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जनकृति का नवीन अंक [अप्रैल-मई सयुंक्त अंक 2018] आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है. सम्पूर्ण अंक की पीडीऍफ़ डाउनलोड करने हेतु विषय सूची में दिए लिंक पर जाएँ.

विभा परमार की कविता

विभा परमार की कविता

 

हां मैं स्त्री हूँ
एक ऐसी स्त्री
जिसकी आँखों से बहती है
निरंतर आसुँओं की धाराएं 
पर उम्मीद की शाखाएँ भी साथ नहीं छोड़ती
स्त्री जिसके सोचने समझने का दायरा
सिर्फ़ 
उसके दिल से शुरु होता है 
और दिल तक खत्म
जाने क्यूँ
अधिक बोलने को उनकी बेशर्मी 
छोटे लिबासों को उनका बेवकूफी
मस्तिष्क बताकर 
पुरुष छलने लगता है
मेरे शरीर की बनावट पर उनका मचलना
मेरे ऊपर बेशर्मी से फब्तियां कसना 
वो अपनी मर्दानी बतलाते है
क्या है कोई ऐसा पुरुष 
जो प्रेम का स्पर्श करें हमेशा मेरे दिल में 
नाकि जिस्मों के अभागे अंगों पर
जिसे प्रेम हो मेरी आत्मा से
बोलते लफ्ज़ों से 
मुस्कुराती आँखों से
मगर आज का पुरुष 
 
सिर्फ़ बातें बोलकर प्यार और शरीर को छूकर 
अपना फर्ज़ पूरा करता है 
मानती हूँ मैं ये प्रेम का एक रूप हो सकता है
मगर वास्तविकता में पूर्णतः प्रेम तो नहीं

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