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जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

रोड टैक्स और इसकी प्रासंगिकता: अटल राम चतुर्वेदी [लेख]

रोड टैक्स और इसकी प्रासंगिकता

अटल राम चतुर्वेदी

 

 सामान्यतः "कर" से आशय सरकारों द्वारा लिये जाने वाले उस शुल्क से ही लगाया जाता है जो किसी वस्तु के क्रय-विक्रय, उसके निर्माण आदि प्रक्रियाओं के दौरान अधिरोपित करते हुए वसूल किया जाता है। ये कर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह के हैं।

     इनके अलावा कुछ कर सरकार द्वारा दी जाने वाली सेवाओं के प्रतिफल में भी वसूल किये जाते हैं, इस सम्बन्ध में "रोड टैक्स" यानी "पथ कर" एक ऐसा "कर" है, जिससे देश का लगभग हर व्यक्ति प्रभावित है और भुगतान भी कर रहा है, इसलिए हमें उपलब्ध सड़क मार्ग सुविधाओं के अनुपात में हमारे द्वारा भुगतान किये जा रहे पथ कर का तुलनात्मक विश्लेषण करना अति आवश्यक प्रतीत होता है।

      जब हम कोई नवीन वाहन क्रय कर उसका पंजीकरण कराते हैं तो उसी समय उस वाहन को सड़क पर चलाने की एवज में हमसे "कर" भी वसूल कर लिया जाता है, वही वाहन जब सड़क पर चलने लगता है तो विभिन्न राष्ट्रीय राजमार्गों के नाकों या टोल से गुजरने पर इनके रखरखाव आदि के नाम पर पुनः नाका/टोल टैक्स के रूप में "कर" वसूला जाता है। साथ ही विभिन्न शहरों व कस्बों में भी वाहन के प्रवेश शुल्क के नाम पर कर की वसूली भी हो जाती है। क्या यह तर्कसंगत है ? निश्चित रूप से नहीं, वो भी उस हालत में जबकि सड़कों और राजमार्गों की दुर्दशा किसी से छिपी हुई नहीं है।

      जब हमें सुविधाजनक और सुरक्षित सड़क और राजमार्ग यात्रा के लिए नहीं मिल पा रहे हैं तो एक बार और एक से अधिक बार इनके सम्बन्ध में "कर" वसूलने का औचित्य समझ से परे है। गाँवों की बात छोड़िये शहरों और राजमार्गों की सड़क की हालत भी अनेक स्थानों पर इतनी बदतर है कि वाहनों का जीवन जहां कम हो रहा है, इंसानों का जीवन तो कहीं-कहीं खत्म ही हो जाता है। गहरे गड्ढों में लुप्तप्रायः सड़कों पर वाहन चलाना किसी खतरे से खाली नहीं। इस स्थिति में अस्वस्थ व्यक्तियों के सड़क मार्ग यात्रा की तो कल्पना ही दुष्कर है। उल्लेखनीय है कि उर्दू का "सफ़र" शब्द, अंग्रेजी के "suffer" शब्द को चरितार्थ करता प्रतीत होता है।

     ऐसी बात नहीं है कि सरकारें सड़क और राजमार्ग निर्माण के लिए रूपये नहीं खर्च करती हैं, हर वर्ष सैकड़ों करोड़ों रुपये उन्हीं सड़कों और राजमार्गों के लिए सरकार द्वारा खर्चे जाते हैं, जिनके सम्बन्ध में हम "रोड टैक्स" दे रहे हैं, लेकिन यदि ये सड़कें पूरी होते ही या पूरी होने से पहले ही टूटने लग जायें तो इस स्थिति को सिवाय उपेक्षा और लापरवाही के और क्या कहा जा सकता है ? जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए।

      मेरे विचार में सड़क और राजमार्ग निर्माण की निविदा निर्गत होते समय इसकी प्रमुख शर्त ही ये होनी चाहिए कि अमुक सड़क को सुव्यवस्थित रखने की जिम्मेदारी एक निश्चित समयावधि के लिए सम्बंधित निर्माण इकाई या संस्था की ही होगी। अगर निविदा के समय ऐसी शर्त अनिवार्य रूप में रखी जाय तो सड़कों और राजमार्गों के निर्माण, गुणवत्ता और नियमित रखरखाव में निश्चित रूप से सुधार आयेगा और हमारे द्वारा प्रदत्त किये जाने वाले "रोड टैक्स" की सार्थकता भी सिद्ध हो सकेगी। साथ ही हमें अधिक सुरक्षित और आरामदायक सड़क व राजमार्ग भी यात्रा के लिए उपलब्ध हो सकेंगे।

अटल राम चतुर्वेदी

निवासी-771-, रतन कुण्ड, मथुरा (उ0प्र0)

मोबाइल 9411641108