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जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

स्त्री का राजनीतिकरण और मृदुला गर्ग: अजय कुमार साव [शोध आलेख]

स्त्री का राजनीतिकरण और मृदुला गर्ग

 

अजय कुमार साव

एसिस्टेंट प्रोफ़ेसर, हिंदी विभाग

सिलीगुड़ी महाविद्यालय

सिलीगुड़ी, दार्जिलिंग

पिन -734001

shaw.ajaykumar1@gmail.com

मो० : 8509734578

 

 

अंतर्विरोधों से गुज़रते हुए समय की गति को उसकी ऐतिहासिकता में जाना जा सकता है, तो साथ ही समय की गति के गंतव्य को उसके संभावित विविध आयामों में पहचाना भी जा सकता है। ऐसे आयामों में स्त्री की राजनीति में भागीदारी एक अंतर्विरोधी पहलू है। आज़ादी पूर्व की राजनीति की दिशा से वर्तमान राजनीति बिल्कुल फ़र्क़ लिए है। एक ओर पंचायत में महिलाओं को प्राप्त आरक्षण गौरव का विषय माना जाता है, तो संसद में महिला आरक्षण बहु प्रतीक्षित उपलब्धि समान प्रतीत होता है। इसे सशक्तिकरण से जोड़कर देखा जाना भले ही स्वाभाविक हो, पर यथार्थ में अत्यंत ही अंतर्विरोधी है। स्त्री की राजनीति में भागीदारी के प्रति आश्वस्त होने की दिशा में इसकी वर्तमान दशा का पर्याय है,  मृदुला गर्ग की कहानी 'मेरे देश की मिट्टी, अहा!'। महिला आरक्षण का अवसर-लाभ सामुदायिक प्रगति में परिकल्पित है, जो सदा के लिए सुखद परिकल्पना बनती दिख रही है। राजनीति में महिला आरक्षण महिला के सशक्तिकरण को कम, सत्ता में आसीन महिला के  सशक्त होने की गाथा अधिक  बनता जा रहा है। इसकी पहचान स्त्री के राजनीतिकरण के रूप में अनिवार्य है। विचारणीय पहलू यह है कि आज 'स्त्री-राजनीति' जैसी अवधारणा का भी 'राजनीतिकरण' हो चुका है। यही कारण है कि राजनीति की विसंगतियों से सत्ता-प्राप्त स्त्री भी बची नहीं रह पाती और महिला सशक्तिकरण के एक आयाम को सार्थक करती परिकल्पना अंतर्विरोधों से ग्रसित है, जिसका जीवंत दस्तावेज़ है कहानी 'मेरे देश की मिट्टी, अहा!'।

      गंभीरता तटस्थता का प्रस्थान है, जिसमें समय-समाज की गति के अवश्यंभावी गंतव्य का दर्शन किया जा सकता है। स्त्री-विमर्श मृदुला गर्ग के लिए एकांत में सृजन का आनंद लोक नहीं है। पारिवारिक-सामाजिक, प्रशासनिक-राजनीतिक प्रतिकूलताओं के बीच अनुकूलित स्त्री समाज के प्रतिनिधि स्त्री पात्र के तटस्थ आकलन का नमूना देखा जा सकता है,  कहानी 'मेरे देश की मिट्टी अहा!' में । लल्ली कहानी का केंद्रीय नारी पात्र है। दादी सुनाती है ----"अपने गांव के अपनो ने ही लूटा हमे लल्ली, ...क्या प्रपंच ना किये। क्या महाजन, क्या ठाकुर-पंडित सब एक जैसे सियार निकले।" 1 यहां सामाजिक स्तर पर संवेदनागत मूल्य के क्षरण की बेबाकी से की गई टिप्पणी संवेदना अवश्य जगाती है। लल्ली के प्रति दादी की मृत्यु के बाद उस जमीन पर, जहां रहती थी, जानवरों की हड्डियों से खाद बनाने का कारखाना स्वास्थ्य की दृष्टि से अवश्य ही जानलेवा साबित हो रहा था। पर, चमारों की बस्ती में ऐसी पहल प्रगति का सूचक बना। रोजगार की संभावना का द्वार दिखा। सो सब मौन। आगे कहती हैं ---" तिस पर उन दिनों प्रगति का नारा जोरों पर था। प्रगति माने  वोट। ... चमारों में वोट डालने का नया-नया चलन हुआ है। सो प्रगति अब उनके खीसे में।" 2 कितने हौले-हौले समाज से राजनीति का को विषय बना डालती है, मृदुला गर्ग की कहानी कला की अद्भुत उपलब्धि है।

   वर्तमान का अकल्पनीय दिशा में करवट लेना अवश्य ही संयोग है, पर इस संयोग के प्रति पाठकों को 'कपोल कल्पित' कहानी की मानसिकता से मुक्ति और घटित के यथार्थ के प्रति आश्वस्त करने की औपचारिकता  भी करती है मृदुला गर्ग। लिखती हैं ---" इस कहानी मे संयोग कुछ ज्यादा जुटे आ रहे हैं ...जाने क्यों लोग चाहने लगे हैं कि कहानी में हादसे संयोग वगैरह ना हो। भला बताइए जब हादसों संयोगों के अंबार का ही नाम जिंदगी हो तो ऐसी बेरुखी फरमाइश क्यों ?...कहानी में हर हुए का तर्कसंगत कारण दिखलाए तो जिंदगी का रस चौपट और जिंदगी की तर्कहीनता से मेल खाती कहानी लिखे, तो गुनी जनों के जूते खाए। जहां तक लल्ली-लैला की राम कहानी का सवाल है, इमानदारी का तकाजा है कि जो-जो हुआ, वही कहती चलूं। अब अन्य चाहे तो माफी दे, चाहे तो जूते मारे।" 3 ।  पाठकों-आलोचकों की कहानी कला से अपेक्षित मानदंडों पर व्यंग्य करने से परहेज नहीं करती हैं। मृदुला गर्ग लेखन की तटस्थता व इमानदारी की गंभीरता ने ही इनकी सृजन-प्रवृत्ति को बोल्ड बनाया है। अपेक्षा इतनी है कि उनके 'कथा-मोड़' को संयोग के रूप में ना लेकर, कटु यथार्थ के रूप में लिया जाए।

        संयोग सुख में स्वीकृत और दुख में विकृत होते हैं। लल्ली का संयोग  सुख-दुख के अंतःमिश्रण का बेआवाज यथार्थ रचता है, जिसके लिए मृदुला गर्ग के किस्सागोई का सहारा अवश्य लिया जाना चाहिए। किस्सागोई में छिपा यथार्थ लल्ली से पाठकों को कई दिशाओं में बांधे रखता है। किस्सागोई के महत्व पर अखिलेश ने लिखा है ---"सूचनाओं के संजाल की वजह से किस्सागोई समाप्त हो रही है, तो यह फिक्र करने की बात है। चूँकि वहां वस्तुतः किस्सागोई नहीं है, जिंदगी के डिटेल्स गायब हो रहे हैं और उसके बगैर कोई आख्यान नहीं रचा जा सकता है। " । 4 लल्ली के साथ प्रथम संयोग घटित होता है दादी की मौत के रूप में। दूसरा, ताई के यहां रहना पड़ा, 20 की हुई नहीं कि ताई-ताऊ की मंशा के तहत हवलदार जीजा से व्याह की नौबत आन पड़ी। इसी वक्त मुसलमान युवा से मुलाकात और विवाह के समय उसके मुसलमान होने का पता चला। गांव जाने के बाद पता चला कि उसके शौहर की पहली पत्नी भी है और बरस भर का लड़का भी। संयोग ही रहा कि पुलिसिया जीवन से भागी और डेढ़ पसली छोकरे से विवाह किया, पर वह भी पत्नी की मार-कुटाई में माहिर है। व्यंग्य अवलोकनीय है ---"दो-चार दिन के त्यौहार के बाद समझ में आया कि हो ना हो उससे शादी इसलिए की होगी क्योंकि पसली चढ़ी पहली बीवी की खाल पर जश्न मनाने  में कातिल होने का डर था।" 5 । संयोग घटित हुआ कि पहली पत्नी की मौत हो गई और गांव आना हो पाया। जहां सौतन की मौत पर दुख जताया, सास ससुर की सेवा की, बच्चे को प्यार किया, गांव वाले खुश रहे। मियां अकेले लौटे।, वह गांव में रह गई। पर, अगर संयोग यह हुआ कि उसकी दादी की सिली बंडी पहन कर बड़ा हुआ और उसके बनाए खिलौने बेच कर पढ़ा-लिखा बंदा आरक्षित कोटे से जिला नूह से एक MLA चुन लिया गया था, उससे मुलाक़ात हो गई। राजनीतिक फ़ायदा देखकर बंदा ने लल्ली को साथिन मुक़र्रर कर दिया । मृदुला गर्ग ने नया सत्ता-संदर्भ जोड़ा है ---" बनिये की बेटी के मुसलमान होने और ख़ास मुसलमानी के गाँव में आ बसने के भीतर उसे ख़ासा राजनीतिक मुनाफ़ा नज़र आया। ... झटपट लैला गाँव में साथिन मुक़र्रर कर दी गई। अब भला लैला उसे कहाँ शहर बुलाता? पक्की आमदनी तो गाँव रहने में होनी थी। साथ में परिवार की टहल। एक और बीबी लाने की मनाही थी नहीं, सो उसने शहर में अपना बन्दोबस्त कर लिया।"  6 । यहाँ कहीं भी विरोध नहीं है। पाठक को लग सकता है कि आख़िर स्त्री-शोषण के प्रति इतना मौन क्यों?  स्त्री मुखर नहीं हो पा रही क्यों? इनके कारणों के पीछे भागना विमर्शवादी मुहिम हो सकता है, पर यहां तो मृदुला गर्ग विरोध प्रतिरोध से ऊपर अंतर्विरोध में गतिमान सत्य की अनिवार्य परिणति की खोजी यात्रा कर रही हैं। यह समझना अनिवार्य है। साथिन के रूप में लैला के जिम्मे तीन कार्य रहे, जिनके फ़ायदे के बारे में मृदुला गर्ग लिखती हैं --" वह सब महज किताब में दर्ज करना होता था। ... एकाध फ़ीसदी मिकदार साथिन के हिस्से भी आ जाती थी। उसके सहारे लैला का बेटा और की निष्बत बेहतर पल बढ़ रहा था। ... परिवार नियोजन.... किताबी खानापूरी उसकी भी करनी पड़ती थी। सहेली नाम की गर्भ निरोधक गोलियां बदस्तूर आती थीं और बंटी चाहे नहीं, बदस्तूर बंटती हुई दिखलाई जाती थीं। लैला का 12वीं पास होना किताबी कार्यवाही के लिए मानी रखता था। तभी न सरकार साथिन को साक्षर बनाने पर आमादा है।" 7 । यहां स्त्री का सत्ता-लाभ केंद्रित चरित्र उभरता है, ना कि समाज-बोध से संपन्न व्यक्तित्व की कोई संभावना है। साथ ही साक्षरता अभियान की विडंबना को भी देखा जा सकता है।

 

मृदुला गर्ग ने किस्सागोई को व्यंग्य की धार प्रदान कर परिवार-राजनीति-समाज सेवा की विडंबनाओं पर कड़ा प्रहार किया है। लैला साथिन के रूप में किताबी कार्रवाई और बंधी आमदनी पाकर निर्भीक हो गई और समझदार भी। शौहर पैसे के लोभ मैं लैला की जी भर कुट्टमास कर लेने पर भी कुछ नहीं पाता। एम०एल०ए० से कह कर व्यवस्था कर रखी थी। एक पैसा भी शौहर के हाथ ना लगे। मृदुला गर्ग ऐसे चरित्र विकास का परिचय देती है ---" सैयां को धता बतलाने और किताब में खाना पूरी करते लैला उस मुकाम पर जा पहुंची, जहां एकदम बोल्ड बन गई। गर्भनिरोधक सहेली की सप्लाई में से एक जने की खुराक खुद निकलने लगी। एकदम नियम से रोजाना, बिना नागा ... उसी के साथ उसे मार से बचने की तरकीब भी सूझ गई। अगली बार सैया घर आया, उसने उसे सहेली की तमाम बेबंटी गोलियां थमा दी कि गुपचुप ले जाकर शहर में बेच ले और मौज करें। ... बेचारे को ख्याल भी ना आया कि उसकी बीवी खुद उन गोलियों का सेवन कर सकती है। ... उसे पता चलता कि लैला की हिम्मत खुदा के खौफ को धता बतला चुकी है, तो वह उसे औरत मानने से इनकार कर देता। ... आप चाहें तो, आप भी कर दें। औरत मानें, मर्द माने, छिनाल मानें, फर्जी मुसलमान मानें, जो चाहे मानें, कहानी उसी की कही जाएगी। " 8 | आशय यह है कि अब लल्ली से बनी लैला को भय नहीं, ना पति का, न समाज का और ना ही खुदा का, अपने लिए, अपने ढंग से जी रही है। पर सही-गलत, उचित-अनुचित की परवाह के बगैर।

 

एक और संयोग कि हड्डियों की खाद बनाने का कारखाना हटाना था। लोकतांत्रिक पद्धति का सहारा लेती है। एम० एल० ए० से निराश होने पर भी लगी रहती है। एक व्यंग्य देखते ही बनता है --" गांव भर की मीटिंग बुलानी होगी और कारखाना बंद करवाने की राह तलाशनी होगी। सीधी डगर ना हो, तो टेढ़ी ढूंढनी होगी। इतनी नीति की बात औरत मर्द सभी जानते हैं। श्रीकृष्ण से लेकर इंदिरा गांधी तक, तो लैला क्यों नहीं जानेगी। इस देश की मिट्टी में पली बढ़ी है।" 9 l एम० एल० ए० से उम्मीद थी, पर निराशा हाथ लगी ---" साथिन का काम है परिवार की देख रेख और नियोजन। ... औरत जात को औरत जात की तरह रहना चाहिए।" 10 l यहाँ 'औरत जात' के संबोधन के प्रति बिना आक्रोश प्रकट किए एम० एल० ए० के शहर जाते ही फ़रमान मियाँ के पास अपनी इच्छा दर्ज की, इस शातिरी के साथ ---" एक राज की बात कहनी थी। ... पहले यह खाल -खींच, हड्डी-चूरा बनाने वाला कारख़ाना हिंदुओं के गाँव में लगने वाला था। पर, बालमन-बनियों ने जोड़-तोड़ करके यहाँ लगाव दिया। मैंने जो सुनी, कह दी, अब आप जाने और गाँव के बाक़ी मर्द।" 11 ।  यहाँ 'मर्द' शब्द की व्यंजना बहुआयामी है। यह है स्त्री-भाषा, जिसमें पुरुष-वर्चस्व में सेंध की सामर्थ्य देखी जा सकती है। भाषा में पहचानना हो मृदुला गर्ग को, तो यह एक अच्छा उदाहरण है।

 

राजनीतिक दावपेंच के प्रति सजग लल्ली की दूरदर्शिता देखते बनती है ---" और इससे पहले कि बाहर से कोई झोले वाला आकर गांव वालों को उकसाए के कारखाने में नौकरी पाने के लिए मोर्चा लगाएं मीटिंग बुलाकर मामला सेट कर लेना चाहिए ।"  12 । हर हाल में कारखाना को हटवाने, बंद करवाने पर आमादा लल्ली साथिन होने के नाते मीटिंग बुलवाई और वहां बैठी भी, मुंह ढक कर, एक कोने में। यहां यह चित्रित है कि स्त्री मुस्लिम सामाजिकता से केसे खुले में नहीं टकराती है, कहीं से स्त्रीवादी मुहावरे को जगह नहीं मिलती, एक लक्ष्य को भेदती आगे बढ़ती लल्ली की रफ्तार देखते बनती है।

राजनीतिक अवसरों को लोक व्यवहार कुशल आज की युवा पीढ़ी गवाना नहीं चाहती। युवक का प्रस्ताव अवलोकनीय है ---" और हम आप खुश किस्मत हैं जो संयोग से आजकल हर जगह प्रदूषण और पर्यावरण के नारे लग रहे हैं। ऊपर से इलेक्शन भी होने वाला है।" साथ ही यह ..."आज के जमाने में हर बीमारी से निबटने का एक ही नुस्खा है, पैसा। अगर कारखाना हटाना है, तो पैसा लगाना होगा। 2000 जमा करो और प्रदूषण के नाम पर मजिस्ट्रेट की अदालत में केस ठोक दो। रुपए उसकी नजर करो और फैसला अपने हक में करवा लो, किस्सा ख़त्म।" 13 | एक ओर व्यवहार कुशलता का परिचय मिलता है, तो साथ ही प्रशासनिक भ्रष्टाचार का भी नमूना।  वह कहता है ---" बिना ट्रेनिंग के लिए लोगों को सरकार सिर्फ एक काम का तुरंत पैसा देती है। नसबंदी करवाने का। सरकारी प्रावधान का अवसर के अनुकूल इस्तेमाल का प्रयास सही-गलत, उचित-अनुचित से ऊपर जरूरी और गैर जरूरी की नजर से किया जाता है। बुजुर्ग को कहा जाता है बुजुर्ग महिला को लेकर नसबंदी कराने जाए। सवाल यह भी रखता है कि भला बुजुर्ग महिला की नसबंदी होगी ही क्यों? और इसी बहाने सरकारी काम की पोल भी खोलती चलती है मृदुला गर्ग ---" सरकारी अमला लालची कमीना भले हो, गैर जरूरी काम नहीं किया करता। किताबी कार्रवाई भर होगी। बस! साथिन अपने साथ है, रुपया मिल जाएगा।" 14 |  यहां साथिन के साथ भरोसा और कुछ नहीं, सरकारी ट्रैक पर गैर सरकारी के चलन को प्रमाणित करता है।

एक ओर लैला की प्रदूषण विरोधी अभियान की नीति और दूसरी ओर युवा की कारखाना बंद होने के बाद भी नौकरी बने रहने और कारखाने के सामान को इधर उधर करते रहने की सुविधा परस्ती में अवसरवादिता है, जिसे मृदुला गर्ग ने बखूबी प्रस्तुत किया है। लैला का सुझाव है --" मैं आसानी से 20 जनियों का पुरजा बना लूंगी। 1000 उस पर मुझे मिलेगा। अपने हिस्से का चौथाई बाकी सब दे दें, तो एक हजार और हो जाएगा। गांव के लोग समझ ले।" 15  | तो दूसरी ओर युवक का प्रस्ताव है ---" कचहरी से इसलिए आर्डर लगने पर जब वह बंद होगा, तब भी मेरी नौकरी बनी रहेगी और बाकी सामान उमान भी यहीं पड़ा रहेगा। मैं उससे गांव की मदद करता रहूंगा। पर्यावरण की हिफाजत के लिए मैं कुछ भी करने को तैयार हूं।" 16 l इस तरह जिस भांति हो पर्यावरण के प्रति कटिबद्ध युवक-युवती अर्थात् नई पीढ़ी की अपनी नीति काम कर गई। लैला के साथ और एक संयोग घटित हुआ कि ---"लगे हाथों लैला ने भी अपनी नसबंदी करवा ली है, वरना शौहर के नियम से गांव आने के बावजूद पेट से नहीं हुई। इस बात पर शौहर से मार कुटाई होती है और तलाक-तला-तलाक के साथ लैला से लल्ली बन गई।" 17 अब उसे यह प्रमाणित करने की चुनौती दी गई थी, उसने नसबंदी नहीं की। मौलवी का युवा बेटा लल्ली के साथ रहा । एक वर्ष बीते थे। वह मां बन गई। मृदुला गर्ग व्यक्ति और समाज को आमने-सामने रखना नहीं भूलती --" पहले शौहर की पहली बीवी के बेटे को भी, पहले की तरह अपनी औलाद की तरह पास रखा, पता नहीं गांव शर्मिंदा हुआ कि नहीं, पर डर कर जरूर रहने लगा। सहेली की बेबंटी गोलियां अब दूसरा शौहर  शहर में बेचने लगा।" 18 | यहां बेबंटी गोलियों का बेचा जाना खटकता जरुर है, पर यथार्थ और इतना कॉमन है कि आपत्तिजनक नहीं प्रतीत होता है।

प्रदूषण कम होता रहा और विश्व बैंक के नुमाइंदे को खेड़ी गांव जब ले जाया गया, तब उसी बांके नौजवान से वे लोग मुलाकात किए और अब उसका नाम राजधानियों में चर्चा में है ----" अब खबर यह है कि अगले इलेक्शन में उसका एम० एल० ए० बनना तय है।" 19 690 (संगति-विसंगति) । अंततः एक समाधान नहीं हो कर लोकतांत्रिक परिदृश्य से जुड़े कई सवाल छोड़ती है मृदुला गर्ग। जब लैला को गांव का एम० एल० ए० ने साथ दिया, तब उसने खानापूर्ति में कोई कसर नहीं छोड़ी। अब जब उसी का दूसरा शौहर एम० एल० ए० बन जाएगा, तब सवाल यह है कि सत्ता-सुख के मोह में हमारा एक वर्ग है तो आमजन मिलने वाली सुविधाओं में संतुष्ट।  इस दरमियान लोकतंत्र की प्रशासनिक विडंबना से किसी को कोई लेना-देना नहीं। साथिन लैला जो भी करें, युवा जो भी करे, आम नागरिक सुविधा भोग रहे हैं। वे सुविधाएँ किस प्रकृति की हैं, कैसे जुटाई गई हैं? इससे कोई सरोकार नहीं। सभी संतुष्ट है और लोकतंत्र की व्यवस्थित अव्यवस्था में व्यवस्थित समाज-परिवार-लोकतंत्र स्वयं ही विमर्श का मुद्दा बन जाता है।

 

 

'देसी फेमिनिस्ट' की  बात करके मृदुला गर्ग ने वर्तमान सत्ता पोषित द्वारा सत्ता के पोषण और बिना किसी शोषण के बने समाज-बोध को सामने लाया है, कहीं भी विद्रोह का स्त्रीवादी हंगामा बिना किए लोकतांत्रिक परिदृश्य में प्रशासन की पोल खुलती रहती है। एक स्त्री के नजरिए से। न तो पति का विरोध, न समाज से लोहा लेने का संकल्प , सही-गलत, उचित-अनुचित के ऊपर  जरूरी को अंजाम देने की सोच एक विडंबनात्मक उपलब्धि है। विडंबनात्मक इसलिए कि लल्ली से बनी लैला का साथिन रूप और भी हिम्मतवाला हो जाएगा, क्योंकि अब तो एम०एल०ए० उसका शौहर ही होगा। भारतीय राजनीतिक-प्रशासनिक परिदृश्य के बीच स्त्री का खड़ा होना और खुले में विद्रोह करने की अपेक्षाओं के विपरीत स्त्री द्वारा निजी और पारिवारिक-सामाजिक जीवन को व्यवस्थित करने की कहानी भले ही झूठ, मिथ्या या अनुचित की बुनियाद पर खड़ी हो, पर वर्तमान देश की राजनीतिक-प्रशासनिक पृष्ठभूमि में ऐसा ही घटित हो जाए, तो आश्चर्य नहीं होता है। जो इस स्त्रीवादी विद्रोह को अमलीजामा पहनाने की सृजन साधना में रत रहते हैं, उन्हें जरूर आश्चर्य होगा। दरअसल सत्ता में रहकर सत्य-मिथ्या की परवाह करना संभव नहीं और परिवार समाज की संगति बिठाना भी अनिवार्य है। और ऐसी अनिवार्यता की पूर्ति के लिए राजनीति-प्रशासन सभी का अनुकूल होते जाना हमारे लोकतंत्र की गतिमान प्रकृति है, जो स्वस्थ नहीं है, पर बीमार भी नहीं समझा जाता है। अतः लोकतंत्र विमर्श का हिस्सा बनें, यह भी संभव नहीं, जिन्होंने संभव बनाने की चेष्टा की, वे उसके अंतर्विरोधों की परख में पीछे रह गए हैं। आज़ादी पूर्व राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय काजल आज़ाद भारत में राजनीति से किनारा ले लेती है। यह पलायन नहीं, राजनीति के व्यभिचार समीकरण से हुई कोफ़्त की अभिव्यक्ति मात्र है।  इन्हीं अंतर्विरोधों में भारतीय लोकतंत्र का विकास संभावित है। इसे व्यंग्य भी समझा जा सकता है और अंतर्विरोधों के बीच की स्वाभाविक राजनीतिक-प्रशासनिक जीवन प्रक्रिया भी।

 

  किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने के पहले मृदुला गर्ग के राजनीति में स्त्री-सहभागिता संबंधी दृष्टिकोण से गुज़रना आवश्यक प्रतीत होता है ---" स्त्री ज़्यादा सहिष्णु है और स्त्री अगर सत्ता में आई तो वो ज़्यादा सकारात्मक रहेगी। ... यह हमारी मान्यता है।  प्रश्न करने की ज़रूरत है ... जो कुछ होता है...तो क्या हमारी (स्त्रियों की) प्रतिक्रिया फ़र्क़ होती है पुरुष से? दोनों में क्या अंतर होता है? ...लेकिन हम देख रहे हैं कि जब भी कोई स्त्री सत्ता में आती है तो वैसा ही व्यवहार करती है, जैसा पुरुष करता है। सत्ता का अपना समीकरण है और वो वही रहता है।"  17 (देह से ऊपर है स्त्री की प्रज्ञा, पुस्तक: स्त्री को स्त्री रहने दो, बस!, डॉ० दीपिका उपाध्याय, भारत पुस्तक भंडार, संस्करण 2014, पृष्ठ 52)  राजनीति में स्त्री के आगमन-प्रवेश के प्रति बनी अवधारणाएँ संभव नहीं हो पा रही हैं। इसके पीछे राजनीति के निजी समीकरण को मृदुला गर्ग देखती हैं। यह समीकरण दो स्तर पर है ---एक अर्थ-सत्ता की प्राप्ति और दूसरा स्त्री-देह की पुरुष नेताओं के लिए उपलब्ध कराना। तीसरा यह भी हो सकता है कि सत्ता का स्वभाव स्वयं में ही तात्कालिक उपलब्धियाँ हासिल करना है। इन तीनों स्थितियों के संदर्भ में स्त्री की राजनीति में भागीदारी की दिशा समझी जानी चाहिये। यहाँ प्रथम: यह विवेचनीय है कि मृदुला गर्ग ने स्त्री-देह को कोई अड़चन माना ही नहीं। एक माध्यम भर माना है। जहाँ रजनी गुप्त 'ये आम रास्ता नहीं' उपन्यास में राजनीति में आई मृदु के समक्ष दैहिक नैतिकता ना सही, दैहिक अस्मिता का सवाल खडा़ किया है, वहीं मृदुला गर्ग ने देह को कोई मुद्दा ही नहीं बनाया है। इस दिशा में राजनीति का जो चेहरा उभरता है, उसे मृदु के संदर्भ में ही देखा- समझा जाना अनिवार्य प्रतीत होता है। मृदु से प्रदेश अध्यक्ष नशे में कहता है, ---‘सच ही सुनना चाहती है तो सुन, जंगली घासफूस के बीच खिले गूलर के फूल की तरह खिलती हैं राजनीति में आई औरतें, जिन्हें हर कोई लपक कर अपने मुंह में गपक लेना चाहता है, यही है सौ फीसद सच।’ दूसरी तरफ, सत्तर के दशक की एक नेत्री अपना अनुभव बताते हुए उससे कहती है, ‘राजनीति में अगर आपकी जड़ें बहुत गहरी नहीं हैं, आप शक्तिहीन हैं या आपका व्यक्तित्व निष्प्रभ है तो फिर राजनीति में सुप्रीम पावर द्वारा आपको सीधे-सीधे बिस्तर पर खींच लिया जाएगा।’ 18 राजनीति में 'सेक्स और सियासत का खेल' समीकरण का एक चरण बन गया है। ऐसी दशा में लल्ली के लिए दैहिक ऐतराज़ बरतना 'स्टीरियोटाईप कैरेक्टर' बनाना प्रतीत होगा। मृदुला गर्ग के लिए 'देह से ऊपर' का मुद्दा है। ना तो अस्तित्व-अस्मिता का शोर है, ना ही नैतिकता की गुहार। लल्ली का गर्भ निरोधक गोलियों का रोज़ाना सेवन प्रमाणित करता है कि लल्ली दैहिक संपर्क में आती है, रोज़-रोज़। पर, यह मुद्दा बन ही नहीं पाता। मुद्दा है राजनीति कमेंट स्त्री की भागीदारी की दिशा का बोध कराना। सत्ता एक ही बात जानती है कि हमें जो चाहिये, वह मिले, चाहे जैसे भी। ऐसा मूल्याँकन भी समग्रता का अभाव महसूस कराता है। लल्ली निजी, पारिवारिक, सामाजिक, प्रशासनिक संदर्भों के राजनीतिकरण की ओर संकेत मात्र है। ऐसी राजनीति को मिली विदेशी पुष्टि के तहत मीडिया द्वारा परिघटित परिणाम स्वयं में लोकतंत्र पर सवालिया निशान है।

 

भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं का प्रवेश आज़ादी के बाद से अवश्य ही संतोषजनक रहा है, पर निर्णायक भागीदारी तक पहुँच नहीं पा रही है। मार्ग की बाधाओं के कारण। राजनीतिक भ्रष्टाचार, व्यभिचार, दुराचार के दैहिक-आर्थिक संदर्भ अनैतिकता का बोध कराते हैं। प्रेम-काम के द्वंद्वमूलक संदर्भ की तरह यहाँ भी मृदुला गर्ग की स्त्री अपराध--बोध से मुक्त है, पर सचेत भी। सामंती ढाँचे में शौहर से, समाज से अनिवार्य सजगतापूर्वक पेश आती है, अपनी निजता के साथ, निजता के 'दैहिक रोड़े' को ठोकरें मारती हुई। मृदुला गर्ग के लिए राजनीति में स्त्री के समक्ष दैहिक संदर्भ से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है स्त्री के राजनीतिक व्यक्तित्व की दिशा, जिसमें लोकतंत्र का स्त्री-बोध निर्मित होना यदि ज़रूरी है, तो साथ ही यथार्थ समीकरणों  के कारण निहायत ही असंभव संभावना भी। मृदुला गर्ग की दृष्टि में राजनीति के देशी स्वरूप और उसमें स्त्री की अपराध-बोध से मुक्त भूमिका के तहत जो कुछ, और जितना कुछ छनकर प्राप्त होता है, वही वर्तमान लोकतांत्रिक उपलब्धि के रूप में स्वीकार्य है, बिना किसी कोफ़्त के। पंचायत हो या संसद में महिला की राजनीतिक भागीदारी ----राजनीति का स्त्री-अर्थ किसी भी सूरत में पुरुष-अर्थ से पृथक नहीं है और हो सकता है, इसकी कोई संभावना भी नहीं। अन्य अनेक के राजनीतिकरण की प्रक्रिया में 'स्त्री का राजनीतिकरण' स्वयं में स्त्री के लिए बहुआयामी अंतर्विरोधों के तहत एक चुनौती है, जिसके पार की स्त्री  मृदुला गर्ग के यहाँ 'स्त्रीवादी शोर से मुक्त' और परिवार-समाज से परे का यथार्थ है, अस्वीकार्य होने के बावजूद।

 

 

 

संदर्भ सूची :

  1. कहानी 'मेरे देश की मिट्टी, अहा!, मृदुला गर्ग, संगति-विसंगति, पृ० 678 |
  2. वही, पृ० 678 l
  3. वही, पृ०
  4. अखिलेश, लमही, अंक -जनवरी, 2016
  5. कहानी 'मेरे देश की मिट्टी, अहा!, मृदुला गर्ग, संगति-विसंगति, पृ० 680 I
  6. वही, पृ० 683 I
  7. वही, पृ० 684 l
  8. वही, 685. |

9 -13 वही, पृ० 686. l

14-16 वही, पृ० 688. l

  1. 'देह से ऊपर है स्त्री की प्रज्ञा' , पुस्तक: स्त्री को स्त्री रहने दो, बस!, डॉ० दीपिका उपाध्याय, भारत पुस्तक भंडार, संस्करण -2014, पृ० 52 l
  2. ये आम रास्ता नहीं, रजनी गुप्त।