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जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

बाधाओं को पछाड़ती दलित प्रतिभा (जूठन भाग-2): रितु अहलावत [शोध आलेख]

बाधाओं को पछाड़ती दलित प्रतिभा

(जूठन भाग-2)

रितु अहलावत

गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय

दूरभाष- 9716744897

 

          ‘दलितअर्थात दबा, कुचला, रौंदा हुआ, शोषित, पीड़ित इत्यादि। यह सब स्थितियाँ दलित द्वारा स्वउत्पादित नहीं हैं बल्कि सवर्ण या ब्राह्मणवादी मानसिकता से पीड़ित समाज द्वारा उत्पन्न की गयी हैं। दलित व्यक्ति जो जीवन की सभी प्रकार की आधारभूत आवश्यकताओं से वंचित रहा है, जब किसी प्रकार शिक्षा हासिल कर अपनी योग्यता व् प्रतिभा को बढ़ाने का प्रयास करता है तो जातिवादी विचारधारा से ग्रसित लोग उसे उसकी जाति याद दिलाना नहीं भूलते हैं। कदम-कदम पर एक शिक्षित दलित को यह ऐहसास करवाया जाता है कि उसकी जाति क्या है और उसके लिए किस प्रकार के कार्य करना उचित है। कुछ इसी प्रकार की स्थिति नजर आती है ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथाजूठनके दूसरे भाग में। जूठन का पहला भाग 1997 में प्रकाशित हुआ था जिसमें ओमप्रकाश जी ने उनके विद्यार्थी जीवन से लेकर नौकरी पाने तक के जीवन में होने वाली जाति आधारित त्रासदी को उल्लेखित किया था। इस आत्मकथा का दलित साहित्य जगत में अद्वितीय स्थान माना जाता है। जूठन आत्मकथा लिखने के साथ-साथ अन्य साहित्यिक विधाओं में भी अपनी लेखनी के माध्यम से ओमप्रकाश जी आन्दोलनकारी उपस्थिति दर्ज करवाते रहे। दलित साहित्य जगत में सक्रीय एवं महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वालों में ओमप्रकाश वाल्मीकि जी ने विशेष स्थान प्राप्त किया है। जूठन नामक आत्मकथा का दूसरा भाग ओमप्रकाश वाल्मीकि जी के इस दुनिया से विदा लेने के बाद प्रकाशित हुआ। उनकी पत्नी चंदा के प्रयासों से इस आत्मकथा की पाण्डुलिपि प्रकाशक तक पहुंची। इस आत्मकथा में वाल्मीकि जी ने यह स्पष्ट किया है कि एक पढ़े-लिखे नौकरी प्राप्त दलित के साथ उसके कार्यस्थल पर किस प्रकार का व्यवहार किया जाता है। इसके साथ ही यदि वह एक साहित्यकार भी है तो उसके साहित्यिक जीवन पर उसकी जाति का कितना और कैसा प्रभाव पड़ता है।

          दलित साहित्य को मानवीय जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ती से पिछड़े अस्सी प्रतिशत लोगों का साहित्य कहा जाता है। वहीं जूठन आत्मकथा का दूसरा भाग उन मुट्ठी भर प्रतिष्ठा प्राप्त दलितों का जीवन संघर्ष दर्शाता है जो अभावों की स्थितियों को झेलकर भी शिक्षा प्राप्त कर लेते हैं और उच्चपदाधिकारी बन पाते हैं। इन कार्यालयों में कुछ जातिवादियों द्वारा उनके साथ जाति आधारित व्यवहार किया जाता है तथा उन्हें उनकी प्रतिभा के अनुसार कार्यभार और उपाधि नहीं दिए जाने का प्रयास किया जाता है। इसके साथ ही उनकी योग्यता पर भी संशय किया जाता है। इसी प्रकार के अनेकों मुद्दों को स्पष्ट रूप से इस आत्मकथा में देखा जा सकता है। इस आत्मकथा का मजबूत पक्ष यह है कि इसमें प्रत्यक्ष प्रमाण मिलता है कि दलित व्यक्ति के लिए स्थितियां चाहे कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, वह अपनी प्रतिभा, योग्यता और सूझ-बूझ के माध्यम से अपनी राह के कांटे हटाने में सक्षम हो सकता है। इस राह में वह अकेला नहीं है बल्कि स्वयं वे सवर्ण जो जातिवाद के पक्षधर न होकर प्रतिभा के पक्षधर हैं एक दलित को आगे बढने के लिए निरंतर प्रोत्साहित करते हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो इस आत्मकथा का अपना अलग ही महत्व हो जाता है क्योंकि इसमें सवर्ण वर्ग केवल शोषक के रूप में नहीं बल्कि सहायक के रूप में भी नजर आता है। यह आत्मकथा शिक्षित दलित वर्ग के जीवन जगत में आने वाली समस्याओं एवं उलझनों को उजागर करती है। पढ़े-लिखे नौकरीपेशा दलितों को केवल कार्यस्थलों पर केवल शोषित ही नहीं होना पड़ता है बल्कि सवर्णों के सहयोग से वे उचित उपाधि भी पाने में सफल रहते हैं।

          आत्मकथा की शुरुआत होती है वाल्मीकि जी का देहरादून में तबादला होने की घटना से। वे अपने सास-ससुर के शहर में आकर बेहद खुश थे परन्तु इस शहर का व्यवहार पढ़े-लिखे और अच्छी नौकरीपेशा दलित के प्रति भी कितना रूढ़िवादी है यह देखकर वे दंग रह जाते हैं। दरअसल वे अपने और अपनी पत्नी के लिए एक किराए का मकान ढूंढ रहे थे। देहरादून के मकान मालिकों की जातिवादी मानसिकता के चलते उन्हें काफी समय तक कोई मकान किराए पर नहीं मिल पा रहा था। वे सबसे पहले ओमप्रकाश जी से उनकी जाति पूछते और जाति ज्ञात होते ही मकान किराय पर देने से साफ़ इनकार कर देते।मकान मालिक साफ़ शब्दों में कहते थे, “ना जी, किसी चूहड़े-चमार को हम मकान नहीं देंगे।इस उत्तर पर उलटे पाँव लौटना पड़ता था।1 यहाँ महानगरों में भी दलितों के साथ किया जाने वाला जातिवादी व्यवहार साफ़ नजर आता है। अपनी इस स्थिति पर वाल्मीकि जी स्वयं को हीन मानने के स्थान पर महानगरीय समाज की ऐसी रुढ़िवादी सोच पर लानत जताते हुए बोले- “यदि आधुनिक कहे जाने वाले पढ़े-लिखे लोगों के इस शहर देहरादून की यह हालत है तो छोटे शहरों में तो दलितों को मकान मिलने का सवाल ही पैदा नहीं होता है। मेरे जैसे पढ़े-लिखे व्यक्ति को यदि यह शहर स्वीकार करने को तैयार नहीं तो शर्मिंदा मुझे नहीं इस शहर को होना चाहिए।2 यहाँ एक दलित का स्वाभिमानी रूम नजर आता है जो अपनी सच्चाई को छिपाए बिना दुनिया के समक्ष अपनी वास्तविकता के साथ खड़ा है। वे अपनी जाति छिपाकर या झूठ बोलकर किराए का मकान हासिल करने के पक्ष में नहीं थे और न ही भारतीय जाति आधारित मानसिकता के समक्ष घुटने टेकना चाहते थे।

          ओमप्रकाश जी को इस प्रकार का व्यवहार केवल समाज द्वारा ही नहीं मिला बल्कि वे नौकरी में जहाँ भी तबादला होकर जाते वहाँ उन्हें जानने से पहले लोग उनकी जाति को पहचान लेते। जब वे देहरादून आर्डनेंस फैक्ट्री में तबादला होकर गए तो उस समय का अनुभव वे कुछ इस प्राकर अभिव्यक्त करते हैं- “मैं एक सम्मानित पद पर इस फैक्टरी में आया हूँ, वह भी एक विशिष्ट योग्यता के साथ। यह बात लोगों के गले ही नहीं उतर रही थी। वे इसे आरक्षण द्वारा मिलने वाली सुविधाओं से जोड़कर देख रहे थे। मेरी पढ़ाई-लिखाई, प्रशिक्षण, अनुभव के बारे में वे जानने की कोशिश भी नहीं कर रहे थे।3 इसके पश्च्यात उनके साथ जाति आधारित व्यवहार किया जाने लगता। जातिवादी मानसिकता से पीड़ित उनके प्रभारी जेठी जी उनकी योग्यता पर शक करते थे। वे उन्हें काम के विषय में चुनौती देते हुए बताते हैं कि यहाँ जो डिज़ाइन बनाये जाते हैं उनमें बहुत दिमाग लगाना होता है, जो उनके अनुसार संभवत: दलितों के पास नहीं होता। उनके इस व्यवहार के विषय में वाल्मीकि जी लिखते हैं- “दरअसल वह मेरी योग्यता को मेरी जाति के साथ जोड़कर देखने के लिए अभिशप्त थे, जो उनके प्रत्येक शब्द से झलक रहा था।4 एक दलित में इस प्रकार के कार्य को करने की प्रतिभा होगी यह जेठी जी मानने को तैयार नहीं थे। वाल्मीकि जी ने उनके द्वारा दिए गये काम को चुनौती के रूप में स्वीकारा। अपनी प्रतिभा और लगन के माध्यम से दो से तीन दिनों में पूर्ण होने वाले काम को एक ही दिन में पूरा कर दिखाया। उनके काम करने के इस जज्बे और विचारों से प्रसन्न होकर उनके बौस पद्मनाभन जी ने आदेश दिया- “वेरी गुड...मि. वाल्मीकि! मुझे ख़ुशी है। यही सोच और परिकल्पना तो हमें चाहिए... मि. जेठी! इनकी सीट मेरे सामने वाले कमरे में लगा दो और इन्हें स्वतंत्र रूप से अपना काम करने दो। इनके काम में आप हास्तक्षेप नहीं करेंगें।5 इससे स्पष्ट है कि सभी अधिकारी जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त नहीं होते कुछ केवल प्रतिभा को जानने और उसे अधिक फलने-फूलने में सहायक भी होते हैं। इस प्रकार वाल्मीकि जी ने अपनी प्रतिभा के माध्यम से अपने अहितैषी को पीछे छोड़ दिया था। अब जेठी जी न तो उनको परेशान कर सकते थे और न ही उनके काम में किसी भी प्रकार की रूकावट ही पैदा कर सकते थे। यह जातिवादी मानसिकता वालों के लिए किसी आघात से कम नहीं था। उनकी यह मानसिकता किदलित केवल आरक्षण के माध्यम से ऊपर पहुँचते हैं अत: उनमें प्रतिभा की कमी होती हैधराशाई हो गयी थी। दलितों के प्रति उनकी यह पूर्वधारणा उन्हें इस सोच के दायरे से बाहर निकालने को राजी ही नहीं होती कि दलित भी प्रतिभावान होते हैं।

          देहरादून के प्रशासन भवन के निर्माण कार्य में लगे मजदूर तूफ़ान की चपेट में आकर मर गए । किसी ठेकेदार, इंजीनियर, किसी मजदूर संघ और पुलिस पर भी इस घटना का कोई प्रभाव पड़ा। ओमप्रकाश जी का कवी हृदय इस घटना से बहुत अधित व्यथित हो उठा। उन्होंनेमौत का तांडवनमक कविता लिखी जिसकी कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-

शब्द हो जाएँ जब गूंगे

और भाषा भी हो जाए अपाहिज

समझ लो

कहीं किसी मजदूर का

लहू बहा है।6

यह कविता उन्होंने गणतंत्र दिवस के सांध्य आयोजन में सबको सुनाई। इससे मजदूरों और अन्य लोगों के मन में उस घटना के प्रति अपनी अनदेखी के लिए ग्लानी पैदा हुई। इतना ही नहीं ओमप्रकाश जी की प्रतिभा की एक और निधि सबके सामने उजागर हुई। वे अपने वरिष्ठों के गर्व का पात्र बने। उनका उत्साहवर्धन पद्मनाभम जी ने कुछ इस प्रकार किया- “वाल्मीकि आपने कभी जिक्र भी नहीं किया कि तुम कवि हो, सचमुच मुझे ख़ुशी हो रही है कि आप मेरे साथ काम करते हैं। मेरे लिए यह गर्व की बात है। आपकी यह कविता मनुष्यता के पक्ष की कविता है। सचमुच आज मेरे मन में तुम्हारे लिए और ज्यादा सम्मान पैदा हुआ है, बधाई...”7 इस प्रकार उन्होंने सवर्णों को भी अपनी कला का प्रशंसक बनाया। इसके बाद अपने कार्यस्थल पर उनका मान बढ़ने लगा और लोग उनके गुणों को पहचान कर उनको सम्मान देने लगे।

          इसी प्रकार वाल्मीकि जी ने मजदूर संघ के अंतर्द्वंद्वों पर आधारित नाटक भी लिखा- ‘दो चेहरे। यह नाटक अनेक विरोधों के बावजूद मंचित किया गया क्योंकि इसका विरोध करने वाले लोगों से ज्यादा लोगों की संख्या इसके समर्थकों की सामने आई। महाप्रबंधक ने इस नाटक के मंचन का सारा खर्च कल्याण कोष से किया। नाटक का सफल मंचन हुआ। इसके बाद इस नाटक को आर्डनेंस फैक्टरी परिसर में भी आयोजित करने का प्रस्ताव रखा गया। यह नाटक क्योंकि मजदूर संगठनों की असलियत दर्शाता था, अत: इसके आयोजन की राह में पुन: तरह-तरह की अड़चनें खड़ी की जाने लगीं। सबसे पहले तो मजदूर नेताओं के दबाव के कारण कार्य समिति द्वारा मिलने वाली सहयोग राशी रुक गयी थी। इसके अतिरिक्त आने वाली समस्याओं का उल्लेख वाल्मीकि जी इस प्रकार करते हैं- “जैसे-जैसे नाटक की तारीख नजदीक आ रही थी, समस्याएँ बढ़ने लगी थीं। नाटक के मंचन से ठीक दो दिन पहले तीन-चार अभिनेताओं ने पूर्वाभ्यास में आना बंद कर दिया था। नए अभिनेताओं को लेकर तैयारी करना आसान नहीं था इसलिए नाटक का मंचन रोक देना पड़ा।8 इन सब स्थितियों को झेलने के बावजूद ओमप्रकाश जी ने हार नहीं मानी बल्किअभिनव नाटक संसथानवालों को अपना नाटक आयोजित करने के लिए दिया। उन्होंनेराजा राममोहन रायअकादमी में इस नाटक का बेहतरीन मंचन किया। समाचार पत्रों के माध्यम से इस नाटक की खूब प्रसिद्धी हुई। इसके अलावा और भी स्थानों पर इस नाटक का बहुत बार मंचन हुआ। इस प्रकार ओमप्रकाश जी की प्रतिभा रोके नहीं रुकी और उन्होंने अपनी प्रसिद्धि सभी जगह पर फैलाई।

          एक दलित नौकरीपेशा व्यक्ति जब अपनी साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित करवाना चाहता है तो यह कार्य भी वह आसानी से नहीं करवा पाता। इसका पहला कारण तो यह है कि वह एक दलित है और सवर्णवादी अपने अहम के सामने किसी दलित को लीक से हटकर काम करते नहीं देख सकते। दूसरा कारण यह कि दलित जिस पाखंडी समाज का चेहरा अपनी साहित्यिक रचनाओं के माध्यम से उजागर करता है उसको छुपाए रखने के पक्षधर जातिवादी लोग उनकी राह में अनेकों अड़चने डालते हैं। जब ओमप्रकाश जी अपना काव्य संग्रहसदियों का संतापप्रकाशित करवाना चाहते थे तो पहले तो किसी भी प्रकाशन संस्थान ने इसके लिए सहयोग नहीं दिया क्योंकि उस समय तक हिन्दी के क्षेत्र में दलितों की वाणी को कोई सहयोग नहीं मिला था। जबयुगवाणी प्रेसके प्रकाशक ने इस कार्य के लिए स्वीकृति दी तो एक अन्य मुसीबत खड़ी हो गयी। उन्हें इस प्रकाशन के लिए अपने कार्यालय के महाप्रबंधक की अनुमति की आवश्यकता थी। उन्होंने अनुमति प्राप्ति का अवदन जे.एन.सिंह के पास भेजा ताकि वे इसे महाप्रबंधक तक पहुँच दें, परन्तु उन्होंने एक माह तक उस अवदन का कोई जवाब नहीं दिया। वह नहीं चाहते थे कि यह प्रकाशन कार्य हो। ओमप्रकाश जी सीधे महाप्रबंधक के पास अपनी समस्या लेकर पहुंचे। उन्होंने सारी समस्या सुनने के बाद सिंह से कहा- “मि. सिंह दे दो अनुमति। वाल्मीकि जी एक जिम्मेदार व्यक्ति हैं। इनकी कविता छपेगी तो फैक्ट्री का भी तो नाम होगा। यह क्यों नहीं सोचते हैं? जाओ अनुमति पत्र बना के लाओ, मेरे हस्ताक्षर से इन्हें बना कर दे दो।9 एक बार फिर वाल्मीकि जी की प्रतिभा अड़चनों को परे धकेलती हुई आगे निकल गयी थी। उनका यह काव्य संग्रह आज दलित साहित्य जगत की अमूल्य निधि है। यदि उस समय मि. सिंह अपनी मंशा में कामयाब हो जाते और इसका प्रकाशन न होने देते तो दलित साहित्य जगत इस अमूल्य निधि से वंचित रह जाता। इस संग्रह की पहुँच केवल हिन्दी साहित्य तक ही नहीं है बल्कि अन्य अनेक भारतीय भाषाओँ में भी इसका अनुवाद हुआ है। अत: यह संग्रह हिन्दी भाषा की सीमाओं को लांघता हुआ पूरे भारत में दलित पीड़ा की गूँज को फैला रहा है। इसके बाद उनकी रचनात्मक प्रक्रिया निरंतर चलती रही कहानी, उपन्यास, नाटक आदि सभी साहित्यिक विधाओं में उनकी लेखनी की प्रतिभा से आज पूरा साहित्य जगत वाकिफ है।

          जब दलितों में जाति आधारित जागरूकता लाने का प्रयास किया जाता है तो यह बात जातिवादी लोगों को नागवार गुजरती है। वे इस प्रकार के कार्यों को रुकवाने का हर संभव प्रयास करते हैं। वाल्मीकि जी नेअस्मिता अध्ययन केंद्रनामक कार्यक्रम शहर के भिन्न-भिन्न भागों में आयोजित किया। इसका उद्देश्य था आम आदमी को दलित साहित्य तथा अम्बेडकरवादी विचारधारा से अवगत करवाना परन्तु ऑप्टो इलेक्ट्रोनिक फैक्ट्री के महाप्रबंधक के.पी.सिंह की इस कार्य के प्रति काफी क्रोधपूर्ण प्रतिक्रिया सामने आई। वे ओमप्रकाश जी से बोले- “तुम अपने आप को समझते क्या हो... एक अच्छी नौकरी क्या मिल गयी है तो हजम नहीं हो रही है... अगर यही सब करना है तो जाओ बाहर और करो भंगी-चमारों की नेतागिरी और कुछ तो तुम लोगों के वश में नहीं, बस जाति के नाम पर दूसरों को गालियाँ ही बको...”10 ओमप्रकाश जी जानते थे कि उनके इस कार्य को सुचारू रूप से चलाने की प्रतिभा उनमें है और यह कार्य किसी भी प्रकार से समाज विरोधी नहीं है। उन्होंने अपना यह कार्य आगे भी चालू रखा। इतना ही नहीं बाद में पूर्ण सच्चाई को जानने पर के.पी.सिंह ने भी अपनी गलत धारणा को बदला और अपने सहयोग की पेशकश ओमप्रकाश जी के सामने रखी- “तो क्या समझते हो, हम कुछ नहीं जानते, किसी ने आकर आपके बारे में उल्टा-सीधा बताया था, बस यही था। उस रोज तुमसे कह तो दिया लेकिन जब बाद में पता किया तो सूचनाएँ कुछ अलग ही थीं। साहित्य के बारे में तो मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है। हाँ, लोगों को समझदार बनाने के इस अभियान में यदि मेरी कभी जरूरत पड़े तो कहना...”11 इस प्रकार वाल्मीकि जी अपनी योग्यता के माध्यम से सवर्णों को भी अपना पक्षधर बनाते चले गये।

          सदियों से जातिवादियों की यह मान्यता रही है कि दलितों में न तो किसी प्रकार की प्रतिभा होती है और न ही योग्यता। यही कारण है कि दलितों को शिक्षा से दूर रखा गया। जब दलित किसी प्रकार से शिक्षित होकर विभिन्न विभागों में काम करने लगते हैं तब भी उन्हें यही जताया जाता है कि वे दलित जाति से हैं। अत: उनका काम कोई कुर्सी संभालना नहीं है बल्कि सफाई कर्मचारी बनकर रहना है या इससे सम्बंधित कोई कार्य करना है। जब 1998 में ओमप्रकाश जी का तबादला जबलपुर हुआ तो वहाँ के एक अधिकारी द्वारा उनके प्रति ऐसा ही व्यवहार देखने को मिला। उनकी योग्यता और उनके अनुभव की अनदेखी कर संयुक्त महाप्रबंधक एन.के.वार्ष्णेय ने उनके साथ जाति आधारित व्यवहार अपनाया। उन्होंने वाल्मीकि जी को जाति आधारित अनुभाग का कार्यभार दिया। ओमप्रकाश वाल्मीकि अपनी आत्मकथा में इस घटना को कुछ इस प्रकार व्यक्त करते हैं- “मेरा तकनिकी ज्ञान इस सरनेम के कारण, एक बार फिर से कहीं पीछे धकेल दिया गया था। एक ऐसा अनुभाग जो पूरी आवासीय कॉलोनी की साफ़-सफाई से लेकर सीवेज आदि के काम देखता था।12 यहाँ की कॉलोनी की दुकानों से किराया भी वसूलना होता था जो बहुत ही कठिन काम था। वहाँ के दुकानदार कई वर्ष से किराया नहीं दे रहे थे और किराया मांगने पर गुंडागर्दी पर उतर आते थे। पुलिस भी इस मसले से दूर ही रहती थी, ऐसी स्थिति में भी वाल्मीकि जी ने अपनी शान्त बुद्धि और योग्य नीति द्वारा इस कठिनाई को दूर किया। उन्होंने सभी दूकानदरों को शाम को चाय नाश्ते के लिए आमंत्रित किया। इसी समय किराए के भुगतान के लिए शांतिपूर्ण विचार-विमर्श किया गया। दुकानदार किराया चुकाने के लिए तैयार हो गये। वाल्मीकि जी लिखते हैं- “इस तरह हमने बाजार की पहली लड़ाई जीत ली थी और दो महीने में हमने लगभग एक लाख रूपय से ज्यादा की रकम एकत्र करके जी.सी.एफ. के खाते में जमा करा दी थी। यह हमारी बहुत बड़ी उपलब्धि थी। लेकिन वार्ष्णेय जी खुश नहीं थे।13 यहाँ पर वार्ष्णेय जी की भेद-भाव की नीति प्रत्यक्ष रूप में दिखाई देती है। यहाँ पर कम्पनी के लाभ की ख़ुशी से अधिक उन्हें इस बात का दुःख है कि जो कार्य असंभव सा प्रतीत हो रहा था वह एक दलित ने आसानी से संभव कर दिखाया।

          व्यक्ति चाहे स्वयं अपनी योग्यता के गुणगान न गाये परन्तु उसकी प्रतिभा छुपाये नहीं छुपती है ओमप्रकाश वाल्मीकि जी की प्रतिभा तथा उचित समय पर उचित निर्णय लेने की योग्यता उनके अनुभाग के अधिकारियों को भी नजर आई। मखीजा ने उनके अनुभव को देखते हुए उनका तबादला विजयन्ता नगर कर दिया। वहाँ भी ओमप्रकाश जी ने असंभव काम को संभव कर सभी को हतप्रद कर दिया। दरअसल उन्हें मखीजा साहब ने एक काम सौंपा- “आपको पता है ये कम्पोनेंट पिछले कई वर्षों से इसी तरह पड़े हैं। किसी ने इन्हें छुआ तक नहीं है। देखो, शायद आपके हाथ से यह इंस्ट्रूमेंट असेम्बल हो जाए, कोशिश कर के देखो।14 यहाँ एक सवर्ण द्वारा एक दलित व्यक्ति की प्रतिभा पर विश्वास नजर आता है। उसके लिए ओमप्रकाश जी की जाति कोई मायने नहीं रखती है बल्कि वह एक दुर्लभ कार्य को करने के लिए उनमें सकारात्मक उर्जा का संचार करते हैं। ओमप्रकाश जी भी सकारात्मकता के साथ इस कार्य में जुट गये। उन्होंने अपनी एक टीम तैयार की और पाँच साल से किनारे पड़े इस काम को पूरा कर दिखाया। इस कार्य के पूर्ण होने पर उन्हें शुभकामनायें देने वालों का ताँता लग गया। इस असंभव कार्य को पूर्ण करने के उपलक्ष में और आगे भी इसी प्रकार के कार्यों को पूर्ण करने के लिए उनका उत्साहवर्धन भी किया गया। उनके उच्च अधिकारी अगरवाल जी ने उनसे कहा- “अपनी टीम का नाम बोर्ड में भजो, मैं कोशिश करूंगा इन सबको सम्मानित किया जाए। आप अपना नाम भी साथ में भेजें।15

इस प्रकार वाल्मीकि जी अपनी प्रतिभा, अनुभव और योग्यता से यह साबित करने में सफल रहे कि दलितों में भी किसी भी कार्य को कर दिखने की प्रतिभा होती है। बस अवसरों के आभाव में वह छुपी रह जाती है। उनकी जाति के आधार पर उनका मूल्यांकन करना अवांछनीय है। वे अपनी प्रतिभा से उन्नति के मार्ग में आई सभी बाधाओं को पीछे छोड़ते रहे। यह आत्मकथा दलित समाज को यह सन्देश देती है कि अपनी प्रतिभा पर पूर्ण भरोसा रख सदैव आगे बढ़ने के लिए अग्रसर रहना चाहिए, न कि जातीय हीन भावना के बवंडर में धंसकर जातिवादियों का मनोबल बढ़ाना चाहिए। अपनी योग्यता पर भरोसा रखकर किसी भी कार्य को पूर्ण किया जा सकता है चाहे राह में कितनी भी बाधाएँ आएँ। इन सब बाधाओं को दलित प्रतिभा पछाड़ सकती है। वाल्मीकि जी ने इसे पूर्णत: सिद्ध किया।

सन्दर्भ सूची

  1. वाल्मीकि ओमप्रकाश, जूठन-दूसरा खंड, राधाकृष्ण प्रकाशन, दूसरा संस्करण- अगस्त 2015, पृष्ठ-29
  2. वही, पृष्ठ-29
  3. वही, पृष्ठ-14
  4. वही, पृष्ठ-16
  5. वही, पृष्ठ-21
  6. वही, पृष्ठ-42
  7. वही, पृष्ठ-46
  8. वही, पृष्ठ-52
  9. वही, पृष्ठ-58
  10. वही, पृष्ठ-73
  11. वही, पृष्ठ-74
  12. वही, पृष्ठ-83
  13. वही, पृष्ठ-107
  14. वही, पृष्ठ-114
  15. वही, पृष्ठ-116