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जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

भगत सिंह होने का मतलब (लेखक- मुद्राराक्षस): समीक्षक: जुगुल किशोर चौधरी [पुस्तक समीक्षा]

ऐतिहासिक विकृति बनाम भगतसिंह

जुगुल किशोर चौधरी

 

रतीय इतिहास लेखन में विद्वानों ने जो भेद-भाव दलितों और पिछड़ों के साथ किया है, वो सदियों तक इतिहास लेखन पर एक धब्बा सा है जो छुपाए नहीं छुपेगा। ‘‘मुद्राराक्षस’’ एक गंभीर, कुशल आलोचक और समाजशास्त्री हैं, इन्होंने इतिहास लेखन को गंभीरता से समझ कर भगतसिंह के जीवन के सभी पक्षों का उल्लेख किया है तथा किस तरह भगत सिंह के विचार समाज के सभी पक्षों को लेकर जीवंत थे और हैं, सबका विश्लेषण किया हैं। भगतसिंह अपने समय की धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक आदि समाज और देश से जुड़े सभी मसलों को इतनी गहराई और समझदारी के साथ रखते हैं कि इनके विचारों को देखकर लगता है, असली भगतसिंह क्या थे। भगतसिंह की तुलना आज हर किसी ऐरे-गैरे व्यक्ति से, साहित्य समाज और इतिहास लेखन में की जा रही है। ऐसे बेहद चिंतनीय सवालों को कटघरे में खड़ा करती है, पुस्तक “भगत सिंह होने का मतलब”

            भगतसिंह का समय गुलामी का समय था। जहां इंसान को इंसान नहीं समझा जा रहा था और भारत का बहुसंख्यक समाज एक ओर अंग्रेजों की गुलामी की मार झेल रहा था, वहीं दूसरी तरफ उससे भी दुर्दांत अवस्था में हिन्दू सभ्यता के अत्याचार से पीड़ित था। जहां दलितों, पिछड़ों के साथ कुत्ते बिल्लियों से भी ज्यादा बदतर व्यवहार किया गया। जातिवादी वर्णव्यवस्था का ऐसा नंगा रूप भगतसिंह की आंखो के सामने था कि उनकी रूह उन्हें आजाद कराने के लिए हमेसा बेधती रही। भगतसिंह दलितों, पिछड़ों की ऐसी स्थिति के लिए जिम्मेदार सभी सत्ताधारी, धर्म के ठेकेदारों और उनकी फैलाई हुई कहानियों से अच्छी तरह से परिचित थे। अपनी जेल डायरी में सब कुछ लिखा जो समाज के विकास की रुकावट में पूर्णत: बाधक था। अंधविश्वास, रूढ़िवादिता, अवैज्ञानिकता, धार्मिक उन्माद, व्यभिचार, आदर्शवाद, नैतिकता आदि को शोषण का कारण मानते थे। भगतसिंह गांधी के दलित मुक्ति के अड़ियल रवैये की आलोचना करते हैं और उन तमाम हिंदूवादी सभ्यता के जो एक मानव को मानव मानने के पक्ष में नहीं थे इस श्रंखला में कई बड़े नेता जो आजादी की लड़ाई के दिग्गज माने जाते है उन सबका उल्लेख अपने जेल डायरी में करते हैं। जिसका विवेचन विश्लेषण ‘मुद्राराक्षस’ दुनिया भर के प्रसिद्ध वैज्ञानिक विचारको का उदाहरण देकर, अपनी पुस्तक में हर जगह करते हैं। भगतसिंह की तुलना आज दुनियाँ किसी से भी करती है, जो भगतसिंह के इर्द-गिर्द भी नहीं भटकते, यहाँ तक कि भगतसिंह के विपरीत दिखाई देने वाले विचारकों की भी तुलना करने से पीछे नहीं हटती, इस श्रेणी में गांधी, मदनमोहन मालवीय, सरदार पटेल आदि हैं और भगतसिंह के इर्द-गिर्द सच्चे मायने में जो हैं वो है जीसस, कबीर जिनकी दुनियाँ नाम तक नहीं लेती। जिनके समतुल्य भगतसिंह को सच्चे अर्थों में रखा जा सकता हैं। मुद्राराक्षस लिखते हैं-“भगतसिंह एक तार्किक आधुनिकतावादी थे, गांधी इतिहास को पीछे की तरफ लौटाने वाले सनातनी हिंदू थे।” भगतसिंह जहां सांस्कृतिक पक्षों को स्वीकार करते थे, वहीं वे मिथकीय तथ्यों को नकारते भी हैं, वो मानते हैं कि मिथकीय समस्याओं को वैज्ञानिक विचार अपनाकर ही भविष्य की समस्याएँ हल हो सकती हैं। इसके विपरीत गांधी वैज्ञानिक अविष्कारों के धुर-विरोधी थे।

            मुद्राराक्षस अंबेडकर-गांधी के बीच हुए पूना पैक्ट समझौते की, पूरी पृष्ठभूमि को उदाहरणों के माध्यम से दलित पिछड़ों के हक, अधिकार की लड़ाई को कैसे गांधी ने छीना उसकी पृष्ठभूमि और कारणों को कैसे भारतीय इतिहासकारों ने बड़ी चालाकी से बस पूना पैक्ट का नाम देते हुए आगे निकल जाते है, उस पर सवाल खड़ा करते हैं। यह पुस्तक भगत सिंह के पूरे क्रांतिकारी वैचारिक जीवन संग्राम को समझने/समझाने में बड़ी सफल और कारगर साबित होती है। भगतसिंह ने अपनी छोटी सी जिंदगी में जो समझ, उस दक़ियानूसी समाज में रहकर व्यक्त की, उससे गांधी, पटेल, मदनमोहन मालवीय जैसे विचारक भी पीछे छूट जाते हैं। हिंदू समाज किस तरह दलित, पिछड़े समाज को गुलाम रखने की साज़िस में कामयाब रहा और किस तरह वेदों-पुराणों और गीता आदि में विचित्र कहानियों का नाटक हिंदू सभ्यता करती आई है सबका मूल्यांकन मिलता है। किस तरह हिन्दू संस्कृति का एक मात्र उद्देश्य जातिवादी वर्ण व्यवस्था को कायम रख देशभक्ति का प्रलाप करना मात्र था, जिसके तार्किक पक्ष इस पुस्तक में स्पष्ट रूप से रखे गए हैं।

            गांधी के आमरण अनशन को मुद्राराक्षस ने ब्लैकमेल कहा और भगतसिंह की अनशन पर दी गई ठोस प्रतिक्रिया को प्रस्तुत करते हैं- “हम तो समझते हैं कि उनका स्वयं को अलग संगठनबद्ध करना तथा मुस्लिमों के बराबर गिनती में होने के कारण उनके बराबर अधिकारों की मांग करना बहुत आशाजनक संकेत है। या तो सांप्रदायिक भेद का झंझट ही खत्म कर दो नहीं तो उनके अलग अधिकार उन्हें दे दो।” जातिवाद की जड़ को स्पष्ट करते हुए मुद्राराक्षस अंबेडकर-गांधी-भगतसिंह की जातिवाद और दलित मुक्ति के प्रश्नों पर क्या दृष्टिकोण था उसकी मूल जड़ को समझने की कोशिश करते हैं। दलितों का शोषण हिन्दू जाति में रहते हुए मुसलमानों से गया गुजरा था। गर दलित पहले से ही हिन्दू से अलग हो गया होता तो इतना अत्याचार, अपमान, शोषण आदि सब आजादी के इतने दशक बाद भी सहना नहीं पड़ता। इस बात को विद्वान, आलोचक, समाजशास्त्री सभी मानते हैं। भगतसिंह जनप्रतिनिधि के लिए पृथक निर्वाचन या पृथक इलेक्टोरेट का समर्थन कर रहे थे जिसके पक्ष में गांधी या कांग्रेस बिलकुल नहीं थे। अगर गांधी ने आमरण अनशन नहीं किया होता और अंबेडकर के बराबरी और दलित मुक्ति वाले मत को मान लिया होता तो अभी तक समाज जातिवादी शोषण व्यवस्था से पूर्णत: स्वतंत्र हो चुका होता। डॉ. आंबेडकर की तरह भगतसिंह ने दलितों को स्वतंत्र रूप से संगठित होने की चुनौती दी थी। भगतसिंह धर्म के मुद्दे से जोड़कर दलित मुक्ति को देखते हैं और लिखते हैं- “जब तुम इन्हें इस तरह पशुओं से भी गया बीता समझोगे तो वे जरूर ही दूसरे धर्मों में शामिल हो जाएंगे जिनमें इन्हें अधिक अधिकार मिलेगें, जहां इनसे इन्सानों जैसा व्यवहार किया जाएगा। फिर कहना, देखो तो ईसाई और मुसलमान हिंदू कौम को नुकसान पहुँचा रहे हैं।” ऐसी दूरदृष्टि भगतसिंह को क्रांतिकारी बनाकर अमर कर गई। अंबेडकर ने भी दलितों की अमानवीय स्थिति से मुक्ति का रास्ता धर्म परिवर्तन में ढूंढा और लाखों अनुयाइयों के साथ नागपुर में बौद्ध धर्म अपनाया। ओशो कहते हैं डॉ. अंबेडकर ने मार्ग तो बहुत अच्छा ढूंढा लेकिन एक धार्मिक (हिन्दुत्व) जेल से निकले तो दूसरी जेल में जा फंसे, जो थोड़ी ज्यादा कम्फ़ोर्टेबल थी लेकिन थी तो वो जेल ही।  

            बड़े ही संवेदनशील मसले को पुस्तक में उठाया गया है। जिसका आज अत्याधुनिक युग में सबसे ज्यादा फुटपाथी उत्पात का रूप समाज के सामने एक समस्या बनकर उभरा है। आजादी से पहले हिन्दुत्व का क्या रूप था और हिन्दुत्व कितना आजादी में शरीक रहा, उसका वास्तविक स्वरूप पुस्तक में दिखता है। हिंदुत्ववादी आंदोलन का प्रमुख उद्देश्य नए समय की विचारधारा को पूरी तरह नकार कर राजा, सामंत और महाजनी वर्णव्यवस्था को बनाए रखना था। मनुस्मृति, गीता आदि धार्मिक ग्रंथो को आधार बनाकर एक दास समाज की स्थापना किस तरह की गई उसकी जड़ तक पहुँचने की कोशिश की गई है। किस तरह हिंदूवादी संगठनों का सामाजिक आर्थिक संरचना से कोई सरोकार नहीं था, ये अपना उद्देश्य मात्र देशभक्ति को ही बताते हैं, जिसका सामाजिक स्वच्छता से कोई लेना देना नहीं था। किस तरह अंग्रेजों से मुक्ति के लिए जो आंदोलन चलाए जा रहे थे उसमें बहुसंख्यक समाज की मुक्ति को, कोई जगह नहीं थी।

            बौद्ध और स्लाम ने मानव जाति को किस तरह स्वीकार्य किया, लेकिन हिन्दू ने नहीं, ऐसी तमाम बहसों को पुस्तक का हिस्सा बनाया गया है। मुद्राराक्षस तुलनात्मक संस्कृति का अध्ययन करते हुये लिखते हैं कि- “जिस तरह ईसाई संस्कृति ने आविष्कार की परंपरा को आगे किया है उसका पार कोई संस्कृति नहीं पा सकी, ईसाई संस्कृति ने ही बड़े-बड़े सुप्रसिद्ध विद्वानों को जन्म दिया। आइन्स्टाइन, फ्रायड, डार्विन, रसेल आदि।” सोचने की बात यह है कि घोर अंधविश्वासी और कर्मकांडी इसाइयत में यह सब कैसे हुआ।  

            आजादी के समय का भारत आज के भारत से कहीं ज्यादा अच्छा था। अंग्रेजों और ईसाई मिशनरियों द्वारा जब दलित, पिछड़ों के लिए शिक्षण संस्थान खोले गए तब हिंदुओं और तथाकथित हिन्दू बुद्धजीवियों की प्रतिक्रिया बेहद चिंतनीय थी, जिसका उदाहरण देकर मुद्राराक्षस गंभीर प्रश्न खड़ा करते हैं। हिन्दी साहित्य में जातिवाद और हिन्दुत्व का जो प्रकोप आज भी हावी है वो इन्हीं पाखंडी बुद्धजीवियों की ही देंन है, जो उस समय कभी बराबरी के पक्षधर नहीं रहे। ‘‘मुद्राराक्षस’’ लिखते हैं कि- 1929-30 में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने दलितों की शिक्षा पर छोभ प्रकट किया और कहा- “जिन शूद्रों के कारण समाज अपवित्र होता है उन्हें अंग्रेज़ शासक अपने स्कूलों में सवर्णों के साथ बैठाकर शिक्षा देता है और एक नीच, चांडाल, कुलीन ब्राह्मण को अदालतों में एक ही प्रकार का दंड दिया जाता हैं।” ऐसी सोच से आज भी भरा पड़ा है पुरातनपंथी हिन्दू समाज और साहित्य, जो आज भी मानवीयता जैसे शब्द से बिलकुल अज्ञान हैं। ऐसे अनेक चिंतनीय विषय को भगत सिंह के चिंतन के माध्यम से खड़ा करते हैं मुद्राराक्षस, जहाँ तक सभ्य समाज के विद्वानो और आलोचकों की नज़र नहीं जाती। हिंदी साहित्य के क्षेत्र में ऐसी कुशिक्षा भरी पड़ी है जहाँ गैरबराबरी का समर्थन होता है। हिंदी के बड़े आलोचक ऋषि का उदाहरण देते हुए लेखक अपनी बात की पुष्टि करते हैं- “ईसाई या मुसलमान बनकर भी दलित काम तो अपनी जाति का ही करता है।” ऐसी बेतुकी बातों पर कटाक्ष करते हुए मुद्राराक्षस लिखते हैं- “मान लीजिए ऋषिप्रवर किसी कुलीन ब्राह्मण की संतान न होकर अपने ही शब्दों में किसी भंगी या चमार की औलाद होते तो उनका जीवन किस स्थिति में बेहतर होता-ईसाई या मुसलमान होकर या हिन्दुत्व का दास बने रहकर?” सामाजिक अस्मिता, दलित अस्मिता, स्त्री अस्मिता के प्रश्न भगतसिंह के माध्यम से आधुनिक परिप्रेक्ष्य के साथ जोड़कर देखने का अदम्य साहस रचनाकार दिखाते हैं। हिंदुओं की आजादी से पहले सामाजिक कुव्यवस्था और आज के आधुनिक युग में फैली कुव्यवस्था पर अपना रोष प्रकट करते हैं तथा लिखते हैं- ये वही समाज है जहाँ इंसान की जान से ज्यादा कीमती एक गाय मानी जाती है। आज भी आधुनिक समाज में दलितों का अपमान और अत्याचार जारी है, लगातार खबरे छपती हैं कि दलित घोड़ी पर बैठकर शादी करने जा रहा था तभी उसे घोड़ी से उतारकर पीटा गया। थोड़े थोड़े अंतराल पर खबर आ जाती है कि कोई दलित परिवार दिन दहाड़े मारा गया, दलित बस्ती घेरकर फूँक डाली गई। दलित स्त्रियों की इस देश में बहुरमती घटनाओं का तो शुमार ही नहीं है। गुजरात जैसे ऊना कांड की घटना और अभी  राजस्थान के पहलू खान की हत्या भी जग जाहिर हैं। उस पर आज का प्रशासन और मीडिया की चुप्पी, समाज की चुप्पी बेहद चिंता का विषय है। इन सब विषयों की चर्चा को पुस्तक में महत्व दिया गया है।   

            भगतसिंह जातिवादिता का मूल कारण हिंदुत्ववादिता को मानते हैं और हिंदुत्ववादियों को आईना दिखाते हुए लिखते हैं- “कुत्ता हमारी गोंद में बैठ सकता हैं। हमारी रसोई में निस्संग करता फिरता है लेकिन इंसान का हमसे स्पर्श हो जाए तो धर्म भृष्ट हो जाता है।” समाज की अंतरआत्मा को झगझोर देने वाले कटाक्ष भगतसिंह आजीवन करते हैं। 

            मुद्राराक्षस का चिंतन बहुत व्यापक-गहरा और अग्रगामी है। इन्होंने अपने रचना साहित्य में भारतीय समाज में ब्राह्मणवादी हवावाज़ी को बहुत गहरे जाकर प्रमाणों के साथ निर्मूल किया है। ये वेद, महाभारत, गीता आदि की तह तक जाकर उसका सामाजिक मूल्यांकन करते है। साहित्य के दिग्गजों से ये सीधे-सीधे टकराते हैं। धार्मिक कट्टरपंथियों और आलोचकों से वाद-संवाद करके उनकी चिन्दियाँ विखेरते हैं। समय सापेक्ष इतिहास दृष्टि राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक स्थिति का आंकलन तमाम साहित्य को पढ़कर करना चाहिए जो मुद्राराक्षस का विशेष गुण है।

            अध्यात्मिकता पर भगत सिंह के विचार- “हमारा देश बहुत अध्यात्मवादी है लेकिन जब मनुष्य को मनुष्य का दर्जा देते हुए भी झिझकते हैं जबकि भौतिकवादी कहलाने वाला योरोप कई सदियों से इंकलाब की आवाज उठा रहा है। उन्होंने अमेरिका और फ्रांस की क्रांतियों के दौरान ही समानता की घोषणा कर दी थी। आज रूस ने भी हर प्रकार के भेदभाव मिटाकर क्रांति के लिए कमर कसी हुई  है।”

            किसान, मजदूर, दलित, पिछड़े के प्रश्न उठाने वाले चिंतकों को किस तरह हिंदूवादी पुरातन पंथियों का कड़ा विरोध झेलना पड़ा इसके कई प्रमाण पुस्तक में दिए गए जो समाज की दुर्दशा के पीछे रहे हाथों का वर्णन करते हैं। किसान आंदोलन में स्वामी सहजानन्द ने जब जमीदारों के अत्याचार और शोषण के खिलाफ आवाज उठाई तब उन्हें खुद गांधी के विरोध का सामना करना पड़ा। ऐसे कई कारण जो भारत की प्रगति में बाधक थे जिसके कारण भारत में औद्योगिक क्रांति कभी संभव नहीं हो पाई। इतिहासकारों में विपिन चंद्रा जैसे इतिहासकारों का उदाहरण देकर इस बात को रखते नज़र आते हैं। भगतसिंह का जुड़ाव समाज से कितना नजदीक था और किस प्रकार दुनियाँ भर के विचारकों की छाप उनके जीवन में देखने को मिलती है। समाज को स्वस्थ बनाने के लिए उनकी सोच कितनी प्रासंगिक थी, सबका जीवंत चित्र मुद्राराक्षस की इस पुस्तक में मौजूद है। मार्क्स, एंगेल्स, अंबेडकर इनके नज़दीक पहुँचते हैं, पर वहीं हिन्दुत्व की रक्षा करने वाले रूढ़िवादी अवैज्ञानिक गांधी, मदनमोहन मालवीय, तिलक आदि कितने विपरीत हैं।     

            भगतसिंह की सोसलिस्ट पार्टी के लोग ही बस समाजवाद को आदर्श मानते हैं बाक़ी अन्य सदस्य उपनिषद, गीता आदि की रूढ़ियों पर विश्वास करते हैं। जिसका जिक्र भगतसिंह अपने पत्रों में खुद करते हैं। मार्क्सवादी विचारकों की क्या स्थिति की गई है भारत में, उस पर बेहद संजीदा सवाल उठाया गया है, पुस्तक में किस तरह रूढ़िवादी मार्क्सवादियों ने मार्क्स के विचारों को धर्मग्रंथों में परिवर्तित कर दिया और मार्क्स के लेखन को बाइबल, कुरान की जगह रखने लग गए और आज स्थिति ये है कि धर्मांध रूढ़िवादियों को न स्वतंत्र चिंतन पसंद है न आलोचना। मुद्राराक्षस गहराई से इतिहास का परीक्षण करते हुए कहते हैं कि मार्क्सवादियों ने भगतसिंह को कभी मार्क्सवादी नहीं कहा सिर्फ इतना कहा कि मार्क्सवाद का साहित्य पढ़ रहे थे या मार्क्सवादी बनने के रास्ते पर थे। मार्क्सवादी थे यह कहने में किसी भी भारतीय मार्क्सवादी को आज भी संकोच है और यही वजह है कि गांधी को अपनी पगड़ी की कलंगी बना लेते हैं लेकिन भगतसिंह को वह सम्मान देने से कतराते हैं। इस बात को भगतसिंह खुद लिखते हैं कि किस तरह रूढ़िवादी कम्युनिष्ट ब्राह्मण ग्रंथि से पीड़ित थी। आलोचना पर भी भगतसिंह के क्या मत थे और मुद्राराक्षस आलोचना को किन अर्थों में देखते हैं, पुस्तक में भगतसिंह के मत से स्पष्ट किया गया है। किन-किन इतिहासकारों ने निष्पक्ष होकर इतिहास लेखन में योगदान दिया है उसके बिन्दु भी पुस्तक में मिलते हैं। भारतीय चिंतन में कोई भी चीज या तो एकदम से पूज्यनीय हो गई या फिर सिरे से नकार दी गई है। भारतीय चिंतन में विदेशी विद्वानों का भी बेडागर्ग करने में भारतीय विद्वान, इतिहासकार पीछे नहीं रहे। 

            अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता, आजाद विचारों का वहन इन दोनों पर भगतसिंह ज़ोर देते हैं- “जो चीज आज़ाद विचारों को बर्दाश्त नहीं कर सकती उसे समाप्त हो जाना चाहिए।... बिना विचारों की आज़ादी के , नई समाज रचना का साहस भी नहीं होता।”  क्रांतिकारी कार्यक्रम के जो मसौदे भगतसिंह ने तैयार किए उनमें पूंजीवाद, निजीसम्पत्ति और सामंतवाद से मुक्ति अनिवार्य थी जो कांग्रेस के आंदोलन में पूरी तरह गायब थी। गांधी ऐसी कोई चीज बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। भगतसिंह सतत क्रांति की बात करते हैं- “ऐसे बीज डालो जोकि उगे और बड़े बृक्ष बन जाए। आश्चर्य होता है कि जीसस का काम भी यही था- मैं मनुष्यों को ऐसा उर्वर बनाना चाहता हूँ जिसमें बोए बीज फसल बन सकें।”

            क्रांति का सही और स्पष्ट मकसद समझाते हुए भगतसिंह ने लिखा- “क्रांतिकारी निश्चय ही बिना सोची-समझी हत्याओं और आगजनी की दरिंदा मुहिम नहीं है और न ही यहाँ-वहाँ चंद बम फेंकना और गोलियां चलाना है और न ही यह सभ्यता के सारे निशान मिटाने तथा समयोचित न्याय और समता के सिद्धान्त को खत्म करना है।” आधुनिक समाज की युवा पीढ़ी को भगतसिंह के इस क्रांतिकारी स्वर से क्रांतिकारिता का असली मकसद सीखना चाहिए। भगतसिंह गांधी की अहिंसात्मक क्रांति को आदर्श-औचित्य मानते हुए कहते हैं- एक ब्लैकमेलर प्रत्यक्ष हिंसा नहीं करता वह भयावह रूप से हिंसक होता है। मुद्राराक्षस गांधी की कूटनीति और अहिंसक शस्त्र का किस तरह प्रयोग करते हैं वह सोचने वाली बात है- “गांधी ने दलित मुक्ति की मांग छोड़ने के लिए जब अंबेडकर के विरुद्ध आमरण अनशन किया तो वह शुद्ध रूप से एक ब्लैकमेलर की हिंसा थी। आखिर गांधी ने भारत के बटवारे के विरुद्ध आमरण अनशन क्यों नहीं किया था।” यह विभाजन का एक महत्वपूर्ण सवाल है, जो मुद्राराक्षस के अलावा कोई और नहीं उठा सकता था। इस तरह गांधी, पटेल आदि की राजनीति पर कई सवाल खड़ा करते हैं मुद्राराक्षस’, लेकिन इनका मुख्य बिंदु भगतसिंह और गांधी है। इस तरह क्रांति से अभिप्राय अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज व्यवस्था में आमूल परिवर्तन है।

            भगतसिंह स्त्री मुक्ति के सवालों को जिंदगी भर उठाते रहे, जिसका स्वर आज प्रखर रूप से समाज में दिख रहा है। उसकी नीव आजादी से पहले भगतसिंह के यहाँ दिखती है। भगतसिंह जिस समय परंपरा विरोधी विचार रेखांकित कर रहे थे उस समय बाल-विवाह विरोध, सतीप्रथा विरोध या विधवा-विवाह जैसे सुधार कार्यक्रमों का वो लोग विरोध कर रहे थे जो तथाकथित आजादी की लड़ाई के बड़े नेता थे। भगतसिंह अपनी ‘जेल नोट डायरी’ में पारंपरिक रूढ़ियों और ऊपरी राजनीति करने वालों की आलोचना करते हैं और एक विकसित वैज्ञानिक समाज की कल्पना का सपना देखते हैं। वेश्यावृत्ति की अवधारणा, निजी-संपत्ति की अवधारणा को भी उस समय विश्लेषित किया। जिस मूल कारण से स्त्री दुर्दशा आज भी हो रही है। अन्याय और अमानवीयता से ग्रस्त समाज के प्रति अधिक संवेदनशील और सामाजिक कुव्यवस्था के आलोचक थे भगतसिंह।

            भगतसिंह की तीन चिंताएँ छोटे से क्रांतिकारी जीवन पर रही। पहली स्वाधीनता, दूसरी वैचारिक क्रांति, तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक परिवर्तन के लिए जरूरी आर्थिक और जातीय बराबरी

            अर्थव्यवस्था संबंधी गांधी के क्रूरतापूर्ण विचारपक्ष का ज़िक्र करना मुद्राराक्षस जी जरूरी समझते हैं, क्योंकि डॉ. अंबेडकर के अलावा भगतसिंह जैसा दूसरा समाजशास्त्री पूरे स्वाधीनता आंदोलन में और कोई नहीं था। गांधी लिखते हैं कि- “उच्चवर्ण को कोशिश करके और आस्था के रूप में सीधीसादी जिंदगी बितानी चाहिए।.....भौतिक सुख बढ्ने से नैतिकता में बृद्धि नहीं हो जाती।” ऐसे कुतर्क सत्ताशाही को कायम करने के लिए गांधी गढ़ते नज़र आते हैं जिस पर मुद्राराक्षस लिखते हैं कि गांधी की कपोलकल्पना थी कि सुखासीन लोग धोतीकुर्ता पहनेंगे और सोफ़े पर बैठने के वजाय चटाई पर बैठकर बकरी का दूध पिएंगे तो गरीबी अपने आप दूर हो जाएगी। गांधी गरीबों के प्रति सहानुभूति या करुणामात्र ही महसूस करते थे ; उनके दर्द की आंच से दूरी बनाए रखी। जबकि यह आंच भगतसिंह ने अपनी धमनियों में उतरकर महसूस की और लिखते हैं- “विश्व में जो अंधेरगर्दी इन खुदगर्ज और बेईमान पूंजीपति शासको ने मचा रखी है वह लिखकर लोगों को समझाई नहीं जा सकती। अब जब उनके पर्दे दुनियाँ में खुल रहे हैं और अब जब श्रमिक भी इन लोगों को अपने श्रम पर हराम की मोटी-मोटी खाल चढ़ाने से रोकने का यत्न करने लगे हैं तो यह तड़पते हैं और शांति का शोर मचाने लगते हैं।”

            पुस्तक में भगतसिंह के क्रांतिकारी वैचारिक भिन्न व्यक्तित्व पर जिन-जिन लोगों की छाप पड़ी उसका भी विश्लेषण मुद्राराक्षस करते हैं। भगतसिंह के वैचारिक पर्यावरण की जो कहानी उनके मित्रों द्वारा सुनाई गई, उन पर मुद्राराक्षस बड़ा तार्किक पक्ष खड़ा करते हैं- “कहीं ऐसा तो नहीं था कि भगतसिंह की मृत्यु के बाद उन्हें यह विश्वास था कि जो कुछ वे कहेंगे वही मान्य होगा और भगतसिंह उन्हीं कई लोगों में से एक माने जाएंगे? क्या उनमें से कोई भी भगतसिंह था।”      वैचारिक स्वतन्त्रता की पृष्ठभूमि भगतसिंह को उनके परिवार से मिली क्योंकि उनका परिवार रूढ़िवादियों से मुक्ति की ओर प्रयासरत था। जहां से इन्होंने तर्क, विद्रोह, और साहस की दीक्षा पाई थी। एक सिख होते हुए भी इनके पिता किशन सिंह ने आर्यसमाज को अपनाया जिसमें गुरुनानक सहित कई सिख गुरुओं की निंदा की गई है। यहीं से इनके वैचारिक पर्यावरण का निर्माण शुरू होता है। सिखों का भारत को अंग्रेजों से आज़ाद कराने में एक महत्वपूर्ण योगदान था, जो इतिहास से गायब है। सिखों ने कई क्रांतिकारी पार्टियां बनाई और स्वाधीनता की लड़ाई में कई जवानों को फाँसी हुई, इन सभी घटनाओं को भगतसिंह ने अपनी आँखों से देखा और यहीं से प्रेरणा मिली ली कि मुझे भी सच्चे अर्थों में देश के लिए जीना हैं। मुद्राराक्षस स्पष्ट रूप से कहते हैं कि भगतसिंह के व्यक्तित्व और उनके चारित्रिक विकास की सबसे बेहतरीन तस्वीर यशपाल ने सिंहावलोकन में दी है। भगतसिंह की मानसिक सोच के पीछे का सबसे बड़ा कारण उनका हिंदू न होना था जिसके कारण दलितों की समस्याओं पर वो उतने ही क्रांतिकारी ढंग से सोच सके थे जैसे अंबेडकर, पेरियार ने सोचा था। सार्त्र, पिकासो, त्रात्स्की, बर्तोल्ट ब्रेख्त, आईस्लर, फ्रैंकफ़र्ट, स्टालिन, जार्ज लुकाच, जाँन लाक, रूसो, मार्क्स, काउत्स्की, लेनिन, ब्लामिदिर सिखोविच आदि विद्वानो की चेतना से भगतसिंह प्रभावित हुए और उनका ज़िक्र अपने देश की कुव्यवस्था आदि को सुधारने के लिए इनके उदाहरण जगह जगह प्रस्तुत करते हैं।   

            आजादी के बाद भारत की लोकतान्त्रिक प्रणाली का प्रमुख अगर उस समय के प्रमुख लोगों में से भगतसिंग होते तो उनके सपनों का भारत आज कैसा होता और गांधी, पटेल, सुभाषचंद्र बोस का भारत कैसा होता या नेहरू का भारत कैसा है? इसकी अविश्वस्नीय, अद्भुत तुलना करते हैं। गांधी और पटेल अगर देश के प्रधानमंत्री हुए होते तो देश का सर्वनास कितना जल्दी होता, क्योंकि गांधी रामराज्य की स्थापना करते और गैरबराबरी के सभी पहलू मौजूद होते। शोषित-दलित तबकों का शोषण हद से ज्यादा बढ़ जाता। पटेल मुसलमानों के धुर-विरोधी थे जिससे अव्यवस्था और अत्याचार का परिसीमन तय था। हिन्दुत्व के एजेंडे को मुद्राराक्षस पटेल की ही देन मानते हैं और लिखते हैं कि-“यह हिंदू मानसिकता पटेल का ही करतब था कि हर पुलिसथाने में मंदिर बन गए।” इस तरह जवाहर लाल नेहरू के प्रधानमंत्री बनने की वजह से कम से कम इतना तो संभव हुआ ही था कि भारत हिंदू राष्ट्र बनने से बचा और धर्मनिरपेक्ष शासनतंत्र स्थापित हुआ। लेकिन अगर भगतसिंह भारत के प्रधानमंत्री होते तो मार्क्स की बुनियादी स्थापनाओं को पूरी तरह से स्वीकार करने के बावजूद उसे धर्म में परिवर्तित नहीं करते और ईश्वर से मुक्त तो रखते ही, साथ ही समाजवादी व्यवस्था को पूरी तरह पूंजीवाद से मुक्त रखते। खुली आलोचना और तर्क बुद्धि के दरवाजे हमेशा के लिए खुले रहते जिससे नई शासन व्यवस्था की खामियाँ आसानी से समझी और दूर की जा सकती थी। लेकिन आज आजादी के उनहत्तर साल बाद भी हम तर्क को तरजीह नहीं दे पाए, नतीजतन अंधविश्वासों और रूढ़ियों के खिलाफ लिखने वालों की आए दिन हत्याएँ, आलोचना करने वालों की हत्या, बलात्कार भरी धमकियाँ, गालियाँ आज के युग में शामिल है। समय, समाज और इतिहास को लेकर भगतसिंह के पास संवेदनशीलता और समझदारी दोनों मौजूद थी।          

            हिंदी के क्षेत्र में ऐसी किसी भी क्रांतिकारी का ज़िक्र नहीं मिलता जो हँसते-हँसते फाँसी पर चढ़े थे, क्या इसलिए कि वो हिंदू नहीं थे? मुद्राराक्षस चिंता ज़ाहिर करते हुए लिखते हैं कि इतिहास में जो मान भगतसिंह को मिलना चाहिए था, हिंदू संस्कृति के ब्राह्मणवाद के चलते, सामंत और सनातनी हिन्दुत्व के समर्थक गांधी को युग पुरुष बना दिया। भगतसिंह के बहाने मुद्राराक्षस ने गांधी के इतिहास को खंगाला और सामाजिक इतिहास को आईना दिखाया है। साहित्य समाज और इतिहास के सामने ढोंगियों की झूँठी सहानुभूति, देशप्रेम, दलित प्रेम को बेनकाब किया है। हिन्दुत्व की अमानवीयता को दर्शाते हुए संवेदनशील लेखक लिखता है कि- “इस देश में गैर बराबरी तो हिन्दुत्व की देन थी ही, समाज के बहुसंख्यक दलित, पिछड़े और आदिवासियों को शूद्र घोषित करके किसी भी तरह के राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक अधिकार से वंचित रखा गया और यह विधान लागू कर दिया गया कि वे कोई संपत्ति नहीं रखेंगे, जूठन खाएंगे, फटा पुराना पहनेंगे। देश के इलाकों में शूद्र स्त्री ब्लाउज तक नहीं पहन सकती थी। ब्लाउज पहनने पर शूद्र स्त्री के स्तन काटे जाते थे। ज़ाहिर है यह ज़्यादातर तबका बेहद दरिद्रता में जिंदगी गुजारता रहा। जिसे आजाद भारत कहा जाता है उसमें भी शूद्र, शूद्र ही रहा और बुरी तरह विपन्नता झेलता रहा।”

            मुद्राराक्षस स्पष्ट वैज्ञानिकता के साथ बेबाकी से अपनी बात रखते हैं। समाज के असमाजिक तत्वों की चिंता नहीं करते, निडर होकर गंभीरता के साथ स्पष्ट बात रखते हैं, चाहे वह धर्म, संस्कृति, जाति, देश या फिर देशप्रेम की क्यों न हो। भगतसिंह देश, संस्कृति और सभ्यता के नए क्रांतिकारी विचारक हैं या थे इन सबका समाजशास्त्रीय विश्लेषण किया है।

            देशभक्ति आज समाज का एक अहम मसला बना हुआ है जिसको मुद्राराक्षस गहराई से समझाते हुए लिखते हैं कि देशभक्ति से ज्यादा जटिल काम है देश के मनुष्य की चिंता। जिस रास्ते पर गांधी, तिलक, मदनमोहन मालवीय नहीं चल पाए। आज भी ऐसी ही देशभक्ति का दौर हैं जहां से जनता गायब है और देशभक्ति का अमली जामा पहनाते हुए सब राजनेता, राजनीतिज्ञ अपनी रोटियाँ सेंक रहे हैं। 

            भगतसिंह में गैरबराबरी के प्रति जीवन भर टीस रही जिसको दूर करने की सोचते रहे। वो सोचते रहे कैसे समाज के कुछ चंद लोग आराम से बैठकर बहुसंख्यक का खून चूस रहें हैं और एक विशाल भूंखी आबादी जीवन की जरूरी चीजों के लिए भी तरसती है। “धरती पर उस आदमी से अधिक घृणास्पद और कोई नहीं है जो भीख देता है और वैसे ही उस आदमी से दयनीय कोई नहीं है जो उसे स्वीकार करता है।”  नैतिकता नाम की चीज का भगतसिंह परिसीमन करते हैं उसको लांघ जाते है क्योंकि नैतिकता ऐसी अवधारणा है जो मनुष्य की स्वाधीनता और तार्किकता को सीमित करती है। भगतसिंह लिखते हैं- “नैतिकता और धर्म उस व्यक्ति के लिए महज एक शब्द भर है जो आजीविका का जुगाड़ करने के लिए गंदे नाले में मछ्ली मारता है और कड़ाके की ठंड से बचने के लिए सड़कों पर पीपों के पीछे पनाह लेता है।”  भगतसिंह मानवता को सबसे ज्यादा चोंट पहुँचाने वाला तत्व, अस्मिता की खरीद फरोख्त को मानते हैं और कहते हैं इसे रोका जाना चाहिए। “कोई भी आदमी इतना ज्यादा धनी नहीं होना चाहिए की वह दूसरों को खरीद सके और न ही कोई आदमी इतना अधिक गरीब होना चाहिए की वह अपने आपको बेचने के लिए मजबूर हो जाए।”     

            भगतसिंह ने धर्म की सामाजिक भूमिका के पतनशील तत्वों की सामग्री जुटाई और धर्म, ईश्वर को लेकर विद्रोही विचार रखे। परिवार और विवाह की संस्था पर क्रांतिकारी विचार रखते हैं। “विवाह अपने आप में पहले की तरह ही वेश्यावृत्ति का कानूनी तौर पर स्वीकृत रूप, औपचारिक आवरण बना रहा।” भगतसिंह ने पारिवारिक संस्था पर एंगेल्स के विचारों से प्रभावित होकर स्त्री स्वतंत्रता और मुक्ति के जो सवाल उठाए हैं वो समाज की जड़ स्थिति को विचलित कर देने वाले हैं। भगतसिंह गुरुमुखी लिपि की सराहना करते  हैं और खड़ी बोली को हिंदू अभियान की वाहिका का रूप मानते हैं और स्त्री दुर्दशा का कारण मानते हैं। इस विषय पर मुद्राराक्षस ने दिलचस्प संवाद सामने रखते हैं कि- अपने मित्र गुलजार से जब इन्होंने पूंछा कि तुमने हिंदी नहीं सीखी तो गुलजार ने कहा-: “तुम जानते हो पंजाब में मर्द बोलते पंजाबी है, पढ़ते लिखते उर्दू हैं और हिंदी पंजाब में औरतों को सिखाई जाती है। यह भी इसलिए कि वे रामचरित मानस पढ़ सकें।” 

            मुद्राराक्षस ने अपने व्यक्तिगत अनुभव को वर्णित करते हुए कहा कि सच बोलने या सत्य काम को करने के लिए अपनों तक का विरोध झेलना पड़ता है। जीसस, मुहम्मद आदि का उदाहरण देकर अभिव्यक्ति और सामाजिक रूढ़ियों से परंपराओं को तोड़ने से जान का खतरा कैसे बना रहता हैं ऐसे उदाहरण देकर भगतसिंह की वीरता उनके देशप्रेम, समाजप्रेम, मानवप्रेम आदि को मुद्राराक्षस ने प्रस्तुत किया है। मुद्राराक्षस जैसा तार्किक और समाज की नस-नस को पहचानने वाला व्यक्तित्व आज के इस आधुनिक युग में बमुश्किल है। हमेसा तार्किकता, जिज्ञासा और बहस करने वाले या गीता, रामायण, आदि धार्मिक ग्रंथो पर सवाल उठाने वालों के विनाश की बात का प्रपंच कैसे ग्रंथो में मिलता है उसकी तह तक जाते हैं मुद्राराक्षस। “संशयात्मा विनष्यति”। इस पर भगतसिंह सवाल उठाते हैं और गीता, महाभारत उपनिषद में लिखी अतार्किक बातों का शत-प्रतिशत विरोध करते हैं जिसके कारण आज भी ये पुरातन पंथी समाज इनको बड़ा गौरव देने के पक्ष में नहीं दिखता। पुस्तक में लेखक ने नास्तिक सत्यानंद अग्निहोत्री का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि एक सच्चा नास्तिक भी विज्ञानबोध पाकर सहज ही नास्तिक बन जाता हैं।

            संस्कृति का प्रभाव किस प्रकार समाज और साहित्य पर पड़ता है और किस प्रकार वैचारिक स्वतंत्रता न होने पर साहित्य कूडे का ढेर बन जाता है। जैसे सोवियत यूनियन बनने के बाद नास्तिक सत्ता स्थापित हुई तो वहाँ का साहित्य कचरा लिखा जाने लगा जब कि चेखव, टालस्टाय, दास्तावस्की जैसे विद्वान वहीं की देन थे। किस तरह सत्ताधारी समाज में परिवर्तन होता है। बौद्ध संस्कृति की अपेक्षा संस्कृत साहित्य ने आस्तिक होकर भो नाटक, कविता में मनुष्य सभ्यता को श्रेष्ठतम दिया, वैसा बौद्ध साहित्य ने नास्तिक होकर भी प्रदान नहीं किया। भगतसिंह अपने व्यक्तिगत अनुभव को रखते हुए लिखते हैं- “आलोचना और स्वतंत्र चिंतन क्रांतिकारी के दो अनिवार्य गुण हैं। यह नहीं कि महात्मा जी महान हैं इसलिए किसी को उनकी आलोचना नहीं करनी चाहिए। चूँकि वो पहुँचे हुए आदमी हैं इसलिए राजनीति, धर्म, अर्थशास्त्र या नीतिशास्त्र पर जो कुछ वे कह देगे वह सही ही होगी। आप सहमत हो या न हों पर आपको कहना जरूर पड़ेगा कि यही सत्य है। यह मानसिकता प्रगति कि ओर नहीं ले जाती। साफ ज़ाहिर है कि यह प्रतिक्रियावादी मानसिकता है।” उस समय के विद्वान किस तरह जातिवादिता से ग्रसित होकर इतिहास लेखन, आलोचना आदि कर रहे थे जिसमें अंबेडकर, फुले, आदि की कोई जगह नहीं थी। ऐसे ही कई इतिहासकारों का उदाहरण मुद्राराक्षस देते हैं जिसमें दलित विद्वानों को हेय दृष्टि से देखा गया। ऐसे ही इतिहासकर हैं निबूद्रीपाद, ये फुले के बारे में लिखते हैं- “आम आदमी की जीवन स्थितियों का चित्रण करने के उद्देश्य से फुले ने ब्रिटिश शाही परिवार की एक सदस्य ड्यूक ऑफ आर्क के समक्ष खुद को गरीबी से त्रस्त भारतीय किसान के वास्तविक प्रतिनिधि के रूप में महज कमर के गिर्द एक कपड़ा लपेटकर पेश किया। इससे पता चलता है कि उनकी सामाजिक दृष्टि क्या थी।” सवर्ण इतिहासकारों, विद्वानों में दलितों, पिछड़ों, के संघर्ष के प्रति सहानुभूति नहीं दिखती बल्कि एक घृणा भरी हेय दृष्टि से इनके इतिहास पटे-पड़े हैं। भगतसिंह लोकतन्त्र पर क्या सोचते थे और लोकतन्त्र का आदर्श क्या है यथार्थ क्या है उसकी अच्छी व्याख्या करते हैं।  

            भगतसिंह का पूरा इतिहास बोध समूची मानव सभ्यता की चिंता करता है। इस तरह मुद्राराक्षस बुद्धजीवियों को इस ओर संकेत करते हैं कि भगतसिंह की छोटी सी उम्र में इतना अच्छा इतिहास बोध कहाँ से आया। जब इतिहास दर्शन की समाज और साहित्य में कोई गुंजाइश ही नहीं थी। भगतसिंह किसी भी परंपरा, धर्म, जाति आदि का खंडन नहीं करते बल्कि तार्किकता के साथ सवाल खड़ा करते हैं। भगतसिंह अकेले ऐसे क्रांतिकारी थे जो कालकोठरी के अंतिम क्षणों तक विश्वचिंतन के इतिहास का अध्ययन कर रहे थे। उनको ये चिंता न थी कि उनकी मृत्यु मुकर्रर कर दी गई है बल्कि उनको चिंता थी तो देश की, समाज की। भगतसिंह के विचार पारदर्शी और तत्वदर्शी हैं।

            भगतसिंह अपने आप को हर दलित, दरिद्र, शोषित समाज का अंग मानते हैं- “जब तक कोई निचला वर्ग है मैं उसमें ही हूँ। जब तक कोई अपराधी तत्व है मैं उसमें ही हूँ। जब तक कोई जेल में कैद है मैं आजाद नहीं हूँ।”

            पुस्तक की भाषा-शैली बहुत ही संवेदनशील है जिसमें बोझिलता का कोई अंश मौजूद नहीं है। नए शब्दों की परिगणना भी इनके यहाँ मिलती है गोकि अन्य लेखकों में बमुश्किल होती है। भगतसिंह के विचार भाषा को लेकर भी मौजूद हैं। भगत सिंह की वैचारिकी को पढ़कर ऐसा जरूरी लगता हैं कि देश के हर एक बच्चे, युवा, बूढ़े, स्त्री-पुरूष को उनके विचारों का पठन-पाठन करना चाहिए, ताकि भारतीय जनमानस संवेदनशील हो, विचारों को जगह दे, आलोचना को जगह दे, जिससे देश का विकास सुनिश्चित है।        

            भगतसिंह ने अपने जीवन में जो लेखन किया वो आज के आधुनिक युग में एक लेखकीय क्रांति से कम नहीं है। इनकी जेल नोट डायरी में जीवन का कोरा तथ्य नहीं बल्कि समाज को विचलित करने वाले तथ्यों का उल्लेख मिलता है, शहीदों का वर्णन मिलता है। भगतसिंह ने अपने पूरे जीवन में समूचे पुरातन विश्वास को चुनौती दी हैं। यही कारण रहा कि पुरातन ऐतिहासिक लेखकों ने और पुरातन सत्ताधारी समाज ने कभी भगतसिंह को वो दर्जा नहीं दिया जो गांधी को दिया। मुद्राराक्षस क्रांतिकारी भगतसिंह के योगदान और स्थान पर चिंता और दुर्भाग्य को रखते हुए लिखते हैं-: भगतसिंह अपनी गर्दन किसी भी अतीत और परंपरा से मुक्त रूप से रख सके थे इसलिए उन्हें बेहिचक इस देश के आधुनिक इतिहास के सबसे बड़े, सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण व्यक्तित्व की जगह रखा जाना चाहिए था। देश में यही नहीं हुआ। देश में संस्कृति के प्रतीक भगतसिंह की तुलना में, जड़ संस्कृति के प्रतीक ही आज ज्यादा ऊँचे बनाए जा रहे हैं।       

            आज भगतसिंह को महज़ एक क्रांतिकारी बनाने पर दुनिया तुली हुई है जबकि सच्चाई यह है कि वो सामाजिक क्रांति, सांस्कृतिक क्रांति, राजनीतिक क्रांति, आर्थिक क्रांति, वैचारिक क्रांति के जनक हैं और उस सम्पूर्ण समाज के प्रतिनिधि जो हाँसिए पर है।

  “उन्हें यह फिक्र है हरदम, नयी तर्ज़-ए-जफा क्या है?

हमें ये शौक है देखें, सितम की इंतहा क्या है ?

          पुस्तक के हर पृष्ठ को पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि भगतसिंह की सच्ची व्याख्या उस राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक पृष्ठभूमि की गहराई में उतरकर करना आसान कार्य नहीं था। लेकिन ‘मुद्राराक्षस’ ने बड़ी सरलता के साथ किया है। पुस्तक में उठाए गए ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, बराबरी के सभी पहलुओं को जैसे उठाया गया है, उससे लगता है कि ‘मुद्राराक्षस’ एक बार फिर भगतसिंह के समय की सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक अव्यवस्था और मानवता की दुर्दशा की कहानी कह रहे हैं, उसकी आलोचना कर रहे हैं और आज भी आधुनिक समाज उन्हीं विसंगतियों से लड़ रहा है, जिन्हें दूर करते-करते भगतसिंह हँसते-हँसते सलीब पर चढ़ गए। मुद्राराक्षस लिखते हैं- इंकलाब ज़िंदाबाद! जैसा अर्थवान और कालजयी नारा दूसरा कोई इतिहास में मुमकिन नहीं हुआ है। भारत में तो सिर्फ इस जीवंत नारे के लिए ही भगतसिंह अमरता पाने का अधिकार रखते हैं। पुस्तक के ये आखिरी शब्द मानो भगतसिंह की अमरता और यश की सच्चाई बयां कर रहे हैं।

इंकलाब ज़िंदाबाद! भगतसिंह ज़िंदाबाद!

शोधार्थी

जुगुल किशोर चौधरी

(एम.ए., एम. फिल. (हिंदी साहित्य)

पी-एच .डी. (हिंदी)

डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.)

Email-jugulkishor12@yahoo.com  jugulc@gmail.com

Mob. No.- 9555538591, 08860101648