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जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

आक्रोश और पहाड़ा फिल्म में चित्रित आदिवासी जीवन: रामधन मीणा [शोध आलेख]

आक्रोश और पहाड़ा फिल्म में चित्रित आदिवासी जीवन

*रामधन मीणा

सिनेमा जनमाध्यम का एक ऐसा सशक्त दृश्य माध्यम है जिसको स्थापित करने का श्रेय फ्रांसीसी भाइयों अगस्टएवं ल्यूमियर को जाता है । जिन्होंने 20वीं सदी के अंतिम दशक में अपने लघु चित्रों को भारत सहित विश्व के अन्य देशों में प्रदर्शित कर एक नए व्यवसायिक एवं संचार क्रांति का मार्ग प्रशस्त किया । इसके लिए सिनेमा जगत आज भी ल्यूमियर बंधुओं के योगदान एवं प्रतिभा का ऋणी है । ज्ञान प्रकाश पांडेय ने लिखा है भारत में व्यवसायिक सिनेमा की नीव जमशेद जी मदन ने रखी जिन्होंने भारत का पहला सिनेमा हॉल एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस 1907 में कोलकाता में बनवाया ।[1] इस प्रकार भारत में सिनेमा की शुरुआत हुई एवं दलित एवं आदिवासी मुद्दों पर भी फिल्में बनाई जाने लगी । क्योंकि डॉ. राही मासूम रजा कहते हैं कि सिनेमा की एक विशेषता यह भी है कि यह अपने दर्शक को कभी नज़रअंदाज नहीं कर सकता । सिनेमा का अस्तित्व दर्शकों के अभाव में संभव नहीं है । हम आम आदमी की बहुत बात करते हैं । लेकिन आम आदमी का साहित्य से उतना संबंध नहीं है जितना फिल्म का है ।[2] लेकिन क्या इसको न्याय कहा जा सकता है जो आज की फिल्में केवल बाजार को ही देखती है । क्योंकि इसी को व्याख्यायित करते हुए डॉ. राही मासूम रजा कहते हैं- सिनेमा उन लोगों तक भी पहुँच जाता है जो लिखना नहीं जानते ।[3] और यह वाकई भारत जैसे अशिक्षित देश में तो सिनेमा की कला के महत्व को और बढ़ा देता है ।

 अनदेखा नहीं किया जा सकता । भारत का आदिवासी तबका जो आज के इस भूमंडलीकृत युग में भी दूर-दराज के जंगलों में निवासरत है उसके लिए यह सिनेमा किसी संजीवनी से कम नहीं यदि उनके मुद्दों पर सही से प्रकाश डाला जाए । यही उन दलित आदिवासियों के लिए साहित्य हैं, क्योंकि अधिकांशतः या कुछ चंद लोगों के अलावा ज्यादातर आदिवासी कौम निरक्षर होती है । इसलिए उनके लिए यह सिनेमा ही प्रत्येक पाठक तक पहुँच बनाने वाला साहित्य साबित हो सकता है ।  लेकिन आज फिल्मकारों के वैचारिक पूर्वाग्रहों एवं दुराग्रहों के कारण आज दलित आदिवासी मुद्दों पर बहुत कम फिल्में आ पा रही हैं एवं जो आ रही है उनमें भी सही से आदिवासियों का चित्रण नहीं किया जाता चाहे कारण कोई भी रहे या उनकी सामाजिक, व्यावसायिक प्रतिबद्धता ही क्यों न हो। सिनेमा को केवल मनोरंजन का साधन मात्र मानकर चलना किसी न किसी प्रकार उस समाज के प्रति ठगी होगी अगर उसका सही से चित्रण नहीं किया जाता । क्योंकि इसी परिपेक्ष में डॉ. रजा कहते हैं कि सिनेमा की परछाइयाँ परदे से उतर कर उस तक आ जाती है और वह उन परछाइयों से अपने दुख-दर्द की तुलना करता है या फिर वह स्वयं एक परछाइ बनकर उन चरित्रों में शामिल हो जाता है ।[4] इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि अक्षर ज्ञान से अनभिज्ञ इन आदिवासियों के लिए सिनेमा ही एक ऐसा सशक्त माध्यम है जो इनमें चेतना जगा सकता है और अन्य साहित्य विद्या की बनिस्पत क्योकि आदिवासी जीवन विविध कलाओं का मूल संगम माना जाता है ।

इनमें यहाँ पुरखों द्वारा प्राप्त विभिन्न कलारूप उनकी संस्कृति को प्रकृति से जोड़े रखते हैं । इसलिए उनकी संस्कृति मुख्यधारा की नगरी संस्कृति से बिल्कुल भिन्न पुरखा संस्कृति में ही रसी-बसी होती है ।  विवाद का मुख्य कारण अक्सर आदिवासियों या आदिवासी मुद्दों का प्रस्तुतीकरण रहा है (यह अलग बात है कि फिल्मकारों को ऐसे विवादों से सीधा व्यावसायिक लाभ भी मिलता रहा है ।) जो हो, इससे फिल्मकार की सामाजिक या व्यावसायिक प्रतिबद्धता के साथ-साथ उसके वैचारिक पूर्वग्रह या दुराग्रह भी सामने आते हैं ।  आदिवासी मुद्दों पर केंद्रित फिल्मो में तो ये और भी गहरे होते हैं । फिल्मकारों के वैचारिक पूर्वग्रहों या दुराग्रहों के कारण ऐसी फिल्मों का अध्ययन अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है । यहाँ यह भी ध्यान रखना जरूरी हो जाता है कि जब एक आदिवासी फिल्मकार अपने समुदाय के किसी भी मुद्दे पर फिल्म बनाता है तो वह उसे किस प्रकार दिखाता है और उन्हीं विषयों को जब एक गैर आदिवासी फिल्मकार फिल्माता है तो वह उसे किस प्रकार दिखाएगा ? दोनों की दृष्टियों में अंतर क्या होगा ? इसे गोविंद निहलानी निर्देशित आक्रोश और  निरंजन कुजूर निर्देशित पहाड़ा की तुलना से समझा जा सकता है । 

आक्रोश-

          फिल्म का पहला दृष्य इस प्रकार है कि लहानिया भीखु एक आदिवासी है एवं उसके उपर उसकी पत्नी के खून का इल्जाम है ।  अंधेरी रात है ।  चिता जल रही है एवं चिता के पास लहानिया भीखु हथकड़ी पहने खड़ा है एवं साथ ही कुछ और आदिवासी भी खड़े हैं जिनका चेहरा चिता की रोशनी में कभी-कभार शाश्वत पराजय एवं अपराध बोध के भाव में दे रहे हैं । आदिवासी लहानिया का चेहरा भी चिता की रोशनी से उजला-उजला प्रतीत हो रहा है । उसका पिता भी दीन-हीन, जर्जर, जीन-शीर्ण कपड़ों में पास ही आँखें झुकाए खड़ा है , एवं उसकी बहन भी दुनिया की दृष्टि से अपनी जवानी को छिपाती हुई लहानिया की दुधमुहें बच्चे को गोद में उठाकर खड़ी है ।  इस प्रकार फिल्म का प्रथम दृष्य बड़ा ही कारुणिक है क्योंकि जिस गुनाह के लिए एक आदिवासी लहानिया को अपनी पत्नी की चिता के पास हथकड़ी लगाकर खड़ा कर रखा है ।  उस गुनाह का गुनाहगार कोई और ही है ।  क्योंकि रविशंकर कुमार अपने आलेख में लिखते हैं कि फिल्में हमारे समाज का दर्पण है ।  हम फिल्मकार फिल्म की स्क्रिप्ट समाज से उठाते हैं और सामाजिक विषयों को पात्रों के माध्यम से सिनेमा का स्वरूप प्रदान करते हैं ।[5] लेकिन सवाल यह उठता है कि यह किस समाज के लिए दर्पण है ? क्योंकि यहाँ निर्देशक ने कहीं न कहीं सहानुभूति तो बटोर ली लेकिन स्वानुभूति कुछ और ही है । इसके बाद फिल्म में सरकारी  वकील भास्कर कुलकर्णी द्वारा लहानिया से पुछे गए सवाल, सवाल कम और इल्जाम ज्यादा लगते हैं जैसे- पहले ये बताओ कि पहला खून किया है तुमने ?...या पहला जुर्म ?... क्या पहले कभी हवालात आये हो ?... तुमने अपनी घरवाली का खून क्यों किया ?...बद्चलन थी ?”[6] इतना ही नहीं  जब लहनियाँ कुछ नहीं बोलता है तो कितना घिनोना पुरवाग्रह होता है आदिवासियों के प्रति इन सभ्य वकीलों का एक और फिल्म का संवाद देखिये “ये आदिवासी कम्बक्त  होते ही ऐसे है पहले तो ये खून खराबा करेगें और बाद में ऐसे चुप हो जायेगे जेसे पेदायसी गूंगे हो”[7] क्योकि इसलिए पहली मुलाकात में पुछे गए ये सवाल एक गैर आदिवासी निर्देशक के रूखेपन को जगजाहिर करता है । जिससे स्पष्ट सवाल उठता है कि उसको एक आदिवासी का केस अपने करियर में धब्बा महसूस हो रहा है एवं वह सरकार से फीस लेकर भी कभी आदिवासियों के भलें की  सोच नहीं रख सकता ।  कहीं न कहीं एक आदिवासी न्याय की आस में हर तरफ से रूखेपन का ही शिकार होता है । क्योंकि प्रतिपक्षी वकील धसाने भास्कर के पिता के शागिर्द रह चुका है ।  अब उसका (कुलकर्णी) गुरु है । 

लहानिया उपर्युक्त सवालों से बिल्कुल भी विचलित नहीं होता है क्योंकि उसे पता है कि न्याय नहीं मिलेगा । इसलिए वह इन इल्जामी सवालों को चुपचाप सुनता रहता है, बिल्कुल भी जवाब नहीं देता, एकदम से खामोश रहता है । इस खामोशी से भास्कर कुलकर्णी अपने करियर को डूबता हुआ प्रतीत कर रहा है एवं बड़ा चिंतित रहता है एवं प्रतिपक्षी वकील एवं अपने गुरु धसाने से लहानिया की खामोशी के बारे में राय-मशविरा करता है । एवं धसाने भास्कर से कहता है कि मैदान में द्रोणाचार्य के सामने अर्जुन भी हथियार उठाता है, हर धंधे का एक धर्म होता है, और वकील का एक ही धर्म है... वकालत ।[8]  इस प्रकार एक वकील को अपना करियर, निर्देशक को अपना व्यापार चाहिए । उसी प्रकार की बेरूखी आज की तथाकथित सरकारें आदिवासियों के प्रति अपनाती है । आगे फिल्म में जब लहानिया का बूढ़ा बाप कचहरी जाता है तो बूढ़ापे के सहारे को इस समाज के कानून ने एक केस में बदलकर थाने में बिठा रखा है ।  हाथ के सहारे की लकड़ी को भी कचहरी वालों ने बाहर ही रखवा दिया है । एवं लहानिया की जवान बहन एवं उसकी दुधमुँहें बच्चे को अंदर ही नहीं जाने दिया गया ।  मुख्यधारा के समाज ने उसको गरीब होने की सजा दी है । बेटा जेल में है...जवान बेटी को तमीजदार छेड़ रहा है लेकिन एक पिता के पास खून के आँसु और शराब पीकर मरने के अलावा कोई चारा नहीं है । इतना ही नहीं गैर आदिवासी निर्देशक का आदिवासी स्त्री के बारे में नजरिया देखिए, जरा इन बातों पर गौर किजीए और बातो का स्तर देखिये  - हेड और टेल करो कि ये किसके साथ जाएगी ।... छोड़ो यार ।... हेड तुम रखो और टेल मैं रखता हूँ ।[9] इस प्रकार के संवाद भी कहीं न कहीं गैर आदिवासी निर्देशक पर सवाल उठाते हैं कि इस प्रकार की कुरीतियाँ मुख्यधारा के समाज में व्याप्त थीं आदिवासी समाज में नहीं । 

 

 

पहाड़ा-

            पहाड़ा लघु फिल्म की कहानी एक आठ वर्ष का मुन्ना के इर्द-गिर्द घूमती है । एक आठ वर्ष का मुन्ना जिसको 13 के पहाड़े की मेज याद करने के लिए दी गई है एवं वह उसको याद करने के लिए संघर्ष कर रहा है । जबकि मुन्ना को अपने आप-पास के पत्थर एवं अपनी खिलौना गाड़ी अच्छी लगती है, स्कूल अच्छा नहीं लगता । क्योंकि स्कूल में सरकार ने माओवादियों के लिए आर्मी को शिफ्ट कर दिया है । झारखंड में माओवादियों के लिए सरकार ने अभियान चला रखा है । जब मुन्ना के पिता (महादेव टोप्पो) स्कूल चले जाते हैं तो आर्मी के द्वारा शायद वो मारा जाता है या मरने की आशंका व्यक्त की जा सकती है । घर पर मुन्ना अपनी माँ से बार-बार पापा के लिए पूछता है कि पापा कब आएँगे । मैंने 13 के पहाड़े की मेज याद कर ली है । बार-बार पूछने पर उसकी माँ उसे बताती है कि आज तेरा पापा मैं ही हूँ ।  और मुझे ही उस 13 के पहाड़े की मेज को सुनाओ । और आखिर में यह पता लगता है कि मुन्ना के पिता रहस्यमय रूप से गायब हो जाते हैं । जो भारतीय सेना पर सवालिया निशान खड़ा करता है । क्योंकि नक्सलवाद के बहाने जो भोले - भाले आदिवासी परिवार हैं वे विखंडन का शिकार हो रहे हैं । जिस प्रकार एक मुन्ना हुआ है । न जाने ऐसे कितने मुन्ना होंगे जो इस दंश का शिकार हुए हैं । इस प्रकार इस दोनों फिल्मों की तुलना करने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि कहीं न कहीं गैर आदिवासी निर्देशक आदिवासी वजूद को सही से परिभाषित नहीं कर पाता है जबकि एक आदिवासी निरंजन कुजूर अपने वजूद को अपनी इस 10 मिनट की फिल्म पहाड़ा में बयाँ कर देते हैं ।

 इसी परिपेक्ष्य में मृत्युंजय ने लिखा है कि ऐसे समय में जब इस एक देश में कई-कई देश एक साथ चल रहे हों और किसी एक के आगे दूसरे के अस्तित्व को ही नकार दिया जा रहा हो, तब जब आभासी पूंजी से लेकर आभासी विकास तक को एकदम स्पष्ट हर नंगी सच्चाई से कही ज्यादाबार दुहराया जा रहा हो और लोगों का उसमें यकीन भी जमा दिया गया हो ।[10] इस प्रकार कहीं न कहीं निर्देशकों का आधिकारिक अनुभव भी काम करता है ।  क्योंकि निरंजन कुजूर स्वयं आदिवासी हैं एवं वह उसी समाज में पल-बढ़ कर बड़ा हुआ है ।  जबकि निहलानी जी एक गैर आदिवासी हैं फिर भी आपका सिनेमा स्वागत योग्य है लेकिन कुछ सवाल भी छोड़ रहा है क्योंकि कहीं न कहीं आपको इस आदिवासी समाज का आधिकारिक अनुभव नहीं है इसलिए आपका सिनेमा भिन्न होगा एक हदतक आदिवासी निर्देशक से इसमें कोई शक नहीं । आदिवासी सिनेमा वही होगा जो आदिवासियों की यथार्थता को हुबहू पेश करे । जब आपको आधिकारिक अनुभव हो उस खास समाज का जिसपर आप फिल्म का फिल्मांकन कर रहे हो । इसलिए कोई चरित्र इसके खिलाफ जाता दिखाई पड़ता है तो उसका नायकत्व खतरे में पड़ जाता है और मजबूरन उसे खलनायक का चोला धारण करना पड़ता है ।

 

संपर्क – रामधन मीणा,

शोधार्थी हिंदी विभाग

पांडिचेरी विश्वविद्यालय,

पुदुचेरी-605014,

चल-दूरभाष-7598430736    ऱफफफ

 

[1] ज्ञान प्रकाश पांडेय, आलेख, आजकल पत्रिका ,अंक अक्टूबर 2012

 

[2] सिनेमा और संस्कृति, लेखक- डॉ. राही मासूम रजा पृष्ठ सं-13 

[3] सिनेमा और संस्कृति, लेखक- डॉ. राही मासूम रजा पृ. 18

[4]सिनेमा और संस्कृति, लेखक- डॉ. राही मासूम रजा पृ. 18,

[5] , आजकल पत्रिका, अंक- अक्टूबर 2012 पृ.-81

[6] फिल्म का संवाद ,जो एक वकील द्वारा मुवक्किल को पूछे जा रहे है ।

[7] वही ...आदिवासियों की संस्कृति का आधिकारिक अनुभव न होना स्पष्ट झलक रहा है ।

[8]  फिल्म का संवाद, जिसमे सरकारी वकील एवं प्रतिपक्षी वकील आपस में मिले हुए है ।

[9] फिल्म का संवाद, सभ्य समाज का आदिवासी स्त्री के प्रति कुत्सित नजरियाँ ।

[10] आलेख-मृत्युंजय हंस पत्रिका, मार्च 2015 पृ.सं.- 31