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जनकृति का मई-जून 2017 सयुंक्त अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के आधार पर बायीं ओर स्तम्भ में पढ़ सकते हैं.

गुलाटी कला महातम्य: प्रदीप कुमार साह [व्यंग्य]

(व्यंग्य)

गुलाटी कला महातम्य

 प्रदीप कुमार साह

"जमूरा, लोगों से आज फिर कुछ पुरानी बात नये अंदाज में ठीक उसी तरह बताना है, जैसा नेता लोग करते हैं. चुनावी समय में अपने मतदाताओं को रिझाने के लिए अपना पुराना वादा जो अभी तक वादा ही है को वर्तमान महौल के रंग में डुबो कर निरंतर तरो-ताजा करते हैं फिर बोलने की अलग शैली की रिपैकेजिंग में पुनः-पुनः पेश करते हैं...." कहते हुये मानव मदारी ने अपना डमरू बजाना शुरू कर दिया.

एक मान्यता के अनुसार मानव के पूर्वज के मौसेरा भाई-संबंधी का एक अदद उत्तराधिकारी वह जमूरा उर्फ़ बंदर डमरू के ढुगढूगी राग से उत्तेजित हो कूद कर मानव मदारी के पास से तेजी से दूर जा बैठा. फिर अपने चहुँओर घेरा बनाये खड़ी भीड़ को टुकुर-टुकुर तकने लगा. किंतु जमूरा का वह कृत्य संभवतः मानव मदारी को अपनी बात जारी रखने में सहमति प्रदान करने हेतु और जन समूह का ध्यान आकृष्ट करने हेतु था कि लोग-बाग मदारी की बात सुने.

तभी मदारी जमूरा के गले से बंधी रस्सी जिसका एक सिरा उसके हाथ के पकड़ में थी को थोड़ा सा झटका दिया और बोला,," जमूरा, मुझे पीठ देखना पसंद नहीं, पलट कर सीधी तरह बैठ! वैसे पलटना से जादुई कला और एक बृहत्त सद्गुण से पशु का क्या वास्ता?" मदारी की बात सुनकर बंदर का खेल-तमाशा देखने एकत्रित हुई भीड़ खिलखिला कर हँस पड़ा कि मदारी का दिमाग फिर तो नहीं गया जो प्रत्येक वस्तु को उलटने-पलटने वाला बंदर जैसे अति चंचल पशु के संबंध में वैसा कहता है?

मदारी अपने दोनों हाथ जोड़ लिये और तमाशबीन से कहा,"माई-बाप... साहब लोगो, इस संबंध में मैं झूठ बिलकुल नहीं बोलता. छोटी-छोटी चीजों का वह उलट-पलट भी कुछ पलटना हुआ? उसे पलटना कहना तो पलटना शब्द की तौहीनता है. वह चीज पलटना उर्फ़ गुलाटी शब्द का द्योतक ही कैसे हो सकता है, जिसका असर कर्ता और कर्म पर महीनो, वर्षों या आजीवन न पड़ता हो तथा दर्शक दीर्घा के शरीर में दीर्घ समय तक तेज तपन उत्पन्न न करे?"

इसके पश्चात मदारी जमूरा के गले से बंधी रस्सी को थोड़ा सा झटका दिया और डमरू बजाने लगा. थोड़ी देर तक डमरू बजाते रहने के पश्चात वह बोला," भाई लोगो, पलटना उर्फ़ गुलाटी शीर्ष स्तर का एक अद्भुत और बेहद रोमांचक कला है तथा चराचर सृष्टि में उससे केवल मानव मात्र ही परिचित हैं. वहाँ भी सभी मानव को वह सौभाग्य प्राप्त नहीं होता-जो पूँछ हीन पशु हैं. यद्यपि जिनका उससे वास्ता पड़ा है, वह भी स्वयं को उससे परिचित होना स्वीकारने से कतराते हैं.

पलटना कर्म उर्फ़ गुलाटी और उसकी महिमा अतिशय अद्भुत है. अतः उसकी थोड़ी सी महिमा समझने के लिये भी अपना कीमती समय देना और एकाग्रता बनाये रखना-दोनों ही बेहद आवश्यक होगा. वह कर्म आज भी बेहद लोकप्रिय है. अभी कुछ समय पहले की एक घटना का स्मरण कीजिये...अभी-अभी अपने देश में घटित हुआ-देश के सदन से जी.एस. टी.बिल पारित होने से पहले तक.

सत्ता पक्ष जी.एस.टी.को कानूनन मूर्त-रूप देने हेतु संबंधित विधेयक सदन में पेश किये. तब विपक्ष आरोप लगाया कि उक्त विधेयक की संकल्पना तो पिछली संप्रग सरकार की है. सरकार बनाने वाली यह पार्टी तब जनादेश के कारण विपक्ष की भूमिका में थी. तब तो विपक्ष के रूप में उस पार्टी द्वारा तत्कालीन मसौदा को कानून बनने से रोका गया. अब उसी तर्ज पर विधेयक सदन में पेश कर मौजूदा सरकार की आड़ में तत्कालीन विपक्षी उसका क्रेडिट लेना क्यों चाहती है?

जवाब में स्वच्छ भारत कार्यक्रम का बिगुल थामे सत्ता पक्ष के पार्टी प्रवक्ता ने पलट कर वाक्य-वार करते हुये कहा कि अब जनादेश के कारण पार्टी चुनी हुई सरकार बना चुकी है. चुनी हुई सरकार वस्तुतः देश का सेवक होता है और देश हित में कार्य करता है. सेवक को अपने प्रश्रय दाता के हित में अपना अहम त्यागना ही होता है और स्वामी के प्रत्येक वस्तु को अच्छे से संभालने का नैतिक जिम्मेदारी भी सेवक का होता है." वैसा कहते हुये सत्ता पक्ष इशारा-इशारा में विपक्ष को आँख दिखाते हुये मानो लाल बत्ती परिपाटी खत्म करने के संकेत भी कर दिये.

किंतु सत्ता पक्ष तब भी नहीं रुका और आगे कहा," पुनः पुरानी सरकार का उत्तराधिकारी भी नयी सरकार है. तब विरासत में मिली कुछ भी अच्छी वस्तु का त्याग क्यों किया जाये? फिर विरासत में मिली उस चीज-वस्तु की आवश्यकतानुसार प्रगति अर्थात उसका स्वनुरूप विकास करने का नैतिक जिम्मेदारी तो उत्तराधिकारी  ही का है. फिर उस प्रयत्न से जिस सेवक के सेवा समय में स्वामी को लाभ प्राप्ति हो, उसे ही तो नवाजा जाये?"

सत्ता पक्ष का पलट जवाब सुनते ही विपक्ष पलट कर रूठ गया और उक्त विधेयक में कथित अपनी ही पार्टी द्वारा प्रथमतः संकल्पित विधेयक के अनुरुप मीनमेख करने लगा. विपक्ष का पलटकर रूठने की अवधि पूरा एक संसदीय सत्र का रहा और उक्त अवधि में संसदीय खर्च के रूप में देश के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई का करोड़ो-अरबों रुपये तार-तार होकर पानी में बह गए.

अब अन्य एक उदाहरण प्रस्तुत है. देश के कुछ राज्य में प्रादेशिक सरकार बनाने हेतु चुनाव कराये गये. चुनाव कार्य में पूर्व की तर्ज पर ईवीएम मशीन से काम लिया गया. फिर चुनाव परिणाम भी प्रस्तुत हुआ. तब बहुत सारी पार्टियों को चुनाव में पराजय का स्वाद चखना पड़ा. मुँह का स्वाद बिगड़ते ही सभी पार्टियाँ ईवीएम को लताड़ने लगी और उस संबंध में चुनाव आयोग पर भौंकने अर्थात मान्य बेहद शरीफ प्रहरी के भाषाशैली-प्रयोग सा दिखावा करने लगी.

तब चुनाव आयोग पलट कर दहाड़े कि ईवीएम को हैक कर अपना सबूत पेश करो. अब निर्धारित तिथि में अधिकांश पार्टी पलट कर पीछे हट गई और कपटी कौआ से राग अलापने लगे. कुछेक पार्टी पास भी आयी तो हाथ जोड़कर आयोग से बोली,"श्रीमान्, हम तो ईवीएम की कार्य कुशलता के संबंध में जनभावना मात्र समझना चाहते थे. किंतु साहब लोगो, पलटना कर्म अर्थात गुलाटी मारने की महत्ता इतने से महातम्य से पूरा नहीं होता! उस हेतु तो अपना थोडा और अमूल्य समय देना पड़ेगा."

इसके पश्चात मदारी डमरू अधिकाधिक तेज आवाज में बजाने लगा. फिर अपने शब्दों पर अधिक जोर देते हुये बोला," साहब लोगों...पलटना उर्फ़ गुलाटी का अंग्रेजी में समानार्थी शब्द है टेक अ यू टर्न. परंतु पलटना कर्म की  महत्ता अपने वर्णिक संख्या के अनुरूप ही छोटा नहीं है. यदि सचमुच का पलटना कर्म कहीं घटित हुआ तो पलटना कर्म का कर्ता और भोक्ता (कर्म) दोनों ही उससे वास्ता पड़ने से साफ-साफ इंकार करते हैं.

यदि मेरी बात का विश्वास न हो तो अपने पड़ोसी देश की हालात पर गौर फ़रमाओ. वहाँ की सेना पलटना कर्म के द्वारा कई बार देश की जनता द्वारा चुनी हुई सरकार की ताजो-तख्त हड़प लिये. किंतु उस कर्म से वास्ता पड़ने संबंधित तथ्य को न तो कभी वहाँ की सेना स्वीकारती है, न जनता द्वारा चुनी हुई नयी सरकार. जब उसके सेना नेतृत्व से शासन में सैनिक हस्तक्षेप के संबंध में पूछा जाता है तो वह उस घटना को राजनैतिक अस्थिरता का दुहाई देते हुये देश के रक्षा की खातिर मजबूरी में किया गया एक उपाय मात्र बताते हैं.

बाद की चुनी हुई सरकार उस घटना को पहली वाली सरकार की गैरजिम्मेदाराना और अदूरदर्शी रवैया बता और मनगढ़ंत तत्कालीन उत्पन्न विशेष अस्थिर हालात संबंधित बात कह उस सवाल को टाल जाती है. उस संबंध में पड़ोसी देश के विद्वान प्रवक्ताओं से बात किया जाये तो वह अपना मंतव्य कुछ इस तरह व्यक्त करते हैं कि वैश्विक स्तर पर यह संदेश प्रसारित हो कि सेना द्वारा देश की चुनी हुई सरकार का तख्ता पलट होना तो गौरव की बात होती है. वह अवधि उसके देश का स्वर्णिम काल होता है. अतः उक्त घटना औरो के लिये भी अनुकरणीय है. किंतु साहब लोगो, अभी पलटना कर्म की महत्ता पर बात पूर्ण नहीं हुये....."

तभी जमूरा दौड़ कर मदारी के समीप आता है और उसका वह हाथ पकड़ लेता है जिसमें उसने डमरू थाम रखा है. मदारी जमूरा से पूछता है,"क्या हुआ जमूरा, मेरी बात नहीं जँची? क्या वह सच नहीं था?" जमूरा अपना गर्दन झटक कर अपने सिर से हाँ में संकेत करता है तो मदारी पुनः पूछता है,"फिर, तुमने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे क्यों रोका?" जमूरा अपना मुँह उसके कान से टिका देता है.

अचानक मदारी जोर से हँसता है,"क्या कहा? अच्छा-अच्छा! आस-पड़ोस और देश की घटनाओं पर चर्चा अच्छी नहीं लगती? विदेशी घटनाओं पर चर्चा हो?" फिर तमाशबीन से मुखातिब होते हुये कहता है,"लो भैया, घर की मुर्गी दाल बराबर और घर का जोगी जोगड़ा, अन्य गाँव का सिद्ध. यह जमूरा को भी खूब भाता है. तो चलिये, विदेशी घटना को ही चर्चा का केंद्र बनाते हैं.

अभी कुछ महीने पहले सबसे मजबूत और निहायत ही धनी एक देश का राष्ट्रपति ट्रम्प महोदय चुने गये. उन्हें अपना पूर्वोक्त वक्तव्य पलटने में महारत हासिल है. चाहे वह वीजा संबंधित मसलो में अपना वक्तव्य दिये हों अथवा चीन, उत्तर कोरिया इत्यादि के संबंध में, उनका पलटना कर्म पेरिस जलवायु समझौता से हटने के रूप में भी जारी है...."तभी जमूरा अपने पंजे से मदारी का मुख ढक देता है. "अब क्या हुआ जमूरा?" मदारी अधिक तेज आवाज में अपना डमरू बजाते हुये अधिकाधिक तेज आवाज में पूछा. जमूरा एक बार फिर से मदारी के कान से अपना मुखड़ा टिका दिया.

"क्या कहा, ताजा घटनाक्रम पर अधिक चर्चा करना अच्छी बात नहीं है?" मदारी चौंकने का अभिनय किया तो जमूरा एक बार फिर से मदारी का सिर पकड़ उसके चेहरा को अपने चेहरे के करीब लाते हुये कुछ नया संकेत किया. तब मदारी तमाशबीन की तरफ मुखातिब होते हुये कहता है,"तुमने बहुत अच्छा कहा जमूरा. पलटना कर्म उर्फ गुलाटी मारना से तो मानव इतिहास ही परिपूर्ण है. अतः हमे अपने ऐतिहासिक तथ्य पर ही चर्चा करनी चाहिए."

"मेहरबनो-कद्रदानों, अब मजे से पान चबाओ लेकिन ढूँढो मत अभी-अभी पीकदान!.... क्योंकि उसकी तो तुम्हें बिलकुल ही आदत नहीं... किंतु अब होने जा रही है बात पते की, सो अब बिलकुल भी होना मत परेशान!" कहते हुये मदारी जोर-जोर से डमरू बजाने लगा. कुछ समय पश्चात मदारी बोला,"तो भाई लोगो, वह कर्म पुराने समय में भी उतना ही लोकप्रिय था जितना आज. सबसे पुरातन समय का प्रमाण है हमारा ग्रंथ. तो उसमें ही अपने प्रिय कर्म पलटना उर्फ़ गुलाटी का दर्शन क्यों न करें.

वेद का कथन है कि जो भगवत नाम का स्मरण करते हैं उसी में भक्ति दृढ होती है. भक्ति दृढ होने से आराध्य के प्रति समर्पण बढ़ता है. समर्पण से प्रभु प्रसन्न होते हैं और अपनी कृपा और ब्रह्म ज्ञान प्रदान करते हैं. प्रभु कृपा बरसने से भक्त को कुछ भी चिंता नहीं व्यापता और ब्रह्म ज्ञान प्राप्ति से वह बिलकुल पवित्र हो जाता है. पवित्र होने से उसमे लोभ अर्थात कुछ पाने की इच्छा, मोह अर्थात किसी वस्तु के प्रति आसक्ति, क्रोध अर्थात यथेष्ट कार्य सिद्धि न होने पर उत्पन्न होनेवाली विचलन एवं काम अर्थात विषय-वासना की मात्रा मिट जाती है.

तभी वेद भाष्य करता है कि संसार में देवताओं की पूजा हो इस निमित्त ब्रह्मा जी महाऋषि वशिष्ट के पास आते हैं ताकि वह पुरोहित कर्म स्वीकार करे और संसार में देवताओं का पूजन प्रारंभ हो. किंतु वशिष्ठ जी पुरोहिती करना स्वीकार नहीं कर रहे थे क्योंकि बिना दान लिये यज्ञ संपन्न कराने से यजमान को उसका फल प्राप्त नहीं होता. यद्यपि ब्रह्मा जी के बार-बार कहने पर उन्होंने दान लेना और वह कार्य करना स्वीकार किये. ततपश्चात महाऋषि वशिष्ट जी ब्रह्म ज्ञान प्राप्ति से ब्राह्मण भी कहलाये इत्यादि-इत्यादि.

उपरोक्त तथ्य के अलोक में सांकेतिक रूप से वेद क्या यह स्पष्ट करता है कि सभी भक्त के लोभादिक दुर्गुण पुंज एकत्रित होकर भगवान के खजाना में भर गये और उन्हें अपना पूजन प्राप्ति हेतु इच्छुक होना पड़ा. पुनः ऋषि-मुनि और अन्य महाऋषि पूजा, जप, तप, योग, ध्यान और पूजन पद्धति से तब क्या अनभिज्ञ होते थे अथवा पुरोहिती यदि महाऋषि वशिष्ट जी से ही संभव था तो उनके इच्छानुसार यजमान को दान करने की बाध्यता से मुक्त करने में भगवान क्या असमर्थ थे? ब्रह्म ज्ञान प्राप्ति के पश्चात महाऋषि वशिष्ठ जी में कुछ भी कामना शेष न रह गयी थी तब उन्हें पुरोहित अथवा ब्राह्मण के उपाधी के व्यर्थ बोझ से बोझिल करना क्या उचित था?

साहब लोगो, वेद के उपरोक्त दृष्टांत से वेद या हमारे पुरातन इतिहास अथवा हमारे पुरातन सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत के संबंध में क्या यह पता नहीं चलता कि हमारा अतीत भी पलटना कर्मयुक्त और गुलाटी कला से परिपूर्ण एवं समृद्ध था." मदारी के इतना कहते ही जमूरा अपना करतब दिखाते हुये उससे डमरू ले लिया. जमूरा का संकेत पाकर मदारी खेल समेट लिया और तमाशबीन का दुआ-सलाम किया. तमाशबीन उसे जाते हुये देखते रह गए जब तक कि वह आँख से ओझल न हो गया.