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जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

पुरुष वर्चस्ववाद को बनाए रखने में दहेज प्रथा की भूमिका: सूर्या ईवी [शोध आलेख]

पुरुष वर्चस्ववाद को बनाए रखने में दहेज प्रथा की भूमिका

(उषा महाजन की कहानी -  ‘और सावित्री ने कहा’  के विशेष संदर्भ में)

सूर्या ई.वी.

पी-एच.डी. शोधार्थी

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय

वर्धा, महाराष्ट्र

 

समाज में पुरुष को स्त्री से अधिक महत्व प्राप्त है यह केवल इसलिए नहीं कि वह कमाकर लाता है बल्कि भारतीय संदर्भों में कहें तो यह सामाजिक और धार्मिक मसला बनकर भी उभरता है महिलाओं की गतिशीलता पर नियंत्रण उनकी लैंगिकता के इर्द-गिर्द कई प्रकार के मिथ खड़े कर लगा दिए जाते हैं|  लगातार स्त्री-पुरुष असमानता को बढ़ावा देने वाली कई प्रथाओं का भी निर्माण हुआ, जिससे पुरुष अपने अधिकार को ओर मज़बूत बनाता रहा| इस रूप में दहेज-प्रथा स्त्री शोषण का सबसे बड़ा हथियार  है| शिक्षा के प्रचार-प्रसार एवं मानवी विकास के तमाम नारों के बावजूद प्रचलित भ्रष्ट समाज–व्यवस्था में आज भी दहेज-प्रथा रूढ़ नज़र आती है| हर रोज समाचार पत्रों के पन्ने नारी की अहम सफलताओं से कई गुण ज्यादा दहेज उत्पीडनों एवं हत्याओं से ही रंगे हुए दिखाई पड़ते हैं|

उषा महाजन की कहानी- ‘और सावित्री ने कहा’,  समाज में मौजूद दहेज प्रथा की वजह से स्त्री के जीवन में आने वाले कई संकटों का पर्दाफाश करती है| स्त्री एक तरफ अपने इस संकट से मुक्त होने व विरोध जताने के तौर पर कभी आत्महत्या करना, घर छोड़कर जाना, तलाक देना या कानूनी लड़ाई आदि कई रास्ते से गुजरती हुई देखने को मिलती है और दूसरी तरफ वह सब कुछ झेलते हुए उसी ज़िंदगी में खुद को सिमटने का प्रयास करती है| प्रस्तुत कहानी में सावित्री दहेज के खिलाफ अपना प्रतिरोध आत्महत्या के ज़रिए दिखाना चाहती थी, लेकिन आत्महत्या किसी भी समस्या का हल नहीं होने की स्थिति में वह स्वयं घर छोड़कर चली जाती है|

लेखिका  ने अपनी इस कहानी में दहेज की  समस्यायों के चित्रण के साथ-साथ जिस रूप में लड़की दहेज-प्रथा के चलते अपनी पूरी ज़िंदगी में दोयम दर्जे की शिकार हो जाती है, जिसकी ओर पड़ताल की है|

कहानी की शुरुआत में माँ-बाप की परेशानी देखने को मिलती है जिसमें  वे  अपनी  बेटी सावित्री की शादी में दहेज देने हेतु पैसे के इंतजाम करने में जुटते हैं| सावित्री बी.ए के साथ-साथ कमर्शियल आर्ट का करेंसस्पोंडेस कोर्स करना चाहती थी पर दहेज में पैसे जुटाने के नाम पर उसे अतिरीक्त शिक्षा हासिल करने नहीं दिया गया| इसके अलावा, दहेज के नाम पर सावित्री अपने ही परिवार में लैंगिक भेदभाव की भी शिकार रही| क्योंकि सावित्री के घरवालों ने उसके भाई वीर को इंजिनीयरिंग पढ़ने की अनुमति दी, परंतु सावित्री को बी. ए पास होने के बाद भी आगे पढ़ने का मौका नहीं दिया गया| यहाँ पर एक बात साफ नज़र आती है कि नारी को पराये धन मानने वाले समाज में नारी शिक्षा को कमतर माना है| इस संदर्भ में सावित्री अपनी माँ से कहती है कि “आप वीर को उस इंजिनियरिंग कॉलेज में दाखिला दिलवा आये थे और पहले दर्जे में बी. ए पास करने के बावजूद आपने मुझे आगे पढाने से इनकार कर दिया था| जो राजी हुआ उसी के साथ ब्याह दिया, बेटी जितनी जल्दी अपने घर चली जाए उतना ही अच्छा! ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती है लड़कियों की अच्छे लड़के मिलने मुश्किल होते जाते हैं...|” पृ. 12 देखा जाए, तो सावित्री को बी. ए तक पढ़ने की अनुमति इसलिए मिली थी क्योंकि लड़की के अनपढ़ होने से उसकी शादी में रुकावट पैदा होती है| बी. ए के साथ दूसरा कोर्स करना और बी. ए के बाद उसकी आगे की पढाई उसके माँ- बाप की नज़र में जरूरी नहीं थे बल्कि उनके सामने दहेज ही बड़ा मुद्दा था| दहेज जुटाना और सावित्री के आगे की पढाई की फीस यह दोनों उन माँ-बाप की बस की बात नहीं थी| एक तरह कहा जाए तो दहेज प्रथा ने सावित्री के करियर पर लगाम लगा दिया|

समाज में “जहां स्त्री की साक्षरता की दर 1901 में 0.69 प्रतिशत से 1971 में बढ़कर 18.4 प्रतिशत हो गई वहां निरक्षर स्त्रियों से बढ़कर स्त्री शिक्षा 1950-51 में 16 करोड़15 लाख से बढ़कर 1970-71 में  21 करोड़ 53 लाख हो गई[i]पृ. 36   इस तरह भारतवर्ष में निरक्षर लोगों के आँकड़े में स्त्रियों की संख्या बढ़ती जा रही है। क्योंकि समाज लड़की के करियर से ज्यादा उसके लिए दहेज जुटाने में, उसे खाना बनाना आदि काम सिखाने में दिलचस्पी दिखाता है, जबकि वही लोग लड़के को पढ़ाने में ज्यादा खर्च भी करते हैं। इससे पता चलता है कि शिक्षा के स्तर पर स्त्री-पुरुष भेदभाव किस स्तर पर पहुंच गया है| इसका नतीजा यह हुआ कि लड़की के खुद के चाहने पर भी वह पुरुष की तरह शिक्षा नहीं हासिल कर पाती। इस तरह उच्च शिक्षा हासिल नहीं होने से वह अच्छी नौकरी भी नहीं प्राप्त कर पाती। इस प्रकार स्त्री को अपनी क्षमता का उपयोग करने का अवसर नहीं मिलने की स्थिति में वह अपने आधे-अधूरे सपनों के साथ जीने को विवश होती है।

  बेटी के जन्म होने से हर माँ-बाप के चेहरे पर दहेज का साया पडने लगता है| अर्थात् हर माँ-बाप, बेटी होना यानि कि ‘दहेज का इंतजाम अभी से शुरू करो’ की मानसिक स्थिति में उतर जाते हैं| बेटा होने का मतलब यह है कि ‘माँ-बाप इस परेशानी से मुक्त’| यह मानसिक स्थिति कहीं न कहीं बेटी को एक बोझ के रूप में धकेलने लगती है| इस वजह से ही जब घर में बेटी पैदा होती है तब घरवाले बेटे की अपेक्षा में बेटी की उपेक्षा कर बैठते हैं| प्रस्तुत कहानी हमें इस स्थिति की ओर भी संकेत करती है| कहानी में सावित्री दो बच्चों की माँ है - एक लड़का और एक लड़की| समाज में लड़की को बोझ मानने वाली इसी मानसिक स्थिति, सावित्री के ससुराल वालों के अपने पोते के प्रति अधिक प्यार और अपनी पोत्ती का तिरस्कार करने में दिखाई देती है|

दहेज प्रथा स्त्री का सबसे बड़ा दुश्मन है| अत: यहाँ पर स्त्री होने के कारण केवल सावित्री ही नहीं, बल्कि उसकी बेटी भी दहेज प्रथा से उत्पन्न लैंगिक भेदभाव की शिकार बनी है| इससे पता चलता है कि जब तक दहेज प्रथा हमारे समाज में मौजूद रहेगी तब तक स्त्री को अपने जीवन की हर परिस्थिति में इस भेदभाव भरी मानसिकता के बीच से गुजरना ही पड़ेगा|

इस तरह दहेज सावित्री के जीवन में निरंतर एक सूई की तरह चुबता रहा| क्योंकि सावित्री की शादी उसके घरवाले दहेज जुटा-जुटाकर मनोविज्ञान का प्राध्यापक के साथ कराये थे परंतु उसकी दिक्कतें एक पढ़े-लिखे इंसान के साथ शादी करने के बाद भी कम नहीं बल्कि बढ़ती गई| अपने पति के बारे में स्वयं सावित्री कहती है कि “वह घर में अपनी बीवी को बेजुबान बना कर कॉलेज में लड़के–लड़कियों को ज़िंदगी की सच्चाई का पाठ पढ़ाता था|” पृ. 12 यहां पर वैवाहिक जीवन में सावित्री की असंतृप्ति दिखाई देती है|

यही नहीं, उसके पति और सास-ससुर भी दहेज के नाम पर उसको ताना देने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे| उसका पति कहता है कि “न जाने कैसी किस्मत फूटी थी कि तुझ जैसी निकम्मी पल्ले पड़ गई| यह तो माताजी-पिताजी ने ही खानदान–खानदान की रट लगाई हुई थी| और मिला क्या? न पैसा पल्ले पड़ा, न लड़की| अरे, कोई मार्डन लड़की होती| अपने बराबर की पढ़ी-लिखी| साथ चलने लायक| और कमा कर लाती सो अलग| या फिर मिलता दहेज में ढेर-सा पैसा|” पृ. 13 इस संदर्भ में डॉ महेंद्र भटनागर लिखते हैं कि “हिंदू समाज में वैवाहिक समस्या को सबसे अधिक जटिल दहेज प्रथा ने बनाया है|” पृ. 171 सावित्री का पति केवल उस के ऊपर गुस्सा ही नहीं बल्कि उस पर मार-पीट भी करता रहा| कई बार उसके पति ने उसके पिता को पत्र लिखकर वीडियो, वाशिंग मशीन आदि सामान मंगवाए और अपने नए मकान बनवाने के नाम पर माइके से पैसा माँगने हेतु सावित्री को परेशान करते रहे| जब सावित्री ने अपने माँ-बाप को पत्र लिखने से इनकार किया तब उसका पति इस तरह उसे मारने और गाली-गलौज करने लगता है कि “नहीं लिखेगी साली? नहीं... नहीं ...?”

जब साबित्री के माँ-बाप उसके ससुराल आते तब उसका पति उनके साथ ऐसा व्यवहार करता है जिससे कि उन्हें अपने दामाद का असली चेहरा पता नहीं चलता और वे दोनों खुशी-खुशी अपने घर वापस जाते| लेकिन दहेज के नाम पर हो रही घरेलू हिंसा से परेशान सावित्री अपनी सारी दुर्दशा के बारे में अपनी माँ से कहती है कि “कटे हुए होंठों का नमकीन खून चुसती मैं वैसे ही फर्श पर औंधी पड़ी रही| चन्नी सहमा हुआ बैठा था| घुटनों के नीचे मेरी सलवार को थामे| पिंकी नन्हे-नन्हे हाथों से मेरी पीठ पर पीटती रुक-रुक कर रों रही थी| मुझसे न हाथ बढ़ाकर चन्नी को दिलासा दिया जा रहा था, न पिंकी को उठाकर छाती से लगा पाई| जी और जिस्म के नए पुराने जख्म सारे तीस-तीस कर पुकार रहे थे, न, अब और नहीं सहा जाता|” पृ. 15

यूँही रोज़ पति के  मार खाने के बाद भी सावित्री को तन- मन के दर्दों के साथ घर का काम करना पड़ता है| घर का कोई भी उससे कोई हमदर्दी नहीं दिखाते बल्कि सब ऐसा व्यवहार करता जैसे घर में कुछ हुआ ही नहीं| अपनी इस पीड़ा से ऊबकर सावित्री स्वयं सोचने लगती है कि “मेरे जीने का मकसद ही क्या है? क्या करूँ मैं इन्सान के इस जन्म की नियामत को लेकर? क्यों पल-पल, दिन-दिन ज़िंदगी की सांसें गिनती रहूँ? कौन है मेरे आगे-पीछे? किसकी इज्जत, किसकी मर्यादा? अपनी तकलीफों का खत्म करने का हक क्यों नहीं है मुझे? है क्यों नहीं? पूरा हक है मुझे! बच्चों के लिए किस के लिए छोडूँ? चन्नी को तो हरगिज़ नहीं है| जाते-जाते यह एक सज़ा तो देती ही जाउंगी इन कसाईयों को| पिंकी को भी नहीं छोडूंगी| अपने पीछे एक और सावित्री को छोड़ने की भूल नहीं करनी मुझे!|” पृ. 16

यहाँ पर सावित्री अपनी परेशानियों से स्वतंत्र होने और अपने पति व  ससुराल वालों को सबक सिखाने हेतु आत्महत्या को हथियार बनाना चाहती थी| लेकिन दूसरे ही क्षण में अपने नन्हें बच्चों के मासूम चेहरे को देखते हुए सावित्री के अंदर आत्म विश्वास जागा और उसने आत्महत्या करने की चिंता को अपने मन से उखाड़कर फेंक दिया|

फिर वह अपने आप से कई सवाल पूछने लगती है कि “फिर आखिर क्यों सह रही थी मैं उस आदमी को, जिसके लिए मैं केवल एक देह थी, वह भी अनचाही? अपने जीवन को पल-पल मसला जाता देखकर भी क्यों मैं उसके साथ बंधी रहूं? क्या सिर्फ इसलिए कि उस घर के सिवा मेरे लिए और कहीं ठिकाना नहीं था, कि मैं जानती थी कि मेरे माँ-बाप भी मुझे ठौर नहीं देने के? क्या सिर्फ इसलिए कि परंपराओं ने मेरे भीतर कूट-कूट कर भरा हुआ था कि एक बार जिसके नाम का सिंदूर माँग में भरा गया उससे जुडा जीवन का कोई अर्थ ही नहीं?”  पृ. 15

यहाँ पर सावित्री के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण सवाल उसकी आर्थिक स्थिति है| सावित्री उच्च शिक्षा से वंजित और बेरोज़गार स्त्री है| सावित्री को यदि पढ़ने का मौका मिला होता शायद उसकी जिंदगी कुछ ओर बन जाती थी| लेकिन दहेज के चलते उसे पढ़ने का अवसर देने के बजाय उसकी शादी करवाई गई| अत: वह बेरोजगार रही| इसलिए ही शादी के बाद उसे आत्महत्या करने को सोचना पड़ा या उसे अपने आपसे यूँही सवाल करना पड़ा कि वह क्यों उस आदमी को सहती गई| यदि सावित्री आर्थिक आत्मनिर्भर होती, तो शायद वह यह सब न करती बल्कि अपना रास्ता पहले से तय कर ली होती| क्योंकि इस कहानी में सावित्री अपने दो बच्चों की माँ होने और अपनी इस असहाय व निर्धन स्थिति में भी ससुराल छोड़कर जाने की हिम्मत दिखाती है| प्रस्तुत कहानी में दहेज प्रथा सावित्री के जीवन में त्रासदी बनकर खड़ी होती है| दहेज प्रथा से सावित्री अपने पूरे जीवन में भावनात्मक ही नहीं बल्कि शारीरिक शोषण की शिकार बनती है|

अत: सावित्री अपने माँ-बाप से ही सवाल करती है कि “मेरी फीस के पैसे बचाकर आप जो फुलकारी की चद्दरें और बनारसी रेशमी साडियों की सौगात जुटाती रहीं, वह भी मेरे किस काम आई? बुझी हुई आँखों वाले चेहरे पर तो कुछ भी कभी नहीं फब सका|”  पृ. 11 कहानीकार यहाँ पर समाज के दहेज लेने वालों की अपेक्षा में दहेज देने तैयार होने वाले लड़की के माँ-बाप का विरोध करते हुए दिखाई देती है| इस संदर्भ में मैत्रेयी पुष्पा कहती है कि ‘दहेजदाता और दहेज लोभी के बीच अंतर की बारीक सी लकीर तक नहीं| बस एक सिक्के के दो पहलू हैं| पहला बेटी को संपत्ति से बेदखल करता है, दान-दहेज देकर, दूसरा, बेटे के दम अतिरीक्त धन और सामान जुटा लेता है|” पृ. 19

और सावित्री ने कहाकहानी कोई नए और अपरिचित सवाल भी नहीं उठाती यह सवाल उन्नीसवी सदी के प्रारंभ से ही उठाए जा रहे हैं मगर आज भी इस सवाल के स्वरूप में बहुत अधिक अंतर नहीं दिखलाई पड़ता. आज भी महिलाओं को शिक्षा उतनी ही दी जा रही है जिससे उनका विवाह हो सके न कि वह स्वतंत्र व्यक्ति की तरह जीवन यापन कर सकें. भारतीय समाज आज भी मिथकों पर आधारित एक ढोंगी समाज है जहां पर महिलाओं की पूजा करने और उनके ऊपर हिंसा समांतर चलती हैं|

कुल मिलाकर कहा जाए, तो ऐसी कई सावित्रियाँ हमारे बीच आज भी मौजूद हैं जिन्हें दहेज व लैंगिक भेदभाव के नाम पर बहुत कुछ सहना पड़ रहा है| कहानी के  भीतर के समाज का सीधा संबंध कहानी के बाहर के वास्तविक समाज से होता है यह कहानी उसी वास्तव का प्रतिनिधित्व करती है.महिलाओं के प्रति हो रही घरेलू हिंसा सिर्फ वह हिंसा  नहीं होती जिसके निशान शरीर पर देखे जा सकते हैं बल्कि ऐसी हिंसाए भी होती हैं जो पूरी तरह से महिलाओं का मनोबल तोड़ती है, चाहे उन्हें पढ़ाई के अवसर प्रदान करने में आनाकानी करना हो अथवा उनकी क्षमताओं पर अविश्वास जताना हो, यह तमाम कारक भी महिलाओं के प्रति हो रही हिंसा के स्वरूप हैं जो अदृश्य हैं, जिन्हें रेखांकित भी नहीं किया जाता. इन तमाम कारकों को जिम्मेदार माने बिना महिलाओं पर दोहरी जिम्मेदारी थोपी जाती है. पितृसत्त्ता के इन अदृश्त स्वरूपों को भी रेखांकित करने की आवश्यकता है जिससे महिलाओं की वैक्तिकता का विकास हो सके|

संदर्भ ग्रंथ सूची:-

  1. पृ. 12, और सावित्री ने कहा, उषा महाजन, किताब घर, नई दिल्ली, 1996
  2. पृ. 36, अंजुमन दीप कौर, कामकाजी नारी: उपलब्धि और संताप के दायरों में
  3. पृ. 12, और सावित्री ने कहा, उषा महाजन, किताब घर, नई दिल्ली, 1996
  4. पृ.174, डॉ रेशमी रामदोनी, समकालीन हिंदी लेखिकाओं की कहानियों में अभिव्यक्त बहुआयामी विद्रोह
  5. पृ. 171, डॉ महेंद्र भटनागर- समस्या मूलक उपन्यासकार प्रेमचंद
  6. पृ. 13, और सावित्री ने कहा, उषा महाजन, किताब घर, नई दिल्ली, 1996
  7. पृ. 15, वही
  8. पृ. 16, वही
  9. पृ. 15, वही
  10. पृ 19, सुनो मालिक सुनो