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जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

भारत में महिला सशक्तिकरण: एक विश्लेषण- डॉ. ऋचा रानी यादव, महेश कुमार तिवारी [शोध आलेख]

भारत में महिला सशक्तिकरण: एक विश्लेषण

                                                                                                                Dr. Richa Rani Yadav*

Mahesh Kumar Tiwari**

‘‘यत्र नार्यास्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’’

            अर्थात् जहां नारी की पूजा होती हैवहां देवता निवास करते हैं। यहां नारी को देवी के रूप में देखा गया है। भारत में स्त्रियों की दशा सदैव एक जैसी नहीं रही अपितु समय एवं काल के साथ परिवर्तन आते गए। किसी युग में नारी को सम्मान दिया गया तो कहीं उसका अपमानउत्पीड़नअत्याचार एवं जुल्म ढ़ाने की सभी हदें पार कर दी गईं। महिलाएं समाज में अनेक कुरीतियों एवं कुप्रथाओं का शिकार होती रही हैंजिनमें हैं - कन्यावधभ्रूण हत्यासती प्रथाजौहरडाकण प्रथाक्रय-विक्रयवैश्यावृत्तिदास प्रथाबाल विवाह इत्यादि। आज अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सपेरा नृत्य की पहचान बनाने वाली कालबेलिया समाज की गुलाबोजिसे कि समाज की नवजात लड़कियों को जिन्दा दफनाने को ‘कन्या धर्म मानने की कुप्रथा का शिकार होना पड़ाको जन्म के एक घण्टे बाद ही जमीन में दफना दिया था परन्तु उसकी मौसी ने गुलाबो को जमीन से निकाल कर पाला और उसी गुलाबों ने आज दुनिया में अपनी प्रतिभा के बल पर महिलाओं व समाज का मान बढ़ाकर नेतृत्व प्रदान किया है।

            भारत में आज भी सामाजिक ताना-बाना ऐसा है जिसमें अधिकांश महिलाएं पिता या पति पर ही आर्थिक रूप से निर्भर करती हैं तथा निर्णय लेने के लिए भी परिवार में पुरुषों पर निर्भर रहती हैं। महिलाओं को न तो घर के मामलों की निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाता है और न ही बाहर के मामलों में। विवाह से पूर्व वे पिता व विवाह के बाद पति के अधीन रहते हुए जीवनयापन करती हैं। हालांकि देश के संविधान में महिलाओं को सदियों पुरानी दासता एवं गुलामी की जंजीरों से मुक्ति दिलाने के प्रावधान किए गए हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, 19, 21, 23, 24, 37, 39(बी), 44 तथा अनुच्छेद 325 स्त्री को भी पुरुषों के समान अधिकारों की पुष्टि करते हैं।

 

महिला सशक्तिकरण

            सर्वप्रथम यह जानना आवश्यक है कि सशक्तिकरण क्या हैसशक्तिकरण का तात्पर्य है ‘शक्तिशाली बनाना। सशक्तिकरण को सामाजिकआर्थिक एवं राजनीतिक असमानताओं से पैदा हुई समस्याओं एवं रिक्तताओं से निपटने के रूप में देखा जा सकता है। इसमें जागरूकताअधिकार एवं हकों को जाननेसहभागितानिर्णयन जैसे घटकों को लिया जाता है। अब हम महिला सशक्तिकरण को पैलिनीथूराई के शब्दों में देखते हैं – “महिला सशक्तिकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा समाज के विकास की प्रक्रिया में राजनीतिक संस्थाओं के द्वारा महिलाओं को पुरुषों के बराबर मान्यता दी जाती है।”1

            लीला मीहेनडल के अनुसार महिला सशक्तिकरण - ‘निडरतासम्मान और जागरूकता तीनों शब्द महिला सशक्तिकरण में सहायक हैं। यदि डर से आजादी महिला सशक्तिकरण का पहला कदम हैतो तेजी से न्याय से उसकी आवश्यकता पूरी हो सकेगी। यदि महिलाओं को वास्तव में न्याय दिलाना है तो उनकी जांच-परख प्रणाली को और अधिक कार्यकुशल बनाना होगा तथा अराजकता फैलाने वाले तत्वों को सजा देनी होगी।”2

            महिलाओं के लिए डॉ. बी.आर. अम्बेडकर का कथन है कि ‘भारतीय नारी श्रम से नहीं घबराती किन्तु आंसुओं की चिन्ता करते हुए वह रोटी, असमान व्यवहार, शोषण से अवश्य डरती है। इसमें बाबा साहेब ने महिलाओं की वास्तविक वेदना को मुखरित किया है। महिला सशक्तिकरण की अवधारणा बहुआयामी है। यह कोई पुरुष निरपेक्ष नहीं बल्कि सापेक्ष विमर्श है और इसके लिए पुरुषों को भी आगे आना होगा। महिलाओं के सामाजिक सशक्तिकरण में शिक्षा की अहम भूमिका है। यह महिलाओं के सर्वांगीण विकास के लिए प्रथम एवं मूलभूत साधन है क्योंकि महिला के शिक्षित होने पर जागरूकताचेतना आएगीअधिकारों की सजगता होगीरूढ़ियांकुरीतियांकुप्रथाओं का अन्धेरा छंटेगा और वैचारिक क्रान्ति से प्रकाश पुंज फूट निकलेगा। शिक्षा के माध्यम से महिलाएं समाज में सशक्तसमान एवं महत्वपूर्ण भूमिका दर्ज करा सकती हैं। शिक्षित महिलाएं न केवल स्वयं आत्मनिर्भर एवं लाभान्वित होती हैं अपितु भावी पीढ़ियां भी लाभान्वित होती है। शिक्षा एक ऐसी सम्पत्ति है जिसे न छीना जा सकता है और न ही बांटा जा सकता है। दूसरी ओर ऐसा हथियार भी है जिसके बल पर कोई भी युद्ध लड़ा जा सकता हैअब चाहे वह शोषणअसमानताअन्यायअनाचार के विरूद्ध ही क्यों ना हो।

            महिलाओं की स्थिति में सुधार के समय-समय पर अनेक प्रयास किसी न किसी रूप में होते रहे हैं। भक्तिकाल में नारियों को पुरुषों के समान भक्ति के योग्य मानाजिसके फलस्वरूप अनेक महिला सन्तों ने विशेष स्थान बनाया जिनमें प्रमुख हैं - मीराबाईमुक्ताबाईकेसमाबाईगंगूबाई व जानी। अकबर ने बाल विवाहबेमेल विवाहसती प्रथा को रोकने की दिशा में कार्य किया। राजा जयमल की विधवा को अकबर ने सती होने से रोका था तथा पुर्तगाली गवर्नर अल्बुकर्क ने अपनीआलमदारी में इस प्रथा के विरूद्ध आदेश प्रसारित करवाए। महिलाओं की दशा को सुधारने में अनेक समाज सुधारकों ने महती भूमिका निभाई। जिनमें प्रमुख थे - राजाराममोहन रायईश्वरचन्द्र विद्यासागरवीर सांलिगमदयानन्द सरस्वतीमहादेव गोविन्द रानाडेबाल गंगाधर तिलकज्योतिबा फूलेकेशवकवेबहरामजी मालाबरीगोपाल कृष्ण आगरकरहरिदेशमुख इत्यादि। महिला समाज सुधारकों में पण्डित रमाबाईरमाबाई रानाडेस्वर्ण कुमारी देवीरानी स्वर्णमयीसावित्री बाई फूलेआनन्दीबाई जोशी ने अपना योगदान दिया।

            

महिलाओं की स्थिति

            शिक्षा सम्पूर्ण अज्ञानता रूपी अंधकार को दूर करके विकास और उन्नति के मार्ग खोलती है। भारत में महिला एवं पुरुष की शिक्षा में विभेदीकरण पाया जाता है। लड़की को ‘पराया धन की संज्ञा देकर उसके सभी अधिकारों का हनन हो जाता है क्योंकि संकीर्ण विचारधारा एवं सीमित ज्ञान के कारण स्वयं महिलाएं भी ऐसा दृष्टिकोण रखती हैं और लड़कियों के साथ हर स्तर पर भेदभाव किया जाता है। खानापहनावाप्यार एवं स्नेहशिक्षास्वास्थ्यव्यवसाय आदि में खुला भेदभाव आज भी देखा जा सकता है। वैश्विक परिदृश्य पर एक नजर डाले तो यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार महिला साक्षरता की स्थिति विश्व के कुछ देशों में इस प्रकार है -

 

क्र.सं. 

देश

देश  साक्षरता (प्रतिशत)

1

ब्राजील    

97.9

2

रूस  

99.8

3

नाईजीरिया

86.5

4

चीन 

98.5

5

भारत (2011) 

65.46

 

भारत में साक्षरता (महिला)

क्र.सं.

वर्ष

प्रतिशत

1

1951

8.9

2

1961

15.4

3

1971

22.0

4

1981

29.8

5

1991

39.3

6

2001

53.7

7

2011

65.46

 

            महिलाओं के लिए नियम-कायदे और कानून तो खूब बना दिये हैं किन्तु उन पर हिंसा और अत्याचार के आंकड़ों में अभी तक कोई कमी नहीं आई है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की वर्तमान रिपोर्ट के अनुसार भारत में 15 से 49 वर्ष की 70 फीसदी महिलाएं किसी न किसी रूप में कभी न कभी हिंसा का शिकार होती हैं। इनमें कामकाजी व गृहणियां भी शामिल हैं। देशभर में महिलाओं पर होने वाले अत्याचार के लगभग 1.5 लाख मामले सालाना दर्ज किए जाते हैं जबकि इसके कई गुण दबकर ही रह जाते हैं। विवाहित महिलाओं के विरूद्ध की जाने वाली हिंसा के मामले में बिहार सबसे आगे हैजहां 59% महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार हुईउनमें 63% शहरी क्षेत्रों की थी। दूसरे नम्बर पर राजस्थान 46.3% एवं तीसरे स्थान पर मध्यप्रदेश 45.8 प्रतिशत है।

भारत में लिंगानुपात

            भारतीय परिप्रेक्ष्य में लिंगानुपात को देखा जाए तो सदैव 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या उससे कम ही रही है। वर्ष 1951 से लिंगानुपात पर दृष्टि डालें तो इसमें ऊतार-चढ़ाव आते रहे हैंपरन्तु कोई विशेष परिवर्तन दिखाई नहीं दिए जिसे निम्न तालिका में देखा जा सकता  है –

 

क्र.सं. वर्ष  लिंगानुपात

क्र.सं.

वर्ष

प्रतिशत

1

1951

946

2

1961

941

3

1971

930

4

1981

934

5

1991

927

6

2001

933

7

2011

940

 

            महिला शिक्षा के बाद दूसरा प्रमुख घटक है स्वास्थ्य। ‘स्वस्थ महिला स्वस्थ बच्चे को जन्म देती है। महिलाएं अनेक बीमारियों से ग्रसित होती हैंवहीं वे कुपोषणअल्प रक्तताहीमोग्लोबिन की कमी आदि का शिकार होती हैं। भूमण्डलीकरण के दौर में स्त्री-पुरुष की समानता की दुहाई देने वाले हमारे समाज में बीमार होने पर महिलाओं को गम्भीर स्थिति में ही अस्पताल ले जाया जाता है। आज भी देश में प्रसवपूर्व सेवाएं शोचनीय दशा में हैं। केवल 53.8 प्रतिशत को टिटनेस टाक्साइड के टीके मिल पाते हैं, 40 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं का रक्त चाप लिया जाता है। अभी भी 2/3 प्रसव घर पर ही हो रहे हैं। केवल 43 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं को प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की सेवाएं प्राप्त हैं। शिशु जन्म के उपरान्त भी महिलाओं को बहुत कम और कन्या शिशु के मामले में कोई देखभाल उपलब्ध नहीं होती।3

            महिलाओं में आज भी अन्धविश्वास एवं रूढ़िवादी प्रवृत्ति कूट-कूट कर भरी है। निरक्षर अथवा कम पढ़ी लिखी महिलाओं की तो दूर की बात उच्च शिक्षा प्राप्त महिलाएं भी पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए सैकड़ों तंत्र-मंत्र एवं उपाय करती हैं। झाड़-फूंकभूत-प्रेततांत्रिक बाबाओं के भंवर जाल में फंस कर नरबलि चढ़ाने को भी तैयार हो जाती हैं। ऐसे में महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए विज्ञान का सहारा लेना होगा और तर्काधारित जागरूकता के माध्यम से ही अन्धविश्वास को दूर किया जा सकता है।

            रोजगार के क्षेत्र में भी महिलाएं अभी तक पिछड़ी हुई हैं परन्तु धीरे-धीरे इस दिशा में निरन्तर संख्या बढ़ रही है। भारतीय राज्यों में महिलाओं को सरकारी सेवाओं में आरक्षण का प्रावधान अलग-अलग है और कुछ सेवाओं के लिएकेन्द्र की सेवाओं में भी आरक्षण के प्रावधान किए गए हैं। निजी सेवाओं में जिनमें होटल इण्डस्ट्रीएयर होस्टेसरिसेप्सनिस्टमॉडल जैसे क्षेत्रों में महिलाओं का वर्चस्व बना हुआ है। दूसरी ओर प्रशासनिक सेवा में मात्र तीन प्रतिशत महिलाएं कार्यरत हैं। विश्वभर में सबसे ज्यादा वर्किंग वुमंस भारत में हैंइसमें अब सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सर्वाधिक महिलाएं जा रही हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार 30 प्रतिशत महिलाएं साफ्टवेयर इण्डस्ट्री में एवं 10 प्रतिशत महिलाएं सीनियर मैनेजमेंट में कार्यरत हैं। भारत में किए गए एक अध्ययन से पता चलता है कि ऊँचे पदों पर महिलाओं की संख्या बहुत कम है। ह्यूमन रिसोर्सेज कंसल्टिंग और आउटसोर्सिंग एओन हेविट इण्डिया ने हाल में विभिन्न उद्योगों की 200 से अधिक कम्पनियों का अध्ययन किया। भारत के कालेजों में आट्र्स/कॉमर्स/ इंजीनियरिंग संकाय में 40 प्रतिशत स्नातक महिलाएं हैं और अध्ययन में पता चला है कि कम्पनियां महिला कर्मचारियों की भर्ती को व्यापारिक लाभ के रूप में देखती हैं। सूचना प्रौद्योगिकी/आईटीईएस क्षेत्र में यह विशेष रूप से किया जाता हैजहां भर्ती के स्तर पर 30 प्रतिशत महिलाओं को चुना जाता है। रीटेल जॉब्स में भर्ती स्तर पर भी महिलाओं को वरीयता दी जाती है लेकिन उत्पादन एवं सेल्स में महिलाओं का प्रतिशत10 के आसपास है। मध्यम स्तर के प्रबंधन में महिलाओं का अनुपात कम हो जाता है (से10 प्रतिशत आईटी क्षेत्र में) और वरिष्ठ प्रबन्धन में तो यह न्यूनतम हो जाता है (3 प्रतिशत से भी कम)। निदेशक बोर्ड स्तर पर तो महिलाओं की मौजूदगी 1 प्रतिशत से भी कम है। अध्ययन में 50 प्रतिशत से अधिक सीईओ का कहना था कि अगले पांच वर्षों में महिलाओं के वरिष्ठ प्रबन्धन तक पहुंचने की उम्मीद की जाती है।4

            भूमण्डलीकृत पूंजीवादी बाजार तंत्र द्वारा स्त्री मुक्ति के नाम पर प्रचारित विभिन्न प्रचार एवं मूल्य इसके एक आदर्श उदाहरण हैं। भूमण्डलीकरण बाजार द्वारा आयोजित सौन्दर्य प्रतियोगिताओं के पक्ष में प्रायः कहा जाता है कि इनसे स्वस्थ रहने व सुन्दर दिखने की जागरूकता में वृद्धि होती है किन्तु स्त्री को एक सुन्दर देह के रूप में दर्शकों (पुरुषों) के समक्ष प्रदर्शित किया जाता है। इसे विडम्बना ही कहा जाना चाहिए कि स्त्री की स्वतंत्रता और अभिमान के नाम पर आयोजन ‘स्त्री एक देह के पुरुषोचित पूर्वाग्रह को ही पुष्ट करता है।5

            एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में एक लाख पच्चीस हजार महिलाएं गर्भधारण के पश्चात् मौत का शिकार हो जाती हैं। प्रत्येक वर्ष एक करोड़ बीस लाख लड़कियां जन्म लेती हैं लेकिन तीस प्रतिशत लड़कियां 15 वर्ष से पूर्व ही मृत्यु का शिकार हो जाती हैं। गर्भवती महिलाओं पर दृष्टि डालें तो पता चलता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में 72 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं निरक्षर हैं। ऐसी स्थिति में वे गर्भधारण करने की उम्रपोष्टिकताभारी कामकाम के घण्टोंस्वास्थ्य जांच आदि से वंचित रहती हैं और सब कुछ भगवान पर छोड़ देती हैं। अब महिलाओं को समझना होगा कि आज समाज में उनकी दयनीय स्थिति भगवान की देन न होकर समाज में चली आ रही परम्पराओं का परिणाम है। इस स्थिति को बदलने का बीड़ा महिलाओं को स्वयं उठाना होगा। जब तक वह स्वयं अपने सामाजिक स्तर पर आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं करेगीतब तक समाज में उनका स्थान गौण ही रहेगा।

            स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्षों बाद भी हमारी कामकाजी जनसंख्या में से 70 प्रतिशत महिलाएं अकुशल कार्यों में लगी हैं तथा उसी हिसाब से मजदूरी प्राप्त कर रही हैं। दूसरी ओर देखते हैं तो पता चलता है कि महिलाओं के कुछ ऐसे कार्य हैं जिनकी गणना ही नहीं होती जैसे - चूल्हा -चैकाबर्तनखानासफाईबच्चों का पालन पोषण आदि। महिलाएं एक दिन में पुरुषों की तुलना में छः घण्टे अधिक कार्य करती हैं। आज विश्व में काम के घण्टों में 60 प्रतिशत से भी अधिक का योगदान महिलाएं करती हैं जबकि वे केवल एक प्रतिशत सम्पत्ति की मालिक हैं। भारत में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना में कुल मानव दिवस में महिलाओं की भागीदारी निम्नानुसार रही हैं -

 

क्र.सं.

वर्ष

कुल मानव दिवस में महिलाओं की भागीदारी

1

2006-7

40 %

2

2007-08

43%

3

2008-09

48%

4

2009-10

48%

5

2010-11

48%

 

            महानरेगा में कुल मानव दिवस में महिलाओं की भागीदारी में राजस्थान अग्रणी रहा हैजहां महिलाओं की भागीदारी 67.6 प्रतिशत रही हैं।

 

भारत में महिलाओं की शासन व्यवस्था में भागीदारी

            लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली के साथ-साथ भारत एक गणराज्य भी है और शासन व्यवस्था का स्वरूप संसदात्मक है। भारतीय शासन व्यवस्था में महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व तो दूर की बात हैइसे कोई स्वीकारना ही नहीं चाहता जिसे महिला आरक्षण विधेयक स्थिति से समझा जा सकता है। अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर 8मार्च, 2010 को संसद एवं विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत राजनीतिक भागीदारी के लिए महिला आरक्षण विधेयक राज्य सभा में भारी बहुमत से पारित हो गया। यह विधेयक पिछले कई दशक से अधिक समय से लम्बित था परन्तु इसको मूर्त रूप देने के लिए लोकसभा में पारित होना शेष है। इस दिशा में कई बार प्रयास हुए परन्तु राजनीतिक दलों में इच्छाशक्ति के अभाव के चलते आज तक पारित नहीं हो पाया है।

 

 

लोकसभा में महिलाएं

            भारत में लोकसभा के प्रथम चुनाव 1952में हुए। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार लोकसभा कुल सदस्य संख्या 552 से अधिक नहीं होगी। वर्तमान में लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 545 हैंजिसमें दो आंग्ल भारतीय मनोनीत होते हैं। लोकसभा में प्रथम निर्वाचन से आज तक के निर्वाचनों में महिला सांसदों के निर्वाचन की स्थिति निम्नानुसार रही –

 

वर्ष

लोकसभा सदस्य

राज्य सभा सदस्य

कुल सदस्य

स्त्री

%

कुल सदस्य

स्त्री

%

1952

499

22

4.41

219

16

7.31

1957

500

27

5.40

237

18

7.59

1962

503

34

6.76

238

18

7.56

1967

523

31

5.93

240

20

8.33

1971

521

22

4.22

243

17

7.00

1977

544

19

3.49

244

25

10.25

1980

544

28

5.15

244

24

9.84

1984

544

44

8.09

244

28

11.48

1989

517

27

5.22

245

24

9.80

1991

554

39

7.17

245

38

15.51

1996

543

39

7.18

223

19

8.52

1998

543

43

7.92

245

15

6.12

1999

543

49

9.0

245

19

7.8

2004

539

44

8.2

245

28

11.4

2009

543

59

10.8

 

 

 

2014

543

61

11.23

244

30

12.29

 

केन्द्रीय मंत्रिपरिषद में महिलाएं

            भारत में लोकसभा निर्वाचन में महिलाओं की भागीदारी की बात करते हैं तो इसकी स्थिति अत्यन्त कमजोर रही है। स्वतंत्रता के पश्चात् निर्वाचन की शुरूआत 1952 से लेकर अन्तिम लोकसभा चुनाव 2009 तक की स्थिति पर दृष्टिपात करें तो पता चलता है कि लोकसभा में निर्वाचित होकर पहुंचने वाली महिलाओं की संख्या वर्ष 2009 में सर्वाधिक 60रही अर्थात् 11 प्रतिशत महिलाएं निर्वाचित हुई जो कि न्याय संगत नहीं है। इसके पीछे अनेक कारण हैं परन्तु महिलाओं के प्रति राजनीतिक दलों में न तो इच्छाशक्ति है और न ही वे पुरुष प्रधान की भूमिका को कम होने देना चाहते हैं। कई राजनीतिक दल तो इस कदर भयभीत हैं कि महिलाओं को टिकट देने से वे निर्वाचित होंगी और वे निर्वाचित होंगी तो पुरुषों का राजनीति से सफाया ही हो जाएगा।

            

            भारत में महिलाओं की दशा को विविध पहलुओं के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयास है। महिलाओं की स्थिति अलग-अलग राज्यों/जिलों/स्थानीय क्षेत्रों की पारिस्थिकीय भिन्नता के चलते एक जैसी नहीं है। अभी तक महिलाओं की दशा को कोई अच्छा नहीं कहा जा सकता परन्तु यह अवश्य कहा जा सकता है कि महिलाएं प्रत्येक क्षेत्र में स्वयं के बल पर आगे बढ़ रही हैं और ये संकेत मिलना शुरू हो गया है कि चाहे सामाजिक क्षेत्र में शिक्षा होतकनीकी शिक्षाव्यावसायिक शिक्षा या अन्य शिक्षा हो सभी जगह महिलाओं ने अपना परचम फहराया है। चाहे संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा हो या राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षा या अन्य प्रतियोगी परीक्षाएं हो महिलाएं कहीं भी पीछे नहीं हैं। राजनीतिक सशक्तिकरण की बात करें तो हमें स्पष्ट संकेत मिले हैं कि स्थानीय संस्थाओं में महिलाओं के लिए 33प्रतिशत या 50 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधानों ने महिलाओं की प्रतिनिधि सहभागिता में निश्चित रूप से सकारात्मक वृद्धि हुई है। हालांकि इसमें अभी कुछ समस्याएं एवं चुनौतियां अवश्य है। आज महिलाएं घर की चारदीवारी से बाहर निकल कर रूढ़ीवादी प्रवृत्तियों को पार कर विभिन्न व्यवसायों एवं सेवाओं में कार्यरत हैंजिससे आर्थिक आत्मनिर्भरता भी आ रही है और केवल आर्थिक रूप से सुदृढ़ ही नहीं हुई है। अपितु समाज एवं परिवार की सोच में भी सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देने प्रारम्भ हो गए हैं। सरकारी सेवा या राजनीति में सक्रिय महिलाओं को समाज में स्थान एवं सम्मान मिल रहा है। डॉक्टरइंजीनियरवकीलप्रोफेसरजजप्रशासनिक अधिकारी जैसे पदों पर महिलाएं आ रही हैं। राजनीति में तो वार्ड पंचसरपंचप्रधानप्रमुखविधानसभा सदस्यलोक सभा सदस्यराज्य सभा सदस्यमंत्रीप्रधानमंत्रीराष्ट्रपति जैसे पदों पर अपना दमखम दिखाने में पीछे नहीं हैं। खेलोंफिल्मोंसौन्दर्य प्रतियोगिताओंपत्रकारितालेखन आदि में भी महिलाओं ने अपने आपको स्थापित किया है।

            महिलाओं को समानता या बराबरी का दर्जा दिलाने की बातें करके या केवल लक्ष्य निर्धारित करने से काम नहीं चलेगा बल्कि लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति का होना और इस दिशा में कार्य करना परमावश्यक है। सरकारस्वयंसेवी संस्थाओं या महिला हितैषी संगठनों को कागजी घोड़े दौड़ाने मात्र से काम नहीं चलेगा अपितु योजनाओं को वास्तविकता के धरातल पर उतारा जाए। एक बात तो निश्चित है कि महिलाओं को सशक्त करने के लिए कोई भगवान या मसीहा अवतरित नहीं होगा और न ही समाज को नारीवाद की परिभाषा पढ़ाने से कोई बात बनेगीनारी मुक्ति के लिए महिलाओं को आगे आना होगाअपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना होगा। सरकारें केवल महिला अधिकारों एवं कानूनों की संख्या में वृद्धि ना करें अपितु व्यावहारिकता को ध्यान में रखते हुए ऐसे अधिकार एवं कानून बनाए जिससे वास्तविक सशक्तिकरण की अवधारणा को साकार रूप दिया जा सके। केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकार अथवा स्थानीय सरकार सभी को महिलाओं को ‘महिला दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। केन्द्र सरकार महिलाओं को मातृत्व अवकाश दो बच्चों तक 2 वर्ष देती है जो कि बच्चे के जन्म से 18 वर्ष पूरी होने तक लिए जाने का प्रावधान हैवहीं राज्यों में स्थिति भिन्न है। राजस्थान में मातृत्व अवकाश अधिकतम 2 बच्चों तक प्रत्येक बच्चे पर 6माह का प्रावधान है। इस प्रकार की भिन्नताएं महिला को महिला से भिन्न बनाती है।

            अन्त में कहा जा सकता है कि नारी को अपने अधिकारों एवं समाज में सम्मान पाने के लिए उस स्थान से उतारना होगाजहां उसे पूजनीय कहकर बिठा दिया गया। उसे इन उतरती सीढ़ियों की दुर्गम यात्रा स्वयं करनी होगी। हमारे देश में महिलाओं की स्थिति अपेक्षाकृत अच्छी नहीं है परन्तु दिशा सकारात्मक दिखाई दे रही है।

 

 

 

 

 

 

 

 

सन्दर्भ सूची

  1. पैलिनीथूराईजी.इण्डियन जनरल ऑफ़ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशनवो. ग्स् टप्प् नं.1, जनवरी-मार्च 2001, पृष्ठ 39
  2. मीहेनडललीलाअचीवमेन्ट एवं चैलेन्जयोजनाअगस्त2001, पृष्ठ 56
  3. लवानियाएम.एम.भारतीय महिलाओं का समाजशास्त्ररिसर्च पब्लिशर्सजयपुर, 2004
  4. कार्यस्थलों पर भेदभाव से संघर्ष: प्रगति में बाधाश्रम (आई.एल.ओ. की पत्रिका)संख्या43, दिसम्बर2011, पृष्ठ 19
  5. सेतियासुभाषस्त्री अस्मिता के प्रश्नसामायिक प्रकाशनदिल्ली, 2008, पृष्ठ92-93

* Associate professor,

Department of Psychology,

DAV PG College BHU Varanasi

** Research Scholar,

Department of Psychology,

DAV PG College BHU Varanasi