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भूपेन्द्र भावुक की कविताएँ

मजदूर

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इस गाँव का हो या उस गाँव का हो
इस राज्य का हो या उस राज्य का हो
इस देश का हो या उस देश का हो
इस दुनिया का हो या उस दुनिया का हो,
चाहे वो किसी दुनिया का हो
मजदूर मजदूर होता है
चाहे कहीं का हो.
उसकी पहचान गाँव, राज्य,देश-दुनिया 
कपड़े-लत्ते,रूप-रंग,वेश-भाषा से कहीं अधिक
आपत्तियों-विपत्तियों की लहरों से 
खियाया, घिसा-पिटा
उबड़-खाबड़
कहीं छिछला कहीं धँसा
उसकी चट्टानी थोबड़ा ही उसकी पहचान है.
उसकी पहचान
उसके कपार पर गहरी खिंची
चिंता की लकीरों को पढ़कर हो जाती है
जहाँ उसके मुक्कद्दर में
परिश्रम,परिश्रम और सिर्फ परिश्रम
मुकर्रर किया गया है.
उसकी पहचान उसकी आँखों से होती है
जिसमें सपने ही सपने हैं
उमंग ही उमंग है
उत्साह ही उत्साह है.
साथ ही वहीं किसी कोने में 
जमा मिल जाएंगे
वक्त से टकरा-टकराकर 
काँच से टूटे उसके कुछ सपने और
कभी पिघलते गलते बहते मिलेंगे.
उसकी पहचान उसके हाथों से होती है
उसके बड़े-बड़े बढ़े नाखूनों से होती है
उन नाखूनों में भरे मैल से होती है.
उसकी पहचान हाथों में उभरे
गहरे गहरे ठेलों से होती है
उसकी लोहे जैसी कठोरता से होती है-
जो लोहे को पिघलाकर पानी कर देता है.
उसकी हथेली पर लिखे उसके भाग्य से होती है
उस भाग्य से,
जिसे किसी भगवान ने बनाया है
उस भगवान ने, 
जिसे कुछ लोगों ने साजिश कर गढ़ा था
और मढ़ दिया था फिर
उसके हत्थे-मत्थे दोनों.
जो जन्मों से मिटा नहीं है
वह मढ़ा है आज भी
ज्यों का त्यों.
सबको समान बनाने वाले का हवाला देकर
वे साजिशकर्ता लीलते गए एक-एक करके
भगवान की ही बनाई पृथ्वी,जल,वायु,आकाश.
और बेदखल करते गए
अपने ही भाईयों को 
और खोदते चले गए असमानता की खाईयाँ
गहरे गहरे और भी गहरे.
बाँटते रहे वर्ण,जाति,धर्म,रंग में.
आज वो खाईयाँ समुद्र बन चुकी हैं
और उसी समुद्र में तैरते
बहते-बिलबिलाते मिलेंगे
चट्टानी थोबड़े और लाल आँखों वाले
और लोहे से हाथ वाले 
अनगिनत जीव.

आगे से मत पूछना किसी मजदूर से
उसकी जाति,उसका धर्म,उसकी राष्ट्रीयता
क्योंकि नहीं होता उसका कोई
नहीं होती कोई 
उसकी जाति,
उसका धर्म, उसकी राष्ट्रीयता.
उसका होता है तो सिर्फ 
उसका परिश्रम
उसका खून-पसीना
जिससे उसका पेट भरता है,
वो होता है तो सिर्फ-
मजदूर.
उसकी होती है सिर्फ एक पहचान-
मजदूरी..

 

वे ये नहीँ जानते..

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उन्हें लगता है
थम गया हूँ
ऐसे
जैसे जम गया होऊँ
खिसकता तक नहीँ,
वक्त के साथ पेंच
और 
और भी पेंच
कसते जा रहे हैं मुझमेँ,
कमीज़ में बटन की तरह
टाँक दिया गया हूँ
ताकि हिल न सकूँ
चल न सकूँ
बोल न सकूँ,
उन्हें गति स्वीकार नहीँ
वो ठहरे रहते हैं
और ठहरे ही रहना चाहते हैं
वे डरते हैं गति से,
पर वो नहीं जानते
वो मुझे थाम नहीँ सकते
रोक नहीँ सकते
बाँध बनाकर,
क्योंकि मैं विचारों से चलता हूँ,
भागता हूँ
और उड़ता हूँ
शरीर से नहीं,
वो शरीर को बाँध
मेरे विचारों को
और भी गतिशील बना जाते हैं
वे ये नहीँ जानते।।