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जनकृति का नवीन अंक [21वीं सदी विशेषांक] आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है. अंक की पीडीऍफ़ कॉपी आप विषय सूची के ऊपर दिए लिंक से प्राप्त कर सकते हैं.

रीना पारीक की कविताएँ

 

ख़त

बीत गया मेरा भी युग

पेड़ से बिछुड़े पत्ते की भाँति

एक वक़्त मेरा भी था

जब हर ऱोज ख़त लिखे

जाते थे

कभी बेटे का ख़त

माँ के नाम

कभी पिता का अपने

बेटे के नाम

पर हर ऱोज ख़त लिखे

जाते थे

कभी पत्नी का ख़त

पति के नाम

कभी प्रेमिका का अपने

प्रेमी के नाम

पर हर ऱोज ख़त लिखे

जाते थे

सच,एक वक़्त मेरा भी था

वक़्त कहाँ रह पता एक जैसा

परिवर्तित जीवन और

परिवर्तित समय

तब कागज़ होता था और

कलम चलती थी

कुछ शब्द कुछ अनकही बाते

होती थी

पर हर ऱोज ख़त लिखे

जाते थे।

 

बीती यादें

गाँव के बीचों बीच

जहाँ कभी

एक पेड़ हुआ करता था

सर्दी गर्मी बारिश

हर मौसम बीता उसी पेड़

की छांव में

बचपन की हँसी-ठिठोली

झगड़े रूठना-मनाना

गवाह रहा वही सबका

लेकिन आज वहाँ खड़ी

ऊँची इमारत

उससे निकलता धुआं

जहरीली गैसें

उड़ते धूल के कण

शायद यही प्रगति की राह

भौतिकता की आहट

और विकसित होने का प्रमाण है।

 

                                                                                             

रीना पारीक(शोधार्थी)

महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय अजमेर राज.

ई मेल reenapareek94@gmail.com