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जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

देवभूमि उत्तराखंड की यात्रा: डॉ. प्रमोद पांडेय [यात्रा वृत्तांत]

देवभूमि उत्तराखंड की यात्रा

डॉ. प्रमोद पांडेय 

 

                        'हरि' की नगरी के नाम से प्रसिद्ध हरिद्वार देवी-देवताओं के दर्शन का प्रवेश द्वार माना जाता है। चारधाम की यात्रा के लिए दूर-दूर से लोग उत्तराखंड आते हैं। प्रकृति की गोद में बसा यह रमणीय स्थान अत्यंत मनमोहक लगता है। प्रकृति के सौंदर्य को अपने आँचल में समेटे हुए विशाल पर्वत लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है। मन में बड़ी उत्सुकता थी कि मैं भी उत्तराखंड के सौंदर्य को करीब से देखूँ। अभी तक तो लोगों से उत्तराखंड व चारधाम यात्रा के बारे में सुनकर मात्र कल्पना के सागर में गोते लगाता था। किसी के कहने और प्रत्यक्ष दर्शन करने में काफी अंतर होता है। मैंने भी प्रत्यक्ष दर्शन करने का मन बना लिया। मई- 2016 के महीने में गर्मी की छुट्टियों में अपने कुछ दोस्तों के साथ उत्तराखंड में स्थित चारधाम का प्रत्यक्ष दर्शन करने निकल पड़ा। यात्रा की शुरुआत मुंबई में बोरीवली स्टेशन से हुई। आरक्षित सीट थी इसलिए चिंता की कोई बात नहीं थी। हम सभी लोग अपनी आरक्षित सीट पर बैठ कर हँसते-गाते, बोलते-बतियाते, खाते-पीते, दिल्ली आ पहुँचे। दिल्ली से हरिद्वार के लिए दूसरी गाड़ी पकड़नी थी। यथा समय गाड़ी प्लेटफार्म पर आयी और हम सभी लोग पूर्व आरक्षित सीट पर जाकर बैठ गए। गाड़ी हरिद्वार 5 घंटे देरी से पहुँची। मुंबई से दिल्ली की यात्रा जितनी आरामदायक थी, उतनी ही तकलीफदायक यात्रा का अनुभव दिल्ली से हरिद्वार जाते समय हुआ। दोपहर का समय था, दिल्ली से ट्रेन समय पर छुटी पर आगे जाकर पता चला कि आगे रेलवे पटरी की मरम्मत का काम चल रहा है। करीब 4 घंटे तक एक ही स्टेशन पर गाड़ी खड़ी रही। किसी तरह हम लोगों ने समय निकाला, गाड़ी को सिग्नल मिला, गाड़ी रवाना हुई और सभी ने चैन की साँस ली। थोड़ी दूर जाते ही गाड़ी पुन: एक स्टेशन पर खड़ी हो गई और पीछे आने वाली गाड़ियों को आगे निकालने की प्रक्रिया शुरु हो गई। आसमान से गिरे खजूर पर अटके वाली कहावत चरितार्थ होने लगी। इस संदर्भ में जब स्टेशन मास्टर से पूछा गया तो स्टेशन मास्टर ने कोई सकारात्मक उत्तर नहीं दिया। यात्रियों की बढ़ती भीड़ को देखते ही स्टेशन मास्टर ने तुरंत गाड़ी को सिग्नल देकर आगे रवाना किया। 

                        यह तो स्वाभाविक है कि जैसे-जैसे मंजिल करीब आती है, वैसे-वैसे मन में बेचैनी बढ़ती जाती है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। इस घटना के बाद मुझे वैष्णो देवी यात्रा की बात याद आ गई। अगर यहाँ पर उसका जिक्र न करुँ तो मेरी लेखन यात्रा अधूरी रह जाएगी। यह रोमांचक घटना भी रेल यात्रा से जुड़ी हुई है। मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ सपरिवार वैष्णो देवी यात्रा पर जा रहा था। मुंबई से निश्चित समय पर गाड़ी चली पर सवाईमाधोपुर के आगे बयाना स्टेशन पर कई घंटो तक खड़ी रही। लोगों की हलचल से पता चला कि आगे दुर्घटना घटी हुई है। थोड़ी देर में ही स्टेशन मास्टर कार्यालय से पक्की खबर मिली कि बयाना​ और भरतपुर स्टेशन के बीच रेल की पटरी पर गाँव के किसान धरने पर बैठे हैं। मेरी 3 साल की बेटी साथ में थी। जैसे-जैसे घड़ी की सुई आगे बढ़ रही थी, बेचैनी उतनी ही बढ़ती जा रही थी। प्लेटफार्म पर न तो पानी की व्यवस्था थी, न खाने की और न दूध की। अतः प्लेटफार्म से बाहर जाकर चाय की दुकान पर गर्म दूध दुगुने भाव में लिया और लाकर बेटी को पिलाया। उस दिन मुझे यह एहसास हुआ कि इस दुनिया में मजबूर इंसान का हर कोई फायदा उठाता है। बयाना स्टेशन के बाहर यही देखने को मिला। जैसे ही यह खबर लोगों तक पहुँची कि गाड़ी आगे जाने वाली नहीं है, वैसे ही सभी वस्तुओं के दाम दोगुने हो गए। लोग ऐसी परिस्थिति में और करते भी क्या? दुगुने दाम देकर जरूरत की वस्तुएं खरीदने लगे। अन्य यात्रियों की तरह मैंने भी दोगुने दाम दिए। 

                        थोड़ी देर बाद रेल सुरक्षा बल के दो-तीन जवान प्लेटफार्म पर डंडे पटकते हुए इधर-उधर घूमते नजर आए। यात्री उन्हें घेर कर खड़े हो गए और आगे की स्थिति पूछने लगे। आखिरकार यात्रियों ने एक साथ मिलकर हंगामा करना शुरु कर दिया। हंगामा सुनकर रेल प्रशासन एवं रेलवे पुलिस के बड़े अधिकारी प्लेटफार्म पर आ गए। यात्रियों की भीड़ नारे लगाना शुरु कर दी स्थिति को बेकाबू होता देख प्रशासन ने यह निर्णय लिया कि गाड़ी को वापस पीछे सवाईमाधोपुर ले जाकर दूसरे रास्ते से दिल्ली ले जाया जाएगा और वहाँ से वह जम्मू के लिए रवाना होगी। यात्रियों ने थोड़ी राहत की साँस ली। इंजन को पीछे लाकर जोड़ा गया और पुनः गाड़ी पीछे की ओर बयाना से सवाई माधोपुर के लिए रवाना हुई। सवाई माधोपुर पहुँचने के बाद लोगों को आश्चर्य तब हुआ जब उन्होंने इस सूचना को सुना कि बयाना और भरतपुर के बीच धरने पर बैठे किसानों को हटा दिया गया है और गाड़ी पुन: बयाना और भरतपुर के रास्ते होकर दिल्ली जाएगी। हुआ भी कुछ इसी प्रकार से गाड़ी वापस बयाना, भरतपुर होते हुए दिल्ली के रास्ते जम्मू के लिए रवाना हुई। जब कभी भी मैं रेल यात्रा करता हूँ तो यह मजेदार प्रसंग मेरी आँखों के सामने साक्षात उपस्थित हो जाता है। 

                        इस बार की यात्रा में रेल मार्ग वही था पर मंजिल अलग थी। इस रोमांचक रेल की यात्रा की घटना समाप्त ही हुई थी कि हमारी मंजिल सामने थी। गाड़ी हरिद्वार स्टेशन पर रुकी और हम सभी लोग अपने सामान के साथ सुरक्षित गाड़ी से नीचे उतर गए। रिक्शा पकड़ कर हम सब महामंडलेश्वर स्वामी​ संतोषानंददेवजी महाराज के आश्रम (अवधूत मंडल आश्रम) में पहुँचे। जहाँ पर हमारे रहने की व्यवस्था की गई थी। स्वामी जी से मेरा अच्छा संबंध है इसलिए रहने व खाने की उत्तम व्यवस्था की गई थी। स्नान करने के पश्चात हम सभी ने भोजन किया और यात्रा की थकान मिटाने के लिए अपने-अपने कमरे में जाकर सो गए, इस उद्देश्य के साथ कि सुबह हरिद्वार घूमने जाना है। सुबह करीब 6:00 बजे हम सभी लोग उठ गए। स्नान, ध्यान करके गंगा स्नान, पूजा, अर्चना के लिए हर की पौड़ी रवाना हुए। यह हर की पौड़ी वही जगह है जहाँ पर कुंभ का मेला लगता है।

                        "हर की पौड़ी या हरि की पौड़ी” भारत के उत्तराखंड राज्य की एक धार्मिक नगरी ‘हरिद्वार’ का एक पवित्र और सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। इसका भावार्थ है "हरि यानी नारायण के चरण।" हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन के बाद जब विश्वकर्मा जी अमृत के लिए झगड़ रहे देव-दानवों से बचाकर अमृत ले जा रहे थे, तो पृथ्वी पर अमृत की कुछ बूँदें गिर गई और वे स्थान धार्मिक महत्व वाले स्थान बन गए। अमृत की बूँदे हरिद्वार में भी गिरी और जहाँ पर वे गिरी थीं वह स्थान हर की पौड़ी था। यहाँ पर स्नान करना हरिद्वार आए हर श्रद्धालु की सबसे प्रबल इच्छा होती है क्योंकि यह माना जाता है कि यहाँ पर स्नान से मोक्ष की प्राप्ति होती है।"

                        "हर की पौड़ी या ब्रह्मकुण्ड पवित्र नगरी हरिद्वार का मुख्य घाट है। ये माना गया है कि यही वह स्थान है जहाँ से गंगा नदी पहाड़ों को छोड़ मैदानी क्षेत्रों की दिशा पकड़ती है। इस स्थान पर नदी में पापों को धो डालने की शक्ति है और यहाँ एक पत्थर में श्रीहरि के पदचिह्न इस बात का समर्थन करते हैं। यह घाट गंगा नदी की नहर के पश्चिमी तट पर है जहाँ से नदी उत्तर दिशा की ओर मुड़ जाती है। हर शाम सूर्यास्त के समय साधु संन्यासी गंगा आरती करते हैं, उस समय नदी का नीचे की ओर बहता जल पूरी तरह से रोशनी में नहाया होता है और याजक अनुष्ठानों में संलग्न होते हैं।" 

                        लाखों की तादात में श्रद्धालु गंगा स्नान के लिए कुंभ के दौरान यहाँ आते हैं। हर की पौड़ी के पास जाकर देखा तो कुंभ के जितना तो नहीं पर लोगों की काफी भीड़ गंगा स्नान के लिए जमा थी। हर की पौड़ी में हम सभी लोगों ने मिलकर गंगा स्नान किया, पूजा-अर्चना की। गंगा स्नान के समय हमें यह हिदायत दी गई थी कि गंगा नदी में अधिक अंदर जाकर स्नान न करें क्योंकि गंगा का प्रवाह अचानक तेज हो सकता है और जल का स्तर बढ़ सकता है। जिसके कारण पानी का प्रवाह अपनी तरफ खींच लेगा। हमने उनकी हिदायत को सुना और उसका पालन किया। गंगा नदी का जलस्तर बढ़ने तथा नदी के पानी का प्रवाह तेज होने का मुख्य कारण है पहाड़ पर गिरी बर्फ का अधिक मात्रा में पिघलना। जितनी अधिक मात्रा में बर्फ पिघलेगी, प्रवाह उतना ही तीव्र होता जाएगा। पानी काफी ठंडा था, देर तक नहाने की प्रबल इच्छा थी पर ठंडे पानी ने हमारी सोच पर पानी फेर दिया और थोड़ी देर में बाहर निकल आए। सचमुच जिस आनंद की अनुभूति गंगा स्नान के दौरान हुई उसकी अभिव्यक्ति शब्दों के माध्यम से नहीं की जा सकती है। यदि गंगा स्नान के आनंद की अनुभूति प्राप्त करना हो तो स्वयं प्रत्यक्ष रुप से जाना ही उचित होगा।

                        हर की पौड़ी में गंगा स्नान के पश्चात दूसरा पड़ाव था मनसा देवी के दर्शन करना। यह मंदिर हर की पौड़ी के पास स्थित पहाड़ी पर 3 किलोमटर की ऊँचाई पर स्थित है। "यह मंदिर अत्यंत ही प्राचीन एवं प्रसिद्ध है तथा हरिद्वार से 3 किमी की दूरी पर स्थित है। यहाँ पर माता शक्तिपीठ पर स्थापित दुख दूर करतीं हैं। यहाँ 3 मंदिर हैं। यहाँ के एक वृक्ष पर सूत्र बाँधा जाता है परंतु मनसा पूर्ण होने के बाद सूत्र निकालना आवश्यक है।  यह मंदिर सुबह ८ बजे से शाम ५ बजे तक खुला रहता है। दोपहर में 2 घंटे के लिए १२ से २ तक मंदिर के पट बंद कर दिए जाते है जिसमे माँ मनसा का श्रृंगार और भोग लगता है | मंदिर परिसर में एक पेड़ है जिसपे भक्त मनोकामना पूर्ति के लिए एक पवित्र धागा बांधते है ।"

                        मनसा देवी मंदिर के संदर्भ में यह मान्यता है कि "मनसादेवी को भगवान शिव की मानस पुत्री के रूप में पूजा जाता है। इनका प्रादुर्भाव मस्तक से हुआ है इस कारण इनका नाम मनसा पड़ा। इनके पति जगत्कारु तथा पुत्र आस्तिक जी हैं। इन्हें नागराज वासुकी की बहन के रूप में पूजा जाता है, प्रसिद्ध मंदिर एक शक्तिपीठ पर हरिद्वार में स्थापित है। इन्हें शिव की मानस पुत्री माना जाता है परंतु कई पुरातन धार्मिक ग्रंथों में इनका जन्म कश्यप के मस्तक से हुआ हैं, ऐसा भी बताया गया है। कुछ ग्रंथों में लिखा है कि वासुकि नाग द्वारा बहन की इच्छा करने पर शिव नें उन्हें इसी कन्या का भेंट दिया और वासुकि इस कन्या के तेज को न सह सका और नागलोक में जाकर पोषण के लिये तपस्वी हलाहल को दे दिया। इसी मनसा नामक कन्या की रक्षा के लिये हलाहल नें प्राण त्यागा।"

                        मनसा देवी के दर्शन करने के बाद पुनः आश्रम वापस आ गए। दोपहर भोजन करने के पश्चात थोड़ा आराम किया और शाम को वापस हरिद्वार की सैर करने निकल गए। गंगा नदी के किनारे तथा शहर के बीच कई छोटे-बड़े धार्मिक स्थलों, जैसे- महादेव मंदिर, दक्ष मंदिर, दुर्गा मंदिर, लक्ष्मी मंदिर, पार्वती मंदिर, बिरला मंदिर, आदि का दर्शन करते हुए गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय को देखते हुए, शाम को वापस आश्रम में आ गए। हरिद्वार के बाजार काफी अच्छे लगे। पर्यटकों के आवागमन के कारण बाजार की सुंदरता एवं रौनक बरकरार है। जगह-जगह बने हुए धार्मिक स्थल, मठ, आश्रम, श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों को अपनी तरफ आकर्षित करते हैं। इन सबसे ​कहीं अधिक आकर्षण का केंद्र गंगा नदी है। जिसकी कल-कल करती धारा शांत वातावरण में मन को आनंद विभोर कर देती है। पवित्र गंगा नदी के तट पर बैठकर पावन, स्वच्छ एवं निर्मल जल की धारा देखते ही बनती है।

                        हरिद्वार के बाद हमारा अगला पड़ाव था ऋषिकेश। अतः सुबह होते ही सब लोग हरिद्वार से उत्तराखंड परिवहन मंडल की बस द्वारा ऋषिकेश के लिए रवाना हुए। हर की पौड़ी के पास स्थित शिवजी की विशाल प्रतिमा को देखते हुए करीब 2 घंटे की यात्रा के बाद ऋषिकेश पहुँचे। वहाँ पहुँचकर हम लोगों ने गुरुद्वारे में शरण ली। गर्मी का मौसम था, स्वाभाविक है जिस प्रकार की गर्मी हरिद्वार में थी, उसी प्रकार की गर्मी ऋषिकेश में भी महसूस हुई। यात्रा पर निकले थे इसलिए आराम करना किसी गुनाह से कम नहीं था। अतः गर्मी की परवाह न करते हुए बाहर घूमने निकल पड़े। गंगा नदी के किनारे स्थित ऋषिकेश अत्यंत रमणीय स्थल​ है। गंगा नदी के ऊपर बनाया गया झूलता हुआ पुल जो कि राम झूला और लक्ष्मण झूला के नाम से जाना जाता है, लोगों के आकर्षण का केंद्र बिंदु है। जिसे देखने न सिर्फ भारत देश के पर्यटक बल्कि विदेशी पर्यटक भी ऋषिकेश आते हैं। गंगा नदी के दोनों किनारों पर काफी आश्रम बने हुए हैं। यहाँ पर पर्यटक आकर रुकते हैं, प्रवचन सुनते हैं, ज्ञान प्राप्त करते हैं और योग करते हैं। गंगा नदी की शीतल जल धारा मन को शीतलता प्रदान कर रही थी। गंगा नदी के तट पर घूमते-घूमते नदी किनारे स्थित घाट, आश्रम, मठ तथा मंदिरों को देखने के बाद वापस गुरुद्वारे में आ गए। अगले दिन वापस सुबह उठकर गंगा नदी के किनारे सैर करते हुए राम झूला तथा लक्ष्मण झूला देखते हुए नीलकंठ महादेव के दर्शन हेतु रवाना हुए। पूरे दिन की सैर के बाद काफी थक गए थे। वापस गुरुद्वारे में आकर आराम करना ही उचित समझा। 

                        ऋषिकेश दर्शन के बाद हमारा अगला पड़ाव था उत्तरकाशी। सुबह उत्तराखंड परिवहन की बस द्वारा ऋषिकेश से उत्तरकाशी के लिए हम लोग रवाना हुए। घुमावदार पहाड़ी रास्ता, नीचे गहरी खाईं, मन विचलित हो जाता था पहाड़ी रास्ते से होकर गुजरती बस की खिड़की से प्रकृति का नजारा मन को मोह लेती थी। जगह-जगह बस रुकती लोग चढ़ते-उतरते थे। पहाड़ों के ऊपर बसे छोटे-छोटे गाँव में रहने वाले लोग जिनकी आजीविका मात्र पहाड़ों पर खेती करना है, वही लोग बस में एक गाँव से चढ़ते और दूसरे गाँव में रहते थे। घुमावदार रास्ते के कारण आंखें बंद करने पर चक्कर और उल्टी आने लगती। पर किसी तरह मन को मजबूत करके ऐसी परिस्थितियों पर विजय प्राप्त कर लेते थे। जंगल में लगने वाली आग के बारे में किताबों में पढ़ा था और समाचार में देखा था परंतु उत्तरकाशी की यात्रा के दौरान प्रत्यक्ष जंगल में लगी आग को देखकर कल्पनाओं के सागर में गोते लगाने लगा। काफी चर्चा विमर्श हुआ, बस में बैठे वहाँ के स्थानीय लोगों से इस संदर्भ में बात भी किया। पता चला कि कभी- कभी आग जान-बूझकर लगाई जाती है, तथा कभी-कभी सार्ट सर्किट (बिजली के तारों के घर्षण से उत्पन्न चिनगारी)  की वजह से अपने आप भी लग जाती है। पर नुकसान वहाँ पर रहने वालों का होता है। कितने लोग बेघर हो जाते हैं तथा कितने लोग अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। इस यात्रा के दौरान हमें वह जगह भी दिखाई दी, जहाँ पर पावर प्लांट बनाने के लिए पूरे गाँव को विस्थापित करके पूरा गाँव पानी में डूबा दिया गया था। उस गांव का नाम था टिहरी। जिसे अब नई टिहरी के नाम से जाना जाता है। सुबह से शाम हो गई यात्रा करते हुए, अंततः उत्तरकाशी पहुँच ही गए। रास्ते में ही प्रलय के दृश्य दिखाई देने लगे थे। उत्तरकाशी में साक्षात उस स्थान को देखा जहाँ विनाशकारी प्रलय ने लोगों को अपनी चपेट में ले लिया था। प्रलय का वह मंजर आज भी उत्तरकाशी में मौजूद है। उस हृदयविदारक दृश्य को देखकर, टी.वी. व समाचार पत्रों में देखे हुए दृश्यों की यादें फिर से ताजा हो गई। घंटों गंगा नदी के किनारे खड़े होकर बाढ़ से क्षतिग्रस्त अवशेषों को निहारते रहे और उस प्रलय की कल्पना करते रहे। उत्तरकाशी में गंगा नदी के किनारे स्थित श्री संतोषानंद देव जी महाराज के आश्रम में अपना डेरा जमाया। कल-कल की आवाज करती गंगा नदी के पानी की धारा रात भर कानों में गूँजती रही। जितनी गर्मी हरिद्वार और ऋषिकेश में थी, ठीक उसके विपरीत उत्तरकाशी में उतनी ही ठंड पड़ रही थी। हल्की-हल्की बूँदा-बाँदी मौसम को खुशनुमा बना देती थी।

                        उत्तरकाशी के सौंदर्य को देखने के बाद सुबह होते ही गंगोत्री के लिए रवाना हुए। इस बार हम लोगों ने निजी वाहन आरक्षित किया और गंगोत्री के लिए रवाना हो गए। ऊँची-ऊँची पहाड़ियों के किनारे पर बना सँकरा रास्ता और उस रास्ते से गुजरती हमारी गाड़ी, डर की स्थिति पैदा करती थी। ऐसा लगता था कि मानो जान हथेली पर लेकर चल रहे हैं क्योंकि एक तरफ ऊँचा पहाड़ तो दूसरी तरफ गहरी खाईं। हम आप स्वयं समझदार हैं, समझ सकते हैं लिखने की आवश्यकता नहीं है। 'नजर हटी, दुर्घटना घटी' जैसे अनेक सावधान करने वाली सूचनाएं जगह-जगह लगी हुई थी। गंगा नदी के किनारे पर बने रास्ते से गाड़ी गुजरती रही और अंततः गंगोत्री सही सलामत पहुँच गए। पूरे रास्ते में तबाही के मंजर के अवशेष दिखाई दिए। 

                        गंगोत्री यह वही जगह है, जहाँ से गंगा नदी का उद्गम हुआ है। यहीं पर राजा भगीरथ आकर तपस्या किए थे और गंगा को धरती पर अवतरित कराए थे। वह स्थान भी हमने देखा जहाँ पर भगीरथ ने तपस्या की थी। उसके ऊपर गोमुख की चढ़ाई के बारे में सुनकर वहाँ तक जाने की इच्छा नहीं हुई क्योंकि गोमुख का रास्ता अत्यंत दुर्गम व बर्फीला है। लोग कहते हैं कि हम हिमालय की तरफ नहीं जाते हैं बल्कि वह स्वयं हमें अपनी ओर आकर्षित करता है। वहाँ पर कई लोगों को गुफाओं में तपस्या करते हुए देखा जो कि सांसारिक माया मोह का त्याग करके गंगा की गोद में स्वयं को समर्पित कर चुके हैं। उस सुंदर एवं रमणीय स्थल को छोड़कर आने का मन नहीं हो रहा था परंतु समयाभाव के कारण अधिक समय तक वहाँ नहीं रुक पाए और वापस गंगोत्री दर्शन की यादों को समेटे हुए उत्तरकाशी के लिए रवाना हो गए। शाम तक वापस उत्तरकाशी स्थित आश्रम में आ गए। लंबी यात्रा करके थक गए थे, इसलिए जल्दी सो गए क्योंकि सुबह जल्दी उठकर वापस यमुनोत्री की यात्रा के लिए निकलना था। सुबह हुई हम सब लोग तैयार होकर यमुनोत्री यात्रा के लिए रवाना हो गए। वही दृश्य, वही नजारे, वही पहाड़ी रास्ते, वही खाईं, एक जैसे लगने लगे थे। यही दृश्य पूरा दिन निगाहों के सामने आता गया और दोपहर 2:00 बजे के करीब यमुनोत्री पहुंच गए। यमुनोत्री के उद्गम स्थान तक गाड़ी जाने का रास्ता नहीं है। रास्ता जहाँ पर समाप्त होता है वहाँ से 5 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई वाला पहाड़ी रास्ता है। जहाँ लोगों को चलकर जाना होता है। खच्चर, पालकी तथा पिट्ठू आदि की सुविधा वहाँ पर उपलब्ध है। जो लोग पैदल नहीं चल सकते, वे लोग इस सुविधा का लाभ उठाते हैं। देखा जाय तो वहाँ के लोगों के रोजगार का साधन है। वहाँ के लोग काफी मेहनती वह ईमानदार होते हैं, जो मेहनत, मजदूरी करके अपना तथा अपने परिवार का पेट पालते हैं। पानी का गर्म कुंड लोगों के आश्चर्य का केंद्र बना हुआ है। एक कुंड में तो पानी इतना गर्म है कि 8 से 10 मिनट में चावल पक जाता है। गर्म कुंड में नहाने के बाद यमुनोत्री के दर्शन करके वापस पहाड़ी रास्ते से नीचे उतर आए। रात होने वाली थी, वहाँ पर रुकने की उचित व्यवस्था नहीं थी। अतः वहाँ से वापस जाना ही उचित समझा। करीब सौ किलोमीटर वापस आने के बाद एक छोटा सा शहर दिखाई दिया। जहाँ पर रात गुजारी।

                        सुबह होते ही वापस मसूरी के लिए रवाना हो गए। ठंडा मौसम, पहाड़ का नजारा, प्राकृतिक सौंदर्य, इन सबसे काफी करीब थे हम। टेढ़े-मेढ़े पहाड़ी रास्ते से गुजरते हुए पहाड़ की ऊँची चोटी पर बसा रमणीय स्थान मसूरी आ पहुँचे। मसूरी के सौंदर्य का नजारा लिए ।मसूरी में अधिक समय रुकना नहीं था, अतः देहरादून होते हुए ऋषिकेश वापस आ गए।  

                        ऋषिकेश वापस आने के बाद थकावट ने साथ नहीं छोड़ा। तबीयत भी कुछ खराब होने लगी क्योंकि गर्म वातावरण से ठंडे वातावरण में जाने के बाद, वापस गर्म वातावरण में आने से शरीर पर असर होना तो स्वाभाविक था। ऋषिकेश में यह सूचना मिली कि बद्रीनाथ जाने वाला रास्ता बरसात में भूस्खलन के कारण कुछ दिनों के लिए बंद कर दिया गया है। मुंबई वापसी का दिन निर्धारित था क्योंकि रेल का आरक्षण पूर्व सुनियोजित था। हमारे पास अब तीन दिन बचे थे। जिसमें बद्रीनाथ और केदारनाथ की यात्रा नहीं हो सकती थी। अतः काफी विचार विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया कि बाकी के दिनों में से 2 दिन ऋषिकेश में तथा 1 दिन हरिद्वार में बिताएंगे। हमारा वापसी का आरक्षण हरिद्वार से ही था। वापस गुरुद्वारे में शरण ली और गंगा नदी के किनारे सुबह, शाम घूमकर किसी तरह एक दिन निकाला। अगले दिन गंगा नदी में होने वाली राफ्टिंग का लुफ्त उठाया। जीवन में पहली बार मौत के साथ सामना हो रहा था क्योंकि गंगा नदी की तेज धारा में राफ्टिंग करना बड़े जिगर व हिम्मत का काम होता है। हर किसी के लिए संभव नहीं होता है। किसी तरह मन को मजबूत करके राफ्टिंग के लिए गए। राफ्टिंग वालों ने  मृत्यु प्रमाण पत्र पर पहले ही हस्ताक्षर करवा लिए। मेरा मतलब राफ्टिंग वालों ने शर्त व निर्देश पर हस्ताक्षर करवा लिए, जिसमें लिखा था कि हम अपनी मर्जी से राफ्टिंग करने जा रहे हैं, अगर कोई अनहोनी घटना घटित होती है तो उसकी जवाबदारी राफ्टिंग वालों की नहीं होगी। बड़ी ही भयावह स्थिति थी, पर जोश भी था, यह प्रथम अनुभव यादगार बन गया। सही सलामत रामझूला के पास वापस आ गए। जान बची तो लाखों पाए वाली कहावत चरितार्थ हो गई। अगले दिन सुबह हरिद्वार के लिए रवाना हो गए। हरिद्वार पहुँचकर पुन: श्री संतोषानंद देव जी के आश्रम में शरण ली। शाम को बाबा रामदेव के आश्रम पतंजलि को देखने गए। पतंजलि परिसर की सैर करने के बाद एक अलग ही अनुभव प्राप्त हुआ। इन्हीं अनुभवों​ के साथ हमारी यात्रा का समापन हरिद्वार में ही हुआ।

 अगली सुबह नई यादों व नए अनुभवों​ के साथ हरिद्वार से मुंबई के लिए रवाना हुए। रास्ते में यात्रा के दौरान चर्चा, विमर्श तथा प्रत्यक्ष अनुभव को याद करके अगले दिन वापस मुंबई आ गए।

 

डॉ. प्रमोद पांडेय 

ए/ 201, जानकी निवास, तपोवन, रानी 

सती मार्ग, मलाड (पूर्व), मुंबई- 400097.

09869517122

drpramod519@gmail.com