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जनकृति का नवीन अंक [21वीं सदी विशेषांक] आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है. अंक की पीडीऍफ़ कॉपी आप विषय सूची के ऊपर दिए लिंक से प्राप्त कर सकते हैं.

धर्मपाल महेंद्र जैन की कविताएँ

मौन

 

मैं कई बार वैसे ही हँस देता हूँ।

अच्छी लगती है

सारहीन मुस्कुराहट

कभी उपेक्षा करती, कभी आदर देती।

 

मैं कई बार वैसे ही हँस देता हूँ

ताकि लोग समझें

मैं ध्यान से सुनता हूँ उनकी बात

खो जाता हूँ उसमें, समझ जाता हूँ

और मुस्कुरा देता हूँ।

 

मैंने अक्सर पाया है

किसी क्षण सब हँस पड़ते हैं

हँसते चले जाते हैं

फिर रुकते जाते हैं, रुक जाते हैं

उसके बाद

एक खामोशी उपजती है।

 

मौन एक प्रतिक्रिया है

मुस्कुराहट के बलिदान पर,

मनोरंजन करते हुए जो मुस्कुराहट

अभी-अभी शहीद हो गई

उसे श्रद्धाजंलि देते हैं हम।

 

कविता पसीने-सी चूने लगे                                                                     

कोड़ा चला कर उन्होंने

गोद दिया यह नीला निशान

मेरे शरीर पर

यही तो मेरे खेत का नक्शा है।

 

मेरे शरीर से खून

उफन रहा है प्रपात के मानिंद

और बह रहा है

नहीं जानता मैं

हल की तरह ट्रैक्टर से बांध कर

मेरे मिट्टी के तन को

सींचते हुए पवित्र लोग

कौन-सी फसल उगाना चाहते हैं

मेरे खेत में।

 

इस खेत को सीने से खेड़ कर

खून से सींच कर

अपने ईमान को बो कर

मैं सो जाना चाहता हूँ

एक गहरी नींद, तुम्हें उठा कर

मेरे कवि।

 

कल यहाँ चहचहाए चिड़िया

कल यहाँ लहलहाए सच्चे आदमी की फसल

इसलिए तुम भी पहुँच जाना

मेरे कवि इस खेत को खेड़ने के लिए

जब कविता पसीने-सी चूने लगे

बताना पवित्र लोगों को

खेती और कविता अलग कर्म नहीं है।

 

सजीव महास्वप्न                                                                                   

शब्दों के सधे कदमों से चलते हुए

बढ़ रहा हूँ मैं।

 

नहीं बन जाता एक दिन में

वृहत्तर दुनिया का महास्वप्न।

सूरज के विखंडन की भयावह आग

आदमी के अंग-अंग में

भर दी है धरती ने।

 

सपने में ओट कर आग

चाहता हूँ ऊर्जा

चिन्तन और द्वंद्व के कोहरे में

लगातार सच खोजते हुए

बुनना और देखना चाहता हूँ

सजीव महास्वप्न

सुखी और बेहतर दुनिया का।

 

 

समुद्र                

 

पढ़ा था मैंने

गंभीर है समुद्र

संध्या देखा

समुद्र अंतहीन

धरती के संधिस्थल पर

टकराता-पछाड़ें खाता

किनारे तोड़ने के लिए।

 

देखा,

नील देहधारी विशाल समुद्र को

नृत्य करते

अंगुलियाँ चला

ज्वारभाटा रचते।

 

अलसाया पड़ा समुद्र

अमर हो कर सुखी नहीं वह

गहराती गई रात

उसकी छाती पर

सो गए विशाल पोत।

 

हाहाकार करता रहा समुद्र

युवा स्त्री-पुरुष

फूँकते रहे उसमें कामाग्नि

वह खाँसता रहा शतायु बूढ़े–सा

मैंने नहीं देखी शांत

कोई सतह समुद्र की।

 

धर्मपाल महेंद्र जैन

ईमेल : dharmtoronto@gmail.com                

फ़ोन : + 416 225 2415

सम्पर्क : 1512-17 Anndale Drive, Toronto M2N2W7, Canada