Notice
जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

वर्तमान समयः स्त्री जीवन की समस्याएं: रेणु चौधरी [शोध आलेख]

वर्तमान समयः स्त्री जीवन की समस्याएं

रेणु चौधरी

 कमरा न. 301, गंगा हॉस्टल, जे.एन.यू,

नई दिल्ली

9968615613

 

 वर्तमान समय में स्त्रियाँ पुरुषों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर चल रही है। घर-परिवार ही नहीं वे बड़े-बड़े कारर्पोरेट्स की सी.ओ. है, कई देशों में प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक है। भारत में भी दो साल पहले श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल राष्ट्रपति थी। जयललिता और ममता बनर्जी क्रमशः तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री है। इतना सब होने के बाद भी वर्तमान समय में यह समाज, इसकी शासन एवं सत्ता व्यवस्था तथा इस देश की सेना का व्यवहार स्त्रियों के प्रति कैसा है? इसे जानने के लिए नीचे के तीन उदाहरण काफी है-

‘‘दिल्ली में 16 दिसम्बर को छः दरिंदों से जूझती, अपने साथ हो रहे अपमान और हिंसा का प्रतिकार करती, इस असभ्य समाज में स्त्री होने का दण्ड भुगतती, एक लड़की लगभग तेरह दिनों तक मौत से लड़ती रही और आखिर में मर गई। मथुरा बलात्कार कांड (महाराष्ट्र) और माया त्यागी काण्ड (बागपत) के बाद शायद पहली बार इतना मुखर जन प्रतिरोध देखने को मिला। हजारों लोगों ने एक हफ्ते तक सरकार को घेरे रखा। सोशल मीडिया के कारण पढ़ा लिखा मध्यम वर्ग और उच्च-मध्यम वर्ग सड़कों पर उतरा। विभिन्न सामाजिक संगठनों ने सरकार पर दबाव बनाया। पुलिस-प्रशासन सक्रिय हुआ। बलात्कारियों को फांसी देने या बधिया बना देने संबंधी माँगें हुईं। विभिन्न प्रकार की याचिकाएं दायर हुईं। लोगों के सामूहिक प्रयास से नए साल पर गुड़गाँव के एक होटल में अश्लील गायक हनी सिंह का कार्यक्रम रद्द करना पड़ा। लड़कियाँ मुखर हुईं। निश्चय ही शहरों और कुछेक गाँवों में जहाँ टी.वी. और अखबार उपलब्ध हैं, इस कुकृत्य की भर्त्सना हुई। इस सारी आपाधापी और विरोध के बीच राजधानी दिल्ली, हरियाणा और बहुत सारे इलाकों में बलात्कार बदस्तूर जारी रहे... अलग-अलग रुपों में औरतों के खिलाफ हिंसा की खबरें लगातार आती रहीं।’’1

 ‘‘छत्तीसगढ़ की आदिवासी शिक्षिका सोनी सोरी को पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कोर्ट में जाने की सजा के तौर पर पकड़ कर थाने ले जाकर उसे बिजली का करंट लगाया गया और उसके गुप्तांगों में पत्थर भर दिए, अस्पताल के डाक्टरों ने पत्थर के टुकड़े निकाल कर सर्वोच्च न्यायालय को भेज दिये। उसके बाद भी सरकार पुलिस वालों को बचाने के लिए मुकदमा लड़ रही है। सोनी सोरी अभी भी जेल में है।’’2

‘‘मणिपुर में मनोरमा को भारतीय सेना के जवान उठा कर ले गए और बलात्कार करने के बाद उसके जननांग में गोलियाँ दाग दीं, मनोरमा के बलात्कारियों को बचाने के लिए भारत सरकार आज भी मुकदमा लड़ रही है, इसके विरोध में उसकी सहेली इरोम शर्मिला बारह साल से अनशन पर है।’’3

 उपरोक्त तीन उदाहरण वर्तमान समय में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति को समझने लिए प्रयाप्त है। समाज में स्त्रियाँ अभी भी दोयम दर्जे की स्थिति में हैं। अभी भी स्त्रियों को पुरुष अहम् की तुष्टि के लिए ‘होम’ होना पड़ता है। स्त्री जीवन के अंधकारमय पक्ष से अभी भी इस पुरुषवादी समाज को कुछ लेना देना नहीं है। आज भी यह समाज व्यवस्था सामंतकालीन मानसिकता में जीता है। जहाँ स्त्रियाँ या तो उनके मन-बहलाने के लिए हैं या उनकी वंश परंपरा को चलाएं रखने के साधन के रूप में। सामंतवाद से लेकर आज गणतंत्र तक की यात्रा हमने कर ली है, लेकिन अभी भी स्त्रियाँ पुरुषों की निगाह में  सिर्फ और सिर्फ ‘मजा’ की ‘वस्तु’ हैं। ‘मजा’ और ‘वस्तु’ दोनों ही उपभोक्तावादी संस्कृति के शब्द हैं। उपभोक्ताकारी को किसी कार्य में यदि fun ‘मजा’ न आये तो उसके लिए वह कार्य बेकार है। उसी तरह कोई Commodity ‘वस्तु’ उसका मनोरंजन न करे तो वह भी उसके लिए बेकार है।

     आजादी के बाद भारतीय परिप्रेक्ष्य में और दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में हम स्त्री-जीवन और उनकी समस्याओं को देखे तो हमारी आँखें फटी की फटी रह जाएंगी। आजादी के बाद जिस तेजी से समाज आगे की तरफ बढ़ता है, उतनी ही तेजी से स्त्रियों को उपभोग की वस्तु में तब्दील करता गया है। ‘‘देवि, माँ, सहचरी, प्राण’’4 के आसन से उतार कर वस्तु में बदल डाला है। सातवें दशक से यह उभार भारतीय समाज में आया और आठवें दशक की तेजी ने इसमें आमूल-चूल परिवर्तन कर डाला। फिर तो उपभोगक्तावाद की जो आँधी बही, वह आज भी रुकने का नाम नहीं ले रही है। यह उपभोक्तावाद की ही माया है जो स्त्रियों को वस्तु में बदलती जा रही है। ‘मनुष्य’ और ‘वस्तु’ में मूलभूत अंतर होते हैं। वस्तुएँ कभी भी मनुष्य की जगह नहीं ले सकतीं, वे सिर्फ जगह लेने का भ्रम पैदा कर सकती हैं। जिस दिन से पुरुषों ने स्त्रियों को, वस्तुओं के नजरिए से देखना शुरु कर दिया, उसी दिन से सामाजिक संरचना में विकृतियाँ आनी शुरू हो गई। इसी वजह से स्त्री जीवन के सामाजिक और आर्थिक पक्ष में विसंगतियों के साथ परिवर्तन होने शुरू हो गए।

 ‘‘स्त्री पैदा नहीं होती, बल्कि उसे बना दिया जाता है।’’5 सिमोन द बोउवार के इस विश्व-विख्यात कथन को यदि हम देखें तो भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह आज भी उतना ही बड़ा सच है जितना कि पृथ्वी सूर्य के चारों तरफ चक्कर लगाती है। स्त्री को ‘स्त्री’ बनाने के पीछे सामाजिक और आर्थिक पक्ष एक बड़े कारक के रूप में कार्य करते हैं। स्त्रियों के जीवन की महत्वपूर्ण स्थिति उनके सामाजिक और आर्थिक जीवन से संचालित होती है। एक समय होता था जब परिवार, समाज और राष्ट्र की धुरी स्त्रियाँ होती थीं। मातृकुल परिवार होते थे। माता के नाम वंश और गोत्र के नाम पर परिवार का वंश और गोत्र चलता था। इस पूँजीवादी समाज में स्त्री गुलाम तो बनी रही, लेकिन कब तक किसी को बहलाया जा सकता है जैसे-जैसे स्त्री शिक्षित होती गयी, वह पुरुष की जकड़ से मुक्त होने की कोशिश करने लगी। लेकिन पूरी तरह से आज भी मुक्त नहीं हो पाई है। आज भी माता-पिता लड़कियों की शिक्षा पर खर्च नहीं करना चाहते। ये मानसिकता पितृसत्ता की देन है, पितृसत्ता ने स्त्री की मानसिकता को भी पुरुषवादी मानसिकता में तब्दील कर दिया है। आज स्त्री ही स्त्री को कोई काम करने में ज्यादा रोक लगाती है, जैसे- ‘‘लड़कियों के विवाह पर होनेवाला खर्च अक्सर अभिभावकों को उनकी शिक्षा पर खर्च करने से रोकता है, परिणामस्वरूप शिक्षा अथवा विवाह के खर्च में वे विवाह पर खर्च के विकल्प को ही चुनते हैं। अच्छे रोजगार से जुड़ी महँगी शिक्षा प्रतिभा और आर्थिक क्षमता की सीधी टक्कर होती है, अभिभावक अपने पुत्रों की शिक्षा पर खर्च करते हैं और पुत्रियों के विवाह पर। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था इस मायने में भी अधूरी है कि स्त्रियों में शिक्षा के बावजूद अपने अधिकारों के प्रति जागरुकता नहीं आ पाई है, शिक्षा उन्हें अपने विरुद्ध लड़ने की क्षमता नहीं देती। आत्मविश्वास और साहस नहीं देती। वस्तुतः शिक्षा का उद्देश्य अक्षर ज्ञान देना ही नहीं बल्कि आर्थिक निर्भरता के साथ-साथ आत्मसम्मान जागृत करना भी होना चाहिए। शिक्षा उनकी अभिव्यक्ति क्षमता बढ़ाए और उन्हें प्रोत्साहित करे ताकि उन्हें गम्भीरता से सुना जाए।  स्त्रियों में चुनौती स्वीकार करने की क्षमता विकसित हो सके तो उनके लिए अपने सामर्थ्य का विकास करना आसान हो जाता है।’’6

 वर्तमान समय में स्त्री आर्थिक रूप से स्वालंबी तो हुई लेकिन उसके साथ ही उसने समाज में संघर्ष भी किया। आज स्त्री को स्वतंत्र रूप से जीने का अधिकार मिला है। वह अब पुरुष की तरह हर एक क्षेत्र में अपना कदम बढ़ा रही है। एक तरह से देखा जाए तो भारतीय स्त्री आज पुरुष की तरह घर से बाहर निकल कर हर एक कार्य क्षेत्र में अपना आधिपत्य जमा रही है। वह आज पुरुष की ही तरह सामाजिक और आर्थिक रूप से सुदृढ़ हो रही है। स्त्री आज उन सभी कार्य क्षेत्रों में प्रवेश पा चुकी है जो कभी उसके लिए वर्जित समझे जाते थे तथा जिन पर सदियों से पुरुषों का वर्चस्व था। आज स्त्री केवल शिक्षिकाएँ, डॉक्टर या नर्स ही नहीं बन रही हैं बल्कि वे तकनीकी विशेषज्ञ, वकील, इंजीनियर, वैज्ञानिक, पत्रकार, पायलट आदि की भूमिका में भी अपनी पहचान बना रही है। आज  हम यह भी देख सकते हैं कि स्त्री राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियों में बड़े-बड़े पदों पर अपना अधिकार जमा रही है। कुमुद शर्मा स्त्री की स्थिति के बारे में लिखती हैं ‘‘महिलाओं की नौकरी, रोजगार, कैरियर अब चर्चा का बड़ा मुद्दा बन रहे हैं, क्योंकि महिलाएँ अब श्रम के केन्द्र में आती जा रही हैं। रोजगार के क्षेत्र में जहाँ सन् 1981 में कार्यरत महिलाओं की संख्या मात्र 19.7 प्रतिशत आंकी गई थी वही यह संख्या सन् 1991 में बढ़कर 23.3 प्रतिशत हो गई। संगठित क्षेत्रों में जहाँ सन् 1991 में 27.9 लाख महिलाएँ कार्यरत थीं वहीं उनकी संख्या सन् 1994 में 42.3 लाख हो गई। असंगठित क्षेत्रों में भी महिलाओं के काम का दायरा बढ़ा है, वातावरण सुधरा है।’’7 जहाँ एक तरफ सुधार की बात की जा रही है वहीं आज स्त्री दोहरे शोषण का शिकार भी हो रही है। वह घर के काम के साथ-साथ अपने कार्यालय का काम भी संभालती है। यह एक तरह से स्त्री के जीवन की विडम्बना ही कही जा सकती है कि अब आर्थिक रूप से मजबूत होने के साथ घर-गृहस्थी के काम को भी उसे देखना पड़ता है। वहीं पुरुष के जीवन के लिए कोई ऐसी बात नहीं है। जब पुरुष काम से घर आता है तो उसे घर की व्यवस्था नहीं देखनी पड़ती, लेकिन वहीं जब एक नौकरी-पेशा स्त्री घर आती है तो उसे अपनी पुरानी भूमिकाओं को पहले की तरह निभाना पड़ता है, अन्यथा कामकाजी होने के नाते उसे अपने सास-ससुर की व्यंग्य-वाणी भी सुननी पड़ती है। आज के दौर में स्त्री-जीवन ऐसी ही कई विसंगतियों से भरा है, जो कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था की देन है। स्त्री कितना भी आर्थिक रूप से मजबूत हो जाए तो भी उसे उन्हीं रीति-रिवाजों में बंध कर रहना पड़ रहा है।  आर्थिक रूप से मजबूत हो जाने के बावजूद पितृसत्ता की मानसिकता से वह मुक्त नहीं हो पा रही है। इस पितृसत्तात्मक समाज में वह दोहरे -तिहरे रूप में शोषण का शिकार हो रही है। आज की कामकाजी स्त्री पैसा कमाने की मशीन के साथ-साथ एक मानव मशीन भी बन गई है।

वह अपना जीवन परंपरा के अनुसार जीने के लिए अभिशप्त है। पति परमेश्वर होता है इस दायरे से वह अभी बाहर नहीं निकल पायी है। या यूं कहें कि अभी भी उससे मुक्त नहीं हो पाई है। परंपरा ने जहाँ एक ओर भारतीय समाज को पुख्ता किया, वही स्त्रियों को काफी कमजोर किया। एक तरह से हम देखें तो एक पूरी सोची-समझी साजिश के तहत सारी की सारी परंपराएँ स्त्रियों के हिस्से कुछ इस तरह से गढ़ी या मढ़ी गईं कि उनका जीवन परंपराओं व रीति-रिवाज के पालन में ही लग गया। यही परंपरा भी है, रिवाज भी, और स्त्री धर्म भी कि स्त्री घर की जिम्मेदारियों को पूरा करते हुए अपना जीवन होम कर दे। परिवार की इच्छाओं की पूर्ति करना ही उसके जीवन का एक मात्र उद्देश्य हो गया। यानी समाज में चाहे कितना भी परिवर्तन हो जाए लेकिन आज भी स्त्री-जीवन से संबंधित रिवाज नहीं बदले हैं, क्योंकि पुरुष अपनी सत्ता से कभी मुक्त होना ही नहीं चाहता। इसे पितृसत्ता की मानसिकता ही कही जा सकती है कि वह कभी नहीं सोचता कि स्त्री उसके बराबर हो, पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियों को अपने से कम आँकने का रिवाज रहा है और रिवाज की यह दीवार इतना जल्दी गिरने वाली नहीं है। पुरुषवादी समाज चाहे कितना भी स्त्रियों के पक्ष में बात करे लेकिन वह कभी नहीं सोचता कि समाज में उसका सदियों से बना वर्चस्व खत्म हो जाए। इसलिए सभी रिवाज परंपरा के नाम पर स्त्रियों के ऊपर थोपे गये। ताकि स्त्री उससे निकल ही न पाये। मैत्रेयी पुष्पा कहती हैं कि ‘‘यह हिन्दुस्तानी परंपरा है कि वह अलसुबह जागे, घर के बाकी लोगों के जागने  से पहले। घर की साफ-सफाई, तुलसी-चौरा की पूजा और उसके बाद पति को जगाना, सास-ससुर का ख्याल रखना, उनके काम निपटाना। उसके लिए साप्ताहिक अवकाश जैसी कोई चीज नहीं होती। ये परंपरा अब सड़ने लगी है। स्त्रियों ने परंपरा से आगे निकलना शुरु कर दिया है। जरा सोचिए कि नाइट ड्यूटी करके लौटने वाली स्त्री ब्रह्मुहूर्त में जागकर परंपरा कैसे निभाएगी? अगर न भी ड्यूटी पर जाए तो भी क्या वह घर में एक नौकरानी की हैसियत रखती है? मायके में पिता, भाई, की सेवा के लिए अपने आपको झोंकने के बाद ससुराल में पति, देवर, सास-ससुर की सेवा में तल्लीन रहना ही उसकी नियति है और यही वह परंपरा है, जिस पर हमें गर्व है। माँग में सिंदूर, गले में मंगलसूत्र और पांव में महावर रचाए। स्त्री कोल्हू के बैल की तरह खटती रहती है।’’8

 लेकिन आज की स्थिति में अंतर है। आज स्त्री अपनी अस्मिता को पहचानने लगी है। वह अब अपनी सुविधा अनुसार काम करती है। स्त्री आज शिक्षित हो रही है। शिक्षा ही एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा वह अपने हक या जीवन के प्रति जागृत हुई है। लेकिन समाज में स्त्री के कई वर्ग हैं और यह कह पाना की हर वर्ग की स्त्री स्वतंत्र हो रही है तथा उनकी स्थिति में सुधार आ रहा है तो यह मुश्किल है। वास्तविकता तो यह है कि स्त्री आज किसी भी वर्ग की हो, वह पूर्ण रूप से स्वतंत्र नहीं है। चाहे वह स्त्री उच्च वर्ग की हो या निम्न वर्ग की हो। जो निम्न वर्ग की स्त्रियाँ श्रम करती हैं, वे अपेक्षाकृत अधिक स्वाधीन हैं, ये स्त्रियाँ पुरुष पर पूर्ण रूप से निर्भर नहीं होती है। इसलिए उनकी समस्याएँ इतनी जटिल नहीं होती है। उच्च वर्ग की स्त्री आर्थिक रूप से स्वतंत्र होती है इसलिए हम देखेगें कि उनकी समस्या अलग होती है। लेकिन समाज में मधयम वर्ग की स्त्रियों की समस्या उच्च और निम्न वर्ग की स्त्रियों की तुलना में अलग है। समाज में नैतिकता के जितने भी चादर है सब इसी वर्ग की स्त्रियों को ओढ़ाते हैं। निम्न वर्ग की स्त्रियाँ नैतिकता को अपने सहज जीवन में उतना महत्व नहीं देती और अपेक्षाकृत स्वच्छंद जीवन जी लेती हैं। उच्च वर्ग के लिए नैतिकता कोई मायने नहीं रखता है। स्त्री चाहे किसी भी वर्ग की हो, उसे संस्कारों के तले दबना ही पड़ता है।

 

संदर्भ ग्रंथ

  1. संपादक- आशु वर्मा, मुक्ति के स्वर, अंक 16, फरवरी 2013, पृष्ठ सं- 3
  2. वही, पृष्ठ संख्या-3
  3. वही, पृष्ठ संख्या-31
  4. नामवर सिंह- छायावाद, पृष्ठ संख्या-70
  5. सीमोन द बोउवार- स्त्रीः उपेक्षिता, अनुवाद- डॉ प्रभा खेतान, कवर पृष्ठ
  6. संपादित कृष्णकान्त, जरुरत है ऐसी शिक्षा की जो जीवन जीना सिखाये, पृष्ठ संख्या-71,72
  7. कुमुद शर्मा- आधी दुनिया का सच, पृष्ठ संख्या- 61
  8. मैत्रेयी पुष्पा- चर्चा हमारा, पृष्ठ संख्या- 43