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जनकृति का जनवरी 2018 (अंक 33) आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है। अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के अनुरूप बायीं ओर विविध स्तम्भ में पढ़ सकते हैं। फरवरी अंक हेतु रचनाएँ, शोध आलेख भेजने की अंतिम तिथि 10 फरवरी है।

मनोज कुमार वर्मा की कविताएँ

हाँ मैं दलित हूं
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मेरे माथे पर नहीं लिखा है
लेकिन मेरा चेहरा बोलता है
बोलते हैं खुसुर फुसुर करते हुए
सैकडों मुंह धारी
पढ़ लेते हैं कागजात
पता लगा लेते हैं इधर उधर से
जब मालूम न पड़े तो
पूंछ लेते हैं
चमार हो
ठाकुर हो
पंडित हो
रुकता है
बुलवाने के लिए मेरे मुंह से मेरी जाति
क्या हैं आप...
उस हरामी की जुबान लगातार चलती रहती है
उसके दिमाग में अटक जाता है
उसके गले में थूंक रुक जाता है
जब तक जान न ले मेरी जात
तब तक उसे पड़ती रहती है लात
वह क्यों जानना चाहता है
उसकी बेटी के लिए
उसकी रिश्तेदारी में..किसी
न न मेरी उम्र बताती है मेरी शादी हो चुकी है
फिर
फिर
क्यों
तमाम गालियां मेरे पास आकर इंतजार मे है
मैं चुप हूं कि
खामोशी की विरासत का वाहक माना गया
कि जिसे कमजोर समझा गया
कि दमन कर पिसा गया
जैसे सहन कर लेते हैं
हर अडवे भडवे के
आलतू-फालतू सवाल,जिज्ञासा को
चलो ठीक है
बस यही उदारता हमारी कमजोरी बताई जाती है
हम चुप होते हैं
जवाब देता हूं
हां मैं दलित हूं
चुप हो जाता हूं
क्या मजाक कर रहे हैं
नहीं नहीं आप कोटे वाले नहीं हो सकते
कहता है मानसिक विकृति का शिकार
और ही ही ही करता है...
और सुकून मिलता है कि जान गया जाति मेरी
ढिंढोरा पीटने के लिए
सबसे पहले की खोज स्खलित हो जाती है...
अजीब सा लगता था
और भूल जाता था
अब भूल नहीं पाता हूं
भूलना नहीं चाहता हूं
जिसे हल्का सा भी कन्फ्यूजन हो
हो कहीं दिमाग की नली में अटका हुआ
जो आपको गटर में तब्दील कर रहा
उन सबसे कहना है, आँखों में आंख डालकर
हां, मैं दलित हूं..
क्या तुम्हें कह सकता हूं,भाई संबोधन से..
मेरे देश के नागरिक
वसुधैव कुटुम्बकम से ग्लोबल विलेज के हिमायती
मारी तो नहीं गई तुम्हारी मति...।


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मनोज कुमार वर्मा
देव लॉज, कमरा न. 6,
छित्तूपुर, बीएचयू , वाराणसी(यू. पी.)
मो. 9118203471
ईमेल- manoj02aug@gmai.com