Notice
जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

सिनेमा और समाज में वृद्ध : भावना सरोहा [लेख]

सिनेमा और समाज में वृद्ध

भावना सरोहा

पी-एच.डी.

इंदिरा गाँधी मुक्त विश्वविद्यालय,  दिल्ली

 

व्यक्ति से परिवार और परिवार से समाज बनता है और इस समाज का एक अहम् हिस्सा बुजुर्गों का है फिर भी वे युवा पीढ़ी से कटे कटे रहने पर मजबूर होते हैं .हमारा संसार विभिन्न धर्मों, जातियों, नस्लों आदि में बटां हुआ है किन्तु इन सब को वृद्धावस्था अपने भीतर समेट लेती है, क्योंकि इस धरती पर जो भी जीव उत्पन्न हुआ है उसे एक न एक दिन बूढ़ा होना ही पड़ता है .इंसान जो कि धरती का सबसे बुद्धिमान और शक्तिशाली प्राणी माना जाता है  एक उम्र के बाद उसे भी कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ता है जैसे कि शारीरिक, मानसिक, गिरता स्वास्थ्य,  आर्थिक,  पारिवारिक व सामाजिक,  अकेलापन और कभी-कभी घर व समाज में अनादर आदि . इन समस्याओं के कुछ कारण हैं जैसे कि संयुक्त परिवार का विघटन,  भौतिक सुख सुविधाओं में वृद्धि, नई पुरानी पीढ़ी में फासला,  धन का महत्व, पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव,  महंगाई का बढ़ना,  सामाजिक सुरक्षा का अभाव आदि.

“सिनेमा, कला का वह सशक्त माध्यम है जो अपने दर्शकों को किसी ख़ास विषय-वस्तु पर आधारित कथा को दिखाता है, बताता है और मनोरंजन करते हुए दर्शकों के हृदयों में गहरे उतर जाने की अभूतपूर्व क्षमता रखता है” (पृष्ट १५, प्रसून सिन्हा, भारतीय सिनेमा, श्री नटराज प्रकाशन, दिल्ली-५३, प्रथम संस्करण २००६  )

सिनेमा एक ऐसा माध्यम है जिसके जरिये अनपढ़ से लेकर पढ़े लिखे लोग इससे जुड़ जाते हैं . सिनेमा के द्वारा दिए गए सन्देशों से कई लोगों का हृदय परिवर्तन भी हुआ है . सिनेमा समाज की छायाप्रति है. सिनेमा ने समाज के बढती उम्र वाले लोगों के हिस्से को बखूब दिखाया है... सभी को एक न एक दिन वृद्धावस्था से गुज़रना पड़ता है.  उस अवस्था का पूरा अध्ययन करके सिनेमा वृद्धों की प्रत्येक स्थिति को दिखाता है.

“मुन्ना भाई एम.बी.बी.एस” फिल्म में एक बूढ़े सफाई कर्मचारी को दिखाया हैफिल्म में उसे झुंझलाते हुए दिखाया गया है जो सुबह से लेकर शाम तक झाड़ू पोछा करता है और लोग साथ-साथ उसे गन्दा भी करते रहते हैं मगर जैसे ही उसे थोड़ा सा प्यार मिलता है, उसे मुन्ना प्यार से गले लगाता है तो वह एकदम भावुक हो जाता है और उसका दिल खिल उठता है . जिससे कभी किसी ने प्यार से बात नहीं की उसे जब थोड़ी इज्ज़त और प्यार मिलता है तो वह कहता है अच्छा ठीक है अब रुलाएगा क्या .गले लगाने के बाद जब मुन्नाभाई बूढ़े कर्मचारी की सफाई गन्दी करता है तो वह ख़ुशी-ख़ुशी कहता है “कोई नहीं साफ़ हो जायेगा” बल्कि एक पल पहले वह युवाओं को कोस रहा होता है कि उसकी सफाई को सब गन्दा कर रहे हैं तथा कोई उसकी बात नहीं सुनता .  घर हो या बाहर हमारे वृद्धों को बचे हुए दिन काटने के लिए सुख सुविधाएं से अधिक थोड़ी इज्ज़त और प्यार की जरुरत है .

भूमंडलीकरण और पश्चिमी सोच का प्रभाव कई फिल्मों में दिखाया गया है . “भूतनाथ” में पिता को रोता हुआ छोड़कर बेटा मुहं मोड़कर चला जाता है .पीछे से पिता के गिरने और चिल्लाने की चीख तक उसे सुनाई नहीं देती .पिता के मरने की खबर सुनने पर भी वह नहीं आता, उसका मकसद एक ही है- “उस घर को बेच देना” .

“लगे रहो मुन्ना भाई” फिल्म में दिखाया गया है की बच्चे अपने माँ-बाप को आश्रम भेज कर अपने को मुक्त समझते हैं . एक बेटा खूब पैसे वाला है मगर एक शहर में होते हुए भी पिता से मिलने का वक़्त नहीं है और न ही बहू उनकी शक्ल देखना चाहती है. फिल्म में जब मुन्ना उसे प्यार से समझाता है कि तुम्हारे पिता अपने जन्मदिन पर अपने बेटे को देखकर बहुत खुश होंगे सिर्फ पांच मिनट के लिए आ जाना तो वह साफ मना कर देता है मगर  जब मार मुन्ना द्वारा उसे पड़ती है और अपनी जान पर आती है तो वह भाग कर पिता से मिलने जाता है. आज की पीढ़ी बहुत ही स्वार्थी होती जा रही है.  जायदाद की बात आती है तो माता जी-पिता जी और जब जायदाद मिल जाती है तो बूढा-बुढ़िया बन जाते हैं . यही हमें “अवतार”,  “अमृत” और “बागवान” फिल्म में देखने को मिलता है .यह कितनी घटिया बात है हमें पाल-पोसकर बड़ा करने  वाले को हम खुद ही भूखा मारने की कोशिश करते हैं. इन तीनों फिल्मों में  बच्चों द्वारा दिए गए धोखे और अपमान के बाद शोषित होते हुए भी वे बेचारे नहीं बनते. मेहनत करने में विश्वास रखते हैं  और दोबारा शून्य से अपना जीवन फिर शुरू करते हैं और कामयाब होते हैं. ऐसा ही एक दृढ़ पात्र उपन्यास “ढलती शाम” में मिलता है जो कि रामावतार द्वारा लिखित है.  .

“बूढ़ी काकी” कहानी और “वाटर” फिल्म में दो ऐसी बूढ़ी स्त्रियों को दिखाया गया है जिनका अच्छा खाना मिलना ही बहुत बड़ा सपना बन जाता है . एक तरफ जहाँ काकी को पकवान खाने की लालसा है और उसी को पाने के लिए बेटे बहू से गालियां खाती हैं वहीँ दूसरी ओर बूढ़ी विधवा है जिसकी शादी बचपन में हो गयी थी और उस समय उसे लड्डू खिलाया गया था. अब वह मरने की कगार पर है और लड्डू खाने का सपना रोज़ देखती है.....हमारे समाज में बुजुर्गों की ऐसी स्थिति है जहाँ खाने के लिए तो मिलता नहीं तो दवा क्या ख़ाक मिलेगी ???

“रूई का बोझ” फिल्म में भी अच्छा खाने-पीने पहनने से एक बुज़ुर्ग को वंचित रखने की कोशिश की जाती है .  बच्चों द्वारा जायदाद लेने के बाद बूढ़े पिता की दुर्गति दिखाई है..कायदे से देखा जाये तो घर के बूढ़े माँ-बाप रुई के  सामान होते हैं जिनका बोझ नहीं होता है ..मगर अधिकतर संतानें इतनी नालायक हो गयी हैं कि वे माँ-बाप को गीली रुई का बोझ समझती हैं और उसे उतार फेकना चाहती हैं.

“शोले” और “शराबी” फिल्मों में हमे ऐसे बुज़ुर्ग मिलते हैं जो शारीरिक रूप से जरूर थोड़े कमजोर हो गये हों लेकिन मानसिक रूप से बहुत मजबूत हैं . शोले फिल्म में एक मुस्लिम (A K HUNGAL ) बुज़ुर्ग पात्र है वह अपने एक मात्र बुढ़ापे का सहारा अपने बेटे को गाँव वालों के भविष्य के लिए कुर्बान कर देता है और वह मंशा रखता है कि यदि और पुत्र होते तो मै उन्हें भी कुर्बान कर देता . दूसरी ओर “शराबी” में मुंशी जी को विजय की शराब की वजह से तड़प नहीं देखी जाती है और कमजोर शरीर होते हुए भी बोझा ढोने निकल पड़ते है और काम करते-करते बेहोश भी हो जाते है. “मदर इंडिया” फिल्म में भी जब राधा के सामने एक स्त्री की लाज का सवाल आता है तो वह भी संघर्ष से पाले हुए, बुढ़ापे के सहारे बिरजू को अपने हाथों से गोली मार देती है . “शोले” और “मदर इंडिया” फिल्मों में हमें  ऐसे पुरुष और स्त्री बुज़ुर्ग पात्र मिलते हैं जो समाज के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हैं .

बॉलीवुड में कई पारिवारिक फ़िल्में ऐसी भी हैं जिनमे घर के बुजुर्गों की घर में अहमियत व महत्ता दिखाई गई है जैसे-‘कभी ख़ुशी कभी गम’, ’देवदास’, ’कुछ कुछ होता है’ आदि .

शारीरिक और मानसिक समस्याओं को ध्यान में रखते हुए भी फ़िल्में बनाई गयीं हैं जैसे-पीकू. “पिकू” जैसी फिल्म में बुजुर्गों की बेहद आम ‘कब्ज़ की समस्या’ को दिखाया गया है . यह आम समस्या होते हुए भी आम नहीं होती है. यह अत्यंत दुखद और पीड़ादायक होती है .पिता और बेटी के आपसी सम्बन्ध को बखूबी दिखाया गया है . बेटी पिता की हर बात,  दवा से लेकर उनकी हर जरुरत,  का ख्याल रखती है किन्तु फिर भी कई बार अपने पिता पर झुंझला जाती है . जिसमें एक कारण है पिता की वजह से उसकी शादी नहीं होना. पिता भास्कर बैनर्जी कई बार बेटी के साथ स्वार्थ से भरा व्यवहार कर बैठते हैं, उन्हें डर है कि यदि बेटी पीकू की शादी हो गई तो उनका ख्याल कौन रखेगा . उनका मानना है कि पति की सेवा और सेक्स के लिए शादी करनी है तो उससे अच्छा है माता-पिता की सेवा की जाए. जब उन्हें लगता कि कोई लड़का पीकू में रुचि ले रहा है तो वह बेटी के सामने ही बोलते है कि “पीकू वर्जिन नहीं है ”. यहाँ पिता-बेटी में बेवजह भावुक संबंध न दिखाते हुए दोनों के बीच खुला व दोस्ताना व्यवहार दिखाया गया है . पिता उसके जीवन में पूरी तरह रमे हुए हैं, हर एक बात वह बेटी को बताते हैं और बेटी ध्यानपूर्वक सुनती है. पिता की तबियत व जरुरत की हर चीज़ का वह ख्याल रखती है. पिता उसे कई बार ऑफिस में भी कॉल करते हैं. सिर्फ यह बताने के लिए कि उनको आज पोटी आयी या नहीं और आयी भी तो किस रंग की; क्योंकि इसी कारण वह अपने जीवन में बहुत पीड़ा झेलते हैं और यही बात उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण है. भास्कर बैनर्जी अपनी पोटी को लेकर चिंतित रहते हैं और सेमी सॉलिड या मैंगो पल्प से लेकर उसके रंग की चर्चा खाने की मेज़ पर पिता-बेटी करते हैं .पिता के लिए सुबह-सुबह एक बेहतरीन मोशन होना दुनियां के बड़े सुखों में से एक है.  दूसरा कारण कई बार बूढा पिता अपने मन की सुनता है तथा मनमानी करता है. फिल्म के अंत में भी वे किसी को बिना बताए साईकिल पर लम्बी सैर पर चले जाते हैं और बेटी उनकी कमज़ोर हड्डियों की समस्या को लेकर चिंतित रहती है कि कहीं गिर गए तो हड्डी टूट सकती है. यहाँ बूढ़े पिता का किरदार मजबूत है जो अपनी सुनता है . इससे ही मिलता-जुलता किरदार “मुक्तिभवन” फिल्म में है. जिसकी पत्नी की मृत्यु हो चुकी है और वह पूरे परिवार में खुद को अकेला महसूस कर रहा है . उसे एक दिन आभास होता है कि वह मरने वाला है . घर में वह महसूस करता है कि बेटा और बहू के पास उसके लिए समय नहीं है . बेटा ऑफिस से लौटने के बाद जरुरी कॉल पर लगा रहता है और बहू भी अब पहले की तरह उसका ध्यान नहीं रखती और न ही उनको पसंद करती है . इसलिए वह चाहता है कि अपने अंतिम दिनों को काशी में “मुक्तिभवन” आश्रम में बिताएं, वहीं से उसे मुक्ति मिलेगी. घर में बूढ़ा व्यक्ति अपनी पोती के नज़दीक दिखाया गया है. दोनों एक ही रूम में रहते हैं .बेटा भी पिता की अंतिम इच्छा मानकर काशी ले जाता है. इस फिल्म में युवा की मजबूरी को प्रदर्शित किया है कि आजकल की नौकरी के कारण युवा चाहकर भी अपने घर के बुजुर्गों को समय नहीं दे पाते हैं. वे उनके प्रति सम्मान और प्रेम तो रखते हैं फिर भी अपने व्यस्त जीवन और महंगाई के कारण न चाहकर भी बदसलूकी कर बैठते हैं.

“कपूर एंड संस” फिल्म में भी “मुक्तिभवन” की तरह ही बुज़ुर्ग की मनोदशा को दिखाया गया है . घर के सबसे बड़े सदस्य को अपने बुढ़ापे में अकेलापन महसूस होता है. वैसे तो घर में बेटा, बहू, पोते आदि हैं किन्तु फिर भी उन्हें लगता है की उनपर ध्यान नहीं दिया जा रहा है . उन्हें लगता है कि किसी भी वक्त मृत्यु आ सकती है इसलिए वह हर समय मरने का ही अभ्यास करते रहते हैं .इस बुज़ुर्ग सदस्य का एक ही सपना है कि मरने से पहले एक बार समस्त परिवार के साथ फोटो खिंचवा ले.

कुछ फिल्मों में बुजुर्गों के युवा स्त्रियों के प्रति आकर्षण को भी विषय बनाया गया है. जैसे कि जोगेर्स पार्क, निशब्द, चीनी कम, द शौकींस आदि. यदि हम सामान्य जीवन में इसे देखते हैं तो बोल देते है ये बूढ़ा चिपकू,  ठरकी है किन्तु इसके पीछे छिपा कारण अति संवेदनशील है. यहाँ यह साफ़ कह देना उचित है कि मैं चरित्रहीन लोगों की बात नहीं कर रही हूँ .सामान्यतः आकर्षण का कारण यह है की वह पीढ़ी धीरे धीरे पीछे खिसकती जा रही है. वे लोग नए लोगो से जुड़ना चाहते हैं ...तभी कोई जबरदस्ती बात करने की कोशिश करता है तो कोई युवा के प्रति आकर्षित हो जाता है ..हर आदमी के अन्दर एक उम्र के बाद बढती उम्र और मौत के प्रति डर बढ़ने लगता है . इसी कारण वे जवानी की तरफ दोबारा बढ़ना चाहते हैं और युवाओं के प्रति आकर्षित होते हैं केवल उनका जवान शरीर ही आकर्षित नहीं करता है . वे डर से दूर भागना चाहते है,  जवानी की तरफ बढ़ना चाहते हैं किन्तु ऐसा हो नहीं सकता. ये सच है कि वे अपनी दुनियादारी के चक्कर में इतना फंस जाते हैं कि ज़िन्दगी के असली मायने खुश रहना को ही भूल जाते हैं और शायद इसी वजह से कभी कभी जवान लोगों के रहन-सहन पर इर्ष्या भी होती है क्योंकि वे उनकी तरह खुशियों का आनंद लेने की काबिलियत खो देते हैं. “द शौकींस” फिल्म में ६० वर्षीय तीन वृद्ध हैं तथा तीनों चरित्र के दोषी नहीं हैं .सामान्य मानव की तरह उनके भीतर शारीरिक सुख पाने की भावनाएं रखते हैं . तीनों में से एक की पत्नी भगवान् की भक्ति में लग जाती है जो अपने पति की इच्छाओं को अनदेखा करती है . एक की पत्नी बहुत पहले ही स्वर्ग सिधार गयी होती है और तीसरा वृद्ध इसीलिए शादी नहीं करता क्योंकि वह अपने दोस्त की बहन से प्रेम करता था और तीनों ही दोस्तों ने आपस में बचपन में यह वादा यह किया था की हम एक दूसरे की बहन पर नज़र नहीं डालेंगे, इसलिए वह पूरी उम्र कुवारा रहता है. तीनों की ज़िन्दगी में निरसता है . तीनों चाहते है कि जो अभी तक उन्होंने अपनी युवावस्था में मौजमस्ती नहीं की वह अब करें. सारी ख्वाईशें पूरी करें. इसी मकसद के साथ वे छुट्टियाँ बिताने मॉरिशस जाते हैं और वहां उनकी मुलाकात ‘आहना’ नाम की लड़की से होती है . आहना ‘अक्षय कुमार’ की बहुत बड़ी प्रशंसक है तथा वह अक्षय से मिलना चाहती है . आहना का कहना है कि जो भी उसे अक्षय से मिलवायेगा उसके लिए वह कुछ भी कर सकती है .बस फिर क्या तीनों वृद्ध उसे अपने-अपने तरीके से लुभाने लगते हैं, तीनों में प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है कि पहले अक्षय से आहना को कौन मिलवायेगा . तीनों को लड़की का साथ रहना अच्छा लगता है . अगर इन लोगों के चरित्र में दोष होता तो उस अकेली नायिका के साथ तीनों मिलकर कोई भी दुष्कर्म कर सकते थे. किन्तु वे बहुत ही संकोच रूप से आगे बढ़ते हैं और कुछ गलत नहीं करते हैं. जितना वह लड़की खुद आगे बढती है उतना ही उनके लिए बहुत होता है . उनके भीतर कहीं भी हमें हवस नहीं दिखती है. अंत में वे तीनों अपनी-अपनी जिंदगी में खुश दिखाए गए हैं . ‘निशब्द’ फिल्म में अधिक उम्र वाले व्यक्ति को बेटी की सहेली से प्यार हो जाता है. युवा लड़की का छोटे कपड़े पहनना, बिंदास व्यवहार, खुल कर जीवन जीने का तरीका, अपनी भावनाओं को निसंकोच व्यक्त करना उसे आकर्षित करता है. ‘जोगर्स पार्क’ फिल्म में भी इसी तरह का आकर्षण एक सेवानिवृत वकील का एक युवा लड़की से दिखाया गया है. ‘चीनी कम’ फिल्म में एक अलग तरह का प्रेम दिखाया गया है . यहाँ दोनों लोगों में उम्र का काफी अंतर है किन्तु लड़की भी यहाँ परिपक्व है. बाहरी आवरण से अधिक यहाँ दोनों को एक - दूसरे की समझदारी आकर्षित करती है . दोनों लोग अकेले और अविवाहित होते हैं दोनों को एक-दूसरे का साथ पसंद आता है और दोनों शादी करने का निर्णय लेते हैं .

बुजुर्गों को समस्या का सामना हर जगह करना पड़ता है . चाहे व्यक्ति किसी भी देश का हो हर व्यक्ति का शरीर एक समान ही बूढ़ा होता है . किन्तु सामाजिक ढांचे व परिवेश के कारण उनकी स्थिति में थोडा बहुत अंतर तो हो सकता है किन्तु शरीर के मामले में सबकी एक जैसी ही समस्याएँ हैं . हमारे देश में जहाँ पारिवारिक रिश्तों में बुजुर्गों को केन्द्रित किया जाता है वहीँ विदेशी फिल्मों में उसके अस्तित्व पर जोर दिया गया है . बुज़ुर्ग क्या करना चाहता है और वह क्या कर सकता है या उसकी आखिरी इच्छा क्या है आदि . जैसे harry & tonto(1974)  फिल्म में न्यू यॉर्क में रहने वाला सेवानिवृत  बूढ़ा व्यक्ति हैरी का जब अपार्टमेंट तोड़ दिया जाता है तो वो पूरी ज़िन्दगी अपनी प्यारी बिल्ली टोंटो के साथ विभिन्न कठिनाइयों का सामना करते हुए देशव्यापी यात्रा पर निकल जाता है  .   Kotch(1971) में joseph kotcher सेवानिवृत विक्रेता है जो नर्सिंग होम में न रहकर अपने बेटे के घर में अपने अंतिम दिन बिताना चाहता है,  the bucket list (2007) में दो कैंसर के मरीज अस्पताल से भाग जाते हैं क्योंकि उनकी इच्छा है की मरने से पहले वे एक रोड ट्रिप करें. The trip to bountiful(1985) में बूढी औरत की इच्छा की मरने से पहले वह अपने बचपन के घर जाये . driving miss daisy (1989),  grumpy old men(1993) ,  grumpier old men(1995), tribute(1980), the straight story (1999), one golden pond(1981), the bridges of Madison country (1995), venus(2006) and old man and the sea  आदि बुजुर्गों पर आधारित फ़िल्में हैं . इन फिल्मों में बुजुर्गों को कुंठित नहीं दिखाया है क्योंकि वे अपनी ज़िन्दगी खुद जीते है, अपनी मर्ज़ी का करते है चाहे उन्हें किसी साथी का चुनाव करना हो या किसी खास लक्ष्य तक पहुंचना हो. वे समाज व परिवार की चिंता छोड़ अपने जीवन के हर एक पल पर खुद का अधिकार समझते हैं.

सिनेमा ने सिर्फ बुजुर्गों को शोषित या दबते हुए ही नहीं दिखाया उन्हें हर स्थिति में अलग अलग भूमिका निभाते हुए दिखाया है . कई बार  देखा जाता है कि सब कुछ होने के बाद भी बुज़ुर्ग अकेलेपन के शिकार हो जाते हैं . ऐसा अक्सर होता है कि दोनों साथी में से एक छोड़कर चला जाता है . उपरोक्त सब समस्याओं के उपचार के अलावा सबसे ज्यादा जरुरी है कि वह अपने जीतेजी अपनी जायदाद किसी को न दें तथा अपना दुःख सुख बाँटने के लिए एक साथी का चुनाव करें. हमारे समाज में ये आसानी से स्वीकार नहीं किया जायेगा मगर जब बच्चे पश्चिमी विचारों का अनुसरण कर सकते है तो बुज़ुर्ग क्यों नहीं . हमें इस विषय पर विचार करना चाहिए.