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जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

आलोचना और इतिहास: संगीता कुमारी

आलोचना और इतिहास

 

-संगीता कुमारी

सहायक प्रोफेसर (तदर्थ)

अदिति महाविद्यालय,

दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

 

किसी रचना में निहित जीवन एवं जगत से उसके प्रच्छन्न सम्बन्ध की पड़ताल का कार्य आलोचना करती है। वह रचना में मौजूद रचनाकार को उसके समस्त अनुभवों के साथ पकड़ती है; अनुभूतियों की प्रमाणिकता की छानबीन करती हुई आगे-पीछे से उसका सम्बन्ध जोड़ती हुई एक दिशा निर्धारित करती है। आलोचना के मुख्य रूप से दो पक्ष हैं- सैद्धांतिक और व्यावहारिक। इन दोनों में एक पारस्परिक सम्बन्ध होता है। कह सकते हैं कि सैद्धांतिक आलोचना रचना के मूल्यांकन की नीति एवं दिशा निर्धारित करती है जबकि व्यावहारिक आलोचना किसी रचनाकार द्वारा साहित्य सम्बन्धी प्रवृतियों पर स्वतन्त्र रूप से किया गया गुण-दोष विवेचन है।

आलोचना और इतिहास के आपसी संबंधों की जांच से पहले इतिहास क्या है? इस पर थोड़ा प्रकाश डालना आवश्यक है। मोटे तौर पर इतिहास की व्याख्या तथ्यों के संग्रह या तिथियों की जानकारी के रूप में की जाती है, पर क्या यह इतिहास की उचित व्याख्या है? इतिहास को यदि सही मायनों में व्याख्यायित करें तो इतिहास वर्तमान और अतीत से इतिहासकार और उसके स्रोतों (पुरातात्विक और साहित्यिक) के बीच संवाद की सतत प्रक्रिया है जो अपने अध्ययन में सामाजिक , सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक जैसे क्षेत्रों को आत्मसात करती हुई चलती है। इस तरह इतिहास सामाजिक गतिविधियों की निरंतरता और परिवर्तन दोनों को प्रस्तुत करती है। सामान्यतः इतिहास यदि मनुष्य के विकास का और मानव समाज को समझने का जरिया है तो आलोचना साहित्य के इतिहास को समझने का और उसे परखने का जरिया। एक ऐसी तकनीक जिसके सहारे साहित्यिक निरंतरता और विकास को न सिर्फ रेखांकित किया जा सके वरन उसमें सर्जनात्मक बदलावों को सम्भावना भी पैदा की जा सके। इस तरह आलोचना इतिहास से विच्छिन्न नहीं है। बिना ऐतिहासिक बोध के एक आलोचक अपने समाज में होने वाले हलचल, विचारधारा की टकराहट को नहीं पकड़ सकता। एक आलोचक की ऐतिहासिक दृष्टि सिर्फ इतिहास से ही सम्बद्ध नहीं होती बल्कि इसमें तत्कालीन राजनीतिक, आर्थिक गतिविधियों और विशेषकर सांस्कृतिक चेतना की गूँज भी विद्यमान होती है। मैनेजर पांडेय के शब्दों में आलोचना संस्कृति की जीवंतता का लक्षण है और उसकी प्राणवत्ता का कारण भी। "आलोचना रचना में व्यक्त और अव्यक्त मूल्यों तथा विश्वासों की व्याख्या करती है साथ ही वह सामाजिक जीवन में मौजूद और रचना में व्यक्त शक्ति संबंधों की भी पहचान करती है। इस तरह आलोचना एक विचारधारात्मक गतिविधि होती है। विचारधारा से यहाँ मेरा आशय ऐतिहासिक चेतना से है। यह ऐतिहासिक चेतना आलोचक के विवेक को ही नहीं, उसकी संवेदनशीलता को भी प्रभावित करती है। जिसे सौंदर्यबोध कहा जाता है उसका भी विचारधारा से एक रिश्ता बनता है। सौंदर्यबोध जीवन विवेक का अंग होता है और जीवन विवेक का सामाजिक विवेक से तथा सामाजिक विवेक का इतिहास विवेक से गहरा सम्बन्ध होता है। इस प्रक्रिया में साहित्य विवेक इतिहास विवेक से जुड़कर सामाजिक रूप से सार्थक बनता है।"[1]

स्पष्ट है कि मैनेजर पांडेय साहित्य और समाज के बीच कि क्रिया प्रतिक्रिया को समझने के लिए इतिहास बोध को आवश्यक मानते हैं और चूंकि आलोचना का कार्य साहित्य कि तात्कालिकता और समसामयिकता में उसकी प्रासंगिकता कि जांच करने से है; आलोचना और इतिहास के बीच का सम्बन्ध अन्योन्याश्रय प्रतीत होता है। आलोचना का कार्य यहीं खत्म नहीं होता, रचना और आलोचना के बीच एक सत्ता पाठक की भी होती है। एक आलोचक भी पहले पाठक ही होता है। किसी रचना के मूल्यांकन कि क्षमता पाठक कि भी होनी चाहिए नहीं तो वह कृत्रिम, भौंडे, मनोरंजन के नाम पर परोसे जाने वाली कृतियों और सामाजिक उपादेयता से जुडी अच्छी कृतियों के बीच का भेद नहीं समझ पायेगा। आलोचना यहाँ सहायक सिद्ध होती है। आलोचना सामान्य पाठक को वह दृष्टि देती है जिससे पाठक सौंदर्यबोध और जीवनबोध को अधिक गहराई से समझ सके।

आलोचना के इन्ही सौंदर्यबोध सम्बन्धी अवधारणाओं से कलावादी समीक्षा की धारा जुड़ जाती है जो आलोचना में जीवन बोध की अवहेलना कर सिर्फ सौंदर्यबोध को स्थापित करते हैं और कला सिर्फ कला के लिए का नारा बुलंद करते हैं। साहित्य सिद्धांत के विवेचन के साथ-साथ बार-बार यह प्रश्न उठता है कि वास्तव में- "साहित्य का प्रयोजन क्या है? शिक्षा या आनंद? साहित्य के मूल्य क्या हों? इसे किन कसौटियों पर कसा जाना चाहिए? …एरिस्टोफेनीज से लेकर प्लेटो, होरेस, मध्ययुगीन विचारकों, सत्रहवीं-अठारहवीं सदी के साहित्यकारों तथा साहित्यशास्त्रियों सभी ने नैतिक शिक्षा या उपदेश को ही काव्य के प्रमुख प्रयोजन के रूप में मान्यता दी। प्लेटो तथा मध्य युग के धार्मिक कट्टरपंथियों ने तो कला या साहित्य का लगभग बहिष्कार ही किया क्योंकि उनके मत में ये अनैतिकता को प्रश्रय देते हैं।"[2]

साहित्य और कला सम्बन्धी उपरोक्त मतों के विपरीत कलावादियों ने साहित्य पर साहित्येतर प्रतिमानों के दवाब को ख़ारिज करते हुए कला सौंदर्य को ही अपना चरम उद्देश्य माना और उसके लिए कला से इतर हर प्रतिमान चाहे वह ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनीतिक या सांस्कृतिक हो उन्हें अस्वीकार कर दिया। पुनर्जागरण काल में भी कला के प्रयोजनों में शिक्षा कि अपेक्षा रंजन, या आनंद को ही अधिक महत्व दिया। स्वच्छंदतावादी विचारधारा ने कला तथा सौंदर्य के आनंद पक्ष को महत्व देने की प्रवृति को और भी बढ़ावा दिया। इसके साथ इसे दार्शनिक आधार प्रदान करने का कार्य जर्मन दार्शनिक इमानुएल कांट (1724 -1804 ) ने किया। इन्होंने क्रिटिक ऑफ़ जजमेंट में कहा कि- "कला व्यापर का अपना क्षेत्र और महत्व है। उसे ज्ञान और नैतिकता से स्वतन्त्र होना चाहिए। विशुद्ध सौंदर्य शास्त्र के पक्षधर कांट के अनुसार सौंदर्य का अस्तित्व चेतना में होता है, बाह्य विश्व में नहीं।"[3]

कलावाद कि यह पेशकश रूपवादी आलोचकों के लिए भी मार्ग प्रशस्त करती है जिनके लिए कलावादियों की तरह ही शिल्प और रूप विधान सम्बन्धी विशेषताएं ज्यादा महत्व रखती हैं। रूपवादी कहते हैं कि साहित्यिकता को तय उसका विषय नहीं करता उसकी प्रस्तुति करती है। अब ऐसे में सहज ही यह प्रश्न उठता है कि सिर्फ सौन्दर्यपरक मूल्यों की व्याख्या से क्या किसी रचना या कृति की प्रासंगिकता रह जाएगी? बिना भाव के सुन्दर शरीर भी निर्जीव ही प्रतीत होगी। यही कारण है कि हिंदी साहित्य के शिखर आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल भी "काव्यानुभूति को जीवनानुभूति पर निर्भर मानते हैं , वे काव्यानुभूति को जीवनानुभूति का उदात्त या अवदात्त रूप कहते हैं; इसलिए वे जीवनानुभूति और काव्यानुभूति पूर्ण पृथकता पर टिकी कलावादी दृष्टि का विरोध करते हैं रीतिग्रंथों के अंधानुकरण और उससे उपजी कृत्रिमता की कड़ी आलोचना करते हैं। अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, आदि के रूपवादी पूर्वग्रहों का विरोध करते हैं और रस की आनंद सम्बन्धी अवधारणाओं का खंडन करते हुए इसे लोकहृदय से जोड़ते हैं।"[4] अपनी पुस्तक रस मीमांसा में संस्कृत काव्यशस्त्र के साहित्यिक मानदंडों को पुनर्व्यख्यायित करते हैं और अपने अनुभव की कसौटी पर रखकर इसका विश्लेषण भी करते हैं। यह आचार्य शुक्ल की ऐतिहासिक चेतना है जो उन्हें संस्कृत के काव्यशास्त्र की पुनर्व्याख्या के लिए प्रेरित करती है और संवेदनशील बनती है अपने समय की नब्ज को पकड़ने की। जब पूरा देश औपनिवेशिक शासन के शोषणमूलक नीति का शिकार हो रहा हो उस समय किसी दरबार में बैठकर नायिकाओं का नख-शिख वर्णन क्या उचित हो सकता है? जिस समाज में मनुष्य को मनुष्य का दर्जा नहीं प्राप्त हो क्या वहां मनोरंजन का अवकाश होता है? आचार्य शुक्ल की यही मानवतावादी चेतना है जिसके कारण उन्होंने मनुष्य मात्र को सर्वोच्चता प्रदान की है और सौंदर्य चित्रण में भी कर्म सौंदर्य को प्रतिष्ठित किया है। मानव मात्र की गूँज के कारण ही आचार्य शुक्ल जहाँ अपनी आलोचना में तुलसी को सबसे श्रेष्ठ रचनाकार की श्रेणी में रखते हैं तो वहीँ आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कबीर को सर्वोच्चता प्रदान करते हैं। कबीर के साथ-साथ रैदास, दादू, धन्ना, पीपा, सेना, जैसे अन्य संत कवियों का भी इस काल में महत्त्वपूर्ण योगदान है। किसी विशेष कालखंड में निम्न जाति, निम्न वर्ग से आने वाले इतने सारे कवियों के पीछे क्या सल्तनत कालीन इतिहास की केंद्रीय चरित्र से इंकार किया जा सकता है? क्या यह सच नहीं है कि थोड़े ही समय के लिए सही पर सत्ता की स्थिरता और तकनीकी रूप से चरखा, करघा आदि के प्रयोग ने निम्नवर्गीय लोगों को आर्थिक सम्पन्नता प्रदान की और इस बेहतर आर्थिक स्थिति ने उन्हें अपने सामाजिक पहचान के साथ-साथ समानता की मांग के लिए प्रेरित किया।

यह संयोग हो सकता है कि तुलसी और अकबर समकालीन हैं पर यह महज संयोग नहीं कि तुलसी इसी समय रामचरितमानस कि रचना लोक भाषा अवधी में करते हैं। दरअसल यह तुलसी का अपने समय की जरुरत है जो उन्हें उन्मुख करता है जन सामान्य की भाषा में लिखने के लिए। रामचरितमानस ने तुलसी को सबसे बड़े समन्यवयकारी कवी के रूप में स्थापित किया है जिसका अभीष्ट है लोकमंगल। तुलसी के समन्वयकारी चेतना के पीछे तत्कालीन सत्ता की समन्यवयकारी नीति की भी भूमिका है। यह इतिहास सम्मत है कि अकबर ने हिन्दू और मुस्लिम प्रजा के बीच सामंजस्य बिठा कर ही लम्बे समय तक सफलतापूर्वक शासन किया। इसी तरह जहांगीर के समय यदि चित्रकला ने सर्वोच्चता को प्राप्त किया तो शाहजहां के समय स्थापत्य, साहित्य, संगीत और कला सभी को फलने-फूलने का भरपूर अवसर मिला। क्या हम इस बात से इंकार कर सकते हैं कि बिना सत्ता के दृढ चरित्र, एक राजा का प्रश्रय, और आर्थिक संसाधन के यह संभव है? क्या कारण है कि प्राचीन काल और मध्यकाल के साहित्यिक साक्ष्य तो फिर भी मिल जाते हैं पर 1857 कि क्रांति से सम्बंधित साक्ष्यों का आभाव है, क्या यह अंग्रेजी सरकार कि शोषणमूलक नीतियों की परिचायक नहीं जिसने क्रूरतापूर्वक इस क्रांति से सम्बंधित साक्ष्यों को नष्ट कर दिया। आज भी जब बख्त्यार खिलजी द्वारा नालंदा महाविद्यालय को नष्ट किये जाने की टीस हम भुला नहीं पाते। ऐसे कौन से कारण हैं कि भारतेन्दु काल में ही गद्य कि विधाएँ जिनमे कहानी, उपन्यास के अतिरिक्त नाटक को मुख्य रूप से पहचान मिली। भारतेन्दु कि रचनाओं को क्या तत्कालीन ऐसतिहासिक नवजागरण परक चेतना से अलग करके देखा जा सकता है?

इसी तरह छायावादी काव्य में राष्ट्रीय स्वाधीनता के स्वर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उपरोक्त विवरणों से स्पष्ट है कि समय के बदलते स्वरुप के साथ-साथ साहित्य कि धारा भी बदलती गयी। इसे इस प्रकार भी समझ सकते हैं कि अगर साहित्य में समाज के भीतर घटित होने वालो घटनाओं का प्रस्फुटन है तो इतिहास के द्वारा समाज के बदलते स्वरूप का उदघाटन भी। और अगर आलोचना समाज और साहित्य के संबंधों कि पड़ताल का उपकरण है तो क्या बिना इतिहास दृष्टि के आलोचना का कार्य संभव है? मेरी नजर में बिना इतिहास कि जानकारी के आलोचना के लिए साहित्य कि जड़ तक पंहुचना संभव नहीं है।

उन्नीसवीं सदी तक इतिहास के साथ-साथ साहित्य के बदलते स्वरूप को एक बड़ा झटका बीसवीं सदी में लगा जब द्वितीय विश्व युद्ध के बाद साहित्य ही क्या मानव सम्बन्धी सभी क्रियाकलापों के प्रतिमान ही बदल गए। एक तरफ द्वितीय विश्व युद्ध कि समाप्ति के बाद मानवीय अस्तित्व पर उठ रहे सवाल तो दूसरी तरफ वैज्ञानिक विकास और तीव्र औद्योगीकरण ने पुरे वैश्विक परिदृश्य में एक प्रकार का संकट उत्पन्न कर दिया। लगभग इसी परिस्थिति में आलोचना के क्षेत्र में नयी समीक्षा ने हलचल पैदा कर दी। "एक ओर स्वछंदतावादी प्रवृतियों का विरोध किया जो अव्यवस्थित, पलायनवादी, क्षीण और इन सब के साथ भावुक भी था दूसरी ओर इन्होने विक्टोरियन साहित्य की नैतिकता का भी विरोध किया।"[5] इसी तरह "नयी समीक्षा में कृति की समझ के लिए साहित्य की पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक, सामाजिक वातावरण पर अतिरिक्त बल देने का भी विरोध किया गया और कृति से हटकर कृतिकार पर ध्यान देने का भी। रिचर्ड्स ने इसी से प्रभावित होकर कविता के सही मूल्यांकन के लीये कविता को प्रतिक्रियायों के लिए एक गुमनाम रचना के रूप में पेश किया।"[6] स्पष्ट है कि ये सभी समीक्षक किसी रचना को उसके ऐतिहासिक, सामाजिक ब्योरों से पृथक देखने के हिमायती थे; पर क्या स्वतन्त्र रूप से किसी कृति कि समीक्षा करने पर उसमे इतिहास कि झलक नहीं मिलेगी। अगर ये किसी कृति को बाह्य प्रभाव से मुक्त रखना चाहते थे तब सबसे पहले इन पर इस समय ( द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उत्पन्न स्थिति) का ही प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए था और जो धारा चली आ रही थी उसी के साथ चलना  चाहिए था। इन तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि किसी कृति में शब्दों का चयन, प्रयोग, उसमें निहित कथ्य स्वयं अपने समय कि ओर इशारा करते हैं। इसे इस तरह भी समझ सकते हैं कि कालिदास के नाटकों में आभिजात्य पात्र संस्कृत बोलते हैं जबकि सामान्य जन, शूद्र और स्त्रियां प्राकृत बोलते हैं तब इस बात का सहज अनुमान किया जा सकता है कि निम्न वर्ग और स्त्रियों कि सामाजिक स्थिति उस समय अच्छी नहीं थी।

सच तो यह है कि ये सारी प्रवृतियां इतिहास सम्मत नहीं होती तो किसी एक प्रवृति का चित्रण ही बार-बार किया जाता। क्यों समय के साथ-साथ साहित्य कि प्रवृति और दिशाएं बदल जाती हैं? क्यों आज दलित-विमर्श, आदिवासी विमर्श या स्त्री विमर्श ही नहीं किन्नरों कि समस्या को भी साहित्य कि मुख्या धारा से जोड़ते हैं? क्यों हिंदी साहित्य कि आलोचना इस आधार पर करते हैं कि अगर इन्होने अपने साहित्य में इन विमर्शों को स्थान दिया होता तो शायद अपने अस्मिता (Identity) के सवाल को लेकर इन्हें अलग से अपनी पहचान बनाने के लिए जद्दोजहद नहीं करनी पड़ती। यह हिंदी साहित्य पर सवाल खड़ा करता है कि क्यों इन विमर्शों को अब तक उचित स्थान नहीं मिला।

निष्कर्षतः कह सकते हैं कि आलोचना कि बेहतर समझ के लिए इतिहास कि समझ आवश्यक है जी निश्चित रूप से साहित्य के मूल्यांकन के लिए एक दिशा देती है। लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं कि आलोचना कोरा इतिहास है पर इसे सहायता प्रदान करने वाली तकनीक अवश्य है।                         

 

[1] मैनेजर पांडेय, आलोचना कि सामाजिकता, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2008, पृ. 23

[2] निर्मला जैन और कुसुम बांठिया, पाश्चात्य साहित्य चिंतन, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2009, पृ. 164

[3] वही, पृ. 165

[4] मैनेजर पांडेय, आलोचना कि सामाजिकता, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2008, पृ. 38-39

[5] निर्मला जैन और कुसुम बांठिया, पाश्चात्य साहित्य चिंतन, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 2009, पृ. 179

[6] वही, पृ. 181