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जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

वैश्वीकरण और मानवीय मूल्यों का आधुनिक परिदृश्य: ईश शक्ति सिंह [लेख]

वैश्वीकरण और मानवीय मूल्यों का आधुनिक परिदृश्य

ईश शक्ति सिंह

Ph.D, शोधार्थी (प्रवासन एवं डायस्पोरा अध्ययन विभाग)

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र

Email: ishshaktisingh@gmail.com

मो.नं. : 07588206039

 

सामाजिक परिवर्तन समाज की केंद्रीय अवधारणा हैं। जिसके द्वारा समाज की गत्यात्मकता को समझने का प्रयास किया जाता है। सामान्य रूप से किसी समाज की सामाजिक संरचना अथवा सामाजिक संगठन अथवा समाज के अन्य उपादानों में समय अन्तराल के साथ होने वाले बदलाव या परिष्करण की प्रक्रिया को सामाजिक परिवर्तन कहते है। यह बदलाव समाज की पूर्ववर्ती स्थिति एवं बाद की स्थिति में आए अन्तर को परिलक्षित करता है। सामाजिक परिवर्तन एक सार्वभौमिक एवं निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जो दुनिया के सभी समाजों में सदैव क्रियाशील रही है और जिसके अंतर्गत समाज की संरचना के विभिन्न अंगों के प्रकार्य, संबंध, संस्था, मूल्य व्यवस्था आदि में होने वाले परिवर्तन को शामिल किया जाता है। साथ ही, यह एक तटस्थ और व्यापक अवधारणा है जिसमें समाज का आमूल-चूल परिवर्तन (संरचना का परिवर्तन) और अति सामान्य परिवर्तन (संरचना में परिवर्तन) दोनों ही शामिल हैं। सामाजिक परिवर्तन की यह अवधारणा किसी समाज के व्यक्तियों में या किसी लघु समूह में हुए छिटपुट बदलावों की अपेक्षा वृहद् सामाजिक प्रणाली या सम्पूर्ण संबंधों की व्यवस्था के स्तर पर होने वाले बदलावों को इंगित करती है।

वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में सामाजिक परिवर्तन की गति काफी तीव्र है। लगभग गत तीन दशकों से प्रचलन में आया ‘वैश्वीकरण’ शब्द आज पूरे विश्व में एक ऐसी आंधी है जिसने आधुनिकता एवं उत्तर-आधुनिकता को भी मात दे दी है। प्रारम्भ में आर्थिक सन्दर्भ में प्रयुक्त वैश्वीकरण की अवधारणा एल.पी.जी. अर्थात उदारीकरण, निजीकरण, एवं वैश्वीकरण की त्रयी का अंतिम एवं महत्वपूर्ण भाग बनी थी। बाद में जल्दी ही वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने अपना स्वायत्त रूप ऐसा बनाया कि उसकी दखल ने राजनीति, संस्कृति, समाज, तकनीकी, सूचना-तकनीकी, संचार-मीडिया, धर्म-संस्कार आदि को भी प्रभावित किया एवं इन सभी से वैश्वीकरण की प्रक्रिया प्रभावित भी होने लगी। अब तो सर्वत्र विश्व गाँव, विश्व नगर, विश्व दृष्टि, विश्व दिवस, विश्व बाजार आदि अनेक संदर्भ है जिनमें विश्व विश्लेषण लगाने से वैश्वीकरण की प्रक्रिया का परिणाम परिलक्षित होता है। पूरा संसार ही उत्पादक एवं उपभोक्ता बनता हुआ प्रतीत होता है। इसका आधार सूत्र तो हमें हमारे उपनिषदों में मिलता है जहाँ उदारवादी दृष्टि वाले व्यक्ति के लिए पूरा संसार ही एक कुटुंब के सामान कहा गया है। इसमें व्यक्तिवादी धारणा के स्थान पर सामूहिक धारणा ऐसी है जिसमें स्थान, क्षेत्र, देश, राज्य आदि की कोई सीमा अपना प्रभाव नहीं रखती है। किन्तु वर्तमान संदर्भ में वैश्वीकरण कुछ और ही अर्थ एवं भावार्थ पर आधारित है।

वैश्वीकरण उस वृहद् प्रक्रिया का नाम है जिसके द्वारा सम्पूर्ण विश्व के देशों या समाजों के सामाजिक संबंधों एवं उसकी अंतरनिर्भरता को गहराई से समझने में एक नई पहचान कायम की जा सके। वैश्वीकरण की इस प्रक्रिया को प्रारम्भ तो किया विविध देशों में खोले गए सुपर मार्केटों नें जहाँ पर दुनिया भर के कई देशों में चलने वाले सामानों की बिक्री इसलिए होने लगी कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा ने एक जोर पकड़ा एवं गुणात्मक उत्पादों के लाने में एक से एक वस्तुएं सामने लाई गई जिसे ग्राहकों-उपभोक्ताओं ने पसंद किया। इसी प्रकार आज के बाजारों में सैकड़ों देशों के उत्पाद एक साथ बिक्री के लिए उपलब्ध हो जाते हैं। नए से नए उत्पाद आने लगे हैं जो कुछ वर्षों पूर्व अस्तित्व में ही नहीं थे। इस वैश्वीकरण ने संसार को देखने का तरीका बदला है एवं साथ ही, जिस तरीके से हम संसार को देखते हैं उसे भी बदल दिया है। वैश्वीकरण तो एक परिप्रेक्ष्य या नजरिया देता है कि हम दुनिया के अन्य समाजों के साथ कैसे संबंध एवं क्रिया रखें। विश्व के किसी भी क्षेत्र की समस्याएँ हमारे जीवन को प्रभावित कर सकती हैं। अतः वैश्वीकरण ऐसे नए विश्व परिदृश्य को स्थापित करता है जिससे आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक आदि सभी संस्थागत क्षेत्रों में तीव्र बदलाव एवं विश्व समाजों की बढ़ती अंतरनिर्भरता दिखाई देती है।

इस वैश्वीकरण के प्रभाव से सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना में भी तेजी से बदलाव आता जा रहा है। समाज, सामाजिक मूल्य को अपना एक महत्वपूर्ण अंग मानता है। सामाजिक मूल्य वे मानक धारणाएं हैं जिनके आधार पर हम किसी व्यक्ति के व्यवहार, वस्तु के गुण, लक्ष्य, साधन एवं भावनाओं आदि को उचित या अनुचित अच्छा या बुरा ठहराते हैं। सामाजिक मूल्य सामाजिक कल्याण एवं सामाजिक आवश्यकताओं के लिए महत्वपूर्ण समझे जाते हैं। सामाजिक मूल्य का निर्माण मानवीय मूल्यों के समन्वय या एकीकरण द्वारा बनता है। सामाजिक प्रमाप के समान मूल्यों का समाज में महत्व बहुत अधिक होता है। मूल्यों से सम्बन्धित होकर ही एक व्यक्ति सही अर्थों में मनुष्य बनता है। मूल्यों के आधार पर ही सामाजिक संगठन का विकास निम्न से उच्च स्तर की ओर होता है। ये मूल्य ही हैं जिनकों प्राप्त कर मनुष्य अपने को सफल बनता है। व्यक्ति का समाजीकरण मूल्यों के अनुरूप ही होता है। इस प्रकार मूल्य व्यक्तित्व विकास के वास्तविक आधार होते हैं।

मूल्य ही निर्धारित करता है, समाज का स्वरूप कैसा होगा, संबंधों का स्वरूप एवं मानव का व्यवहार कैसा होगा। मूल्य, समाज व मानव के जीवन के रक्त हैं, अतः रक्त जैसा होगा जीवन वैसा होगा। समाज का परिवर्तन समय की मांग है उसके विकास एवं प्रगति के लिए, परन्तु सामाजिक परिवर्तन से मानवीय मूल्यों में प्रदूषण नहीं होना चाहिए अन्यथा मानवीय मूल्यों के प्रदूषण से समाज की संगठनात्मक इकाईयां भी प्रदूषित हो जाती हैं। वरन समाज का स्वरूप, मानवीय मूल्य विहीन रूप के समान प्रतीत होगा। वैश्वीकरण के दौर में सामाजिक परिवर्तन ने समाज को विकास व प्रगति का मार्ग तो प्रशस्त किया है परन्तु मानवीय मूल्य एवं सामाजिक मूल्य के विकास की तरफ ध्यान आकृष्ट करने में बाधा खड़ा कर रखा है।

वैश्वीकरण का प्रभाव विभिन्न देशों की स्थानीय, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं खेलकूद या मनोरंजन की परिस्थितियों पर भी देखने को मिलता है। हम में से हर एक को वैश्वीकरण से प्रभावित होता देखा जा सकता है। परिवार में बच्चों का जीवन, विद्यालय में विद्यार्थियों की शिक्षा आदि सभी को वैश्वीकरण ने प्रभावित किया है। परिवार में जहाँ सामूहिक मूल्यों, परम्पराओं, परिपाटियों के आधार पर निर्णय लिए जाते थे। विवाह के संबंध पवित्र एवं तुलनात्मक रूप से स्थाई होते थे, वहाँ आज सभी में व्यक्तिवादी दृष्टिकोण एवं स्वार्थ और उपभोक्तावादी विचारों नें परिवार एवं विवाह की संस्थाओं को कमजोर किया है। इन सबका कारण है व्यक्तिवादिता की विचारधारा में बेहताशा वृद्धि। इसे प्रारम्भ में आधुनिकीकरण नें लोगों में अपने निजी स्वार्थ पर ही सम्पूर्ण ध्यान देने की भावना को बढ़ावा देते हुए आगे बढ़ाया था। वर्तमान में वैश्वीकरण ने भी इसी व्यक्तिवादिता को और अधिक प्रबल बनाया है। लोगों के जीवन पर परम्परा एवं प्रथाओं के आधार पर आगे बढ़ने का असर कम हैं। अब कैरियर की होड़ लगी है एवं व्यक्तिगत योग्यताओं, अनुभव एवं कुशलता के आधार पर पैकेज देकर व्यक्ति को कार्य करने का अवसर दिया जाता है।

व्यक्तिवाद का एक नया स्वरूप भी वैश्वीकरण ने उभरा है जिसमें लोग अपने आप तक सक्रिय रूप से केंद्रित होने लगे है एवं निजी पहचान अलग से बनाने की धारणा को अधिक महत्व देते हैं। इसमें परम्परागत मूल्यों एवं मानकों को पूर्ण रूप से दरकिनार कर दिया जाता है। जो सामाजिक मानदंड एवं मर्यादाएं व्यक्ति के व्यवहार पर दबाव रखती थी एवं उसे सामाजिक नियंत्रण में रहने के लिए प्रेरित करती थी, वे अब शिथिल एवं अप्रासंगिक बनती जा रही हैं। परिवार में पिता की प्रतिष्ठा एवं हैसियत की परवाह किये बगैर लड़का, लड़की स्वयं की इच्छानुसार आचरण करते हैं, विवाह के निर्णय लेतें हैं, सैर-सपाटे पर चले जाते हैं एवं फैशन की चीजें उपयोग में लाते हैं, जिससे उन्हें संतुष्टि मिलती है। पहचान के परम्परागत आधारों के स्थान पर व्यक्तिगत शौक एवं योग्यताओं को आधार बनाया जाने लगा है। यह स्वयं की विशेषताओं का परावर्त प्रदर्शन है जो वैश्वीकरण की प्रक्रिया से और बढ़ा है।         

वैश्वीकरण के सामाजिक परिवर्तन नें मानव के सामने तराजू के एक पलड़े पर उसके प्रगति व विकास को रख रखा है तो दुसरे पलड़े पर सामाजिक मूल्यों को, और देखा जा रहा है कि कही ना कही मानव ने अपने उन्नति व विकास के चक्कर में मूल्यों को छोड़ रहा है । मानव की यह एक आधुनिक मज़बूरी बनती जा रही है, मूल्यों को साथ लेकर चलने या उसे निभाने में। समाज या मानव, तकनीक के अनुरूप अपने को ढालता जा रहा है साथ ही मूल्यों से जुड़े आधार व संबंधों जैसे परिवार का बिखराव, पीढ़ियों में बढ़ता अन्तराल, संबंधों में औपचारिकता, जटिल सामाजिक संबंध, दिखावटीपन, कर्तव्यनिष्ठता की कमी, नातेदारी संबंधों में ढीलापन, पड़ोसी संबंधों में अनजानापन, मानव सम्पर्क में शंकापन इत्यादि में भी तकनीकी होता जा रहा है। जिससे इस प्रकार के समस्याओं से रूबरू होना पड़ रहा है। समाज का परिवर्तन उसके उत्तरोतर विकास के लिए होना चाहिए ना कि मूल्यों में परिवर्तन के लिए। सामाजिक परिवर्तन को लेकर एक चर्चा मूल्यों को लेकर किया जाता है कि क्या समाज के परिवर्तन में मानवीय मूल्यों का भी परिवर्तन होना आवश्यक है। बदलते समय में मूल्य को लेकर संकट गहराता जा रहा है। परिवर्तित दौर में मानव का व्यवहार व संबंध अपने आदर्शवादी मूल्यों को लेकर चुनौती की राह पर खड़ा है। इसका कारण आज के इस तेजी से बदलते समय ने मानव के अपने विकास के लिए कही ना कही मानवीय मूल्यों को हासिए पर खड़ा करना चाहता है। ऐसे में आवश्यकता है मनुष्य को मनुष्यता को बचाएं रखने के लिए वह उस क्षमता को विकसित करे जिससे मानवीय मूल्यों को सुरक्षित व संरक्षित किया जा सके।