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जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

बस्तों के बोझ तले दबता बचपन: डॉ. रेखा जैन [लेख]

बस्तो के बोझ तले दबता बचपन

 

डा० रेखा जैन

 

भारी बोझ के कारण बच्चों की पीठ मे दर्द और मांसपेशियों की समस्या व गर्दन के दर्द से बच्चों को जूझना पड रहा है।बचपन एक ऐसी उम्र होती है।जब तनाव से मुक्त होकर मस्ती से जीते है।उनका बचपन तनाव की काली छाया से कलुषित हो रहा है। हर सुबह स्कूल जाने से पहले बच्चे पेट मेदर्द सिर मे दर्द का बहाना बनाते रहते है।

 

यह सच है कि बच्चों के कांधे आज बस्तो के बोझ से बुरी तरह दबे हुये ।इतना ही नहीं  ठंड हो या बरसात ।हर मौसम मे स्कूल जाने का समय बच्चों के मन मे वितृष्णा का भाव भर रहे है।

बच्चों की पीठपर लदे भारी भरकम बस्ते से मुक्ति दिलाने की पहल आई नेक्सट ने शुरू की है।

केन्द्रीय विद्यालय संगठन ने देशभर मे पहली  बार मानवीय दृष्टिकोण.अपनाते  हुये बच्चों के बस्तो के बोझ को कम करने का मुद्दा उठाया है।

 

देश के नौनिहालो को देखते हुये आवशयकता इस बात की हैअब नये सिरे से शिक्षा प्रणाली को समझा देखा परखा अौर लागू लिया जाये।

यह सच है कि बच्चों को कम उम्र मे किताबी कीडा बनाने से उन्हें  व्यवहारिक बनाने  के बजाय मशीनी बनाये जाने का प्रयास किया जारहा है।

बस्ती के बॊझ को कम करने के लिये कुछ सुझाव देना चाँहूगी।

 

  • अनावश्यक विषयों को बैकल्पिक बनाया जाये ।

 

  • बच्चों को सारी कापी किताबें रोजाना स्कूल ले जाना गैर जरूरी किया जाये।

 

(३) बच्चों मे रूचि बरकरार रहे इसके लिये मैदानी, प्रयोगात्मक और अन्य माध्यमों से बच्चो को स्कूल की अोर आकर्षित करना होगा ।

 

(४) समय के साथ शिक्षा मे गुणात्मक सुधार होना चाहिए ।किताबी कीडा बनकर ज्ञान प्राप्त करने की गलत परम्परा के स्थान पर व्यावहारिक ज्ञान देकर बस्ते का बोझ कम किया जा सकता है।

 

निष्कर्षत कहा जा सकता हैकि बस्तो के बोझ तले दबते बचपन को बचाना  बहुत. ही आवश्यक है।दस किलो का क्लास तृतीय का है कांधे पर लटकते ही एक ओर बच्चा झुक जाता है। उसकी छोटी उम्र अौर भारी  भरकम बोझ को देख कर किसी कवि की ये पंक्तियां याद आती है।

 

मेरा बस्ता कितना भारी ।

बोझा उठाना है लाचारी ।

मेरा तो नन्हा  सा मन है।

छोटी बु्दि दुर्बल तन है।

कम्प्यूटर का युग अब आया

बस्ते का अब भार घटा दो।

थोडी कापी पैन चाहिए ।

हमको मन का चैन चाहिए ।

 

अन्त मे इतना ही कहना चाँहूगी कि बच्चे के ऊपर कसने वाले बैग का भार उसे भविष्य मे किस हैल्थ प्राब्लम की ओर ले जा रहा है।आई नेक्स्ट सिर्फ अपना सामाजिक दायित्व पूरा करते हुये बच्चों के लिये आने वाले एक ऐसे खतरे से आपको रुबरु कराते है।जिस पर नियम और कानून बन चुके है। स्कूल का काम केवल पढाना ही नहीं बल्कि बच्चों के बेहतर कल पर विचार करना भी है।

 

डा० रेखा जैन

शिकोहाबाद

मो  9756321909