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जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

प्रगतिशील कवियों में नागार्जुन का स्थान: डॉ. शिप्रा किरण

प्रगतिशील कवियों में नागार्जुन का स्थान

डॉ. शिप्रा किरण, सहायक प्राध्यापक

बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय

लखनऊ- 226025

मोबाईल- 7607071662

 

नागार्जुन का कद उनकी कविताओं से भी बड़ा था. अरुण कमल ने लिखा है- “नागार्जुन ने अपने जीवन के लगभग पचास वर्षों में हजारों कविताएँ लिखीं हैं. एक एक कतरे को कविता से जोड़ने से जो नक्शा बनता है, वह इतना विस्तृत, इतना जन संकुल है कि किसी एक बिम्ब या सूत्रों में उनके काव्यलोक को व्यक्त नहीं किया जा सकता. ये हजार हजार बाँहों वाली कविताएँ हैं. हजार दिशाओं को इंगित करती, हजार वस्तुओं को अपनी मुट्ठियों में थामे.”1 नागार्जुन ने कविता सिर्फ रची नही है बल्कि उसे जिया भी है. उनकी कविताएँ उनकी प्रतिबद्धता का बयान हैं-

प्रतिबद्ध हूँ सम्बद्ध हूँ आबद्ध हूँ

प्रतिबद्ध हूँ जी हाँ प्रतिबद्ध हूँ

बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त

संकुचित स्व की आपा धापी के खिलाफ...

अविवेकी भीड़ की भेड़िया धसान के खिलाफ...

अन्धबधिर व्यक्तियों को सही राह बतलाने के लिए...

अपने आपको भी व्यामोह से बार बार उबारने की खातिर...

प्रतिबद्ध हूँ जी हाँ शतधा प्रतिबद्ध हूँ.2

नागार्जुन की प्रतिबद्धता का व्यापक दायरा है. यही उनके अपार साहस का कारण भी है जो सत्ता की आँखों में आँखें डालकर बात करता है. अपनी इसी खास प्रवृत्ति के कारण नागार्जुन की काव्य संवेदना अन्य प्रगतिशील कवियों से अलग और विशिष्ट है. नागार्जुन की वैचारिक प्रतिबद्धता देखने के क्रम में उनका रूप लगातार जनवादी कवि का दर्जा पाता दिखता है. जन आन्दोलनों से नागार्जुन का काव्य व्यापक रूप से प्रभावित है. उनकी कवितायें समसामयिकता की गवाह बन कर सामने आती हैं. स्वतंत्रता के बाद देश की राजनैतिक दशा और जनता के ठोस यथार्थ को जितने करीब से नागार्जुन ने देखा उतना शायद और किसी प्रगतिशील कवि ने नहीं देखा हो. नागार्जुन की कविता जनता के बारे में जनता की तरह सोचती है. सिर्फ उनकी कविता ही नही उनका जीवन भी आम आवाम का पक्षधर था. वे सम्पूर्ण पीड़ित मानवता के दुःख दर्द के हिस्सेदार बनते हैं कहीं शब्दों से तो कहीं खुद-ब-खुद. नागार्जुन की कविता ‘प्रतिबद्ध हूँ’ सन 1975 ई. में लिखी गई जब देश में इमरजेंसी लगी हुई थी. ऐसे समय में अपनी प्रतिबद्धता और पक्षधरता का खुला बयान कोई हँसी-खेल नहीं था. गोबिंद प्रसाद ने लिखा है- “वास्तव में नागार्जुन की कविताएँ एक्शनफुल अधिक हैं फोटोग्रैफिक कम. इन कविताओं की खूबी यह है कि कवि कहीं भी गिड़गिड़ाता नहीं. वह पाठक को आत्मदया या भावुकता से हीन नहीं बनाता. उलटे प्रतिपक्षी को व्यंग्य के विविध रूपों की बौछार कर डिमोरलाइज्ड कर देता है.”3 नागार्जुन की यही खास प्रवृत्ति उनकी संवेदना को सबसे अलग बनाती है. नागार्जुन के लिए अच्छी कविता एक सार्थक संवाद है. नागार्जुन के संवाद का दूसरा पक्ष जनसमुदाय है. वे कहते हैं-

जनता मुझसे पूछ रही क्या बतलाऊं

जनकवि हूँ मैं साफ़ कहूँगा क्यों हकलाऊं.4

नागार्जुन की कविता हकलाती नहीं उनकी दृष्टि में कोई दुविधा नहीं है. शब्दों का दोमुंहापन नही इसलिए यह कविता सार्थक संवाद बन पाती है. नागार्जुन उन मार्क्सवादियों से भिन्न हैं जो अपनी चर्चाओं में तो जाति के अस्तित्व को अस्वीकार करते हैं किन्तु जीवन और राजनीति में जाति के सहारे ही जीते हैं. नागार्जुन भारतीय समाज के भावी परिवर्तन और विकास के बारे में सोचते समय वर्ग और वर्ण के सम्बन्ध की जटिलता और वास्तविकता को नहीं भूलते. साथ ही क्रांति की पूरी प्रक्रिया में किसानों व मजदूरों की अनिवार्य एकता को भी नहीं भूलते. वे ‘हरिजन गाथा’ में सामंतों द्वारा मजदूरों-हरिजनों के शोषण का भयावह चित्रण कर के ही नहीं रह गए हैं बल्कि इसके परिवर्तन का संकेत भी दिया है. गरीबदास सताए हुए भूमिहीन बंधुआ मजदूर हरिजन के बच्चे की हथेली में हथियारों के निशान देखते हैं-

आड़ी-तिरछी रेखाओं में, हथियारों के ही निशान हैं

खुखरी है, बम है, असि भी है, गंडासा, भाला प्रधान है.5

नागार्जुन गरीबदास के मन में विश्वास पैदा करते हैं-

दिल ने कहा दलित माओं के, सब बच्चे अब बाग़ी होंगे

अग्निपुत्र होंगे वे अंतिम, विप्लव में सहभागी होंगे.6

नागार्जुन कविता के विषय में केवल आत्मा की गुफा में नहीं रहते हमारे आसपास के जीवन और प्रकृति में भी होते हैं क्योंकि उनका सजग संवेदनशील मन उन्हें पहचानने के लिए तत्पर रहता है. नागार्जुन की कविता अक्सर जीवन यथार्थ का चित्रण अधिक करती है विचारधारा पर बहस कम. सत्ता और व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष में जनता का साथ देने वाली नागार्जुन की कविता जन जीवन के संघर्षों के साक्षी की बेचैन वाणी है. देश की जनता और प्रकृति की आत्मीय छवि नागार्जुन के कविताओं की अद्भुत विशेषता है. 1980 के आस पास भोजपुर का किसान आन्दोलन जब तेज हो रहा था तब उसका स्वागत करते हुए नागार्जुन ने लिखा था-

यही धुंआ मैं खोज रहा था, यही आग मैं खोज रहा था.

यही गंध थी मुझे चाहिए, बारूदी छर्रे की खुशबू!...

ठहरो ठहरो इन नथनों में इसको भर लूं, बारूदी छर्रों की खुशबू.7

मैनेजर पाण्डेय ने लिखा है- “हिन्दी में जनता के कवि बहुत हैं लेकिन जन आन्दोलनों के कवि नागार्जुन ही हैं.”8 सन 1947 के जन आन्दोलनों की गूँज नागार्जुन की कविताओं में मौजूद है. स्वतंत्रता के बाद जन आन्दोलनों के पक्ष में कविताएँ लिखना सरल नहीं था. स्वाधीनता के बाद प्रगतिशील कवियों के वैचारिक भटकाव के साथ उस दौर के तमाम वामपंथी शासक वर्ग या सत्ता के तथाकथित ‘शाश्वत चरित्र’ को भूल गए और उनके द्वारा फैलाए गए अवसरवाद के जाल में फंसते गए. शासक वर्ग क्रमशः और अधिक चालाक और खूंखार होता गया. इन सबका प्रभाव प्रगतिशील कवियों पर पड़ा. अनेक भूतपूर्व विद्रोहियों ने लक्ष्य बदल लिए. कुछ ने पुराने लक्ष्य की बात करते हुए भी अपने रास्ते बदल लिए. संकट के उस दौर में भी नागार्जुन सत्ता के दमनकारी रूप और जनता के संघर्ष का चित्रण करते हैं. राजनीति का साहित्य से ऐसा जुड़ाव होता है कि काव्य मर्मज्ञ कविता की साहित्यिकता की चिंता करते हुए नागार्जुन को राजनैतिक कवि घोषित कर बैठते हैं. यह स्वाभाविक भी है. अन्याय के विरुद्ध आक्रोश से उपजी कविता का स्वर कर्कश हो ही जाता है. ब्रेख्त ने लिखा भी है-

बिगड़ जाती है चेहरे की रौनक घृणा में, क्रोध में.

आवाज कर्कश हो जाती है

घृणा चाहे नीचता से हो और क्रोध अन्याय के खिलाफ.9

जड़ीभूत सौन्दर्याभिरुचि के उपासक नागार्जुन की कविताओं को पढ़कर बेचैन हो जाते हैं. ऎसी ही एक कविता है ‘पैने दांतों वाली’-

धूप में पसर कर लेटी है,

मोटी, तगड़ी, अधेड़ मादा सूअर...जमना किनारे मखमली दूबों पर

पूस की गुनगुनी धुप में पसर कर लेटी है

यह भी तो मादरे हिन्द की बेटी है.10

ऐसा सौन्दर्यबोध नागार्जुन जैसे कवि का ही हो सकता था. गोबिंद प्रसाद ने ठीक ही लिखा है- दरअसल नागार्जुन की कविता कविता के तमाम शास्त्रबद्ध आभिजात्य को अंगूठा दिखाती हुई पाठक व स्वयं कवियों के लिए प्रेरणा पाठ है. वह अपनी प्रकृति में आबाल-वृद्ध सबके लिए सहज, सुन्दर, सरल और सुलभ है. वह विशिष्टातीत होकर भी सारमयी है, यही उसकी निजता है. उसमें एक ही साथ क्रांतिकारिता के क्लासिक खजाने हैं और आज के इतिहास के छंद को समझाने वाला आक्रोश है. कहीं आक्रोश की तह में थिरकते व्यंग्य और करूण सन्नाटे की लय है तो कहीं आरण्यक प्रकृति से प्रत्यक्ष संवाद.”11 1930 के बाद से प्रगतिशील कविता का प्रभाव हिन्दी साहित्य में बढ़ने लगा था. कांग्रेस के भीतर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का निर्माण तथा हंस, जागरण, विश्वामित्र, आज आदि पत्र-पत्रिकाओं में विभिन्न रुझानों के लेखकों के योगदान से समाजवाद, साम्यवाद, मार्क्सवाद का प्रभाव बढ़ता जा रहा था. श्री पट्टाभिसीतारमैया ने ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का इतिहास’ में बताया है कि “अंग्रेजों ने 1930-1934 के दौरान राजद्रोह के आरोप में 348 पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन पर रोक लगा दी थी.”12 इसका कारण यह था कि ये पत्र-पत्रिकाएँ समाजवाद, नवजागरण तथा किसानों की मुक्ति का पक्ष लेती थीं. कांग्रेस के स्वाधीनता संग्राम की लड़ाई प्रगतिशील कवियों को नागवार गुजरती थी. इसका कारण था कांग्रेस की पूंजीवादी वर्ग के साथ समझौता करने वाली नीतियाँ. रामविलास शर्मा ने लिखा है-  

देशभक्ति के काम में रूपए दिए हजार

चमक उठा उस पुण्य से फिर खोया व्यापार

न इसको लूट बताओ जी.13

प्रारंभ में प्रगतिशील काव्य एक व्यापक साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष का काव्य था. समाजवादी विचारों के प्रभाव से उसमें साम्राज्यवाद से मुक्ति के साथ सभी प्रकार के शोषण से मुक्ति के प्रश्न जुड़ गए. आजादी के बाद भारतीय जनता के अंतर्विरोध खुल कर सामने आए. सत्ता के साथ देशी सामंतों और उद्योगपतियों के रिश्ते धीरे धीरे प्रगाढ़ होते गए. जो लोग किसान, मजदूर या जनता के हित को ध्यान में रखकर देश की आजादी और विकास की कल्पना करते थे उन्होंने इस समझौते का विरोध किया. नागार्जुन ऐसे ही लोगों में से एक थे. आजादी की पहली वर्षगाँठ पर नागार्जुन ने ‘जन्मदिन नए शिशु राष्ट्र का’ कविता में लिखा- 

आज ही के दिन तुम मिल गए थे दुश्मनों से, गुनाहगारों से

छोड़कर संघर्ष का पथ, भूलकर अंतिम विजय की घोषणायें

भोंक कर लम्बा छुरा तुम सर्वहारा जन गणों की पीठ में. 14

सर्वहारा जन गणों को अपने विवेक की कसौटी नहीं मानने वाले साहित्यकार आजादी के बाद प्रगतिवाद से अलग हो गए. इतना ही नहीं प्रगतिशील साहित्य के विरुद्ध जोरदार संगठित आन्दोलन चलाए गए. नेमिचंद्र जैन और भारतभूषण अग्रवाल जैसे कई प्रगतिशील कवि जो पहले अपने को घनघोर मार्क्सवादी कहते थे, मार्क्सवाद विरोधी हो गए थे. प्रयोगवाद-नई कविता के दौर में प्रगतिशील काव्यान्दोलन की धारा क्षीण हुई. प्रगतिशील कवियों में शमशेर बहादुर सिंह ने यद्यपि मार्क्सवाद से अपना नाता नहीं तोड़ा लेकिन नई कविता के भीतर प्रगतिशील काव्य मूल्यों के लिए संघर्ष करते रहे. “लेकिन नागार्जुन उन दृढ रचनाकारों में एक थे जिन्होंने प्रगतिशील जीवन मूल्यों को स्वीकार करके अपने साहित्य की दिशा निश्चित की और अपनी रचनात्मक सक्रियता से प्रगतिशील साहित्य के विकास में निरंतर सहयोग दिया.”15 अन्य प्रगतिशील कवियों से नागार्जुन की विशिष्टता का मूल्यांकन करते समय उनके इस पक्ष को आँख से ओझल नहीं करना चाहिए. नागार्जुन की कविताओं को देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि उनके कवि व्यक्तित्व का विकास निरंतर यथार्थवाद की उंचाईयों की दिशा में हुआ है. छायावादोत्तर कविता में छायावादी रूमानियत से सर्वाधिक स्वतंत्र रहे हैं नागार्जुन और केदारनाथ अग्रवाल. भारतभूषण अग्रवाल जो पहले “मार्क्सवाद को समाज के लिए रामबाण”16 मानते थे और आत्मपरिचय में डंके की चोट पर खुद को कम्युनिस्ट कहते थे बाद में मार्क्सवाद के विरोधी हो गए. उन्होंने लिखा- “अब कम्युनिस्ट नहीं हूँ. यही नहीं अब तो लगता है कि जब कहता था तब भी नहीं था.”17 प्रभाकर माचवे भी पहले अपने मार्क्सवादी उफान के दौर में पेड़ पत्तों में भी ‘लाल परचम की विजय’ पढ़ रहे थे. बाद में उन्हें भी गांधी दिल का सहज आकर्षण और मार्क्स दिमाग की ओवरग्रोथ जान पड़ते थे. नागार्जुन विचारधारा को दैनिक प्रयोग के वस्त्र की तरह नहीं समझते थे. नागार्जुन के इन्द्रीयबोध का स्वरुप इस पंक्ति से समझा जा सकता है-

बहुत दिनों बाद, अब मैंने जी भर भोगे...

गंध-रूप-रस-शब्द-स्पर्श सब साथ साथ इस भू पर.18

इसके बाद नागार्जुन सामाजिक गहमा गहमी की तरह उन्मुख होते हैं. केदारनाथ अग्रवाल संवेदनात्मक स्तर पर रागात्मक प्रगाढ़ता की और उन्मुख होते हैं. और ‘मांझी न बजाओ बंशी’ जैसी कविता लिखते हैं. जबकि शमशेर बहादुर सिंह के यहाँ इन्द्रियबोध का संसार एक दूसरे से अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर जुड़ा हुआ है. शमशेर के काव्य का प्रभाव स्वप्न लोक सा जान पड़ता है-

आह, तुम्हारे दांतों से जो दूब के तिनके की नोंक-

उस पिकनिक में चिपकी रह गई थी

आज तक मेरी नींद में गड़ती है.19

शमशेर इसलिए थोड़ी दूर तक रहस्यवाद की दुनिया में भी विचरण कर आते हैं. केदारनाथ और नागार्जुन अपनी-अपनी विशिष्टताओं के बावजूद इस रहस्यलोक से दूर हैं और यथार्थवादी हैं. शमशेर का रूमानी संस्कार नागार्जुन में नगण्य है. शमशेर के रूमानी व रहस्योन्मुख संस्कारों का उनके यथार्थवादी रुझान से निरंतर अंतर्द्वन्द्व चलता है. केदार की कविता में अंतरंगता का भाव ज्यादा है जबकि नागार्जुन की संवेदना बहिर्मुखी रही है. नागार्जुन अस्तित्ववाद के प्रभाव से मुक्त हैं. उनका यथार्थवादी चरित्र उनको इस संस्कार से बचाता है. शमशेर के यहाँ विशिष्ट प्रकार का शिल्प विधान है जिसके कारण उनकी सहृदयता और करुणा काव्य में प्रकट नही हो पाती है. मुक्तिबोध की स्थिति शमशेर से भिन्न है. उनके यहाँ शांत, सुन्दर और सुरक्षित स्थान नहीं है. मुक्तिबोध का विवेक मार्क्सवादी है. कुछ प्रयोगवादियों की तरह वे खुद को सुरक्षित रखने के लिए दुनिया को असुरक्षित रखने के पक्ष में नहीं हैं. मुक्तिबोध के लिए मार्क्सवाद व्यक्तिवाद का विलोम बनकर नहीं बल्कि पूर्णता की एक जटिल प्रक्रिया के रूप में आता है. उनकी आत्मग्रस्तता और आत्मसंघर्ष उनके आत्म संवेदन को सामाजिक संवेदन की भूमि पर ले जाने के लिए तत्पर दिखाई देती है. अँधेरे में कविता की ‘खोज’ नायक की आत्म ग्रस्तता को उसके मध्यवर्गीय संस्कारों से निकाल कर सामजिक संघर्षों की जमात में खड़ा करने का प्रयास करती है. यह कवि की ईमानदार अभिव्यक्ति का प्रयास है. नागार्जुन की मुक्तिबोध से भिन्नता यही है कि ये उस आत्मग्रस्तता के शिकार नहीं हैं जो मुक्तिबोध के काव्य की मुख्य समस्या है. नागार्जुन यथार्थ जीवन की प्रक्रियाओं को न तो मुक्तिबोध की तरह आत्मगत भावों के आरोप से विकृत कर आत्मसंघर्ष के रूप में घटित होता हुआ दिखाते हैं ना ही गिरिजा कुमार माथुर की तरह रूमानियत या भावुकता से खंडित या सिक्त कर देते हैं. केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं में रागात्मक प्रगाढ़ता का तत्त्व उनके संयत सौन्दर्यबोध का प्रमुख आधार है. केदारनाथ अग्रवाल ने भी नागार्जुन की तरह राजनीतिक व्यंग्य लिखने की परम्परा का विकास किया लेकिन केदार एक निश्चित दौर के बाद इस परम्परा से विचलित होते गए जबकि नागार्जुन जैसे जैसे जीवन के जटिल अंतर्विरोधों को समझते गए हैं उनके राजनीतिक व्यंग्य और पैने होते गए हैं. अपने प्रखर यथार्थवादी और दृढ भौतिकवादी उन्मेष के कारण ही नागार्जुन प्रगतिशील कवियों की जमात में सर्वाधिक महत्वपूर्ण रहे हैं.   

 

सन्दर्भ सूची

  1. आलोचना, अंक 56, 57- सं. अरुण कमल, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ सं. 27
  2. नागार्जुन : प्रतिनिधि कविताएँ, सं. नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ सं. 15
  3. कविता के सम्मुख, गोबिंद प्रसाद, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ सं. 64
  4. नागार्जुन : प्रतिनिधि कविताएँ, सं. नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ सं. 25
  5. नागार्जुन : प्रतिनिधि कविताएँ, सं. नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ सं. 139
  6. नागार्जुन : प्रतिनिधि कविताएँ, सं. नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ सं. 142
  7. नागार्जुन : प्रतिनिधि कविताएँ, सं. नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ सं. 117
  8. आलोचना की सामाजिकता- मैनेजर पाण्डेय, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ सं. 196
  9. कविता कोश
  10. नागार्जुन : प्रतिनिधि कविताएँ, सं. नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ सं. 81
  11. कविता के सम्मुख, गोबिंद प्रसाद, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ सं. 65
  12. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का इतिहास (खंड 2)  पृष्ठ सं. 197
  13. सदियों के सोए जाग उठे- रामविलास शर्मा, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ सं. 101
  14. हजार हजार बाहों वाली- नागार्जुन, राधाकृष्ण प्रकाशन, पृष्ठ सं. 44
  15. नागार्जुन की कविता- अजय तिवारी, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ सं. 189
  16. नई कविता और अस्तित्ववाद- रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ सं. 168
  17. नई कविता और अस्तित्ववाद- रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ सं. 168
  18. नागार्जुन : प्रतिनिधि कविताएँ, सं. नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ सं. 71
  19. कुछ कविताएँ व कुछ और कविताएँ- शमशेर बहादुर सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, पृष्ठ सं. 20