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जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

हिंदी उपन्यासों में अभिव्यक्त खेल जीवन: जैनेन्द्र कुमार

हिंदी उपन्यासों में अभिव्यक्त खेल जीवन

जैनेन्द्र कुमार

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय

 

              “जैसे ही

                कुछ नया करना चाहती है

                 अकेली पड़ जाती है

                  वरना लोग साथ देते ही हैं

                   एक देवी का

                    एक सती का

                     एक रंडी का1

‘पायदान’

पिछले कई दशक से या यों कहें कि आजादी के बाद से नारियों ने जीवन के विविध क्षेत्रों में अपने कदम बढ़ाये । उन्होंने लगातार पुरुषों की सत्ता को चुनौती दी । ऐसे निषिद्ध क्षेत्रों में पदार्पण किया जहाँ स्त्रियों का प्रवेश वर्जित था । भारतीय राजनीति में नेहरु युग के बाद इंदिरा गाँधी के उदय और उनके द्वारा कुशल नेतृत्व ने यह साबित किया कि महिलाएं भी वह सब कुछ कर सकती हैं जो पुरुष ही करते आये हैं । भारतीय समाज में इस घटना का इतना प्रभाव पड़ा कि जो भी लड़कियां थोड़ी आजाद पसंद ख्याल की होतीं और पारंपरिक नारी स्वभाव का अनुसरण नहीं करतीं तो उसे ‘इंदिरा’ कहा जाने लगा । बाद के दिनों में स्त्रियाँ चाँद पर पहुंची, रेल चलाई, एवरेस्ट पर जा पहुंची, हवाई जहाज उड़ाया, राष्ट्रपति बनी, लोकसभा का संचालन किया और अंततः हर जगह खुद को साबित किया ।

जाहिर है इसी दौरान लड़कियों ने खेल के मैदान में भी प्रवेश किया जो कि पूर्णतः ‘मर्दाना’ क्षेत्र माना जाता रहा है । खेल के आरंभिक स्वरुपकारों को तो यह इल्म भी नहीं रहा होगा कि एक दिन इसे स्त्रियाँ भी खेलने लगेंगी । आज लगभग हर खेल में पुरुष टीम के साथ-साथ महिलाओं की भी टीम होती है । यद्यपि खेल में शारीरिक ताकत की एक बड़ी भूमिका होती है, कुछेक अपवादों को छोड़ कर । सदियों से नारी को श्रृंगार और सौंदर्य उपकरणों से लाद कर जिस तरह घर के अन्दर कैद किया गया है जाहिर है उसकी जैविक स्थिति कोमलांगी सी हो गयी है । उसके अन्दर पुरुषों जैसी आक्रामकता का अभाव है । स्त्रियों को बाहरी परिस्थितियों से पुरुषों की तरह जूझना नहीं पड़ा इसलिए उसमें जीवटता का विकास नहीं हो पाया जो कि एक खिलाड़ी में होनी चाहिए । लेकिन फिर भी आज कर्णम मल्लेश्वरी, पी.टी उषा, कृष्णा पूनिया, मैरिकोम, सायना नेहवाल और  सानिया मिर्जा जैसी खिलाड़ी ताकत में भी किसी पुरुष से कम नहीं हैं । खेल की दुनिया में इन लोगों ने जो कामयाबी हासिल की है उसके लिए कई प्रतिस्पर्धी पुरुष सपने देखते हैं ।

हिंदी साहित्य में भी इसकी धमक सुनायी पड़ती है । सोना चौधरी का ‘पायदान’ एक ऐसी ही लड़की की संघर्षगाथा है जिसने लड़कियों के लिए बनाए सामाजिक नियमों को मानने से इनकार कर दिया । खेल की दुनिया में हठात प्रवेश कर लिया जो तब सिर्फ पुरुषों के लिए आरक्षित था । ‘पायदान’ उपन्यास में नायिका के तीन नाम क्रमशः ‘कशिश’, ‘आँचल’ और ‘आस्था’ को ही शीर्षक का रूप देकर उसके जीवन के क्रमिक विकास को दिखलाने की कोशिश की गई है । ‘कशिश’ में घर छोड़ने से पहले तक वर्णन है जबकि ‘आँचल’ में उसके बाद का । आस्था में मुख्य रूप से नागपुर का जीवन संघर्ष आया है । “क्रमशः कशिश, आँचल और आस्था के बहाने एक ही औरत के विकास और विनाश की गाथा एक सौ तिरपन पृष्ठों में फैली हुई है, जिसमें से वह पुरुष के बनाए चौखटों को तोड़ती हुई बाहर आना चाहती है, बेशक अभी तक यह मैदान खाली था । साहित्य में फुटबाल के मैदान में किक लगाई भी तो एक लड़की ने ।”2 नायिका कशिश की जैसी पृष्ठभूमि है, उस लिहाज से यह बहुत ही बड़ा क्रांतिकारी कदम था । किसी स्थापित सत्ता को चुनौती देना या ऐसी किसी राह पर चलना जिसकी राहें स्पष्ट न हो, हमेशा चुनौतीपूर्ण होता है । हिंदी साहित्य में खेल को लेकर जो दूसरा उपन्यास ‘खेल गुरु’ है, उसकी नायिका वसुधा को खेल की दुनिया के लिए बाकायदा प्रशिक्षित किया जाता है जबकि कशिश को हर जगह खुद ही अपनी राह बनानी पड़ती है । हिंदी में खेल की दुनिया को आधार बना कर जो ये दो उपन्यास लिखे गये हैं संयोग से दोनों के केंद्र में महिला खिलाड़ी ही हैं । दोनों मूलतः ग्रामीण परिवेश से हैं । ‘खेल गुरु’ की नायिका वसुधा को जहाँ सही समय पर योग्य मार्गदर्शक मिल जाते हैं वहीं पायदान की नायिका कशिश जीवन भर इसके लिए तरसती है । वैसे पुरुष की लोलुप दृष्टि से अपनी देह को बचाने के लिए दोनों अपने स्तर पर                 संघर्षरत हैं ।

            खेल की दुनिया में महिलाओं की उपस्थिति कम होने का एक कारण यह भी है कि उनकी देह को कोमल और नाजुक माना और बनाया गया जो खेल की दुनिया के लिए अनफिट हैं । अपनी जैविक संरचना और उससे पैदा होने वाली रुकावटों के कारण सभ्यता की आदिम अवस्था में ही महिलाओं के लिए अपेक्षाकृत कम श्रम वाले काम निर्धारित कर दिए गए । ऐसा माना जाता है कि पाषण युग में पुरुष खेती करता था तो औरतें बागवानी और घर संभालती थीं । सभ्यता के विकासक्रम में अपनी संभावनाओं को विस्तार देने के लिए पुरुषों ने जंगलों को मैदान में बदलना शुरू किया । जाहिर है यहाँ ताकत और जिस स्टेमिना की जरुरत थी अपनी जैविक कारणों से स्त्रियाँ पुरुषों से पिछड़ गयी । “स्त्री-पुरुष के सेक्स का विभेदीकरण वास्तव में एक जैविक तथ्य है, इतिहास की कोई घटना नहीं ।”3 विस्तार ने मालिकाना हक़ और निजी सम्पति की इच्छा जगायी । धीरे धीरे इसी स्वामित्व के दायरे में स्त्री भी आ गयी । इसलिए हम देखते हैं जितने भी मिथक हमारे यहाँ प्रचलित है वहां दो कबीलों या दो राजाओं में युद्द के बाद स्त्री, जमीन और जानवरों को ही अपने कब्जे में लेने का सन्दर्भ आता है ।

            ‘पायदान’ की नायिका कशिश/आँचल/आस्था सारी परंपरा को धता बता कर मैदान में प्रवेश करती हैं । वैसे पारिवारिक और सामाजिक परिस्थितियाँ इसके विपरीत थीं । उपन्यास में एक जगह कशिश कहती है “बुआ के घर जाते ही मुझे वे सब जगहें दिखा दी गई जहाँ-जहाँ काम करना था । जो एक जगह कभी भी नहीं दिखाई गई वह थी खेलने का  मैदान ।”4 कशिश एक ऐसे हरियाणवी परिवार से आती है जहाँ लड़की की स्थिति भारत के अन्य भागों से भिन्न नहीं है । वैसे हरियाणा खेल के लिहाज से भारत के अग्रणी राज्यों में से एक है । सालों से वहां ओलम्पियन पैदा होते रहे हैं । सामाजिक और भौगोलिक संरचना भी इसमें मदद पहुंचाती है । पुरुषों के लिए आज भी वहां संभावना के द्वार पूरी तरह से खुले हैं और उनका दिल खोल कर स्वागत होता है । कशिश एक जगह कहती भी है “पांचवीं कक्षा में शहर में आने के बाद मैं देखती सब मुझे काम के लिए डांटते-फटकारते रहते । छोटा भाई जब खेल में कुछ जीतकर लाता तो सबका केंद्र बिंदु बन जाता ।”5 फिर भी जब बेटी के खेलने और उसमें आगे बढ़ने की संभावना का आभास भी होता है तो पुरुष वर्ग और उन्हीं की मानसिकता में जी रही स्त्रियों में खलबली मच जाती है । “कहीं अगर जरा दूसरे बच्चों को खेलता देख खड़ी भी हो जाती तो बहुत डांट पड़ती कि जहाँ जाती है वही रह                   जाती है ।”6 

            लड़कियों के लिए उसकी माँ, ताई, चाची और दादी इत्यादि ही उसकी प्रगति की सबसे बड़ी बाधक होती है । पुरुषों द्वरा बनाये गये नियम कानून जो महिलाओं के पैरों में बेड़ी डालने का काम करते हैं उसको लागू करने में औरतों की सबसे बड़ी भूमिका होती है । “औरतों का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि वह बचपन से केवल दूसरी औरतों के हाथ में प्रशिक्षण के लिए छोड़ दी जाती है । लड़के का भी लालन-पालन माँ द्वारा होता है, लेकिन माँ के मन में उसके पौरुष के प्रति सम्मान रहता है । लड़का बहुत जल्दी स्त्री जगत से भाग खड़ा होता है जबकि लड़की को उसी जगत में रहना पड़ता है । माँ एक ही साथ अपनी लड़की के प्रति स्नेहशील और विरोधी दोनों ही होती है । वह अपनी बेटी को अपनी नियति के साथ बाँध लेती है । उसमें वह अपना नारीत्व फिर से स्थापित करना चाहती है । यह एक प्रकार का स्वयं से प्रतिशोध है ।”7 बदलते समय के साथ लड़कियों के लिए भी खेल के दरवाजे खुल रहे हैं । “यह ठीक है कि आजकल युवा लड़की को सामान्य शिक्षा के लिए प्रेरित किया जाता है तथा लड़कों के साथ खेलकूद में भाग लेने को कहा जाता है, किन्तु इन सब क्षेत्रों में उससे विशेष  सफलता की आशा नहीं की जाती और उसका पहला उद्देश्य सब कुछ को आत्मसात करके एक सही स्त्री बनना ही रहता है ।”8

            खेल का मैदान और उससे जुड़े पदाधिकारी या दर्शक सब लोग अब तक महिला खिलाड़ियों को मात्र ग्लैमर मानते हैं । उसको एक खिलाड़ी न मानकर एक देह माना जाता है । बिहार में एक मैच के दौरान आस्था की टीम की गोलकीपर पर भद्दे कमेंट किये जाते हैं “साली पैंट पहन कर मैदान में क्यों आई है ? नेकर पहन, तेरी टांग देखने को ही तो टिकट लिया है ।”9 पायदान उपन्यास ऐसे प्रसंगों से भरा पड़ा है जिसमें कशिश/आँचल/ आस्था को उसके खेल हुनर से कम और हुस्न के हुनर से ज्यादा जाना गया । पुरुषवादी समाज उसे एक खिलाड़ी के तौर पर कभी ठीक से स्वीकार नहीं कर पाया । कोच खेल के मैदान का गुरु तो होता है, साथ ही साथ वह एक पारंपरिक पुरुष भी होता है जिसके लिए स्त्री सिर्फ भोग्या होती है । इसलिए वह कशिश के साथ फुटबाल न खेल कोई और ही खेल खेलने की कोशिश करता । “कोच अभ्यास के दौरान उसके शरीर को छूता । कुल मिलाकर उसकी हरकत खेल के स्वाभाविक प्रक्रिया से अलग थी । कशिश ने इन सबसे तंग आकर स्टेडियम जाना बंद कर दिया लेकिन खेलों से लगाव बना रहा । माँ को वह बता भी नहीं सकती ।”10 लड़कियां समाज के कुचक्र में इस तरह फंसी हैं या जकड़ी हैं कि इन सब का प्रतिकार भी खुल कर नहीं कर सकतीं । दिक्कत यह है कि हमारे समाज की संरचना ही ऐसी है कि लड़कों का कुछ नहीं होता लेकिन लड़कियां बदनाम कर दी जाती हैं । इस कारण उसके भावी जीवन में अनेक समस्याएँ खड़ी हो जाती हैं । “मम्मी ने पूछा पर मैंने कुछ बताया नहीं । क्या बताती । एक तो आगे खेलों में जाने का रास्ता बंद हो जाता, दूसरा ये कि मेरे माँ- बाप क्या करते ।” 11

            खेल के मैदान से लेकर बाहर तक नायिका यौन-शोषण से कई रूपों में प्रभावित रही । बचपन में ही उसके चाचा ने उसके और ताऊ की बेटी के साथ गलत हरकत की । आमिर खान के बहुचर्चित टीवी कार्यक्रम सत्यमेव जयते का एक एपिसोड बाल यौन शोषण पर ही आधारित था । बीबीसी हिंदी के अनुसार इस कार्यक्रम में दिखाया गया कि सिंड्रेला प्रकाश नाम की युवती के साथ भी बचपन में ऐसी घंटना हुई जब वह सिर्फ 12 साल की थी । 55  साल के उसके ही एक परचित ने गलत इरादे से उसके शरीर को कई जगह छुआ था । इस पूरे कार्यक्रम से एक बात स्पष्ट तौर पर सामने आती है कि इस तरह की शुरूआत सबसे पहले घर से ही होती है । संकोच और धमकी के कारण ये सारी बातें सामने नहीं आ पाती । अगर इसका पता चल भी जाता है तो पारिवारिक प्रतिष्ठा के कारण मामले को दबा दिया जाता है । छुपाने और प्रतिकार न करने की यही पारिवारिक विरासत आगे जाकर लड़कियों की कमजोरी का कारण बन जाती है । ‘पायदान’ की नायिका कशिश के बचपन में भी कुछ ऐसा ही घटता है । “रात में चाचा और उसका दोस्त हमारे बदन के साथ सब कुछ सहज भाव से करते रहते, हम घिग्घी बांधे आँख मूंदे होते, दादा जी करवट लिए पड़े                रहते ।....हमारी परवरिश ने हमारे अवचेतन में कुछ ऐसा भर दिया था जो हमसे वैसा कराता रहा । न जाने क्यों,पर सबसे बड़ा भय यही रहता कि कहीं कोई चाचा और उसके दोस्त को वह सब करते देख न ले । हम अपने बदन निढाल रखते पर दिमाग तनाव से जागता रहता । जब वे दोनों थक कर सो जाते तो हमें भी नींद के आगोश में जाते देर नहीं लगती । बचपन का शरीर कितना झेलता, दिमाग कहाँ तक तनता ?”12

            लड़कियों को सबसे पहले अपने परिवार से लड़ना पड़ता है । बाहर की दुनिया में जितनी कठिनाई है उससे कम घर में नहीं है ।  समाज में प्रचलित कायदे कानून जो लड़कियों की प्रगति में बाधक हैं उसकी पहली शिक्षा परिवार में ही दी जाती है साथ की उसको कठोरता से पालन करने का प्रशिक्षण भी । “मुझे बाहर के समाज ने तो बाद में पहले मेरे अपनों ने ही अच्छी तरह समझा दिया था कि मैं एक लड़की हूँ और मुझे समाज द्वारा बनाई गई हदों के भीतर रहना चाहिए । चाहे मैं स्वीकार करूँ या नहीं परन्तु मुझे उनके अनुसार चलना ही पड़ेगा । अगर मैंने ऐसा नहीं किया तो मुझे निशाना बना दिया जायेगा । आवारा, बदचलन या ऐसी ही कोई संज्ञा देकर । अगर लड़का देर तक घर से बाहर रहे तो कोई बात नहीं, लेकिन लड़की वैसा करे तो वह चरित्रहीन हो जाती है ।”13

बड़े भाई की भूमिका कशिश की जिन्दगी में एक दारोगा की तरह थी । कशिश की हरेक गतिविधि पर उसकी नजर थी । समाज की जैसी बुनावट है उसमें पुरुषों की आज़ादी का पर्याप्त वातावारण मौजूद है लेकिन स्त्रियों के लिए दरवाजे बंद रखे गये हैं । जब भी इस दरवाजे को लांघने या तोड़ने की कोशिश होती है मर्दवादी समाज इस पर बंधन लगाने की चेष्टा करता है । “दरअसल जो समाज घर के बाहर था वही घर के भीतर भी था । मेहर भईया ने मुझे लम्बी किक लगानी सिखाई, घंटों-घंटों उनके साथ सीखने में गुजारने पड़ते थे । बड़े भाई को इस पर ऐतराज था, कोई मुझे मैदान में खेल के मुताबिक शारीरिक कसरत कराता तो उसे कोफ़्त होती । किसी पदाधिकारी के पास टीम के सिलसिले में मैं जाती तो बाद में वह लड़ने पर आ जाता । मेरे नाम के साथ उड़ाई जाने वाली हर कहानी उस तक पहुँचने लगी । घुमा फिरा कर वह मेरी जबाब तलबी तक आ जाता । एक बार साथ खेलने वाला एक लड़का अपने स्कूटर पर मुझे मेरे घर तक छोड़ गया । भाई की नजर पड़ी तो उसने उस स्कूटर का नंबर नोट कर लिया । बाहर के मर्द से असुरक्षा और घर के मर्द से सुरक्षा में कम दमघोंटू क्या था ?”14

परिवार की बदनामी के नाम पर लड़कियों के आस पास ऐसा वातावरण बनाया जाता है ताकि वह अपनी बात न कह सकें । उसकी भावना व्यक्त करने की चीज न होकर अन्दर ही अन्दर सहने और घुटने की चीज हो जाती है । परिवार, समाज, रिश्तेदारी की बदनामी का हवाला देकर विरोध और विद्रोह की तमाम कोशिशों को भावनात्मक रूप से कुचल दिया जाता है । “समाज, माँ-बाप, भाई-बहन, दोस्त-रिश्तेदार सब यह अनुमति तो देते हैं कि लड़की घुटकर दम तोड़ दे लेकिन वह जो चाहती है, वह जो महसूस करती है, अगर उसे बाहर निकालेगी तो सबकी बदनामी होगी । इसलिए जो उसके अन्दर है, अन्दर ही रहे ।”15

खेल का मैदान हमारे समाज का ही एक कोना है । वहाँ भी वर्चस्व के लिए तमाम तरह की तिकड़म लगायी जाती है । कशिश की एक महिला कोच अपनी बहन की शादी अपने एक सहकर्मी कोच से कराना चाहती थी । इसके लिए वह लड़कियों को उनके पास प्रशिक्षण के लिए भेजती थी । अपने निजी स्वार्थ के चक्कर में खिलाड़ियों के भविष्य से खेलने की घटना खेल दुनिया में आम बात है । कशिश के साथ ऐसा लगातार होता रहता            है । जैसा कि पहले भी जिक्र हो चुका है और सिमोन इसकी व्याख्या भी कर चुकी है कि औरतों की प्रगति में औरत भी रुकावट डालती है । कशिश का फुटबाल खेलना महिलाओं के लिए तो अस्वीकार था ही, साथ ही साथ उसकी महिला कोच भी उसे अच्छी नजर से नहीं देखती थी । कठिन परिस्थितियों ने उसे फुटबाल के लिए और प्रेरित किया । फुटबाल के सिवा उसे किसी भी चीज में अपना उद्धार नहीं दिखता था । उसकी ताकत यह थी कि इसके सिवा उसके पास और कोई विकल्प भी नहीं था । “फुटबॉल का मैदान मेरे लिए सारी संभावनाओं का केंद्र बन गया । मैं राष्ट्रीय स्तर तक जा सकती थी, विदेशों में खेलने का अवसर पा सकती थी, पढाई के लिए वजीफे से नौकरी तक मिल सकती थी, घर की चक्की से छूट सकती थी, विवाह से बच सकती थी । कोच या खिलाड़ी जिससे जरा भी सीखने को मिलता या प्रोत्साहन की उम्मीद बनती, मैं उसकी मुरीद बनने को तत्पर रहती । मेरा दिमाग इस कदर खेल में रमा रहता कि कौन किस भावनावश मुझे मिलता है, किसकी नजर में क्या है सब बेमानी होकर रह गया । सुबह शाम दिन रात सारी दुनिया भुलाकर जुट गई अपने लक्ष्य की पूर्ति में ।”16 खेल की दुनिया में सफ़ल होने के कई रास्ते हैं । या तो आप बहुत प्रतिभाशाली हों या आपके पास बड़ी सिफारिश हो या आप कोई भी सौदा करने को तैयार हों । जरुरी नहीं की हर खिलाड़ी इनमें से हरेक शर्त को पूरा करता ही हो । कशिश मजबूत इरादों वाली लड़की है जिसे अपनी शर्तों पर जीना पसंद है और उसके पास कोई गॉडफादर नहीं है । इसलिए कोई भी प्रशिक्षक उससे खुश नहीं है । कशिश का जुनून उन्हें विद्रोह लगता और वे इसे पसंद नहीं करते थे । “मैं जानती हूँ मैंने उसकी मर्दानगी को ठेस पहुंचाई थी । एक तो लड़कों के बीच खेलने को उतरी थी और दूसरे उसके घर के चक्कर नहीं लगाये । एक लड़की, गरीब लड़की की अहम भरी औकात को वह हिकारत से ही ले सकता था ।”17

            परिस्थतियों से लड़ते-लड़ते एक समय ऐसा भी आया जब वह अपनी समकालीन महिला खिलाड़ियों से बहुत आगे निकल गई । अब किसी भी टीम चयन की बात होती तो सारी जिम्मेदारी कशिश को ही दी जाती । इसके पीछे कशिश का जुनून था । खेल के बाहर उसके लिए कुछ नहीं था  । इसके सिवा वह कुछ नहीं सोचती थी । “मैंने भुला दिया था कि मैदान के बाहर भी कोई दुनिया है या जो नहीं खेलते वे भी अच्छे सपने देख लेते हैं और खुश रहते हैं । या सिर्फ खेलना ही जिन्दगी नहीं है, उसके अलावा भी बहुत कुछ है । लगता था खेल और मैदान के बाहर शायद सपने ही नहीं होते और अगर होते हैं तो मैं वह सपने कभी नहीं देखना चाहती जिनमें खेल से शुरुआत और अंत न हो ।”18 उम्र के साथ लड़कियों में शारीरिक बदलाव के साथ-साथ पुरुषों के प्रति आकर्षण भी पैदा होता है । कशिश ने खुद को ऐसे ढाल लिया मानो इन सब का कोई असर ही उसके ऊपर नहीं हुआ । इसका फायदा यह हुआ कि बड़े भाई को उसे खेल से अलग करने का कोई सटीक बहाना ही नहीं मिला ।

            अपनी महत्वकांक्षा और लड़की होने के कारण कशिश बार-बार यौन शोषण के लपेटे में आती रही । लम्बी, छरहरी, सुन्दर और खेलने के कारण सुगठित शरीर उसकी कमजोरी बन गये । ‘चमकता हुआ तारा’ बनाने का झांसा देकर उसे कई बार शिकार बनाने की कोशिश की गई । बचपन से लेकर जवानी तक वह इससे प्रभावित और पीड़ित रही । परिस्थियाँ उसे साफ़ मजबूर कर रही थी कि वह खेल का मैदान छोड़ दे । एक ज्योतिष जो खेल एसोसिएशन से जुड़ा था उसके भाई को प्रलोभन देकर परिवार का उद्धार करने के नाम पर उसके घर तक आ गया । दरअसल उसकी नजर कशिश के शरीर पर थी । माँ की अंधभक्ति के बाबजूद उसने साहस दिखाकर उसकी पोल खोल दी और भाई से उसकी पिटाई करवाई । एक प्रशिक्षक ने मंत्री जी को खुश करने के बदले अच्छा पद दिलाने का झांसा देते हुए कहा “अगर तुम चाहो तो बहुत अच्छा पद हासिल कर सकती हो । वे तुम्हें बनाएंगे, तुम उन्हें खुश कर दो । बाद में ये चीजें कोई मायने नहीं रखतीं, एक बार कुछ बन जाओ बस ।”19 उसने बाकायदा उदाहारण देकर इसकी व्याख्या भी कर दी । एक लड़की होना ही कशिश की कमजोरी नहीं थी,बल्कि गरीबी भी उसकी कमजोरी थी । आर्थिक अभाव के कारण वह हर वक्त अच्छी नौकरी की मोहताज थी । नौकरी की यही तलाश उसे इस मोड़ पर ला खड़ा करती । समझौता नहीं करने की प्रवृति नए संकट पैदा करती । कशिश द्वारा सकारात्मक जवाब नहीं पाकर यह प्रशिक्षक मौके  की तलाश में था । मौका मिला नेशनल कैम्प में । जहाँ हाल-चाल पूछने के बहाने उसने कशिश के साथ बदतमीजी की । “कैसा चल रहा है । साथ ही उसके हाथ के घेरे ने सरककर मेरे दाहिने स्तन को बुरी तरह मसल दिया । मैं रोती हुई वापस अपने कमरे में भाग गई ।”20

            सहगल के बहाने ‘पायदान’ स्थानीय स्तर पर होने वाले खेल आयोजन और उसके पीछे के स्याह सच को उजागर करता है । सहगल के लिए खेल सिर्फ एक व्यवसाय था । “वह फुटबाल का ही नहीं लड़कियों में कम प्रचलित कई अन्य खेलों का भी सेक्रेटरी बना हुआ था । दरअसल जिस भी आल इंडिया बॉडी को हमारे प्रदेश में शाखा खड़ी करनी हो, सहगल सेक्रेटरी बनने को हाजिर होता ।”21 सपक टकरा, बाल बैडमिंटन, खो-खो, कबड्डी, स्क्वॉश, लान बॉल इत्यादि खेल जो हमारे समाज में बहुत लोकप्रिय नहीं हैं उसकी स्थिति तो और भी बदतर है । जिला स्तर पर एक ही आदमी बहुत सारे खेलों का सेक्रेटरी बना होता है । उसकी प्रशासनिक पकड़ भी बहुत तगड़ी होती है । चूँकि इन खेलों पर किसी की विशेष नजर नहीं होती इसलिए ऐसे लोग अपनी मनमर्जी चलाते हैं । लड़कियों के लिए ऐसे खेलों में खेलने और आगे बढ़ने के लिए कदम कदम पर समझौता करना पड़ता है । सर्टिफिकेट का खेल में बड़ा महत्व होता है क्योंकि इसके सहारे कहीं छोटी-मोटी नौकरी लग जाती है । अधिकारी इस बात को गहराई से जानते हैं इसलिए इस बहाने खिलाड़ियों की ब्लैकमेलिंग आम बात है । कशिश जब बबली से पूछती है कि दीदी तुम सहगल के गांव जाकर सर्टिफिकेट क्यों नहीं ले लेती तो वह कहती है  “क्या जाऊं ! रिश्ते में यह शायद मेरा दादा लगेगा । कहता है एक बार सो जा सर्टिफिकेट ले जा ।”22

            नागपुर का सहगल भी इस उपन्यास की नायिका को प्रलोभन देते हुए कहता है “भाई हमारा तुम्हारा तो स्पोर्ट्स का नाता है, हम एक दूसरे नहीं समझेंगे तो कौन समझेगा ? कितनी खिलाड़ी लड़कियों और कितनी लेडी कोचों से मेरा वास्ता रहा है, पर तुम स्पेशल हो, देखो मैं कहाँ से कहाँ पहुंचाऊंगा ।...... स्पोर्ट्स में इतना कुछ होता है । मैं तो मानता नहीं कि तुम्हें आज तक लोगों ने छोड़ रखा है । इतनी रईसजादी तो हो नहीं । इसमें है क्या, बीस मिनट लगने हैं, एक बार चस्का लग गया तो खुद आओगी बार-बार...थिंक ओवर इट...आई मस्ट हैव यू ।”23 पीठ पीछे तो ऐसे लोगों की खूब आलोचना की जाती लेकिन फ्रंट पर मुकाबला करने के नाम पर सब पीछे हट जाते । ‘खतरनाक आदमी’ कहकर पल्ला झाड़ लिया जाता । ऐसा ही एक और सचिव था जिसने खेल को कमाने और खाने का धंधा बना लिया था । खिलाड़ी और खेल उसके लिए कोई भावनात्मक महत्व नहीं रखते थे । आँचल कहती है “मैं खुद टीम का कप्तान होते हुए भी उन फर्जी कागजों पर हस्ताक्षर करके आती थी जिनमें हजारों रूपये खिलाड़ियों  पर खर्च किया हुआ दिखाया जाता था । कहने या सुनने में ये शब्द कितने अच्छे लगते हैं कि बुराई का डटकर मुकाबला करो और कितना आसान लगता है यह सब कि बुराई के सामने कभी सर मत झुकाओ । वह आदमी खेल के नाम पर सरकार से भी पैसा लेता, खिलाड़ियों को भी लूटता । फिर गिरगिट की तरह रंग बदलना, जरा-जरा सी देर में मुकर जाना और सबसे खतरनाक था कि बच्चों का भविष्य बनाने के नाम पर उनकी जिन्दगी का ठेकेदार बनकर उनकी जिन्दगी को अपनी खराबियों से सराबोर करना ।”24 आँचल का सपना है कि वह भारतीय टीम की ओर से खेले । यही उसकी कमजोरी भी है । बेटी की उम्र की होने के वाबजूद सचिव उसकी इस कमजोरी का फायदा उठाना चाहता है । “आँचल अगर भारतीय टीम में खेलना है तो लाज का आँचल उतारना होगा, दिन में एक बार मुझे अपने होठों का रस चख लेने दिया कर ।”25

            समस्या सिर्फ खेल के मैदान तक ही सीमित नहीं थी । खेल के आधार पर जब आँचल को छोटी सी नौकरी मिल जाती है तो वहां भी उसे दिक्कतों का सामना करना पड़ता है । किसी भी मर्द से किया गया उसका मित्रवत व्यवहार उसके लिए मुसीबत का कारण बन जाता । वह सेक्स की जल्दी दिखाने लगता । दफ्तर के बहुत बड़े अधिकारी के दलाल ने सीधा ऑफर दिया “तरक्की चाहिए, छुट्टी चाहिए, खेलों में भाग लेने की इजाजत चाहिए, जो चाहे करो बस बॉस को खुश करके ।”26 कुछ लोकप्रिय और प्रचलित खेलों को छोड़ कर किसी भी खेल संगठन का स्थाई और मान्य स्वरुप नहीं था । हरेक खेल के कई संगठन थे । 2011 में हरियाणा में  ही ओलम्पिक संघ की मान्यता को लेकर विवाद पैदा हो गया । एक संघ की बागडोर इनोलो विधायक अभय सिंह चौटाला के हाथ में थी तो दूसरे संघ का नेतृत्व हरियाणा के पुलिस महानिदेशक (सीआईडी) पीवी राठी कर रहे थे । दोनों संघ अपनी मान्यता के लिए दावा कर रहे थे । 2013 में हॉकी इंडिया और भारतीय हॉकी महासंघ दोनों का अंतरराष्ट्रीय हॉकी संघ के समक्ष मान्यता के दावेदारी प्रस्तुत करने का मामला आया था । पायदान में भी संघों के इस विवाद का जिक्र आता है । इससे सबसे बड़ा नुकसान खिलाड़ियों को होता है । अगर किसी एक संघ को मान्यता मिल गई तो विरोधी संघ के खिलाड़ियोंको ब्लैक लिस्ट में डाल दिया जाता है । “ये धड़े इस कदर बंटे हुए थे कि जो खिलाड़ी एक के लिए खेल लेती, बांकी उसे छूते भी नहीं ।”27 बीसीसीआई (बोर्ड ऑफ़ कंट्रोल फॉर क्रिकेट इन इंडिया) ने सुभाष चंद्रा और कपिल देव की ‘आईसीएल’ में खेलने वाले खिलाड़ियों का भी यही हाल किया । उनके पैसे रोक लिए गये और उन्हें देश के लिए खेलने से वंचित कर दिया गया । कपिल देव जैसे महानतम खिलाड़ी को भी मांफी मांग कर वापसी करनी पड़ी । अम्बाती  रायडू जैसे प्रतिभावान खिलाड़ी के खेल जीवन के कई महत्वपूर्ण साल इसी विवाद के कारण बर्बाद हो गये ।

            पायदान की नायिका को कई मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ा । पहला यह कि वह लड़की थी । दूसरा यह कि उसने ठेठ पुरुषों के खेल को अपनाया । किसी लड़की द्वारा फुटबाल खेलने का निर्णय लेना मात्र इतिहास से टक्कर लेना है । उस जिस्मानी वर्चस्व को चुनौती देना है जिसपर पुरुषों का एकछत्र राज रहता आया है । इतिहास और वर्तमान दोनों से टकराने के कारण पायदान उपन्यास की नायिका अंततः हार जाती है लेकिन भविष्य के प्रति आशा जगा जाती है । बाद की जिन्दगी गोलियों और मनोचिकित्सक के सहारे सिमट जाती है । एक संभावना जगाने वाली लड़की गुमनाम गली में गुम हो जाती है । “घर से निकली थी तो इरादे थे आसमान में छेद करने के और अब जमीं पर चलना भी भारी लगने लगा था । निराशा व अवसाद में डूबे हुए कई-कई दिन निकल जाते ।...कभी होता कहीं भाग जाऊं ।.....जब भागने की मनः स्थिति में आती तो चिड़चिड़ाहट से दिमाग गर्म होता,शरीर बेताबी से सनसनाता रहता और प्रायः मैं सामने वाले से अंग्रेजी में फट पड़ती । भूख और नींद का चक्र पूरी तरह गड़बड़ाने से खेलना या स्टेडियम जाना पूरी तरह छूट गया था ।”28    

            जिस तरह समाज के अन्य क्षेत्रों में नारी को उसका समुचित स्थान नहीं मिला है और वह वहाँ प्रताड़ित है उसी तरह खेल की दुनिया में भी उसकी दखल समाज स्वीकार नहीं कर पाता । इसलिए पायदान की नायिका गुमनामी की अँधेरी गली में धकेल दी जाती है । उसको एक खिलाड़ी के तौर पर आगे बढ़ने के सारे रास्ते बंद कर दिए जाते हैं । “जिसको अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक जाना था, जिसको सम्मानपूर्वक आजीविका का हक़दार होना था और जिसको देश का गौरव होना था, वह सारी संभावनाओं को ख़तम करके लौट जाने को विवश होती है । ये हारी हुई प्रतिभाएं किसी अज्ञात कोने में सिर न छिपाएं तो क्या करें ? स्त्री का मर्दों के क्षेत्र में दस्तक देना अपने हाथ कटा लेने और पांव बांध देने की सजा का भागी है, आगे आकर बचा लेने वाला भी कोई कहाँ है ?”29

‘खेल गुरु’                   

            हिंदी साहित्य में खेल की दुनिया को आधार बनाकर लिखा गया दूसरा उपन्यास ‘खेल गुरु’ एकल खेल (लॉन्ग जम्प) के लिहाज से पहला उपन्यास है । उपन्यासकार ने बहुत मेहनत से इसके तकनीकी पक्षों को ध्यान में रखते हुए खेल की दुनिया को कथा के रूप में ढाला है । उपन्यास में गुरु (कोच) और शिष्य (खिलाड़ी) के संबंधों के जरिये खेल की दुनिया के कई पक्षों को समझने की कोशिश की गयी है । “यह उपन्यास अपनी कल्पना की क्रीड़ा-कथा रचता है, जिसमें खेल है दौड़ का, छलांग का, आकांक्षा का, स्वप्न का, स्वर्ण का उपलब्धि का और आनंद का ।”30  उपन्यासकार रमेश दवे खुद भी शिक्षक रहे हैं इसलिए उनकी नैतिक छाप उपन्यास में साफ़ दिखाई पड़ती है । ‘खेल गुरु’ को वास्तव में एक देह गाथा होना था और कई मायनों में देह शब्द की लगातार आवृति उस ओर ले जाने का प्रयास भी करती है इसके बावजूद खेल की दुनिया का विस्तृत चेहरा हमारे सामने आता है । जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है इसमें ‘खेल’ के साथ ‘गुरु’ का भी जुड़ाव है । पारम्परिक रूप से वासुदेवन सर गुरु की भूमिका में हैं । वसुधा एक स्तरीय लॉन्ग जम्पर है इसलिए समय-समय पर और भी बहुत से गुरु (कोच) का सानिध्य उसे मिलता है । उपन्यास गुरु शिष्य परम्परा के स्याह पक्ष को भी बेबाक तरीके से प्रस्तुत करता है । साथ ही साथ खेल जगत भी विस्तृत फलक में उपन्यास में उपस्थित हुआ है । “खेलों में षड़यंत्र, भाई-भतीजावाद, भ्रष्ट्राचार, और खेल-संस्थानों अकादमियों, कोचों आदि के खिलाड़ियों से, विशेषकर महिला खिलाड़ियों से व्यवहार को लेखक ने जिस विश्वसनीयता और साफगोई से लिखा है, वह हिंदी उपन्यासों में कम ही देखने को मिलता है ।”31

 उपन्यास की मुख्य पात्र वसुधा केरल के कोट्टायम जिले के चंगनछेरी गाँव की रहने वाली एक जुनूनी लड़की है । बचपन में ही उसकी खेल प्रतिभा (लांग जम्पर) को उसके एक शिक्षक वासुदेवन पहचान लेते हैं । “वसुधा हर फतवे का विरोध है । वह हर मर्दाना फलसफे की पराजय का नया इतिहास रचने को आतुर है । वह न खेल में हार मानती है न उम्र में हार मानती है, न अपने लड़कीपन से और न उस सारी दुनिया से जो उसके औरत होने की प्रतीक्षा कर रही है ।”32 उनकी ही प्रेरणा से वसुधा जिला से लेकर राज्य, जोन सब को फतह करती हुई पटियाला के नेताजी सुभाष क्रीडा संस्थान पहुँच जाती है । जहाँ               उसको अन्तर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता में बेहतर प्रदर्शन के लायक तैयार किया जाता है । यहीं आकर उपन्यासकार की चिंता शुरु होती है । उपन्यास यहाँ आकर निर्णायक मोड़ पर पहुँच जाता है ।

वैसे ‘पायदान’ की नायिका जैसी कठिनाई वसुधा को नहीं हुई, उसे खेलने के लिए अनुकूल वातावारण मिला । फिर भी एक आम भारतीय परिवार की तरह उसके घर में              बेटी को खेल में करियर बनाने की आजादी देने को लेकर द्वंद्व था । “लड़की का माँ के लिए अर्थ था लड़के से कमतर कोई एक घरेलू जीव । दूसरा अर्थ था, उसका लड़की से जल्दी औरत होना और शादी करके सेटिल हो जाना और तीसरा अर्थ था शादी के बाद बच्चे ।”33 जबकि पिता इस बात के पक्ष में थे कि “क्यों न वसुधा को स्पोर्ट्स में उसका करियर बनाने दिया जाय । क्या जरुरी है कि दक्षिण की हर लड़की नृत्यांगना या गायिका ही बने ।”34

            वसुधा पटियाला में विवि सर के फिटनेस चेकअप से प्रशिक्षण सत्र में विचलित होती है । कोच उसकी ब्रा-पेंटी के अन्दर भी झाँक कर उसका फिटनेस लेवल चेक करना चाहता है । बिना किसी महिला प्रशिक्षक के  ऐसी शारीरिक जाँच वसुधा जैसी मध्यवर्गीय परिवार की लड़की के लिए असहज कर देने वाला क्षण था । ऐसे भी क्षण आये जब कोच  की  गतिविधि  और  बातों  ने  भ्रम  पैदा  किया । “देखो खेल में ऊपर जाने का रास्ता कोच के नीचे होकर जाता है ।”35 नैतिकता के दवाब में उपन्यासकार द्वंद्व होते हुए भी खेल संस्थानों में हो रहे यौन शोषण पर पर्दा डालने की कोशिश करता है और इसे  उच्चस्तरीय खेल प्रक्रिया का हिस्सा बताता है जिसे वसुधा अपने संस्कारों के कारण स्वीकार नहीं कर पा रही । लेकिन इससे यौन शोषण का वातावरण जरुर बनता है जिसके कारण कहानी में मोड़ भी आते हैं ।  इस बहाने खेल सस्थानों के काले कारनामों पर से पर्दा उठता है । खेल संस्थानों से लेकर उसके तमाम अवयवों में यौन शोषण खेल जगत की कड़वी सच्चाई है । “खिलाड़ी अगर लड़की है तो वह खिलाड़ी बाद में है पहले तो आदमी की वहशी थाली का मेन्यू है, स्वीट या नमकीन डिश है ।”36 अभी कुछ साल पहले तमिलनाडु क्रिकेट एसोसिएशन के एक अधिकारी पर भी ऐसा ही आरोप लगा था । ताजा घटना मध्यप्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन में भी घटी है जहाँ आरोपी अधिकारी को इस्तीफा देना पड़ा । दैनिक भास्कर में  क्रमशः 2  जून और 3 जून की खबर छपी ‘महिला पहलवान ने कोच पर लगाये यौन उत्पीड़न के आरोप’ और ‘उत्पीड़न मामले में कोच निलंबित’ । ऐसी खबरें खेल जगत में आम बात है लेकिन जब बात बाहर आ जाती है तो खबर बन जाती है । कोच के डर और करियर के प्रति शंकित होने के कारण लड़कियां समझौते करने पर विवश हो जाती हैं । “एक उत्साही किशोर या जवान लड़की के खेल में प्रवेश करते ही हर कोच का हर अधिकारी का हर संस्थान के छोटे से बड़े कर्मचारी तक का मनोभाव यही तो होता है ना, किसी न किसी तरह इस लड़की को पटा लो, पकड़ लो और वश में न आये तो मौका देखकर उसका बलात्कार कर दो । लड़की के तमाम सिलेक्शनों का एकमात्र लालच उसका शरीर सुख रहता है । इसलिए कई लड़कियां शरीर को कैरियर मान लेती हैं । ऐसे में कौन बनेगा ओलम्पियन, कहाँ से आएगा गोल्ड मेडल ?”37

तिरुअनन्तपुरम के खेल संस्थान में भ्रष्टाचार का एक मामला सामने आता है । मंत्री की साली अलामेलू को चयन में वरीयता दी जाती है । राजनीति से गठजोड़ के कारण खेल जगत धांधलियों का अड्डा बन चुका है । “संस्थानों, अकादमियों या ऐसे प्रतिष्ठानों से होता ही क्या है ? मोटी-मोटी तनख्वाहों से बड़े-बड़े पद रचे जाते हैं, जो कभी हॉकी, क्रिकेट, फुटबाल या किसी  भी खेल का बेस्ट ऑफ इलेवन तो क्या, स्टेट लेवल मैच भी न खेला हो, वह डाइरेक्टर, मैनेजर और तरह तरह का अफसर हो जाता है ।”38 जितना खेल मैदान के अन्दर खेला जाता है उससे कहीं ज्यादा बाहर खेला जाता है । आज तमाम खेल संघों पर राजनेताओं का कब्ज़ा हो चुका है । इनके डर और प्रभाव से गावस्कर और रवि शास्त्री सहित बहुत सी खेल हस्ती भी बीसीसीआई के सामने मुंह नहीं खोलती । कीर्ति आजाद हो या अमरनाथ या फिर बिशन सिंह बेदी जिसने बीसीसीआई के खिलाफ आवाज उठाई उसकी या तो पेंशन रोक दी गयी या उन्हें कोई भी महत्वपूर्ण पद ही नहीं दिया गया । इनमें से जिस किसी ने भी उसकी सत्ता को चुनौती देने की कोशिश की तो उन्हें मुँह की खानी पड़ी । उनके विरोध का मतलब अपना नुकसान करना है । इस प्रक्रिया में ऊपर से नीचे सबके बीच गजब का गठबंधन होता है क्योंकि सब के हित एक दूसरे से जुड़े होते हैं । मंत्री के साली अलामेलू को वसुधा के ऊपर वरीयता मिल जाने पर बवाल हो जाता है और यह बड़ा मुद्दा बन जाता है । सिलेक्शन कमिटी  भंग करने की नौबत आ जाती है । अंततः मंत्री की साली अलामेलू को प्रायश्चित करना पड़ता है । “टीम गेम में ऐसी धांधली एक-दो खिलाड़ी को लेकर चल जाती है, मगर इंडिविजुअल गेम तो एक सिंगल व्यक्ति के मेरिट और परफार्मेंस का होता है । यह छोटा सा गलत फेवर जाहिर कर देता है कि सिलेक्शन मेरिट या परफार्मेंस के बजाय तिकड़म से हुआ है ।”39 खेल की दुनिया को समझना इस कारण जरा मुश्किल हो जाता है क्योंकि सभी खेलों की संरचना एक सी नहीं होती । कुछ खेल टीम के जरिए खेला जाता है तो कुछ व्यक्तिगत स्तर पर । कुछ खेल ऐसे हैं जिनमें मिक्स डबल (एक पुरुष एक महिला की जोड़ी) का प्रचलन भी है । लॉन्ग जम्प में  खिलाड़ी व्यक्तिगत रूप से भाग लेता है इसलिए इसमें सबकी क्षमता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है । इस कारण हम देखते हैं कि जब इस उपन्यास में भी वसुधा के नाम से पहले अलामेलू का नाम आता है तब सबको एहसास हो जाता है कि चयन में धांधली हुई है । इसलिए गलती पकड़ ली जाती है और फिर बवाल हो जाता है । ऐसे खेलों में पारदर्शिता उसकी संरचना के कारण है लेकिन बहुत सारे खेल ऐसे हैं जहाँ व्यक्तिगत प्रदर्शन से ज्यादा टीम का प्रदर्शन मायने रखता है । ऐसे खेलों में सिफारिश वाले खिलाड़ियों को खपाना आसान होता है । कुश्ती, फुटबाल सहित कई खेल ऐसे भी हैं जहाँ निर्णायकों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है वहां भी निर्णायकों से समझौते करके चीजों को अपने अनुसार नियंत्रित किया जा सकता है ।

उपन्यास जब अपने अंत की ओर बढ़ने लगता है तब वसुधा के फैसले एकबारगी चौंकाते हैं । बचपन से ही अपने लक्ष्य के प्रति जुनूनी वसुधा वासुदेवन सर के दिए गुरु मंत्र से विद्रोह करती है । एक समय था जब वह वासुदेवन सर की सहायता से सिर्फ ओलम्पिक और विश्व चैम्पियन बनने का सपना देखा करती थी । वासुदेवन सर को हर वक्त डर लगा रहता था की यौवन के कारण वह अपने लक्ष्य से भटक न जाए । अंत में होता भी यही है । अब व्योम का प्यार और उससे शादी वसुधा के जीवन में ओलम्पिक से कम महत्वपूर्ण नहीं है । यहाँ उपन्यासकार ने सूक्ष्मता से खेल की दुनिया को देखा है । वसुधा को देह की सुरक्षा को लेकर जो मन में शंका थी उसके निवारण के लिए एक ‘व्योम’ की जरुरत थी । इसके साथ खेल की दुनिया में लॉन्ग जम्पर की स्थिति अन्य खेलों की अपेक्षा अच्छी नहीं थी । जीते गये पदक और मिले पुरस्कार की एक सीमा है । “..कुल मिलाकर वसुधा को क्या मिलता है, सोने का मेडल । कंपनियों के अख़बारों में उसकी शोहरत । कहीं कम्पनियाँ उसे रख लें, अपने यहाँ जगह दे दें भाग्य उसका । कहीं उसका पारिवारिक जीवन पटरी पर आ जाए । किस्मत उसकी । वसुधा आने वाले खतरों का पूर्वानुमान लगा लेती है । अपने साथी का चुनाव कर लेती है । आखिर खेल के विपरीत एक निर्णय लेना पड़ता है ।”40 व्योम के आने से वसुधा कई मोर्चे पर अपने को सुरक्षित समझ सकती है । उसकी देह को लेकर विवि सर के अन्दर जो आकर्षण है उसपर विराम लग सकता है । उसकी तैयारी और भी बेहतर हो सकती है । जिस वसुधा ने अपनी छलांग से दुनिया को नापने का सपना देखा था उसके सपने में अब व्योम भी है । उसने खुद को व्योम में शामिल कर लिया । “दुनिया और समाज के खिलाफ खड़ी औरत यह समझ जाती है कि पुरुष की प्रतियोगिता में यह संघर्ष बराबरी का नहीं । अंत में हार तथा समझौता ही औरत की नियति है । औरत का संघर्ष और सामना यदि एक प्रतीकात्मक क्रांति है तो हार अनिवार्य है । वह सपने देखती है, आशा करती है, किन्तु है तो निष्क्रिय ही ।”41 उपन्यास इस बात पर मुहर लगाता है हमारे समाज में महिला खिलाड़ियों की यही नियति है । हमारा सामाजिक वातावरण इतना कसा हुआ है कि महिला खिलाड़ी को सिर्फ खेल के मैदान में ही नहीं लड़ना पड़ता । जितनी उर्जा वह मैदान में खर्च करती है उतनी ही या उससे ज्यादा उसे इस  समाज में अपनी स्वीकार्यता के लिए खर्च करनी पड़ती है । यही दोहरा संघर्ष उसे घुटने टेकने को मजबूर करता है । ‘व्योम’ का सहारा यहाँ जरुरत बन जाती है । एथलीट अंजू बॉबी जोर्ज के पति रॉबर्ट बॉबी जोर्ज, मुक्केबाज मैरीकॉम के पति ओनलर, डिस्कस थ्रो खिलाड़ी कृष्णा पूनिया के पति वीरेंद्र पूनिया, भारोत्तोलक मोनिका देवी के पति देवदत्त शर्मा का इन महिला खिलाड़ियों की सफलता में बहुत बड़ा योगदान है । “मैं तो मुक्केबाजी छोड़ने का मन बना चुकी थी, लेकिन मेरे पति ओनलर ने मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया जिसकी बदौलत आज मैं इस मुकाम पर पहुँची हूँ ।”42

यह भी जरुरी नहीं कि हर ‘वसुधा’ को एक ‘व्योम’ जैसा साथी और प्रेरणास्पद  पुरुष मिल ही जाए । यौन शोषण से लेकर भ्रष्टाचार तक के जाल में उलझकर कई प्रतिभाएं दम तोड़ देती है । कुछ तो खेल की दुनिया के अलोकतांत्रिक व्यवस्था के कारण सही जगह तक पहुँच भी नहीं पाती । खेल की अभिजात्य दुनिया खास लोगों तक सिमट कर रह जाती है । “कितनी ही वसुधाएं गांव-गांव, आदिवासी-वनवासी प्रदेशों में अपनी गठीली,लचीली देहों से भरी पड़ी हैं । कौन उनके जरिये मिट्टी में से स्वर्ण खोजेगा ।”43

            कायदे से पहली बार खेल जगत अपने विस्तृत परिदृश्य में हमारे सामने आया है । खेल की तकनीकी शब्दावली के सटीक प्रयोग ने उपन्यास को खेल के मैदान से सीधा जोड़ दिया है । जैसा कि उपन्यासकार ने ‘आरंभिका’ में खुद जिक्र किया है “यह कथा उपजी है अनेक खिलाड़ियों, खेल-अध्यापकों व आयोजनों के साथ संवाद, संपर्क और उनके अनुभव से ।”44 इन तमाम अनुभव को कथात्मक रूप में पिरोना बहुत कठिन काम है जिसका बखूबी निर्वाह दवे जी ने किया है । खेल जगत को बिना किसी कृत्रिमता के साथ कथा रूप में रचने के कारण दवे जी और उनका उपन्यास याद रखा जायेगा । “लेखक के इस कथन से सहमत होने के पर्याप्त कारण हैं कि उसका मकसद किसी खेल पर किताब लिखना नहीं, वरन खेल की इतनी व्यापक और जनप्रिय दुनिया को अपनी कल्पना से कथा बनाना रहा है । इसलिए खेलों के जरिए यह मनुष्य के तन-मन, जीवन और अनुभव, आकांक्षा और स्वप्न की कहानी है ।”45

सन्दर्भ सूची

 

(1)     सोना चौधरी, 2007, पायदान, साहित्य उपक्रम, इतिहासबोध प्रकाशन, दिल्ली: 05

(2)     मैत्रेयी पुष्पा, 2007, लेख- औरत और फुटबाल (पायदान, ले०– सोना चौधरी) साहित्य उपक्रम, इतिहासबोध प्रकाशन, दिल्ली: 155

(3)     सिमोन द बोउवार, 2008, स्त्री: उपेक्षिता, जीवनी, सन्दर्भ एवं प्रस्तुति- प्रभा खेतान, हिन्द पॉकेट बुक, नयी दिल्ली: 25

(4)     सोना चौधरी, 2007, पायदान, साहित्य उपक्रम, इतिहासबोध प्रकाशन, दिल्ली: 15

(5)     वही : 18

(6)     वही: 16

(7)     सिमोन द बोउवार, 2008, स्त्री: उपेक्षिता, जीवनी, सन्दर्भ एवं प्रस्तुति- प्रभा खेतान, हिन्द पॉकेट बुक, नयी दिल्ली: 136

(8)     वही: 136

(9)     सोना चौधरी, 2007, पायदान, साहित्य उपक्रम, इतिहासबोध प्रकाशन, दिल्ली: 124

(10)  वही: 22

(11)   वही: 23

(12)   वही: 14

(13)   वही: 54

(14)   वही: 46-47

(15)   वही: 78-79

(16)   वही: 43

(17)   वही: 44

(18)   वही: 45

(19)   वही: 55

(20)   वही: 56

(21)   वही: 65

(22)   वही: 69

(23)   वही: 151

(24)   वही: 75

(25)   वही: 75

(26)   वही: 81

(27)   वही: 99

(28)   वही: 114

(29)   मैत्रेयी पुष्पा, 2007, लेख- औरत और फुटबाल (पायदान, ले०– सोना चौधरी) साहित्य उपक्रम, इतिहासबोध प्रकाशन, दिल्ली: 159

(30)   रमेश दवे, 2011, खेल गुरु, सामयिक प्रकाशन, नयी दिल्ली: 08

(31)   फ्लेप, रमेश दवे, 2011, खेल गुरु, सामयिक प्रकाशन, नयी दिल्ली

(32)   वही: 13

(33)   वही: 22

(34)   वही: 22

(35)   वही: 221

(36)   वही: 251

(37)  वही: 252

(38)   वही: 253

(39)   वही: 96

(40)   भारत भारद्वाज (सं०), मार्च-अप्रैल 2012, पुस्तक वार्ता (पत्रिका), खेल खेल में,                 ले०- अरुण कुमार, महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा: 13

(41)   सिमोन द बोउवार, 2008, स्त्री: उपेक्षिता, जीवनी, सन्दर्भ एवं प्रस्तुति- प्रभा खेतान, हिन्द पॉकेट बुक, नयी दिल्ली: 161

(42)   http://hindi.webdunia.com/%1.htm

(43)   रमेश दवे, 2011, खेल गुरु, सामयिक प्रकाशन, नयी दिल्ली: 19

(44)   वही: 09

(45)   प्रभाकर क्षोत्रिये (सं०), नवम्बर-दिसंबर 2011, समकालीन भारतीय साहित्य (पत्रिका), साहित्य अकादेमी, नयी दिल्ली: 195