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खेमकरण ‘सोमन’ की कविताएँ

जो लोग खोद रहे थे इधर गड्ढे

 

जो लोग खोद रहे थे इधर गड्ढे

वे नहीं जानते थे

कहीं किसी और गड्ढों के बारे में

 

परन्तु गड्ढे जानते थे

कुछ ही दूरी पर खोदे जा रहे हैं

कुछ और गड्ढे भी/इन्हीं लोगों के लिए

 

गड्ढे

दूसरों गड्ढों को बता देते हैं सब कुछ

क्योंकि/उनकी जमीन एक ही होती है।

 

 

फिर उसके अन्दर कुछ पैदा हुआ

 

उस दिन

उसने किताबों की ओर देखा

किताबें भी उसकी ओर देखकर मुस्कुराने लगी

 

वह किताबों को उलटने-पलटने लगा

किताबें भी उसे उलटने-पलटने लगी

 

उस दिन

उसके अन्दर कुछ पैदा हुआ

वह पानी जैसा था/हरा-भरा पेड़ जैसा था

रास्ता जैसा था/उजाला जैसा था

नदी जैसी थी/ झील जैसी थी

नमक का हक अदा करने जैसा कुछ था

था माँ के आँचल में छुप जाने की चाहत रखने वाला मन

मनुष्य जैसा

 

उस दिन उसने

एक्सीडेंट में घायल हुए कुछ लोगों को अस्पताल पहुँचाया

अपने पैसे खर्च किए उनकी मरहम-पट्टी में

पड़ौसियों की आपसी लड़ाई भी खत्म करवाई

मन के अन्दर की छटपटाहट कुछ कम हुई

जीने की इच्छा जागी

 

किताबें जाँचती है खून भी

कि/खून में किस चीज की मात्रा हो रही है कम !

 

खेमकरण सोमन

गैस्ट फैकल्टी, हिन्दी विभाग,

राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय चौखुटिया,

जिला- अल्मोड़ा, उत्तराखण्ड-263656

मो.: 9045022156