Notice
जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

मनु स्मृति: आलोक कुमार [एकांकी]

 

मनु-स्मृति

आलोक कुमार

 

पात्र-सूची

 

             मनु(स्त्री-पात्र)

             दीपक

             चंदन/चुन्नू-(भाई)

            दुखन दास-(पिताजी)

            समाज-1

            समाज-2

            समाज-3

            समाज-4

 

 

 

 

 

 

 

            

 

अंक-प्रथम

  

दृश्य-प्रथम

(मंच के बीच में एक बेंच रखा रहेगा,जहाँ मनु और दीपक बैठे होते हैं दीपक मनु को कहानी ‘यही सच है’ का एक अंश सुनाते रहता है)

‘’आँसू-भरी आँखों से मैं प्लेटफॉर्म को पीछे छूटता हुआ देखती हूँ। सारी आकृतियाँ  धुँधली-सी दिखाई देती हैं। असंख्य हिलते हुए हाथों के बीच निशीथ के हाथ को, उस हाथ को, जिसने मेरा हाथ पकड़ा था, ढूँढने का असफल-सा प्रयास करती हूँ। गाड़ी प्लेटफॉर्म को पार कर जाती है, और दूर-दूर तक कलकत्ता की जगमगाती बत्तियाँ दिखाई देती हैं।- धीरे-धीरे वे सब दूर हो जाती हैं, पीछे छूटती जाती हैं। मुझे लगता है, यह दैत्याकार ट्रेन मुझे मेरे घर से कहीं दूर ले जा रही है - अनदेखी, अनजानी राहों में गुमराह करने के लिए, भटकाने के लिए!’’

दीपक:-मनु  तुम  सुन  रही  हो  न ? मनु !

मनु :- दीपक न जाने क्यों मेरा मन बहुत घबरा रहा है,ऐसा अलग रहा जैसे कुछ बुरा होने वाला है. तुम मेरा साथ दोगे न दीपक ?

दीपक:-हमेशा.

मनु:-हमने जो कदम उठाया है वह सही तो है न ?

दीपक:-हां बिल्कुल, शिक्षा भी तो हमे सही और गलत में फर्क करना सिखलाती है. अगर हम आज़ादी से जी नहीं सकते तो ऐसी जिंदगी का क्या अर्थ मनु. साहित्य भी तो हमे जीना ही सिखलाता है.अगर तुम पढना चाहती हो आगे बढ़ना चाहती हो और अपनी अस्मिता का निर्माण  खुद करना चाहती हो तो इस में गलत क्या है. ऐसे में यदि पुरानी परम्परा को तोडना भी पड़े तो तोड़ दो नवीन परंपरा का पुरानी परम्परा हमेशा ही विरोध ही तो करती आई  है.

मनु:-मेरे साथ सदा रहोगे न दीपक?

दीपक:-वादारहा
मनु:-मुझे बीच मझधार में छोड़ कर नहीं जाओगे ?

दीपक:-तुम्हारे साथ ही रहूँगा अपनी आखिरी  साँस तक.

(मंच पर मनु के पिता और भाई का प्रवेश जो पहले से ही छीप कर दोनों की बातें सुनते रहते हैं दोनों काफी गुस्से में होते हैं तभी गोली चलती है जो मनु का भाई चलाता है वह गोली दीपक को जा कर लगती है)

चंदन:-(क्रोध में) ये लो ये रहे तुम्हारे वादे और बंद किये देते हैं तुम्हारी आखरी साँस  चंदन गोली चलाता है जो सीधा दीपक के सीने पे जा कर लगती  हैं.(दीपक वही सीना पकडे मनु की तरफ अपना हाथ बढ़ाता है जहाँ दीपक के मुख से एक हलकी आवाज़ निकलती है मनु..उ..उ..उ  ! और अचेत नीचे गिर जाता है)

मनु:-(जोर से चिल्लाती है) नहीं..............! ये क्या किया तुम लोगों ने ? (मनु वहीं अचेत दीपक के शरीर को हिला डुला कर उठाने का प्रयत्न करती हैं)दीपक दीपक दीपक (और फिर पास बैठ फूट-फूट कर रोने लगती है.) 

दुखन दास:- बहुत देख लिया तेरा ये पागलपन बहुत दे दी तुम्हे आज़ादी. दो डिग्री क्या  ले ली खुद को मदर टरेसा, झासी की रानी समझने लगी है, बेटा इस कुत्ते की लाश को घसीट कर जंगल में फेक दो और इस पागल को ले चलो इसका फैसला घर पर ही करते हैं. (चंदन दीपक की लाश को घसीटते हुए और दुखन दास मनु को बाजू से पकड़ कर खींचते हुए लेकर मंच से प्रस्थान करता है)

 

दृश्य:-2

 

(पुनः तीनो का मंच पर प्रवेश)

                                     

(एक अभावग्रस्त कमरे का दृश्य, कमरे में एक पुराना बक्सा. उस बक्से में एक कपड़े का बना गुड्डा गुडिया, 2 हाथ का रस्सा और एक कुर्सी पहले से रखा रहेगा)

दुखन दास:-चल तू चल,बंद कर दो इसे कमरे में ये पागल हो चुकी है पागल.

चंदन:-प्यार करेगी हम्म !समाज के बनाए कानून को तोड़ेगी ? ये तेरे थैले में क्या है ? दिखा.

मनु:-छोड़ो इसे नहीं दूंगी मैं.

चंदन:- नहीं देगी ? हम्म कैसे नहीं देगी, चल ला (चंदन एक जोरदार थप्पड़ मनु को मारता है मनु नीचे गिर जाती है और थैली छीन कर उससे कुछ पन्ने निकालता है जिसमें मनु की  कविताएँ लिखी होती हैं जिसे चंदन पढ़ता है)’हम हैं आज की नारी,सशक्त हम हैं आज की नारी हम पे किसी का न जोर हम हैं खुद के अधिकारी...(चंदन व्यंग करते हुए कहता है) ये देखो इसे अधिकार चाहिए आज़ादी चाहिए (यह कहते हुए चंदन उन पन्नों को फाड़ देता है और हवा में उछालते हुए कहता है) ये ले, ये रहा तेरा अधिकार और ये रही तेरी आज़ादी. (मनु चीखते हुए) मेरी कविताएँ  नहीं मेरी कविताएँ...(मनु बिखरे पन्नों को समेटने लगती है और फिर वही सुबक सुबक कर रोने लगती है)

दुखनदास:-इसके हाथ पैर बांध दो बेटा और पड़े रहने दो इसे यही इसकी यही सजा है ये पागल हो चुकी है पागल पागल कही की.

           (नेपथ्य से एक कविता का वाचन)

“अंदर की अनगिनत धडकनों में जाने क्यों इतनी चुभन है

क्या है ऐसा जो बस हर पल दुखता है इतने तो आँसू हैं

       पलकों के अधमुहें दरवाजों पर

       जैसे सागर में तूफ़ान लहराता है

कहते हैं किताबों में जैसा जीवन सिखलाता है जीना वैसा

सांस जो अब थम जाए कैसा सिखाना फिर परीक्षण कैसा

         काठ का कोई पुतला औरों के चलाए जैसे चलता है

                   कब तक चले ये भी

         रास्तों के साथ-साथ कदम भी सहम गए

         पहले उम्मीद गई फिर सारी आस गई

         एक-एक कर के सारे ही भ्रम गए

       मन ऐसा भोला है जाने किन आंखों से हैरानी जताता है

                  ऐसा भी होता है !

      (नेपथ्य से कविता का वाचन समाप्त होने पर)

      (कुछ सैकेंड तक मनु रोते रहती है फिर वह अपना सर उठाती है)

मनु:- पागल मैं पागल नहीं हूँ, मैं पागल नहीं हूँ मैं पागल नहीं हूँ, मैं एक नारी हूँ नारी एक भारतीय नारी जो सदियों से संस्कृति, परम्परा,रीति-निति के नाम पर स्वाहा होते आई है.मुझे सब याद है बचपन से लेकर आज तक सब याद है क्या नहीं सहा है मैंने. बचपन !(मनु जैसे अपने बचपन की स्मृतियों में खो गई हो)मेरा बचपन गुड्डे-गुडियों से खेलने की उम्र थी..याद आया रुको-रुको मैं दिखाती हूँ मेरा बचपन..मेरे बचपन के वे गुड्डे-गुडिया..माँ ने बना के दिये थे कपड़ो के बने थे घर में होते हैं न फटे पुराने उनके बने थे मेरे गुड्डे-गुडिया. रुको रुको दिखाती हूँ मैं (मनु तेजी से बक्से की ओर बढती है तभी रस्सी पैरो में तन जाने की वजह से गिर जाती है वह किसी तरह से अपने शरीर को घसीट कर बक्से तक ले जाती है जिस से वह अपनी गुडिया निकलती है साथ ही वह एक रस्सी भी निकालती है जिसे वह एक टक नजर से देखने लगती है मनु फिर मानो अपनी किसी स्मृतियों में खो गई हो फिर वह उस रस्सी को बक्से के ऊपर रख अपनी गुडिया से बाते करने लगती है)

मनु:- आओ मिन्नी मैं तुम्हे अपने दोस्तों से मिलवाती हूँ पता है मिन्नी मुझे सब पागल कहते हैं, पर तुम्हे तो पता है न मैं पागल नहीं हूँ तुम तो बचपन से मुझे देखती आई हो और तुम्हे सारी बाते भी तो बताया करती थी, है न ? याद है न वह रस्सी वाली बात जो मैंने बाबा से बोली थी. जब चुन्नू ने बाबा से बल्ला ला देने बोला था तो बाब ने क्या बोला था ?अरे वाह मेरा बेटा सचिन बनेगा ठीक है बेटा मैं रामबाबू से बोल कर तेरे लिए बल्ला बनवा देता हूँ. और जब मैंने बोला बाबा मुझे भी रस्सी  ला दो खेलने के लिए तो बाबा ने क्या बोला था याद है न ? रस्सी  ला दू कहा से ला दूँ रस्सी? दिन रात ज़मींदार के यहाँ काम करता हूँ तो दो वक़्त की रोटी नसीब होती है और तुम्हे रस्सी  ला दूँ कहा से ला दूँ तुम्हे रस्सी  जा उस तख्ते पर एक रस्सा है जा कर उस से खेल ले और हा खेल लो तो फिर उसी रस्से से फाँसी लगा कर मर जाना तेरी माँ भी रस्सेसे लटक कर  मर गई थी  तू भी मर जा. एक लड़का है किसी तरह पाल लूंगा(यह कहते-कहते मनु फिर से रोने लगती है)

मनु:-याद है न मिन्नी तेरे आगे मैं कितना रोई थी तू ही तो थी जो मेरे आँसू पोछा करती थी (तभी दर्शको की ओर देखते हुए भाव मनु के बदल जाते हैं धीमे मुस्काते आँसू पोछते हुए बोलती है)

मनु:-पता है उस दिन मिन्नी ने कौन सी कविता सुना कर मुझे चुप करवाया था ? ‘मत रो मेरी गुडिया रानी तेरी शादी होगी रानी ढोल बजेंगे ढामा-ढम मैं नाचूंगी छमा-छम. (यह कहते-कहते मनु खड़े होकर नाचने लगती है,और फिर एकदम से वह जड़ खड़ी हो जाती है मानो उसके धूमिल पटल पर फिर से कुछ धुंधलाई स्मृतियों कोंध गई हो. दर्शको को देखते हुए गुस्से से बोलती है)

मनु:-लोक-लाज भूल गई है तू !लड़की ऐसे बेढंग तरीके से लडकों की तरह नाचती है ! अब तू बड़ी हो गई है ,गाँव वाले क्या कहेंगे बेटी को कुछ सिखलाया नहीं ,नज़र नहीं रखी बेटी पर ! नज़र ?(मनु संकुचित डरने का भाव करती है धीरे-धीरे पीछे हटती है और बिलकुल सिकुड कर अपने कपड़ो को इधर उधर से ठीक करती है और कह उठती है)

मनु:-मेरे ही घर में मेरे बाबा के नज़र के सामने बेटी-बेटी बोल कर मुझे वह इधर-उधर छुआ करता था. उसकी छुअन मुझे पितृात्मक नहीं लगती थी. एक चुभन थी. उस उम्र में भी में उस असहजता को समझ ले रही थी पर मेरे बाबा यह सब अपने नज़रो के आगे सब देख कर भी न जाने क्यों अपनी नज़रे फेर लिया करते थे. तब मैं उस का कारण नहीं समझ पाई थी पर अब सब समझती हूँ. यह समझते-समझते आज मैं 23 वर्ष की हो चुकी हूँ.वर्षो की गुलामी,गरीबी,और वर्ग-भेद ने शायद उनकी जुबान बंद कर रखी थी. पर अब बस मैं चुप नहीं रहूंगी मैं लडूंगी इस सड़ी गली रीति-रिवाजो को तोड़ दूंगी इन बन्धनों को तोड़ दूंगी. एक नवीन संस्कृति के लिए जोड़ लगाउँगी. हाँ मैं  कविताएँ लिखती हूँ गीत लिखती हूँ सुनोंगे मेरी कविताएँ....

                                             (नेपथ्य से एक कविता का वाचन)

 

सूर्य की अब किसी को जरुरत नहीं  जुगनुओं को अंधेरों में ढकेला गया

करके बीते शहर में साजिश रौशनी को शहर से निकाला गया

        साँझ बनकर भिखारिन भटकती रही

होके बेइज्जत सरे आम बाज़ार से सर झुकाए-झुकाए उजाला गया

उसका अपमान होता रहा हर तरफ सच का ओढा जिसने दुपट्टा यहाँ

उसका पूजन हुआ उसका अर्चन हुआ ओढ़ कर झूट का जो  दुशाला गया

जाने किस शान से लोग पत्थर हुए  एक भी लफ़्ज ज़ुबा पे बाकी नहीं

         बांध कर कौन आँखों पर पट्टी गया

          डाल कर कौन ज़ुबा पर ताला गया

वृक्ष जितने हरे थे तिरिस्कृत हुए,ठूठ जितने खड़े थे पुरस्कृत हुए

        सर्वस्व खो कर भी जिसने सच बोला यहाँ

             नाम उसका हवा में उछाला गया.....

 

                                       (नेपथ्य से कविता का वाचन समाप्त होने पर)

मनु:-यह मेरी सब से पहली कविता थी. जिसे मैंने कॉलेज की एक प्रतियोगता में सुनाया था. दीपक से मेरी मुलाक़ात वहीं हुई और दोस्ती भी. आगे मुझे वह हमेशा हर तरह से मदद करता रहा शुरू के 2 वर्षो तक हम साथ बैठते, पढ़ते, बाते करते पर पर हम में थोड़ी-थोड़ी दूरी होती थी.मैं दीपक के साथ कभी असहज नहीं महसूस करती थी. हम आज तृतीय वर्ष में पहुच चुके थे, मैं कक्षा नहीं गई थी और कैंपस के कोने में बैठी रो रही थी जहाँ अक्सर हम बैठें बाते किया करते थे. दीपक जब आया तो उसने मेरे रोने का कारण पूछा मैंने बताया की मेरे बाबा ने मेरी शादी मुझ से बिना पूछे सुरेश से तय कर दी है ,जो मुझ से कम पढ़ा-लिखा है और तो और वह जमींदार के लिए हर जगह लड़ता-झगड़ता रहता है. कई बार तो वह जेल भी इसी कारण से जा चुका है. मैंने भी कह दिया बाबा से से मैं उस से शादी नहीं करुँगी नहीं करुँगी नहीं करुँगी....और हाँ दीपक मैं अगर करुँगी भी तो सिर्फ शादी तुम से करुँगी सिर्फ तुम से तुम से सिर्फ तुम से (यह कहते हुए मनु आखरी वाक्य में जहां वह कहती है ‘अगर करुँगी भी तो सिर्फ शादी तुम से करुँगी’ में दीपक के आँखों में देखने का अभिनय करती है और उसके बाजुओ को थामते हुए उसके कंधे पर अपने सर को रख देती है और फिर से एक बार दोहराती है ‘हाँ जब करुँगी शादी तो तुम से करुँगी दीपक. दीपक वहाँ मनु की कल्पना मात्र में होगा वह यह सब उस कुर्सी को देख कर कहती रहती है जो उसके सामने रखी होती है कुर्सी के ही वह बाजू को थामती है और कुर्सी पर ही अपना सर रखती है)

मनु:- दीपक ने भी मेरे माथे को सहलाते हुए मानो अपनी रज़ामंदी दे दी उस दिन पहली बार दीपक ने मुझे स्पर्श किया था उसके स्पर्श में एक अपनापन था बिलकुल माँ के स्पर्श की तरह. ऐसा लग रहा था मानो एक बार दुबारा शिशु की तरह सिमट कर अपनी आज तक की सम्पूर्ण वेदना कह गुजरू. शायद इसे ही प्रेम कहते हैं. पर मेरी यह ख़ुशी ज्यादा दिन की नहीं थी इस समाज ने उसकी कई अन्य परिभाषाए गढ़ दीये. किसी ने कहा-

पहला व्यक्ति:-यह समाज के लिए ये कलंक है.

(मनु पहले व्यक्ति को देखते हुए डरते-सहमते खुद को दाये घसीटती है)    

दूसरा व्यक्ति:-यह प्रेम नहीं वासना है.

(मनु फिर दुसरे व्यक्ति को देखते डरते-सहमते खुद को बाएँ घसीटती है)    

 

तीसरा व्यक्ति:-समाज को ये पथ भ्रष्ट कर देगी.

(फिर वो खुद को घसीटते हुए सब के मध्य में आ जाती है)                  

 चौथा व्यक्ति:- इसे सजा दो.

       (सभी व्यक्ति एक स्वर में बोलेंगे)

सभी व्यक्ति:- इसे सजा दो इसे सजा दो इसे सजा दो

  (चौथा व्यक्ति के बोलने पर वह उठ कर पीछे हटने लगती है जैसे-जैसे सभी इसे सजा दो इसे सजा दो बोलते जाते वैसे-वैसे मनु पीछे हटती जाती है और फिर मनु अपनी आँखे बंद कर अपने दोनों कानो को मूँदते हुए जोर से चिलाती है दूर हट जाओ मैं कहती हूँ दूर हट जाओ मनु के चीखते ही सभी चारो डर के थोड़े पीछे हट जाते हैं और मनु के हाथ पैर में जो रस्से बंधे होंगे उसे पकड के खड़े हो जाएँगे. तभी नेपथ्य से एक कविता का वाचन)

 

    जब- जब सिर उठाया, मन चौखट से जा टकराया

     माथे पर लगी चोट मन में आया कचोट

     आखिर क्यों मैंने ये घर बनाया

      जब- जब सिर उठाया, मन चौखट से जा टकराया

      दरवाजे हट गए या वो ही बड़ा हो गया

      दर्द के क्षणों में कुछ समझ न आया

      सर झुका आओ बोला, बाहर का आसमान

      सर झुका आओ बोली भीतर की दीवारे

     दोनों ने ही मुझे छोटा करना चाहा

       बुरा किया जो मैं ने ये घर बनाया

    जब- जब सिर उठाया, मन चौखट से जा टकराया.

(कविता समाप्त होने पर मनु अपना झुका सर उठाती है गुस्से से उसकी आँखे बड़ी- बड़ी हो जाती है और कहती है)    

मनु:-अब बस 

(वह धीमे-धीमे आगे बढ़ने लगती है उसके हाथ और पैर में जो रस्से बंधे होंगे उसे अब मनु अपनी पूरी ताकत से खीचने लगती है और कहती है)

मनु:-अब यह आसू नहीं बहेंगे, तोड़ दूंगी मैं इन बेरियो को नहीं मानूंगी इस सड़ी गली रीति-रिवाज़ो को इस दकियानुसी परंपरा को. नहीं मानूंगी...

           (लय में मनु गरजते हुए कहती है)

      नारी हूँ मैं नारी,मेरी भी अपनी एक सत्ता है,

            सह लिया अब नहीं सहेंगे

            अपना बस एक अरमान है,

      है अगर तू पुरुष तो क्या हम भी तेरी माँ हैं

       जन्म लिया तू कोख से मेरी तेरी सही पहचान हैं

      साथ चलेगा साथ चलूंगी रोके से अब न बात बनेगी

      क्योंकि नारी की भी अपना , इस धरती पे एक मान है..

       एक मान है..एक मान है एक मान है....

(मनु यह कहते-कहते अपने पूरी ताकत से रस्से को खीचती है रस्सा टूट जाता है जिस से चारों व्यक्ति नीचे गिर जाता है मनु धीमे-धीमे मंच से नीचे उतर जाती है और दर्शकों के आगे आकर खड़ी हो जाती है साथ ही निरंतर कहते जाती है)

मनु:- एक मान है..एक मान है एक मान है....

(अंततः मनु धीमे-धीमे अपना सर आसमान की ओर ऊपर उठाती है)

समाप्त