई...”

‘कुंडी न खड़काओं राजा’ की धुन टैक्सी की आवाज़ के साथ जुगलबन्दी करने लगी । उसके साथ गुनगुनाते हुए राकेश सड़क के किनारे सजी झुग्गियों के संसार को पीछे छुटते हुए देखने लगा ।

“ये रही साएब आपकी, इंजीनीयर कालनी....” गेट के आगे हल्के से ब्रेक लगाते हुए ड्रायवर ने कहा ।

टैक्सी से उतरकर उसने पैसे दिए और अपने बैग के साथ ढेर सारी थैलियाँ थामे घर की तरफ बढ़ चला । कॉँलनी अन्दर घुसते ही उसने देखा मिस्टर रेड्डी अब तक न्यूज़ देख रहे हैं, लेकिन बाकी काँलनी सो रही है, या सोने की तैयारियाँ कर रही है । अधिकांश घरों की बत्तियाँ बूझ चुकी थी । क्यारियों में बच्‍चों के मसले जाने के बाद बचे फूल हवाओं के साथ बातें कर रहे थे । अपनी गली में मुड़कर उसने देखा बाहर का बल्ब अब भी जल रहा है । वह बुदबुदाया “मतलब नेहा और जागृति जरूर टेनिस मैच देख रहे होंगें ।” उसने सोचा बुआ तो अब तक सो गई होगी । दबे पाँवों से फाटक खोलकर वह डोरबेल तक गया । डोर-बेल बजाने से पहले उसे शरारत सूझी । बिल्ली की तरह चलते हुए वह ड्राइंग रूम की खिड़के के पास गया । शीशा बन्द था । परदे भी खींचे हुए थे । लेकिन उसने देखा टी.वी.तो बन्द हैं और ड्राइंग रूम में उसे कोई नज़र नहीं आ रहा था । उसने सोचा शायद परदे की वजह से । वैसे ही धीमे पैरों से वह दरवाजे पर लौट आया । एक बार डोरबेल बजाई । कुछ देर रुका । कोई नहीं आया । उसने फिर डोर-बेल बजाई । कुछ इन्तज़ार किया । फिर कोई नहीं आया । उसकी बेचैनी बढ़ने लगी । उसने दो-तीन बार लगातार बेल के बटन को दबा दिया । अन्ततः दरवाज़ा खुला । बुआ आखें मलते हुए उसके सामने खड़ी थी । उसने राकेश को खड़ा देखकर कहा, “अरे राकेश बेटा...कउन फउन-वउन नइ, कुछ नइ...अचानक । चलो भीतरी आव... खाना-पानी गरम कर देइ हम...”

राकेश ने अपनी उँगली होंठों पर रखते हुए इशारा किया, “शू....उउउउ...।” फुसफुसाते हुए उनसे बुआ को बताया, “सप्राइज़ देना है, माने अचानक आकर चौकाना । मैं खाने के लिए बाहर से ले आया हूँ, लो इसे टेबल पर लगा दो, तब तक मैं फ्रेश होकर आता हूँ ।” उसने हाथ के पैकेट लहराते हुए कहा । बुआ उन्हें झट उसके हाथ से लेकर किचन की ओर बढ़ चली थी, तभी उसने धीमे से पूछा, “कहां हैं दोनों?”

बुआ ने कुछ कहा नहीं, बस सीढ़ियों की तरफ इशारा कर दिया । वह इशारा स्पष्ट समझा नहीं था । उसने अपने कमरे की ओर उँगली दिखाई । बुआ ने नकारार्थी सर हिलाकर नेहा के कमरे की ओर इशारा किया । राकेश ने समझने का इशारा कर अपने जूते वही उतार दिए और रेलिंग को पकड़कर वह इस एहतियात से सीढ़िया चढ़ रहा था कि आहट भी हो । दरवाज़े के पास पहुँचकर उसने धीरे से दरवाज़े को धकेला । खुला था । थोड़ा और दरवाजे को ढकेलकर वह भीतर देखने का प्रयास करने लगा । सिवाय लटकते कपड़ों और कुछ तस्वीरों के कुछ न दिखाई दिया । उसने थोड़ा और दरवाज़ा धकेला । उसे धीमी धीमी हँसी की आवाज़ सुनाई देने लगी । हल्की सी हँसी हँसते हुए उसने सोचा, “तो यहाँ हँसी-मजाक चल रहा है ।” वहीं खड़ा रहकर वह सुनने का प्रयास करने लगा । कोई शब्द न सुनाई देता था । बस रह-रहकर वही मंद-मंद हँसी की आवाज़ और कुछ आहटें सुनाई देती थी । कुछ देर बाद उसने दरवाज़ें को थोड़ा और धक्‍का दिया । कोर भर दरवाज़ा खुल चुका था । एक तरफ होकर शरारती बच्‍चे की तरह झाँककर देखा और अवाक् रह गया । उसे अपनी आँखों पर विश्‍वास न हुआ । उसने अपने यहाँ होने पर विश्‍वास न हुआ । वह फिर झाँककर देखने लगा । उससे देखा न गया । उसने जागृति को ऐसे देखा तो था, लेकिन नेहा को देखना उसे गँवारा न हुआ । नीचे बुआ थी और यहाँ यह नज़ारा । न नीचे जा सकता था न आगे । कुछ देर तक उसके दिमाग ने काम करना बन्द कर दिया । फिर उसने अपने आप को सँभाला । उसने अपने आप को समझाया । दरवाज़ा खटखटाने की सोची । दो-एक बार हाथ दरवाजें तक ले गया और अपने आप को बिल्कुल कमजोर पाया । उसे अपने आँखों में कुछ गीला महसूस हुआ । उसे आस्तीन से पोंछकर उसने खुद को समेटा और बगैर कुछ सोचें दरवाजें पर जोर से उलटी उँगलियाँ चला दी ।

भीतर हड़बड़ी सुनाई दी । उसका अन्दाज़ा सही निकला । दोनों अपने आप को समेटने लगे हुए थे । नेहा की आवाज़ आयी - “कौन? कम-इन”

“शुअर...?” उसने आवाज़ बदलकर जवाब दिया । उसने आवाज़ में ही जतलाने का प्रयास किया कि वह अभी-अभी आया है और उसने कुछ नहीं देखा ।

“या शुअर...” नेहा फिर से बोली ।

“सप्राभइइइईज़.....लुक हूइज़ हिअर.....” कहते हुए वह धीरे से कमरे में दाखिल हुआ, लेकिन उसकी नज़रे खिड़की तरफ थी । जैसे उनसे वह नज़रे मिलाना नहीं चाहता हो । जैसे उसे यहाँ होना ही नहीं चाहिए । वह अपने आप को अनाहुत महसूस करने लगा । मेहमान सा । दोनों के दिमाग़ में सन्नाटा छा गया । काटे तो खून नहीं । तभी उसकी नज़र लैपटॉप पर गई । उसे लैपटॉप की ओर देखते हुए जागृति ने देख लिया । झट से लपककर उसने लैपटॉप की स्क्रीन नीचे गिरा दी और राकेश के चेहरे की तरफ देखकर मुस्कराने का प्रयास करने लगी ।

“ओह ...भैय्या...व्हाट अ...व्हाट अ प्लेसंट सप्राइज़...कब आए आप?” उसने दातों को चबाते हुए हलक़ से शब्द निकाले ।

राकेश के मन में तूफानों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा था । उसकी मर्दानगी को जागृति ने जो धक्‍का दिया, वह उसे भीतर से मसोस रहा था । वह अपने आप को कुछ भी जाहिर करने से रोके जा रहा था । उसकी आवाज़ में क्रोध झलकने लगा था । उसे अफ़सोस भी हुआ कि वह दरवाजे से लौट क्यों नहीं गया । उसके मुँह से अचानक निकल पड़ा, “जब आप लोग....आप लोग प्लेजरस् गेम्स में मसरूफ़ थे .....आय डिडन्ट एक्सपेक्ट फ्रॉम यू जोग...शिट्..मिस जागृति...थू...ए ब्लड़ी बिच् व्हाट् डू यू वांट मी  से नाउ? और नेहा तुम....तुमने मुझे बताया नहीं कि....कि तुम...यू आर अ....छी....इइइ ! व्हाट शुड़ आय से?” कहकर वो जाने को मुड़ ही रह था, इतने में, जागृति ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया । उसने छुड़ाने की कोशिश नहीं की । बस मुँह फेरकर खड़ा रहा ।

“मैंने कहा था न जागृति...हमें पहले ही कह देना चाहिए था ।”

“मैने सोचा....” जागृति की अधूरी कँपकपी आवाज़ आयी ।

“इसका मतलब है, ये सब पहले से ही चल रह था । मतलब की तुम लोगों ने मुझे चारे की तरह इस्तेमाल किया । मैं सिर्फ एक मोहरा था । ये विवाह, ये प्रेम, सब नाटक था....।” उसके हाथ और आवाज़ में कँपकपाहट थी और  थरथराहट भरी चीख उसके गले को कँपकपाते हुए निकल रही थी । उसकी सुर्ख आँखों से बूँदे टपक पड़ी ।  

“प्लीज़ राकेश धीरे बोलो, प्लीज...कहीं बुआ न सुन ले, आई बेग् यू...।”

“धीरे? तुम लोगों को ये करते हुए शर्म.....और मैं मुझे धीरे...यू शेमलेस...थू..उउउ ।” उसने थूँक के छींटे फर्म पर उड़ाए । “...और ये लैपटॉप...यही, यही सबकी जड़ है ।” कहते हुए उसने लैपटॉप को उठाकर दीवार पर मार दिया ।

“अरे राकेस...बेटा आ रही हौ न...? अरे खाना-बाना फीर से ठंड़ा हो जाइ, फिर हम न गरमएँगे...आवा जल्दी ।” सीढ़ियों के पास आकर बुआ ने आवाज़ दी । राकेश जानता था कि बुआ सीढ़ियाँ नहीं चढ़ सकती थी । उसने जागृति की पकड़ से अपना हाथ छुड़ाया । उसकी साँसे और धड़कन कई गुना बढ़ गई थी । कमीज़ की बाहों से उसने पहले हाठों पर फैला झाग पोछा फिर माथे और गले का पसीना । “नीचे आओ...।” कहते हुए वो रफ़्तार के साथ कमरे निकलकर सीढ़ियाँ उतरने लगा ।

“अरे इ का, तुम तौ हात-मूँ बी ना धोए रहे? जाओ हाथ-मू धोए बिगर खाना नइ मिले हय ।” बुआ ने डाँटते हुए रसोईघर में चली गई ।

“नहीं बुआ, बहुत भूख लगी है...और आपकी शैतान बहु और भतीजी कहाँ हाथ-पैर धोने देती हैं । चलिए हाथ धो लेता हूँ ।” वह भी बुआ के पीछ रसोई में दाखिल हो गया ।

“भगवानै जानै इन बचवन का का होइ हय...ताड़ जइसे बड गये...बचपना अबै वइसै ।” बुआ बुदबुदायी । “इ कउनो बखत हय खाने का...पूजा अउर खाने के समय होवे हय...मू उठाइके कभे खात हय कभे सोत हय...हाय रे पइसा...।”

राकेश जब तक हाथ घोकर खाने की मेज़ तक आया नेहा और जागृति भी आकर बैठ चुकी थी । तीनों ने बुआ को स्थिति के असामान्य होने का अहसास तक नहीं होने दिया ।

“बुआ आप जाकर सो जाइएगा... हम खा लेंगे ।” राकेश ने टालना चाहा ।

“इ बी सइ हय...ठीक हय, आप लोगन का बात तो रातभर चलेगा न अब ।” कहते हुए घुटनों पर हाथ रखकर “हे भगवान” का जयघोष करते हुए बुआ रसोईघर के दूसरी तरफ बने कमरे में चली गयी ।

            उनके जाते ही राकेश ने टी.वी.का रिमोट उठाकर चैनल्स बदलना शुरु कर दिया । मेज़ की दूसरी ओर बैठे जीवों पर उसने जबरन ध्यान नहीं दिया । दोनों ने अपनी निगाहें राकेश पर गड़ा रखी थी और राकेश ने टी.वी.पर । वह खाए जा रहा था, मानो सदियों से भूखा हो । उसका एक हाथ चैनल्स बदल रहा था, दूसरा निश्‍चित स्थान पर अन्‍न पहुँचा रहा था ।

           

(3)

            “यार जाधव, हमने इसे बचाकर आज कोई पाप तो नहीं किया न?”

            “इसने क्या किया यार, ये तो बेचारा, खुद नशिब का मारा है....” उसने जोर से ठहाका लगाया ।

            “नहीं, इसने भी बढ़ावा दिया...ये अगर चाहता तो....दूबारा ऐसा करने की किसी की हिम्मत न होती ।“

            “जाने दे न यार चव्हाण...हमें क्या...मर रहा था...बचा लिया...चल तू, फॉर्म भर और दो कटिंग चाय बोलकर आ....।”

ऐसे सारी बहसें सुनने की, अपना पक्ष बताए बगैर पक्ष-विपक्ष में बातें सुनने की, जैसे उसे आदत हो गयी थी । कोर्ट-कचहरी, मीडिया, ह्यूमन राइट, महिला आयोग सारी जगहों पर पूरे दो महीने छाया रहा मुद्दा । राकेश ने अपनी पत्नी और बहन पर धोखाधड़ी का मुकदमा कर दिया ! उसकी कानों में गूँजती हैं, वो दलीलें, वो मीडिया ट्रायल्स....पब्लिक प्रॉसिक्यूटर का उल्टे उसे ही घुमा-फिराकर नामर्द कहना...। अपनी ही बहन को कोर्ट में खींचना । इज्जत का तार तार होना । फिर उसे लगता, उसने ठीक किया...यदि वो ऐसा न करता...तो उसका पुरुषत्व घेरे में आ जाता । क्या  पहले से ही वो ऐसा कर रहे थे? इन अजीब और परेशान कर देनेवाले ख्यालों के साथ वो जी रहा था । मुकदमा चलता जा रहा था । उसके अन्दर से ‘आवाज़ आती मर जाउँ तो दर्द फना हो जाए’ । साइट के बहाने वो कई महिनों तक घर नहीं आया ।

            उम्मीद ही नहीं, विश्वास उसे जीवित रखे था । एक दिन उसने ‘उन’ दोनों ने मिलने के लिए बुलाया । बाहर मौसम खुशगवार होता, तब भी इनकी बातचीत में कोई अन्तर शायद ही आता । वही झमाझम अनचाही बम्बईया बारिश । वहीं की फिल्मों की तरह लीजलीजी, संवेदनहीन । सारे मीडिया...लोगों से छिपते-छिपाते आए थे, तीनों । पता नहीं राकेश क्यों आ गया था, क्या वो भी यही चाहता था । किससे मिलने आया था वो, नेहा से या....?

            “यू नो...दिस् गोइंग टू डिस्ट्रॉय आवर लाइव्स...दिस् मीडिया...दिस् शिट् पिपल्स...ऐण्ड ऑल...आय ऐम सिक विथ ऑल दिस्..” छत से गमले में टपकती बूँदों पर ध्यान केन्द्रीत करते हुए जागृति ने कहना शुरु किया, “लेट्स नॉट फाइट...”

            “यू लॉस्ट ऐनिथिंग इन ऑल दिस् शिट्....इवन तुम?” उसने नेहा की तरफ मुड़कर कहना चाहा, लेकिन आँखें उसके पीछे लगे बुद्ध की गहन ध्यानमग्न पेंटिंग पर जा टिकी । “तुम दोनों ने पाया ही है...खोया तो मैंने...”

            “टू कैपीचीनो...ऐण्ड वन ब्लैक टी...और दो कुलचे भी लाना ।” जागृति ने राह देख रहे वेटर से कहा ।

            “....और जल्दी” राकेश ने जल्दी में जोड़ा ।

            “सॉरी यार...वी हैव नो अदर च्वाइस...’’

            “भैय्या...”

            “डोन्ट कॉल मी दैट...” कँपकँपी आवाज़ को भारी करने की कोशिश करते हुए उँगली दिखाकर कहने लगा, “तुमने खूब तमाशा बनाया मेरा....अब आप लोग जो कहे, वही सही, लेकिन कण्डिशन्स मेरी सही होंगी....और हाँ, अपनी सारी दलिलें कोर्ट के लिए बचाकर रखना, गॉट इट?”

            “ठीक है” जागृति की सहमति लेते हुए वाक्य पूरा हुआ ।

बारीश ने आज अँधेरे को जल्द ही बुला लिया था । तेजी से ठंड़ी होती चाय को टेबुल पर ही छोड़कर वह निकल पड़ा । टैक्सी पकड़कर वो सीधे घर की तरफ निकल पड़ा । बारीश अभी भी जारी थी । अचानक उसके ड्रायवर ने गति पर लगाम लगाया । सामने तीन चार लोग हाथों में हथियार लिए खड़े थे । उन्होंने दरवाजा खोला औऱ राकेश को पीटना शुरु कर दिया । ड्रायवर भाग गया ।

‘साले, कम्पनी के डॉक्यूमेंस् लीक करता है ! हरामी की औलाद....”

अर्धचेतन अवस्था में उसने ये आवाज़ पहचानी, ये तो वरदविनायक कम्पनी का मुख्य प्रशासक है । मैंने कौन-से पेपर्स लीक किए? लेकिन वो कुछ बोल न सका । इतने में वहाँ से गुज़रनेवाली पुलिस की गाड़ी की आवाज सुनकर हमलावरों ने गोलियाँ चलानी शुरु कर दी । चोट अन्दरुनी थी । उसे प्राथमिक उपचार के बाद पुलिस स्टेशन ले जाया गया । दो हमलावरों को पुलिस ने बुरी तरह से जख्मी कर दिया । बाकी भागने में कामयाब रहे ।

 

(4)

            “ये सब क्या है, तू यहाँ कैसे फँस गया? वो लोग तुमको कायको घसीट रहा था?” चाय की चुस्की लेते हुए सब-इन्सपेक्टर पूछ रहा था ।

            “मालूम नहीं सर, बट वो लोग किसी डॉक्यूमेंट के लीक होने की बात कर रहे थे ।”

            “तुमने किया?”

            “नहीं”

            “घर में और कौन-कौन रहता है?”

            राकेश ने कोई जवाब न दिया ।

            “वो दो के अलावा?”

            “बुआ”

            “मतलब वो दो भी रहता है?”

            “हाँ”

            “हाँ?, पर कैसे?”

            “बुआ की वजह से”

ताली बजाते हुए, वो हँसने लगा । “कमाल है भई! तुम्हारे कारण दुनिया लड़ रही है, और तुम...! अच्छा ठीक है, तुम्हें पता है, हम लोग तुझको बचाने कैसे पहुँचा?” अकारहीन राकेश के चेहरे की तरफ देखकर रहस्योद्धाटन की शैली में उसने कहा, “तेरे उन दो प्यारों में से एक ने फोन किया था हमें, जाहिर है, उन्हें इस घटना की खबर थी । खैर, तेरे बहाने, ये वॉन्टेड़ लोग मिल गया । तुझको किसी पर और शक है?”                      

            “उन्हीं पर, उन दोनों को अरेस्ट किया जाए”

            “किस जुर्म में?”

            “मुझ पर हमला कराने के जुर्म में”

            “कोई सबूत?”

            “आपने तो कहा, कि उन्होंने फोन किया था”

            “तेरे पास कोई सबूत है क्या? नहीं न? चलो अब जगह खाली करो...अभी बहुत काम है” कुर्सी से उठकर उसने राकेश की बाँह पकड़ी और उसे लगभग घसीटते हुए बाहर ले आया । राकेश की समझ में नहीं रहा था कि हो क्या रहा है । बाहर आते ही उसके सामने एक चौपहिया आकर रुकी । जागृति ने पीछे की सीट पर उसे बैठने का इशारा किया । वह मना न कर पाया । उसकी गोद में एक बैग रखा गया, “इसमें तुम्हारे सारे डॉक्यूमेंटस् हैं । ऊपर वाली चैन में टिकट । अब से ठीक आधे घंटे बाद फ्लाइट है । तुम्हारे रहने का भी इन्तजाम हो चुका है । नॉर्वे में । ये राय नहीं है, उम्मीद है तुम इसे उसी तरह लोगे । बुआ को मैं समझा दुँगी । और हाँ, लौटने की जरुरत नहीं, पुलिस पर फायरिंग करने की सज़ा तो जानते होगे तुम? बस । अभी तक एफआयआर हुई नहीं, लेकिन जिस दिन लौटोगे, तो सेवा में मिलेगी । हैप्पी जर्नी ।”

            दरवाजा खुला । कार जिस गति से रुकी थी, उसी गति से चली गयी । उसके चेहर पर कोई भाव होता भी कैसे? । एअरपोर्ट के दरवाजे में घुसते हुए उसे लगा, ब्लैक होल या बर्मुड़ा ट्रायंगल इससे क्या अलग होगा ।

 

मोबिन जहोरोद्दीन