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जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

‘मृच्छकटिकम्’ में नारी-मनोविज्ञान: अरुण कुमार निषाद[शोध आलेख]

‘मृच्छकटिकम्’ में  नारी-मनोविज्ञान

अरुण कुमार निषाद

शोधच्छात्र

संस्कृत तथा प्राकृत भाषा विभाग

लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ

शोध सारांश

प्रत्येक व्यक्ति तथा जीव-जन्तु का अपना मनोविज्ञान होता है. वह अपने बारे में, समाज के विषय में तथा परिवार के विषय में अलग-अलग दृष्टिकोण रखता है. मन के भीतर उठने वाला यही विचार या दृष्टिकोण उसका मनोविज्ञान है. यह विचार अलग-अलग व्यक्तियों में अलग-अलग वस्तुओं के लिए पृथक-पृथक हो सकता है. प्रस्तुत शोधपत्र में मृच्छकटिकम् प्रकरण में वर्णित नारी-मनोविज्ञान पर चर्चा की गयी है.

की वर्ड : संस्कृत साहित्य, नाट्य लेखन, नारी-मनोविज्ञान

महाकवि शूद्रक की गणना संस्कृत साहित्य के महान नाटककारों में की जाती है. रूपक के दस भेदों (1.नाटक 2.प्रकरण 3.भाण 4.प्रहसन 5.डिम 6.व्यायोग 7.समवकार 8.वीथी 9.अंक 10.ईहामृग) में मृच्छकटिकम् प्रकरण है. इसमें दस अंक हैं- 1.अलंकार विन्यास 2.द्युतकर संवाहक 3.सन्धि विच्छेद 4.मदनिका शर्विलक 5.दुर्दिन 6.प्रवहण विपर्यय 7.आर्यकापहरण 8.वसन्तसेना मोटन 9.व्यवहार 10.संहार. इसमें चारुदत्त नामक निर्धन ब्राह्मण और गणिका वसन्तसेना की प्रेम कथा है. इसकी रूपक की यह विशेषता है कि यह संस्कृत का पहला यथार्थवादी रूपक माना जाता है. इसमें पुरुष नारी पर न रीझ कर, नारी पुरुष पर रीझती है.           

धूता अपने पति चारुदत्त को अपकीर्ति से बचाने के लिए अपनी रत्नावली वसन्तसेना को भेजवा देती है कि- कहीं वसन्तसेना अपने गहने चोरी का आरोप चारुदत्त पर न लगा दे. कोई भी पतिव्रता पत्नी अपने पति को संकट में नहीं देख सकती. तभी तो चारुदत्त कहते हैं कि- धूता जैसी पत्नी को पाकर मैं धन्य हो गया.

विभवानुगता भार्या सुखदुःखसुहृद भवान्.

सत्यञ्च न परिभ्रष्ट यद्दरिद्रेषु दुर्लभम्.|

समाज में यह बात प्रचलित है कि- महिलाओं के पेट में कोई बात पचती नहीं है तभी तो प्रथम अंक में विदूषक रदनिका को शकार द्वारा किए गये दुर्व्यवहार को चारुदत्त से न कहने की बात करता है.

विदूषक- भवति रादनिके न खलु तेऽयमपमानस्तत्रभवतश्चारुदत्तस्य निवेदयितव्य:. दौर्गत्यपीडितस्य मन्ये द्विगुणतरा पीडा भविष्यति.

रदनिका-आर्य मैत्रेय ! रदानिका खल्वहं संयतमुखी.[1]        

यद्यपि वसन्तसेना चारुदत्त की प्रेमिका है, तब भी उसे इस बात का पता है कि किसी भी सम्मानित व्यक्ति के घर में वेश्या का प्रवेश वर्जित है, तभी तो वह अपने मन में विचार करती है-

वसन्तसेना-(स्वगतम्) मन्दभागिनी खल्वहं तवाभ्यन्तरस्य.[2]    

आज भी कोई स्त्री रात में कहीं अकेले अपनी इज्जत के कारण कहीं आती जाती नहीं है. इसीलिए रात में जब वसन्तसेना अपने घर जाना चाहती है तो मैत्रेय (विदूषक) को साथ चलने को कहती है –

वसन्तसेना- आर्य! इच्छाम्यहमनेनार्येणानुगम्यमाना स्वकं गेहं गन्तुम्.[3]        

एक वेश्या का जैसा मनोविज्ञान शूद्रक ने वर्णित किया है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है. वसन्तसेना कहती है कि- मुझको एक ऐसे पुरुष की जरूरत है जो मेरी कामवासना को मिटा दे.

वसन्तसेना- चेटि! रन्तुमिच्छामि, न तु सेवितुम्.[4]    

यह भी एक नारी मनोविज्ञान ही है कि- कोई भी स्त्री किसी पर पुरुष का स्पर्श नहीं करना चाहती, तभी तो जब संवाहक चेटी को मर्दनकला सिखाने को कहता है तो वसन्तसेना मना कर देती है.

संवाहक- आर्ये! यद्येव तदियं कला परिजनहस्तागता क्रियताम्.

वसन्तसेना-आर्य! यस्य कारणादियं कला शिक्ष्यते एवार्येण सुश्रुषितव्य:.[5]        

प्रत्येक प्रेमिका अपने प्रियतम का दर्शन करना, उससे मिलना, प्रणय करना इत्यादि चाहती है, तभी तो वसन्तसेना कर्णपूरक द्वारा चारुदत्त का दुपट्टा देने पर उत्कण्ठित होकर पूछती है कि- इस समय आर्य चारुदत्त कहाँ हैं? कर्णपूरक के यह बतलाने पर कि- वह इस समय घर की ओर जा रहे हैं. वह नारी स्वभाव के अनुसार अटारी पर चढकर चारुदत्त को निहारती है.

वसन्तसेना- चेटि! उपरितनमलिन्दकमारुह्यार्यचारुदत्तं पश्याम:.[6]

प्रायश: यह देखा जाता है कि- महिलायें किसी भी गुप्त बात को चोरी छिपे अवश्य सुनती हैं. वह भी अपना सब काम-धाम छोड़कर.

वसन्तसेना- कथं मम सम्बन्धिनी कथा? तच्छ्रोष्याम्यनेन गवाक्षेणापवारितशरीरा.[7]  

नारी जिससे प्रेम करती है उसे सुरक्षित भी देखना चाहती है. मदनिका शर्विलक से कहती है- अपना ख्याल रखना, जब वह आर्यक को छुड़ाने जा रहा होता है.

मदनिका- यथार्यपुत्रो भणति, अप्रमत्तेन, तावदार्यपुत्रेण भवितव्यम्.[8]

नारी जिससे सच्चा प्रेम करती है, उसके लिए अपना तन-मन-धन सब कुछ समर्पित कर देती है. वह उससे हर हाल में मिलना चाहती है. वसन्तसेना बरसात में भी चारुदत्त से मिलने चली आती है.

उदयन्तु नाम मेघा भवतु निशा वर्षमविरतं पततु.

गणयामि नैव सर्वं दयिताभिमुखेन हृदयेन.|[9]  श्लोक 4/33     

मेघा वर्षन्तु गर्जन्तु मुञ्चन्त्वशनिमेव वा.

गणयति न शीतोष्णं रमणाभिमुखा: स्त्रिय:.|[10]  श्लोक 5/16    

वसन्तसेना की माता को न्यायालय में सबके यह कहने में लज्जा आती है कि- उसकी पुत्री रात में चारुदत्त में मिलने गयी थी. समाज में कोई भी स्त्री अपने और अपने परिवार की हँसी नहीं उड़वाना चाहती.

वृद्धा- हा धिक् हा धिक्, अतिलज्जनीयं खल्विदम्. जनस्य पृच्छनीयोऽयमर्थ:, न पुनरधिकरणिकस्य.[11] 

दसवें अंक में धूता आत्मदाह करना चाहती है, क्योंकि कोई भी नारी बिना पति के,विधवा बनकर रहना पसन्द नहीं करती. समाज के लोग उसको हेय दृष्टि से देखते हैं. शुभ कार्यों में उसका आना-जाना वर्जित होता है.        

उपर्युक्त विवेचन के उपरान्त कहा जा सकता है कि- किसी भी मामले में नारी पुरुष से कम नहीं है. अपने स्वाभिमान के सामने वह दुनिया की हर चीज को ठुकरा सकती है. मृच्छकतिकम् की नायिका वसन्तसेना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. प्रेम के सामने तो वह अपना सर्वस्व लुटा दे, परन्तु यदि वह अपने पर आ गयी तो सारा राज्य-वैभव उनके सामने तिनके का समान है. मृच्छकटिकम् संस्कृत में लिखे गये सामाजिक नाटकों में अग्रगण्य है. यह एक यथार्थवादी रूपक है.                     

 

 

 

[1]मृच्छकटिकम्, महाकवि शूद्रक, सम्पादक आचार्य पं.तारिणीश झा, प्रकाशन केन्द्र लखनऊ प्रकाशन, पृष्ठ संख्या 80      

[2]वही, पृष्ठ संख्या 80  

[3]वही, पृष्ठ संख्या 87  

[4]वही, पृष्ठ संख्या 94   

[5]वही, पृष्ठ संख्या 129  

[6]वही, पृष्ठ संख्या 137  

[7]वही, पृष्ठ संख्या 188  

[8]वही, पृष्ठ संख्या 210  

[9]वही, पृष्ठ संख्या 236  

[10]वही, पृष्ठ संख्या 261  

[11]वही, पृष्ठ संख्या 428