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जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

धोबी जाति में धोबिया संस्कृति के सांस्कृतिक तत्वों का विश्लेषण: शिव कुमार [शोध आलेख]

धोबी जाति में धोबिया संस्कृति के सांस्कृतिक तत्वों का विश्लेषण

शिव कुमार[1]

            मानवशास्त्र विषय की उत्पत्ति संस्कृति के अध्ययन से शुरू हुई है। मानवशास्त्रियों ने संस्कृति शब्द का प्रयोग विभिन्न अर्थ में किया है। हालांकि यह खेद का विषय है कि मानवशास्त्री अभी तक संस्कृति की आम परिभाषा पर सहमत नहीं हो पाए हैं। क्रोबर तथा क्लुखौन ने अपने शोध पत्र ‘कल्चर: ए क्रिटिकल रिव्यु ऑफ कांसेप्ट एंड डेफिनेशंस’ (1952) में मानवशास्त्रियों द्वारा प्रदत्त संस्कृति की परिभाषाओं को संकलित कर यह बतलाने का प्रयास किया है कि संस्कृति की 108 परिभाषाएं हैं। इससे स्पष्ट होता है कि संस्कृति की परिभाषा के संबंध में मानवशास्त्री एकमत नहीं हैं। मानवशास्त्र में संस्कृति शब्द को सर्वप्रथम परिभाषित करने का श्रेय ब्रिटिश उद्विकासवादी मानवशास्त्री टायलर को जाता है। टायलर ने अपनी पुस्तक ‘प्रिमिटिव कल्चर’ (1871) में संस्कृति को परिभाषित करते हुए कहा है कि “संस्कृति एक जटिल समग्रता है, जिसमें ज्ञान, कला, विश्वास, आचार, कानून तथा ऐसी ही अन्य आदतों तथा क्षमताओं का समावेश रहता है, जिसे मानव समाज का सदस्य होने के नाते ग्रहण करता है।” टायलर की परिभाषा से ज्ञात होता है कि संस्कृति सामाजिक विरासत है तथा संस्कृति एक जटिल समग्रता है। हालांकि समग्रता की तुलना में जटिलता पर विशेष बल दिया गया है।

            ब्रिटिश प्रकार्यवादी मैलीनोवस्की ने संस्कृति को प्रकार्यात्मक ढंग से बताया है। उनके अनुसार संस्कृति का संबंध वंशागत उपकरण, समान, शिल्पशास्त्रीय प्रक्रिया, विचार, आदत तथा मूल्य से है। इस प्रकार मैलिनोवस्की ने संस्कृति को अभौतिक तथा भौतिक अथवा मूर्त या अमूर्त में विभाजित करने का प्रयास किया है। बाद में अपनी पुस्तक ‘साइंटिफिक थ्योरी ऑफ कल्चर’ (1944) में संस्कृति को प्रकार्यवाद सिद्धांत के अनुसार परिभाषित किया है, उनके अनुसार “संस्कृति मानव की आवश्यकता पूर्ति का साधन है।” चूंकि संस्कृति का अस्तित्व मानव के अस्तित्व से जुड़ा हुआ है। अतः संस्कृति का मुख्य प्रकार्य मानव का अस्तित्व बनाए रखना है। इसी प्रकार बीडेन (1952) ने संस्कृति को कृषि तथ्यों, मानसिक तथ्यों, प्राविधिक तथ्यों तथा सामाजिक तथ्यों की उपज मानते हैं। संस्कृति की परिभाषा को और प्रस्तुत करते हुए बीडेन ने कहा है कि “संस्कृति के अंतर्गत व्यक्ति के व्यवहार तथा विचार के साथ-साथ बौद्धिक, कलात्मक और सामाजिक संस्थाएं आती हैं। इन संस्थाओं के माध्यम से मानव अपनी जैविक तथा सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है तथा अपने पर्यावरण के साथ अनुकुलन करने का प्रयास करता है। पिडिंगटन (1952) ने संस्कृति को भौतिक तथा बौधिक साधनों का संपूर्ण योग बतलाया है। इस प्रकार मैलीनोवस्की, बीडेन तथा पिडिंगटन की परिभाषाओं में संस्कृति के अभौतिक तथा भौतिक पक्ष प्रकट होते हैं। भौतिक संस्कृति के अंतर्गत गांव-घर, घरेलू उपकरण, कृषि उपकरण, युद्ध उपकरण, मनोरंजन उपकरण, भोजन, वस्त्र, आभूषण इत्यादि आते हैं। जबकि अभौतिक संस्कृति के अंतर्गत ज्ञान, विश्वास, मूल्य, प्रथा, कानून, कला, संस्था इत्यादि आते हैं। संस्कृति के यह दोनों पक्ष एक दूसरे से संबंधित हैं अर्थात पूरक हैं। कला एक ऐसी अभौतिक संस्कृति है जिसमें भौतिक संस्कृति अपना महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कला की उत्पत्ति मानव के विशेष रुचि, कार्यकुशलता, निपूर्णता इत्यादि से होता है और इस विशेष कार्यकुशाता अथवा निपूर्णता को प्रदर्शित करने और आकर्षक बनाने के लिए मानव भौतिक संस्कृतियों का निर्माण करता है। इस प्रकार कह सकते हैं कि कला एक समग्र है जिसका संबंध मानव के विशेष गुण से होता है।

होबेल (1958) ने “संस्कृति को सीखे हुए व्यवहार प्रतिमान का कुल योग बताया है।” वे संस्कृति को जैविक वंशागत नहीं मानते हैं बल्कि वह संस्कृति को सामाजिक अविष्कारों का परिणाम मानते हैं। हर्षकोविट्स ने अपनी पुस्तक ‘मैन एंड हिज वर्क’ (1956) में “संस्कृति को पर्यावरण का मानव निर्मित भाग मानते हैं।” उन्होंने पर्यावरण को दो भागों में विभाजित किया है- प्राकृतिक तथा सामाजिक। उन्होंने सामाजिक पर्यावरण के अंदर मानव निर्मित सभी भौतिक तथा अभौतिक सांस्कृतिक वस्तुओं को रखा है। अमेरिकी मानवशास्त्री ए. एल. क्रोबर ने “संस्कृति को अधिवैयक्तिक एवं अधिसावयवी बतलाया है। अधिवैयक्तिक का तात्पर्य है कि संस्कृति का निर्माण किसी व्यक्ति विशेष ने नहीं किया है, संस्कृति का निर्माण व्यक्ति नहीं वरन समाज से होता है। संस्कृति के अधिसावयवी से तात्पर्य संस्कृति व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात भी अस्तित्व में बनी रहती है। अमेरिकी मानवशास्त्रीय लेसली वाइट तथा रॉबर्ट रेडफोर्ड ने संस्कृति के सांकेतिक दृष्टिकोण पर जोर दिया है। वाइट के अनुसार “संस्कृति एक सांकेतिक तथा निरंतर चयन की जाने वाली गतिशील प्रक्रिया है।” रेडफील्ड (1941) के अनुसार “संस्कृति कला तथा कलात्मक वस्तुओं द्वारा प्रदर्शित परंपरागत ज्ञान का संगठित समूह है”। क्रोबर, मैलीनोवस्की, बेनेडिक्ट तथा रेडफील्ड आदि सभी अमेरिकी मानवशास्त्रियों ने संस्कृति के समाकलन को व्यक्त करने के लिए उसे एक संरूपण के रूप में देखा है। राल्फ लिंटन ने अपनी पुस्तक कल्चरल ‘बैकग्राउंड ऑफ पर्सनालिटी’ (1945) में संस्कृति को मानव द्वारा लिखे हुए व्यवहारों का प्रतिमान माना है”। उनके अनुसार लोगों का जीवन एक चीज है तथा हम क्या अध्ययन करते हैं एवं लिखते हैं वह दूसरी चीज हैं। हम पहले को सच्चाई तथा दूसरे को सच्चाई संबंधी अपना ज्ञान समझ सकते हैं। इस प्रकार पहला पक्ष संस्कृति को प्रस्तुत करता है, तो दूसरा पक्ष संस्कृति के निर्माण को। इस पुस्तक में उन्होंने मौलिक संस्कृति की अवधारणा विकसित की है। उनके अनुसार प्रत्येक समाज की अपनी एक मौलिक संस्कृति होती है, जो उस समाज के सदस्यों के समान व्यवहार प्रतिमानों से प्रदर्शित होती है। श्रीमती रूप बेनेडिक्ट ने अपनी पुस्तक ‘पैटर्न ऑफ कल्चर’ (1934) में संस्कृति प्रतिमान की अवधारणा विकसित की है। उनके अनुसार “संस्कृति को कई खंडों में विभाजित किया जा सकता है। जब वे खंड तथा उप खंड एक निश्चित व्यवस्था में संगठित हो जाते हैं, तब प्रतिमान का निर्माण होता है”। कार्डिनर ने अपनी पुस्तक ‘साइकोलॉजिकल फ्रंटियर ऑफ सोसाइटी’ (1945) में “संस्कृति की अनुकूलनात्मक क्षमता को प्रदर्शित करते हुए ‘मौलिक व्यक्तित्व प्रकार’ की अवधारणा विकसित की है। उनके अनुसार प्रत्येक संस्कृति में अनुकूलन की क्षमता होती है। अनुकूलन प्रतिमान द्वारा मौलिक व्यक्तित्व का विकास होता है।” कोराडु बोआस ने अपनी पुस्तक ‘द पीपल ऑफ एलोर’ (1944) में रूपात्मक व्यक्तित्व की अवधारणा विकसित कर व्यक्तित्व एवं संस्कृति के संबंधों को दर्शाने का प्रयास किया है। परीक्षण तथा अध्ययन के आधार पर उन्होंने एलोरवासियों के ‘रुपात्मक व्यक्तित्व’ को दर्शाने का प्रयास किया है। रूपात्मक व्यक्तित्व का निर्माण संस्कृति के द्वारा होता है। समान सामाजिक संस्थाएं किसी समाज के सभी सदस्यों को समान रुप से प्रशिक्षित कर रूपात्मक व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं। मोरिश ओपलर ने अपनी पुस्तक ‘एन अपाचे लाइफ वे’ (1941) में संस्कृति के लिए लयात्मक पहलुओं को प्रकाश में लाने का प्रयास किया है। उनके अनुसार “प्रत्येक समाज की अपनी-अपनी सांस्कृतिक विशेषता होती है, जो दूसरे से बिलकुल भिन्न होती है। सांस्कृतिक भिन्नता का कारण उनमें पाए जाने वाले भिन्न-भिन्न लय हैं। लय एक प्रकार की प्रेरणा होती है, जो भौतिक तथा अभौतिक दोनों प्रकार की संस्कृतियों को विशिष्ट रुप प्रदान करती है। क्लूखौन (1952) ने सांस्कृतिक तत्वों को दो भागों में विभाजित करने का प्रयास किया है- प्रकट तथा अप्रकट। प्रकट सांस्कृतिक तत्वों का अवलोकन मानव इंद्रियों द्वारा भी कर सकते हैं, जबकि संस्कृति के अप्रकट तत्वों का अवलोकन केवल दक्ष मानवशास्त्री ही कर सकते हैं।

            इस प्रकार परंपरागत मानवशास्त्रियों ने समय-समय पर अपने शोधों एवं खोजों के आधार अपने विचार प्रस्तुत कर संस्कृति को परिभाषित किया है। इसके साथ ही साथ उन्होंने संस्कृति को कभी भौतिक कभी अभौतिक तो कभी प्रकट या अप्रकट इत्यादि भागों में बाटा है। उपरोक्त परिभाषाओं से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि “संस्कृति एक समग्र है जो मानव निर्मित है और उसे मानव सिखने के साथ-साथ अगली पीढ़ी में हस्तातरित भी करता रहता है।” संस्कृति के अंतर्गत ज्ञान, कला, विश्वास, लोकाचार, प्रथाएँ, रीति-रिवाज, सामाजिक मूल्य, नियम-कानून इत्यादि मानवीय व्यवहार तथा इन व्यवहारों को करने के लिए मानवनिर्मित भौतिक उपकरण जैसे- घरेलू उपकरण, वस्त्र, आभूषण, वाद्य-यंत्र, आधुनिक उपकरण, कृषि उपकरण, औद्योगिक उपकरण, शिल्प उपकरण इत्यादि सम्मिलित हैं। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि कला एक ऐसी ही मानव संस्कृति है जिसे मानव ने अपनी कार्यकुशलता अथवा निपूर्णता से निर्मित किया है। कला का क्षेत्र बहुत व्यापक है जिसमें ललित कला से लेकर उपयोगी कला के सभी प्रारूपों को सम्मिलित किया जा सकता है। इसी प्रकार लोक कला भी एक प्रकार की उपयोगी कला है जिसका संबंध अति जनसाधारण समुदाय के विशेष कार्यकुशलता से होता है। यह कार्यकुशलता कोई विशेष व्यक्ति द्वारा सिखाया हुआ नहीं होता है बल्कि वह आदमी अपने जीवन के सुख-दुख, हास-परिहास, भूख-प्यास, जीवन संघर्ष इत्यादि से सिखाता है और उसी जीवन संघर्ष को मन के पूर्ण भाव के साथ एक लय, धुन, ताल, गीत, नृत्य, गाथा, मिथक, नाटक इत्यादि के माध्यम से अपने समाज के लोगों को बताता है, जो उसका खुद का अभिज्ञान होता है। यह अभिज्ञानाता एक व्यक्ति द्वारा शुरू होता है फिर वह सम्पूर्ण समाज, जाति और समुदाय की सांस्कृतिक पहचान और निरंतरता बन जाती है।

मानवशास्त्री संस्कृति को हमेशा समूहवाचक संज्ञा की तरह इस्तेमाल करते हैं, जिसके अंतर्गत मानव समाज की सारी प्रतिकात्मक एवं सीखी हुई चीजों के साथ-साथ गैर जैविक चीजें आती हैं। जैसे- भाषा, प्रथा, विचार, परिपाटी, विभिन्न प्रकार के ज्ञान एवं विज्ञान, समाजिक नियम-कानून इत्यादि। यह संस्कृति ही है, जो मानव समाज को अन्य प्राणियों या नर वानरों से अलग करती है। मानवशास्त्र जैसे विषय में संस्कृति की विशेष महत्ता है, क्योंकि मानवशास्त्रियों का मानना है कि मानव का व्यवहार संभवत सबसे अधिक संस्कृति से निर्धारित होता है। संस्कृति में आनुवांशिक कारकों की महत्ता सबसे कम है। इस तरह की विचारधारा ने संस्कृति के संबंध में बहुत सारे विचारों को को जन्म दिया है। प्रत्येक समाज में किसी न किसी प्रकार की संस्कृति अवश्य पाई जाती है और संस्कृति समयानुसार बदलती भी रहती है। जिसका प्रभाव समाज पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अवश्य पढ़ता है। यही कारण है कि मानवशास्त्र एवं समाजशास्त्र में संस्कृतिक अध्ययन चलता रहता है। मानवशास्त्रियों का उद्देश्य संस्कृति और समाज के बीच के संबंध का अध्ययन करना होता है। समाजशास्त्र में संस्कृति के अर्थ को लेकर थोड़ा मतभेद रहा है। यह मतभेद का बुनियादी कारण यह है कि संस्कृति मुख्य रूप से मानवशास्त्र का विषय है। जहां इसकी परिभाषा को लेकर काफी विवाद रहा है। अधिकांश मानवशास्त्रीयों ने संस्कृति को बहुत ही व्यापक रुप में परिभाषित किया है, जिसकी परिभाषा के अंतर्गत मानव निर्मित सभी भौतिक और अभौतिक चीजें सम्मिलित हैं। ऐसे मानवशास्त्रियों की संख्या बहुत कम है जो मनुष्य की भौतिक उपलब्धियों को संस्कृति का हिस्सा नहीं मानते हैं,  क्योंकि मानवशास्त्रियों ने संस्कृति को विस्तृत रूप से देखने का प्रयास किया है।

            संस्कृति के तत्व के संबंध में विभिन्न विद्वानों के भिन्न-भिन्न विचार हैं। जानसन ने संस्कृति के प्रमुख तत्वों में सबसे पहले ज्ञानात्मक तत्व को रखा है। आदिकाल से लेकर आज तक अनेक प्रकार के समाज हुए हैं, परंतु उन सभी में किसी न किसी प्रकार का ज्ञान अवश्य पाया जाता रहा है। ज्ञान के अभाव में मानव समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। समाज में जितने भी प्रकार के ज्ञान हो सकते हैं वह सभी संस्कृति के अभिन्न अंग है। मानवशस्त्र के साथ समाजशास्त्र, शिक्षाशास्त्र, अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र, एवं विज्ञान के सभी आयामों में ज्ञान होता है, वह सभी ही संस्कृति है। विभिन्न समाजों के बीच ज्ञान के स्तर पर सिर्फ इतना ही फर्क है कि ज्ञान कहीं कम विकसित है, तो कहीं ज्यादा विकसित है। इसलिए ज्ञान संस्कृति का अभिन्न अंग माना गया है। यह ज्ञान ही है जिससे व्यक्ति ने अपनी सांस्कृतिक अभिज्ञानता को जीवित रखा है और पारंपरिक रूप में हस्तांतरित किया है। इसी प्रकार मेटा स्पेन्सर (1976) संस्कृति के तत्व के रूप में सबसे ज्यादा लोक साहित्य (Folklore) पर बल दिया है। प्रत्येक समाज में कुछ ऐसी परंपरागत चीजें होती हैं जो मौखिक स्तर पर जीवित रहती हैं। इनका आधार कोई धर्मग्रंथ नहीं होता है। यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक गीतों, कहानियों, विश्वासों, नृत्यों, नौटंकियों, गाथाओं, कथों, मिथकों तथा लोक रीतियों के द्वारा पहुँचती हैं। बाद में कभी-कभी किसी समाज में इसका स्वरूप लिखित भी जाता है और इस संस्कृति के तत्व स्थानीयता को छोड़कर सार्वभौमिकता को प्राप्त कर लेते है। भारतीय ग्रामीण समाज में प्रचलित विभिन्न प्रकार के जातीय लोक कलाएं  जैसे- धोबी गीत, किन्नर गीत, बिरहा, प्रजापति गीत, चमर-नटुआ, मलहार, कजरी इत्यादि लोक संस्कृति के प्रमुख अंग हैं।

            अतः इन विशिष्ट लोक संस्कृतियों को उनके सांस्कृतिक पहचान और निरंतरता को जानने के लिए मानवशास्त्रियों की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि मानवशास्त्रीय शोध के विभिन्न प्रविधियों के द्वारा अध्ययन किए जाने वाले समुदाय, संस्कृति, समाज एवं व्यक्ति का सम्पूर्ण अध्ययन करता है। जैसा की प्रस्तुत शोध में किया गया है। प्रस्तुत शोध में धोबिया लोककला के माध्यम से धोबी जाति की पहचान, सांस्कृतिक परिवर्तन एवं निरंतरता को ढूँढने का प्रयास किया गया है। इस अध्याय में सबसे पहले धोबी जाति के सामाजिक-सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनैतिक एवं पारंपरिक धोबिया संस्कृति से संबन्धित विभिन्न भौतिक एवं अभौतिक संस्कृति की विस्तृत व्याख्या किया गया है। इसके बाद धोबी समाज में होने वाले विभिन्न सांस्कृतिक परिवर्तनों का धोबिया लोककला के माध्यम से विश्लेषण किया गया है। मानवशास्त्रीय विश्लेषण से यह निष्कर्ष निकलता है कि धोबी जाति उत्तर-प्रदेश राज्य के पूर्वाञ्चल क्षेत्र में रहने वाली एक ऐसी जाति है जो लोक संस्कृति और सांस्कृतिक सम्पदा में धनी है और यह जाति इस अनूठी कला को अपनी अभिज्ञानता का द्योतक मानती है, जिसे वह निरंतरता के रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित भी कर रही है। धोबिया सांस्कृतिक के सामाजिक मूल्य केवल धोबी जाति के लोग ग्रहण नहीं कर रहे हैं, बल्कि स्थानीय पारिस्थितिकी में रहने वाले अन्य समाज के लोग भी सीख रहे हैं क्योंकि उस समाज के सदस्य हैं।

 

धोबी जाति का इतिहास:

            धोबी भारत में पाये जाने वाले एक अन्त्यज वर्ण या मध्यम जाति समूह हैं जिनका मुख्य कार्य कपड़े धोने, रंगने एवं इस्त्री करने से संबंधित माना जाता है। धोबी शब्द की उत्पत्ति हिन्दी भाषा के ‘धोना’ तथा संस्कृत भाषा के ‘धव’ धातु से माना जाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘साफ करना अथवा कपड़े धोना है। इस जाति की उत्पत्ति से संबंधित कोई लिखित साक्ष्य नहीं मिलते है। विभिन्न पुस्तकों एवं विद्वानों के द्वारा यही सुनने को मिलता है कि भारतीय जातीय परंपरा में शूद्र वर्ण के कुछ लोग उच्च जाति मलीन वस्त्रों को धोने का कार्य करते थे, जिन्हें व्यावसायिक आधार पर ‘धोबी’ शब्द से संबोधित किया जाता था। कालांतर में इस समूह का बिखराव होता गया जिसका परिणाम यह हुआ कि इस समूह को धोबी जाति का नाम प्राप्त हुआ और विभिन्न क्षेत्रों में रहने के कारण इन्हें स्थान के आधार पर सम्बोधन प्राप्त हुआ। वर्तमान समय में इन्हें भारत के अलग-अलग राज्यों में भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है, जैसे- रजक, मालवीय, दिवाकर, श्रीवास इत्यादि। विभिन्न स्थानों पर निवास करने के कारण भी इन्हें भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा जाता है, जैसे- वाननार, मादीवाला, अगसार, पारित, राजका, चकली, राजाकुला, वेलुत्दार, एकली, सेठी, कनोजिया, पणिक्कर, बेरार, मद्रासी, बुंदेलखंडी, निमारिया, धर्मपुरुया एवं उदयपूरिया आदि।

            भारतीय जजमानी प्रथा के अंतर्गत धोबी जाति का स्थान अति महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि धोबी जाति की सामाजिक स्थिति का निर्धारण जजमानी प्रथा के आधार पर  होता है। वाइजर (1935) ने जजमानी प्रथा को उच्च जाति एवं निम्न जाति के बीच सामंजस्य स्थापित करने वाला कारक बताया है क्योंकि जजमानी प्रथा में निम्न जाति, उच्च जाति के लिए यजमान की भूमिका निभाते हैं और निम्न जाति उच्च जाति केलिए कुलीन की भूमिका निभाते हैं। इस संबंध में दोनों वर्ग एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं जिसके कारण दोनों की सामाजिक आवश्यकताएँ पूर्ण होती हैं। वाइजर ने धोबी जाति के संबंध में बताते हुए कहा है कि यह जाति उच्च जाति के मलीन कपड़ों को साफ करने का कार्य करती है, जिसके परिणाम स्वरूप धोबी जाति को अपने जीवन निर्वाह केलिए भौतिक सामग्रियाँ प्राप्त होती हैं। धोबी जाति कि उत्पत्ति भी इसी कार्य को करने वाले के रूप में मानी जाती है, क्योंकि इस जाति कि उत्पत्ति से संबंधित कोई लिखित इतिहास अथवा साक्ष्य उपलब्ध नहीं मिलते हैं। रसेल और हिलालाल (1916) ने भी धोबी जाति को ‘धोने वाला समुदाय’ के रूप में परिभाषित किया है। इस प्रकार धोबी जाति की सामाजिक स्थिति में जजमानी प्रथा महत्वपूर्ण मानी जाती है। धोबी जाति अपने जजमानी प्रथा में  गाँव के उच्च जाति के लोगों के कपड़ों को धोने का कार्य करती है। कपड़े धोने का कार्य करने के कारण इस जाति को स्थानीय सामाजिक स्तरीकरण में सम्मानजनक स्थान प्राप्त होता है। वैसे तो यह जाति भारतीय संविधान के अनुसार अनुसूचित जाति के अंतर्गत आती है। उत्तर-प्रदेश के पूर्वाञ्चल क्षेत्र में रहने वाली धोबी जाति में भी वर्तमान समय में जजमानी प्रथा देखने को मिलती है जिसमें धोबी जाति के अधिकांश जनसंख्या इससे अपना जीवन निर्वाह कर रही है।

            धोबी जाति का पारिवारिक संगठन संयुक्त एवं एकल प्रकार का होता है। चूंकि कृषिगत संपत्ति का लगभग अभाव होता है, इस कारण इस जाति के लोग संयुक्त परिवार में रहना ज्यादा पसंद करते हैं। परंतु आज के वर्तमान समय में इस जाति पर आधुनिकता एवं पश्चिमीकरण का प्रभाव पड़ा है जिसके कारण इस जाति में भी एकल परिवार का स्वरूप देखने को मिलता है। ऑस्कर लेविस (1958) ने धोबी जाति के परिवार को लघु संयुक्त परिवार कहा है क्योंकि इनका आकार बहुत छोटा होता है और इन्हें समूह में रहकर अपने कार्य करने में ज्यादा सहूलियत होती है। धोबी जाति में विवाह हिन्दू धर्म के अनुसार रचाया जाता है क्योंकि धोबी जाति का संबंध भी हिन्दू धर्म से ज्यादा नजदीक माना जाता है। इसका दूसरा कारण यह है कि धोबी जाति ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य वर्ण के लोगों का वस्त्र साफ करती है और ये लोग ही इसके सबसे ज्यादा नजदीक होते हैं। गाँव में इनका संबंध पिछड़ी जाति (मल्लाह, बिन्द, कोयरी, यादव, कुर्मी, प्रजापति, तेली इत्यादि) के लोगों से ज्यादा होता है और पिछड़ी जाति के समाज में विवाह का स्वरूप हिन्दू धर्म से सम्पन्न होता है। यही कारण कारण है कि धोबी जाति में भी विवाह का स्वरूप हिन्दू रीति-रिवाज से सम्पन्न होता है। धोबी जाति में विवाह अंतर्जातीय होता है क्योंकि इस जाति के लोग पाने ही जाति में विवाह करते हैं। मुस्लिम धोबी में विवाह मुस्लिम धर्म के अनुरूप करते हैं। मिर्ज़ापुर और गाजीपुर जिले में रहें वाली धोबी जाति पूर्णतः हिन्दू जाति को मानती है और इस धर्म के रीति-रिवाज से अपने विवाह सम्पन्न करती है। धोबी जाति के लोग अपने विवाह के कार्यक्रमों में अपने लोककला ‘धोबिया’ को भी प्रदर्शित करते हैं। इसके साथ ही साथ महिलाएं विवाह के कुछ दिन पहले से ही घर में गीत और संगीत गाती हैं तथा रात्री में विभिन्न रूप मानकर घर में आए मेहमानों को डरती और हसती हैं। महिलाएं पुरुषों का रूप धर कर नृत्य करती हैं। इसके बाद विवाह के समय माड़ो में दूल्हे और अतिथियों के स्वागत में गारी गीत गाती हैं, जो हास्यप्रद होता है। धोबी जाति के नातेदारी का स्वरूप भी हिन्दू रीति पर आधारित होता है। प्रस्तुत शोध लेख में धोबिया संस्कृति अर्थात धोबी जाति के देशज संस्कृति में व्याप्त संस्कृति के तत्वों को विश्लेषित करने का प्रयास किया गया जिसे उत्तर-प्रदेश के मिर्ज़ापुर और गाजीपुर जिले में निवास करने वाले धोबी समाज में देखा जा सकता है।

धोबिया संस्कृति के सांस्कृतिक तत्वों का विश्लेषण:

            संस्कृति के तत्व के संबंध में विभिन्न विद्वानों विभिन्न विचार दिए हैं। समाजशास्त्रीय जानसन ने किसी समाज के संस्कृति के तत्वों को ज्ञानात्मक, विश्वास, मूल्य एवं मानदंड तथा संकेत के तत्वों में विभाजित करके समझने का प्रयास किया है। इनका कहना है कि किसी भी समाज के संस्कृति में इन सभी तत्वों का समेश होता है जिसे अवलोकन के आधार पर देखा जा सकता है। इसके अलावा मेटा स्पेन्सर (1976:55) ने संस्कृति के तत्वों को थोड़ा अलग ढंग से प्रस्तुत किया है, जिसमें प्रतीक, मूल्य, मानदंड, लोकसाहित्य, कानून एवं विचारधारा के रूप में उस समाज में परिलक्षित होता है। किसी समाज, जाति अथवा समुदाय के संस्कृति के तत्व उस स्थानीय पारिस्थितिकी में उस समाज के सांस्कृतिक पहचान, जीवन-संघर्ष, निरंतरता एवं अभिज्ञानता को प्रदर्शित करते हैं। प्रस्तुत शोध में शोधार्थी ने अपने शोध क्षेत्र एवं निवासियों के बीच अर्धसहभागी अवलोकन करते हुए धोबी जाति के समाज में प्रचलित विभिन्न सांस्कृतिक विविधताओं का अध्ययन किया है तथा सूचनादाताओं के साक्षात्कार के माध्यम और एमिक दृष्टिकोण के सहारे धोबी जाति के विभिन्न सांस्कृतिक तत्वों को निम्नलिखित भागों में वर्गीकृत करते हुए, उस समाज में विभिन्न संस्कृति के तत्वों को विश्लेषित करने का प्रयास किया गया है। यह वर्गिकरण स्थानीय समुदाय के सहयोग से ही किया गया है।–

ज्ञानात्मक तत्व (Cognitive Elements):

            आदिम काल से लेकर आज तक जीतने भी समाज हुए उन सभी में किसी-न-किसी प्रकार का ज्ञान पाया जाता रहा है। इसीलिए ज्ञान के अभाव में किसी समाज की कल्पना नहीं किया जा सकता है। इसी प्रकार धोबी जाति में भी उनके सांस्कृतिक तत्व के रूप में ज्ञान का माध्यम होता है जो उस के सांस्कृतिक पहचान और निरंतरता के रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ीहस्तांतरित होता है। धोबिया संस्कृति एक ऐसी संस्कृति है जिसमें गीतों, कथाओं एवं गाथाओं के मध्यम से ऐतिहासिक, उद्विकासीय, पौराणिक, जातीय जीवन संघर्ष, पारिवारिक संरचना, पारिवारिक विघटन, रीति-रिवाज एवं प्रथाओं को बच्चों में संचारित करते हैं। शोधार्थी ने विभिन्न धोबिया गीतों एवं कथाओं का संग्रह किया है। धोबिया लोककलाकार द्वारा सुनाए गए एक लोकगीत में पौराणिक ज्ञान की झलक देखने को मिलती है। -

बजावे भोला डमरू धीरे-धीरे॥

आगे-आगे शंकर चले पीछे-पीछे बैला॥

पर्वत पर पार्वती चले धीरे-धीरे॥

बजावे भोला डमरू धीरे-धीरे॥

आगे-आगे राम चले पीछे-पीछे लक्षमन॥

बिचवे में सीता चले धीरे-धीरे॥

बजावे भोला डमरू धीरे-धीरे॥

आगे-आगे कृष्ण चले पीछे बलदाऊ॥

बिचवे में राधा चले धीरे-धीरे॥

बजावे भोला डमरू धीरे-धीरे॥

काशी में गंगा में बहे मथुरा में जमुना॥

अयोध्या में सरजू बहे धीरे-धीरे॥

बजावे भोला डमरू धीरे-धीरे॥

आगे-आगे गुरु चले पीछे-पीछे चेला॥

बिचवे में श्रद्धा चले धीरे-धीरे॥

बजावे भोला डमरू धीरे-धीरे॥

            इस धोबिया लोकगीत में पौराणिक देवी देवताओं की जानकारी मिलती है। इसके साथ ही साथ पौराणिक स्थानों पर बहने वाली पवित्र नदियों की जानकारी मिलती है। अंत में यह भी दर्शाया गया है कि गुरु का स्थान सबसे ऊपर होता है और उसके पीछे शिष्य है जो गुरु के द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलता है। धोबिया लोक संस्कृति में धोबी जाति के जातीय जीवन संघर्ष कि जानकारी भी मिलती है। धोबी अपने जीवन के सम्पूर्ण दैनिक कार्य को गीतों के रूप में भी गाता है, जिससे उसके जीवन संघर्ष और जातिगत व्यवसाय जानकारी मिलती है।

विश्वास (Beliefs):

            विश्वास एक ऐसा शब्द या पद है जिसका इस्तेमाल तकनीकी रूप से, अव्यवस्थित रूप से और दृढ़ता के रूप में किया जाता है। परंतु सामान्यतः ये मनुष्य के कुछ अनदेखे भावनात्मक गतिविधि के रूप में जाना जाता है। प्रत्येक समाज में विभिन्न चीजों के बारे में विभिन्न विश्वास विद्यमान रहता है, जो उस समाज के सामाजिक एवं धार्मिक जीवन को प्रदर्शित करता है। धोबिया संस्कृति में धोबी जाति के लोगों में अपने जातिगत व्यवसाय को लेकर सबसे अधिक विश्वास देखने को मिलता है। इनका यह कार्य जजमानी प्रथा पर आधारित होता है जो सम्पूर्ण जीवन को संचालित करता है। धोबी जाति का दूसरा सबसे बड़ा संबंध घाट से होता है, जहाँ धोबी कपड़ों को धोता है। जैसे एक धोबी जाति कि महिला से पूछने पर पता चला कि घाट धोबी जाति के लिए एक पवित्र जगह होता है जहाँ वे किसी प्रकार की गंदगी करना पसंद नहीं करते हैं। उनका विश्वास है कि घाट पर नदी-तालाब के देवी-देवता निवास करते हैं। इसलिए जब वे सुबह घाट पर पहुँचते हैं तो सबसे पहले घाट के देवी-देवता की पुजा करते हैं और उनसे यह विनती करते हैं कि उन्हें नदी-तालाब के जानवरों से बचाएं।

            मिर्ज़ापुर और गाजीपुर में शोध कार्य करते हुए यह भी देखा गया कि धोबी जाति के लोग हिन्दू धर्म से सबसे अधिक प्रभावित हैं। इस क्षेत्र में जादू-टोने के प्रति भी धोबी जाति में अटूट विश्वास देखा गया है। शोधार्थी को धोबी जाति के कुछ ओझा और सोखा भी मिले जिनका कार्य जादू-टोने के प्रभाव को कम करना था बढ़ाना था। मिर्ज़ापुर जिले में अमदहा गाँव में मंगरु धोबी जो एक ओझा के रूप में जाने जाते हैं। उनसे वार्ता-लाप करने से पता चला कि धोबी समाज में जादू-टोना, टोटका, नजर-गुजर, टोना-टमान, करवाई, बैठाव, डीह छेकई इत्यादि विश्वास के रूप में प्रचलित हैं। जबकि सभ्य समाज में यह क्रिया-कलाप अंध-विश्वास के रूप माना जाता है। यहाँ यह भी देखने को मिलता है कि प्रत्येक धोबी जाति के घर में उनके अपने देवी-देवता हैं, जैसे सम्यई माई, टेडुया बाबा, शारदा माई, चौरा बाबा, डीह बाबा इत्यादि।

 

मूल्य एवं मानदंड (Values and Norms):

            प्रत्येक समाज के अंतर्गत कुछ ऐसे मूल्य होते हैं जो उस समाज के सदस्यों के जीवन के मुख्य उद्देश्य होते हैं और वह समाज कभी भी नहीं चाहेगा कि उसके मूल्य टूटे। जीवन के उद्देश्य मात्र को ही मूल्य नहीं कहा जाता है, बल्कि व्यक्ति के आचरण के नियम को भी मूल्य कि श्रेणी में रखा जाता है। साधारण भाषा में यह कहा जा सकता है कि वैसे नियम जिसे स्थानीय समाज कभी टूटने नहीं देना चाहता है, उन्हीं नियमों को ही सामाजिक मूल्य कहा जाता है। धोबी समाज भी एक ऐसा समाज है जो अपने मूल्यों को आज भी बनाए हुए है। मिर्ज़ापुर और गाजीपुर जिले में रहने वाले धोबी समाज में नातेदारी के संबंधों जैसे माता-पिता, दादा-दादी, भाई-बहन, जीजा-साली, सास-पतोह इत्यादि के प्रति आचरण का भाव देखने को मिलता है। यही कारण है कि धोबी समाज में आज भी संयुक्त परिवार का अस्तित्व देखने को मिला, जिसका विवरण ग्राफ के माध्यम से प्रस्तुत किया जा सकता है। 

ग्राफ: मिर्ज़ापुर-गाजीपुर जिले में एकल एवं संयुक्त परिवार कि स्थिति

            एक धोबी का सम्पूर्ण जीवन ही उसके सामाजिक मूल्यों का सर होता है क्योंकि धोबी समाज की सामाजिक व्यवस्था जजमानी व्यवस्था पर आधारित होती है, जिसमें परिवार के सभी सदस्य अपनी-अपनी बराबर भूमिका निभाते हैं। धोबी अपने बच्चों में भी इन्हीं मूल्यों को सीखते हैं। इनके मूल्यों में एक अद्भुत व्यवस्था यह भी देखने को मिलती है कि धोबी समाज में धोबिया लोककलाकारों के प्रति विशेष सम्मान होता है। यही कारण है कि इनके जातीय पंचायत में इन कलाकारों के बातों एवं विचारों को सराहा जाता है। इस जाति की कोई निश्चित राजनैतिक व्यवस्था नहीं होती है, परंतु छोटे-मोटे विवाद एवं संगोष्ठी-समारोह में इनकी बैठक होती है, जिसमें धोबिया कलाकारों के बातों को सुना जाता है और उनके सुझावों को माना जाता है। शोधार्थी ने अपने शोधकार्य में प्रायः ऐसी बैठकों को देखा और भाग लिया था, जिसमें धोबी जाति के बुजुर्ग पुरुष एवं महिलाओं के द्वारा बताए जाने वाले मानवीय आचरणों के संबन्धित होते थे। यह बैठक प्रायः शाम अथवा रात्री में आयोजित होती थी। जहाँ धोबी समाज के सभी सदस्य मनोरंजन के लिए एकत्रित होते थे। इस मनोरंजे के माध्यम से बुजुर्ग व्यक्ति बच्चों को अपने समाज के मूल्यों को बताता था। इनके बताने का माध्यम समान्यतः गीत अथवा कहानी होता था। जैसे एक बार एक व्यक्ति ने ‘श्रवण कुमार’ की कहानी सुनाई, जिसमें श्रवण कुमार के माता-पिता के प्रति आदर एवं प्रेम की शिक्षा मिलती है। इसे उस व्यक्ति ने गाथा के रूप में सुनाया था।

रानी कामिल मंडी जाय वोही कोहरा के द्वार,

एक हड़िया दे बनाय खीर पकाने के लिए ,

एक मोहरा दिखाई दुठे पेट हो बनाई,

एक में खट्टी दुज में मीठी खीर पकाने के लिए,

मीठी खीर खुद है खाई खट्टी अंधी-अंधा को खिलाई,

अंधी-अंधा करे विचार सरवन सुनला ई पुकार,

आपन थरिया देहलन टार खीर खिलाने के लिए,

अंधी-अंधा करे पुकार सरवन तीरथ दे घुमाई,

तिरिया देहलन ले पहुचाइ कावर लेहलन वो बनवाई,

माता-पिता को कंध उठाय तीरथ कराने के लिए,

गंगा-जमुना है नहवाई तबे गईली नर्मदा नियराई,

माता-पिता को नीर पिलाने के लिए,

कमंडल लिए वो लटकाय दौडल गईलन सरजू तीरवा नीर पिलाने के लिए,

जिस दम बोले कमंडल बाय,

दशरथ मारे तान के बान मृगा जानके लिए,

जिस दम लगा बान सरवन राम-राम दुहराई।

            प्रस्तुत धोबिया गीत एक गाथा के रूप में प्रचलित है जिसे इस उद्देश्य से सुनाया जाता है कि बच्चों में श्रवण कुमार के जैसे गुण का संचार हो क्योंकि श्रवण कुमार मातृ-पितृ भक्त थे। इस प्रकार के अनेकों गीत, कहानियाँ, कथाएँ एवं गाथाएँ धोबी समाज में मूल्यों का संचार करते हैं।

            मूल्य की तरह ही मानदंड किसी समाज के ऐसे नियम होते हैं जिसका उद्देश्य उस समाज के नियम-कानून को हमेशा बनाए रखाता है और जो भी इस नियम का उलंघन करता है, उसे वह समाज दंडित करता है। यदि कोई इन नियमों का पालन करता है तो उसे समाज द्वारा प्रशंसा अथवा पुरस्कार मिलता है। ऐसी ही नियम-क़ानूनों को समनर (1906) ने लोकाचार (Mores) कहा है जो किसी समाज की आत्मा भी मानी जाती है। ‘मानदंड ऐसे नियम होते है जो विशिष्ट पारिस्थितिकी में कैसे व्यवहार करे इसका निर्धारण करता है’। (स्पेन्सर, 1976) इसी प्रकार धोबी समाज में सामाजिक मानदंडों का विशेष महत्व देखने को मिलता है। वर्तमान आधुनिकता और वैश्वीकरण के दौर में धोबी जाति अपने मानदंडों जैसे शादी-विवाह, धार्मिक विश्वास (घाट एवं पूर्वजों के प्रति) एवं प्रथाओं एवं रीति-रिवाजों को मानदंड के रूप में प्रदर्शित एवं संचालित कर रही है। आज भी धोबी जाति में विवाह अंतर्जातीय होता है तथा अपने निकट के संबंधियों जैसे भाई-बहन (चचेरे, ममेरे, फुफेरे, मौसेरे इत्यादि) के बीच नहीं होता है।

लोकसाहित्य (Folklore):

            प्रत्येक समाज में कुछ ऐसी परंपरागत चीजें होती हैं जो मौखिक स्तर पर जीवित रहती हैं। इनका आधार कोई पौराणिक धर्म ग्रंथ नहीं होता है। यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक गीतों, कथाओं, कहानियों, लोकोक्तियों एवं पहेलियों के माध्यम से चलती जाती हैं। बाद में कभी-कभी किसी समाज में इनका स्वरूप लिखित भी हो जाता है। लोकसाहित्य का सीधा संबंध मौखिक परंपरा से माना जा सकता है। पूर्वाञ्चल में मिर्ज़ापुर एवं गाजीपुर जिले में निवास करने वाली धोबी जाति में एक ऐसी ही मौखिक परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है जिसे धोबिया लोककला के नाम से जाना जाता है। यह लोककला ही इस संस्कृति का सबसेप्रमुख तत्व है। धोबिया लोकसाहित्य के रूप में प्रचलित धोबिया लोककला के अनेक रूप देखने को मिलते हैं, जैसे- गीत, नृत्य, गाथाएँ, कथाएँ, कहानियाँ, मुहावरें, वस्त्र-आभूषण एवं लोकोक्तियाँ इत्यादि। धोबिया लोक कला के विभिन्न स्वरूपों को पंचम अध्याय के अंतर्गत धोबी जाति का अवलोकन के अंतर्गत प्रस्तुत किया जा चुका है। धोबिया लोक साहित्य का उद्देश्य धोबी समाज में जातीय जीवन संघर्ष को प्रस्तुत करना है। धोबी जाति का जीवन संघर्ष ही इनके पूरे समाज के सांस्कृतिक पहचान, निरंतरता एवं सांस्कृतिक परिवर्तन को प्रदर्शित करता है।

विचारधारा (Ideology):

            प्रत्येक समाज के अंतर्गत विभिन्न प्रकार की मान्यताएँ पायी जाती हैं। विचारों में भिन्नता के कारण ही विभिन्न संस्कृतियों एवं समाजों के बीच पर्याप्त विभेद दिखाई पड़ता है। कभी-कभी एक धर्म के अंतर्गत बहुत शाखाएँ दिखाई देती हैं। ये सभी विभिन्न विचारों के सूचक होते हैं। विचारों की विभिन्नता सिर्फ धर्म में ही नहीं होती हैं, बल्कि यह साहित्य, कला अथवा वैज्ञानिक चिंतन के स्तर पर भी पायी जाती हैं। (सिंह,2009) धोबी जाति का संबंध एक विशेष लोककला से है जिसे धोबिया लोककला कहा जाता हैं, जो धोबी समाज में एक विचारधारा के रूप में परिलक्षित होता है। धोबी जाति की पारंपरिक कला का नामकरण ही इस जाति के नाम पर हुआ है- ‘धोबिया’। ‘धोबिया’ कोई सामान्य शब्द नहीं है बल्कि एक विचार है जो पूर्वाञ्चल के सभी धोबी जाति में परिलक्षित होता है। जिसे निम्नलिखित आधार पर समझा जा सकता है।-

धोबी जाति + जीवन शैली = धोबी जाति की जीवन शैली

धोबी जाति की जीवन शैली + व्यवहारों का भिन्न प्रकार से प्रदर्शन = धोबिया लोक व्यवहार

धोबिया लोक व्यवहार + एक अलग सांस्कृतिक अभिज्ञान का विचार = धोबिया विचारधारा

इस प्रकार धोबिया लोक संस्कृति का सबसे प्रमुख हिस्सा धोबिया विचारधार भी है क्योंकि यह विचारधारा किसी एक से जरूर उत्पन्न हुई हो सकती है है लेकिन आज पूर्वाञ्चल के सभी धोबी जाति में परिलक्षित हो रही है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह भी है की आज धोबी जाति के के लोग अपनी संस्कृति के तत्वों को प्रदर्शित करने के लिए अपने नाम के साथ ‘धोबी’ लिखते हैं। शोध क्षेत्र में विभिन्न सूचनादाताओं जैसे मंगरु धोबी, बचाउ धोबी, पुनवासी धोबी, जियावान धोबी इत्यादि से साक्षात्कार लिया गया था। जब इनसे नाम पूछा गया तो उन्होंनें अपने नमके साथ धोबी जोड़कर बताया। उसने पूछने पर यह सुनने को मिला कि धोबी उनकी पहचान है जो उनके पूर्वजों एवं महापुरुषों के अद्वितीय विचार का द्योतक है। अतः शोधार्थी ने धोबिया संस्कृति के तत्व में सबसे अंतिम और महत्वपूर्ण तत्व के रूप में धोबिया विचारधारा को रखा है और विश्लेषित करने का प्रयास किया है।

संदर्भ सूची:

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  • John Poggie, & Richard B. Pollanoc. (2004). Dangerand rituals of avoidance among New England.
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  • दास, भगवान एवं सिंह, सतनाम. (2011). “धोबी समाज का संक्षिप्त इतिहास”. दिल्ली: सम्यक प्रकाशन.
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  • द्विवेदी, हजारी प्रसाद. जनपद पत्रिका. अंक -1 पृ. 65
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  • लोक साहित्य मौखिक परंपरा है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती है। (बदरीनारायण,)
  • त्रिपाठी, सूर्यकांत. (2013). “लोक का अवलोकन”.दिल्ली: आर्य प्रकाशन.

 

[1] पी-एच. डी. शोधार्थी, मानवविज्ञान विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र)

  ईमेल- shiv.anthro@gmail.com, मो.- 9807119455.