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राहुल प्रसाद की कविताएँ

हुनर फुटपाथों पर दम तोड़ देता है

देख! गरीबी फुटपाथों पर

अपना कौशल दिखा रही है

कैसे अपना पेट है भरना

वो भी हमको सिखा रही है

न ही सिकन है माथे पर

ना ही आलस हाथों में

जीवन के प्रति निष्ठा उनकी

झलक रही है बातों में

कर देते सब कुछ समर्पित

अपनी भूख मिटाने को

कभी कभी दिन गुजर है जाता

न मिलता कुछ भी खाने को

ऐसे कितने दृश्य हमारे

आँखों के सम्मुख नाच रहे हैं

और बहुत से हुनरमंद भी

खुद अपने को बांच रहें हैं

ऐसे कौशल को दुनिया में

मक़ाम नहीं मिल पाता है

 

जैसे पढ़े लिखे लोगों को

काम नहीं मिल पाता है

ऐसे कौशल फुटपाथों पर

ऐसे ही मर जाते हैं

जैसे पुष्प खिले-खिले

शाखों से झर जाते हैं

 

कैसे उसे भिखारी कह दूं

एक रोज वो मुझसे बोला

तेरे दर पर आया हूँ

दो रोटी ही दे दो बाबा

बड़ी दूर से आया हूँ

उसकी काया देख देख

मेरा मन भी डोल गया

कृतज्ञ भाव से इन शब्दों को

जब वो मुझसे बोल गया

उसकी काया ऐसी थी

माना सदियों का भूखा है

यकीं नहीं मै कर पाया था

लगा नजर का धोखा है

उसे देख मै कुछ सकुचाया

आह मेरी निकल पड़ी

हालत उसकी देख-देख कर

आँखे मेरी छलक पड़ी

मैंने उसको दी रोटी

दिल को तब आराम मिला

खुद के अंदर ही दर्शन का

मुझे पुण्य तब धाम मिला

दुआ ख़ुशी की देकर मेरे

दुःख को हरकर चला गया

कैसे उसे भिखारी कह दूं

जो झोली भरकर चला गया

दो रोटी का मूल्य बड़ा या

उसकी लाख दुआओं का

नहीं आज तक उत्तर पाया

अपने मन के भावों का

अपने मन के कई सवालों

से मै अब तक जूझ रहा हूँ

कोई भी मुझको बतला दे

सबसे ही मै पूछ रहा हूँ

हममें दो बस स्वार्थ भरा है

असली तो वो पेशावर हैं

उनकी दिल की एक दुआ पर

सारा धन भी न्योछावर है

एक कौर के बदले में जो

लाख दुआ दे जाते हैं

सच्चे देने वाले वो हैं

हम हाथ बंधे रह जाते हैं

 

तो फिर मेरा सहारा कौन

( उस बच्ची की पुकार जिसको कभी-कभी पैदा होते ही फुटपाथ पर छोड़ दिया जाता है, कविता का अंत अनुत्तरित प्रश्न पर किया  गया है )

मेरा तो अपराध नहीं था

फिर क्यों मुझको छोड़ दिया?

तुमने मुझको पैदा करके

क्यों अपना मुहं मोड़ लिया?

मेरी भी तो चाह यही थी

झूमू नाचूँ गाऊं मै

और सुनहरी सी दुनिया के

अपने ख्वाब सजाऊँ मै

माँ मुझको गोदी में लेकर

अपना दूध पिलाएगी

नींद नहीं गर आये तो

लोरी मुझे सुनाएगी

प्यारे-प्यारे से नामों से

रोज मुझे बुलाएगी

लेकिन मेरा सपना हे माँ

पल भर में ही टूट गया

दुनिया में आते-आते ही

साथ तुम्हारा छूट गया

 

अगर बच गयी मै दुनिया में

तो फिर मेरा सहारा कौन?

अगर नहीं मै बच पायी तो

फिर मेरा हत्यारा कौन?

 

राहुल प्रसाद

शोध छात्र

गुजरात केंद्रीय विश्वद्याविद्यालय