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जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

पुनर्विवाह: डॉ मधु त्रिवेदी [लघुकथा]

(लघु कथा )

पुनर्विवाह

 

          कमर तक लटके बाल, माथे पर बड़ी बिन्दी आगे माथे पर आये छोटे -छोटे बाल ऐसे लगते थे जैसे कि अर्ध चन्द्र को आ बादलों ने ढक लिया हो । लावण्यता से युक्त देखने से ऐसी लगती थी कि कोई अप्सरा स्वर्ग से उतरी हो । 

 

          पर सब कुछ अस्त व्यस्त था क्योंकि जो मातम फैला हुआ था उससे उसकी हर खुशी को ग्रहण लग गया था सामने  सफेद कपड़े में लिपटी उसके पति की पार्थिव देह ने उसके आगे अनन्त प्रश्न खड़े कर दिये थे । 

 

          पढी लिखी न होने के कारण जीविका का संकट स्थायी रूप से था । जो अब तक उसका पति था वो अल्लाह प्यारा हो चुका था  ।बीमारी की वजह से नौकरी बहुत पहले छूट चुकी थी, बस रहने के लिए टूटी फूटी झोपड़ पट्टी थी वर्तमान को खोने के बाद भविष्य की चिन्ता थी ।

 

            पति से बेमेल विवाह हुआ था पति चालीस का तो वो  बीस की थी माँ बाप सड़क हादसे में मर गये और कोई न होने के कारण मामा -मामी ने अधेड़ के गले की घंटी बना दिया था मधुमयी को इतना भी अवकाश  न मिला कि अपना बुरा भला सोचती उससे पहले ही मढ़ दी गई इस उम्र दराज व्यक्ति से । 

 

         संतान न होने के कारण अकेली थी इस वीराट संसार में कोई नहीं था । भगवान को जितनी ज्यादती करनी थी कर ली । बस इन्तजार था किसी आशा की किरण का । थोड़ी बहुत आशा दिखाई देती थी तो उस व्यक्ति में जो उसके पति की पार्थिव देह के आगे बैठा था और अन्तिम क्रिया के लिए सारे साज जुटा रहा था ।

 

         क्योंकि गरीबी किसी न किसी आसरे का मोहताज तो होती ही है वहीं सहारा मधुमती को पार्थिव देह के आगे बैठे व्यक्ति में नजर आ रहा था । लेकिन सहचरी या जीवनपथिनी न बनकर बल्कि अपने पति के मित्र होने के नाते । विधाता की निष्ठुर दुनियाँ में एक द्वार बन्द होते ही दूसरा स्वतः ही खो जाता है ।

 

         मधुमती की बोझिल जिन्दगी इ स बात का अपवाद न थी । जब सब मेहमान अपने घर  वापस जाने लगे तो मधुमती भावी भय से डरने लगी कि घर में अकेले रह जाने पर एकाकीपन से कैसे उबर पायेगी और कैसे वह भावी आवश्यकताओ को पूरा करेगी । मेहमानों के जाने के बाद जब उसके पति का मित्र जाने लगा तो वह बहुत भावुक हो उठी और उसके पैरों में पड़ गई । उसके पैरों में पड़ने का आशय समझ वह दो दिन रूक गये क्योकि आर्थिक अभाव में सबसे ज्यादा बलि पेट को ही देनी पड़ती है । 

         दो दिन रूक कर मित्र ने कुछ अभावों की तो पूर्ति कर दी लेकिन अभावों का सुरा जैसा मुख खुला था जिनको पूरा करना संभव था दुनियाँ में अकेली थी इसलिए तिनके का सहारा ढूढ़ रही थी जब मृत पति का मित्र चला गया तो अकेली रह गई उसके लिए पड़ोसियों का सहारा ही बहुत था । पडोस में रहने वाली मालिन रोज आ कर उससे पूछ जाती कि किसी चीज की जरूरत तो नहीं 

पर संकोच के वशीभूत हो कभी कुछ ले लेती तो कभी मना कर देती पर जिन्दगी का व्यापार अस्वीकृति से नहीं चलता है इस लिए चाह थी कि कोई स्थायी सहारा मिले अन्ततः मधुमती ने जीवन चलाने के लिए पहले से विवाह युवक जिसके एक बेटी थी विवाह कर लिया । 

 

 

डॉ मधु त्रिवेदी 

शान्ति निकेतन कालेज ऑफ़

 बिजनेस मैनेजमेंट एण्ड कम्प्यूटर 

साइंस आगरा 

प्राचार्या,

पोस्ट ग्रेडुएट कालेज आगरा