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जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

गोदान और नलिन विलोचन शर्मा: अजय आनंद

गोदान और नलिन विलोचन शर्मा

 

अजय आनंद

शोधार्थी, हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

मो: 9015774943, ईमेल :ajay.anand.03@gmail.com

‘गोदान’ हिंदी साहित्य का महत्त्वपूर्ण उपन्यास है । नलिन जी की आलोचना से पहले इसे ‘कलात्मक’ रूप से कमतर आँका जाता था। आरंभ में ‘गोदान’ के बारे में यह प्रचलित हो गया था—यह ‘दोयम दर्जे’ का उपन्यास है। थोड़ा साफ़ करके कहें तो ‘असफल उपन्यास’ है। ‘गोदान’ में शहरी जीवन, शहरी चरित्रों का वर्णन अनावश्यक और अप्रामाणिक है, ‘गोदान’ का गाँव नकली है,‘गोदान’ के ग्रामीण-पात्र एकआयामी या अधिक-से-अधिक दोआयामी सपाट पात्र हैं। जिनकी सिर्फ़ बाह्याकृति या सामाजिक सूरतें हम देख पाते हैं, उनका कोई आंतरिक लोक नहीं है। इस उपन्यास में महाकाव्यात्मकता का अत्यंत अभाव है। कुल मिलाकर यही धारणा नलिन जी से पूर्व और उनके समकालीन समीक्षकों—नंददुलारे वाजपेयी, रामविलास शर्मा, प्रकाशचंद्र गुप्त, पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’ आदि प्रमुख आलोचोकों का था।

            ‘प्रेमचंद : एक साहित्यिक विवेचन’ में ‘गोदान’ की समीक्षा करते हुए नंददुलारे वाजपेयी ने ‘गोदान’ के कथानक के बारे में लिखा है, “ ‘गोदान’ उपन्यास के उक्त दोनों कथानक यद्यपि परस्पर इतने असंबद्ध नहीं हैं, फिर भी उनमें वास्तविक ऐक्य की कमी अवश्य है।”[1] आगे कथानक की व्याख्या करते हुए नंददुलारे वाजपेयी जी प्रकारांतर से ‘गोदान’ के कथानक को असंबद्ध घोषित करते हैं, “उपन्यास में आए हुए वे वाक्य उन उन पात्रों के चरित्र-विकास से संबंध रखते हैं तथा उन उन स्थलों की परिस्थिति के अनुरूप होते हैं। अत: ऐसे वाक्यों का ताँता लगा देना जिनसे उन पात्रों के चरित्र में योग न मिलता हो और न वहाँ की परिस्थिति की अनुरूपता ही आती हो, रचना को उपदेशात्मक, कृत्रिम और असंबद्ध बना देगा।”[2]

            प्रेमचंद के दूसरे प्रमुख आलोचक रामविलास शर्मा हैं। उनकी दो पुस्तकें प्रेमचंद पर उस समय प्रकाशित हो चुकी थी—‘प्रेमचंद’ (1941) व  ‘प्रेमचंद और उनका युग’ (1952)। ‘गोदान’ की विवेचना करते हुए रामविलास शर्मा ने ‘सामाजिक-यथार्थ’ पर बल दिया है। ‘गोदान’ में सामंतवाद, साम्राज्यवाद और पूँजीवाद विरोधी यथार्थ की प्रतिष्ठा करते हुए वे लिखते हैं, “ ‘गोदान’ की मूल समस्या ऋण की समस्या है। ”[3] इससे स्पष्ट होता है कि रामविलास जी ‘गोदान’ को तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिदृश्य में स्थापित कर रहे थे। किन्तु, वे ‘गोदान’ के स्थापत्य से संतुष्ट नहीं थे। उनका मानना था, “केवल निर्माण की दृष्टि से स्वयं प्रेमचंद ‘सेवासदन’ को फिर ना पा सके; अपने अन्य बड़े उपन्यासों में उन्होंने निर्माण का ढंग ही बदल दिया था।”[4]

            नंददुलारे वाजपेयी और रामविलास शर्मा का ही नहीं, 1950-55 ई. तक अन्य प्रमुख आलोचकों का भी मंतव्य ‘गोदान’ के बारे में नकारात्मक ही था। यहाँ प्रो. जनार्दन प्रसाद झा ‘द्विज’, बाबू गुलाब राय, शांतिप्रिय द्विवेदी, प्रकाशचन्द्र गुप्त और पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’ प्रभृति प्रमुख आलोचकों के स्थापनाओं का उल्लेख करना जरूरी है। कुछ विद्वानों से नलिन जी अपने आलेख ‘उपन्यास’[5] में संवाद भी किया है  —

  1. जनार्दन प्रसाद झा ‘द्विज’ ने लिखा है, “ ‘गोदान’ इन्हीं दो विपरीत वर्गों में बँटी हुई नर-नारियों के बाह्य जीवन की विभिन्न दशाओं और दिशाओं पर प्रकाश डालता है।”[6]
  2. बाबू गुलाब राय का मत है, “गोदान’ में गाँव के चित्र अधिकार (आधिकारिक) रूप से तथा शहर के चित्र प्रासंगिक रूप से आये हैं।”[7]
  3. शांतिप्रिय द्विवेदी का मत है, “इस उपन्यास का बृहत् शरीर जिस देहाती जीवन के मेरुदंड पर खड़ा है, उसकी प्रचुरता और विदग्धता को देखते हुए इतर प्रसंग ‘क्षेपक’ से लगते हैं; इन क्षेपकों के कारण ही उपन्यास स्थूलकाय हो गया है।”[8]
  4. प्रकाशचंद्र गुप्त का मत है, “ ‘गोदान’ ग्रामीण जीवन का चित्र है।”[9]
  5. पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’ का मत है, “प्रेमचंद ने ‘गोदान’ में भी दो कथायें रखी हैं—एक का संबंध होरी के परिवार से हैं और दूसरे का राय साहब अमरपाल सिंह तथा उनके मित्रों से।”[10]

उपर्युक्त स्थापनाओं पर गौर करने से पता चलता है कि नलिन जी से पूर्व ‘गोदान’ का मूल्यांकन किस तरह से किया जा रहा था। नलिन जी संभवत: पहले आलोचक हैं; जिन्होंने ‘गोदान’ का मूल्यांकन ‘कलापक्ष’ को ध्यान में रखकर किया है। अपने  आलेखों में उन्होंने ‘गोदान’ के ‘स्थापत्य’ पर लगाये गए आरोपों का तर्कपूर्ण उत्तर दिया है। ‘गोदान’ के ‘स्थापत्य’ को वे ‘समानान्तर स्थापत्य’ मानते हैं । जो हिंदी कथालोचना के क्षेत्र में उनकी मौलिक खोज है। उन्होंने ‘गोदान’ के स्थापत्य’ की विशेषताओं को रेखांकित करते हुए लिखा है, “वस्तुतः यही ‘गोदान’ के स्थापत्य की वह विशेषता है जिसके कारण उसमें महाकाव्यात्मक गरिमा आ जाती है। नदी के दो तट असंबद्ध दिखते हैं, पर वे वस्तुतः असंबद्ध नहीं रहते—उन्हीं के बीच से जल-धारा बहती है। इसी तरह ‘गोदान’ की असंबद्ध-सी दीख पड़नेवाली दोनों कहानियों के बीच से भारतीय जीवन की विशाल धारा बहती चली जाती है।भारतीय जन-जीवन का, जो एक ओर तो नागरिक है और दूसरी ओर ग्रामीण और जो एक साथ ही अत्यंत प्राचीन भी है और जागरण के लिए छटपटा भी रहा है, इतने बड़े पैमाने पर इतना यथार्थ चित्रण हिंदी में ही क्यों, किसी भी भारतीय भाषा के किसी उपन्यास में नहीं हुआ है।”[11] ‘ग्रामीण जीवन के चित्रकार प्रेमचंद’ शीर्षक आलेख में इस स्थापना को और साफ़ करके नलिन विलोचन शर्मा यों लिखते हैं, “ ‘गोदान’ में चित्रित ग्रामीण जीवन उसी में चित्रित नागरिक जीवन का शेष पूरक है। वह नहीं होता, तो भारतीय जीवन का जो विराट् चित्र प्रेमचंद प्रस्तुत करना चाहते थे, वह अधूरा रह जाता।”[12] इसलिए “दोनों चित्रों को कृत्रिम रूप से संबद्ध दिखाने के बदले प्रेमचंद ने उन्हें आमने-सामने रख दिया है।”[13]

‘महाकाव्यात्मक उपन्यास’ से सर्वप्रथम टालस्टॉय के कालजयी उपन्यास ‘War and Peace’ (युद्ध और शांति) को अभिहित किया गया था। इस उपन्यास का मुख्य कथानक युद्धकालीन रूस के साथ-साथ शांतिकालीन रूस है। जिसके कारण इस उपन्यास में ‘रूस’ सम्पूर्ण सामाजिक, दार्शनिक और राजनीतिक समग्रता के साथ उपस्थित हुआ है।

‘युद्ध और शांति’ के प्रकाशन के समय यह प्रयोग उपन्यास ‘स्थापत्य’ के दृष्टिकोण से नया था। यह जरूरी नहीं है कि ‘नया प्रयोग’ प्रत्येक आलोचक की पकड़ में आये। Parcy Lubbock ने अपनी पुस्तक ‘The Carft of Fiction’ में ‘War and Peace’ को ‘असंबद्ध उपन्यास’ घोषित किया था। Lubbock का आरोप था की टालस्टॉय अनजाने, “ ‘एक साथ ही दो उपन्यास लिख रहा है।’ ”[14] वस्तुतः दो कथानक ‘War and Peace’ की कमजोरी न होकर मजबूती है; क्योंकि महान रचना अपने भीतर ही आलोचनात्मक ‘निकष’ समाहित करके आती है और पारखी आलोचक उस ‘निकष’ को परख लेता है। नलिन जी ऐसे ही पारखी आलोचक हैं। ‘गोदान के स्थापत्य’ शीर्षक आलेख में उन्होंने ‘गोदान’ के नूतन ‘कथा-शिल्प’ का स्वागत करते हुए लिखा है , “गोदान में स्पष्टत: दो खंड उसके रचयिता द्वारा गूँथे नहीं जा सके हैं, वे एक उपन्यास न होकर दो उपन्यास हैं ! इस तरह प्रेमचंद का वस्तुतः महान् उपन्यास, जिसका विधान-शिल्प नवीनतम औपन्यासिक प्रयोगों में परिगणनीय है, आज भी उसी तरह अगृहीत बना हुआ है। जिस तरह कभी ‘निराला’ का मुक्त छंद”[15]

‘गोदान’ के स्थापत्य के बाद  उनको ‘गोदान’ की भाषा  बहुत प्रभावित करती है; क्योंकि प्रेमचंद के आरंभिक रचनाओं की भाषा उर्दू जवानदारी से लबरेज है। किन्तु, ‘गोदान’ और ‘कफ़न’ तक आते-आते “प्रेमचंद की गद्य-शैली सरल, पर वैशिष्ट्यपूर्ण”[16] हो जाती है। उन्होंने ‘गोदान’ की भाषा-शैली की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए लिखा है, “गोदान’ में प्रेमचंद की शैली उर्दू-गद्य की आलंकारिकता के निर्मोह से सर्वथा मुक्त हो गयी है।”[17]

नलिन जी ने ‘गोदान’ की समीक्षा का केंद्र ‘स्थापत्य’ और कलापक्ष को बनाया है; क्योंकि उनका ध्येय कलात्मक रूप से ‘गोदान’ को स्थापित करना है, लेकिन, ऐसा भी नहीं है कि उनकी आलोचना में विषयवस्तु गौण है। ‘प्रेमचंद और मध्यवर्ग’ शीर्षक निबंध में ‘गोदान’ को सम्पूर्ण भारतीय जीवन का उपन्यास स्वीकार करते वे लिखते हैं, “गोदान’ में तो सम्पूर्ण भारतीय जीवन ही पात्र बनाया गया है और स्वभावतः उसमें मध्यवर्ग को अनुपात के अनुसार ही स्थान मिला है।”[18]

समासत: हम देखते हैं कि नलिनजी की समीक्षा हिंदी कथा आलोचना में क्षतिपूर्ति करता है। उनके द्वारा ‘गोदान’ का किया गया मूल्यांकन का प्रभाव परवर्ती आलोचकों पर भी पड़ा है।

 

 

[1] नंददुलारे वाजपेयी,  2008,  प्रेमचंद : एक साहित्यिक विवेचन,  राजकमल प्रकाशन,  नई दिल्ली - 2 : 85

[2] वही : 89

[3] डॉ. रामविलास शर्मा,  2011,  प्रेमचंद और उनका युग, राजकमल प्रकाशन,  नई दिल्ली : 96

[4] डॉ. रामविलास शर्मा,  2011,  प्रेमचंद, राधाकृष्ण प्रकाशन,  नई दिल्ली : 130

[5] यह आलेख सर्वप्रथम ‘आलोचना’ -5 (अक्टूबर, 1952) में हिंदी उपन्यास शीर्षक से प्रकाशित हुआ था

[6] प्रो. जनार्दन प्रसाद झा ‘द्विज’, 1949, प्रेमचंद और उपन्यास-कला, वाणी मंदिर प्रेस, छपरा (बिहार) : 15

[7] श्रीरंजन सूरिदेव (सं.), 1968, हिंदी उपन्यास : विशेषत: प्रेमचंद, ज्ञानपीठ प्राइवेट लिमिटेड, पटना-4 : 7

[8] वही : 7

[9] वही : 7

[10] डॉ. पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’,1958, प्रेमचंद और उनकी साहित्य साधना, प्रकाशक, उत्तरचंद कपूर, दिल्ली : 114

[11] श्रीरंजन सूरिदेव (सं.), 1968, हिंदी उपन्यास : विशेषत: प्रेमचंद, ज्ञानपीठ प्राइवेट लिमिटेड, पटना-4 : 7-8

[12] वही : 47

[13] वही : 47

[14] वही : 83

[15] वही : 88

[16] वही : 88

[17] वही : 9

[18] वही : 53