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जनकृति का नवीन अंक [21वीं सदी विशेषांक] आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है. अंक की पीडीऍफ़ कॉपी आप विषय सूची के ऊपर दिए लिंक से प्राप्त कर सकते हैं.

प्रगति गुप्ता की कविताएँ

तुम कहते तो...


काश तुम्हारी 
उस अनकही पीङा तक 
मैं पहुंच पाती 
तुम कहते तो...... 
मैं मरहम बन 
उन छिपे घावों को
सहला जाती 
तुम कहते तो..... 
साथ नहीं चल रही तुम्हारे 
तभी तो कहने को
कहती हूँ..... 
मौन मुझे भी छूता है 
ये मुझसे बेहतर 
तुम्हें पता है....... 
माना कि सबके 
अपने सुख अपने दुख है 
पर तुम ने खुद के 
दिल को सुना होता.......
उस निशब्द मौन को 
कहा होता........... 
जो मेरा और तुम्हारा था 
उसको, 
तुम कहते तो.......... 
      
      

करवट 

रिश्तों के करवटें लेते ही 
मुस्कुराहटों को सिकुड़ते 
देखो कभी... 
खामोश - सी चुप्पी में 
दबी फुसफुसाहट को 
सुनकर देखो कभी.... 
वहीं कहीं छिपी 
अपनी टूटन को जरूर 
समेट कर रखना.... 
रिश्तों के करवट लेते ही 
पलकों पर ढाढ़स की 
चादर ओढ़ कर रखना... 
यही हुनर तो जिन्दगी को 
वक्त बेवक्त सिखाना है 
हम सबको कुछ सबक दे 
उसको तो यूँ ही 
निकल जाना है..... 
          
बेटी की माँ 

आज मैं स्वयं को 
सबसे अधिक धनिक मानती 
बेटी की माँ बनते ही 
सृष्टि रचियता को 
धन्यवाद बोलती.... 
स्वयं के साथ - साथ 
उसने मुझे -
जीव पोषित करने का, 
अधिकार दिया.. 
मैनें बेटी को जन्म दे 
उसे भी, इस सृजन कड़ी में 
संलग्न किया.... 
प्रेम, दया ममता 
जैसे भावों से,  सँवार उसे 
स्वयं ईश्वर ने उतारा है... 
बेटा जने या बेटी वो 
जनने का अधिकार 
उसे ही सौंपा है... 
ईश्वर के सृजन को 
निखारने का 
अधिकार जिसे हो -
वो ईश्वर का सहभागी है 
उसको कमतर समझने वाला 
स्वयं अपने पापों का भागी है... 
अपने पापों का भागी है...... 
  

 

 

प्रगति गुप्ता 
58, सरदार क्लब स्कीम जोधपुर 
(राजस्थान) 342001 
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