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जनकृति का नवीन अंक [21वीं सदी विशेषांक] आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है. अंक की पीडीऍफ़ कॉपी आप विषय सूची के ऊपर दिए लिंक से प्राप्त कर सकते हैं.

नवगीत: सुधेश

 

1.

इस आभासी जग में 

चाहने वाले बहुत हैं 

पर मेरे पास नहीं कोई । 

 

दूर दूर से मुखड़े ललचाते 

जिन्दगी धूप में पिघले 

कुन्दन से चमक रहे तन 

अन्त में प़ीतल के निकले ।

इस पथरीली दुनिया में 

क्या दिन क्या रातें 

संवेदना कहीं छिप छिप रोई ।

 

इन्टरनेट से पास हुई दुनिया 

नदी तट सी दूर हो गई 

गूगल ने समानान्तर संसार रचा 

मेरे घर की पहचान खो गई ।

प्यार की कहाँ शीतलता 

तपती आँखों से लगता है 

अब के बरसात न रोई ।

 

जो जीवन में नहीं मिला 

नहीं मुझे मिलना था 

मैं जंगल का फूल अकेला 

खिल कर भी नहीं खिला । 

तन की मैली चादर को 

दिल्ली की मैली जमना ने 

नहीं धोई तो नहीं धोई ।

 

 

2.

 

रह गई है मेरी जिन्दगी 

एक भूली हुई सी चाह बन कर ।

 

जीवन सिन्धु में आए बहुत से ज्वार

बच गया पर डूबने से 

जवानी में बुढ़ापा आगया कमबख़्त 

क्यों कर बचा मैं ऊबने से ।

बडा था हौसला मंज़िल पर पहुँचने का 

रह गई मगर यह जिन्दगी 

आह और क़राह बन कर ।

 

जंगल में खिला था फूल 

बिल्कुल अकेला बियाबान में 

सब की आँखें चुरा कर 

सूर्य का षड़यन्त्र था गहरा 

दोपहर को रात कर दी 

मेघ को लेगया दूर फुसलाकर ।

 

  पानी का कहत धूप का अभाव 

 झेला सभी कुछ जीवन चाह बन कर। 

 

 

सुधेश  

३१४ सरल अपार्टमैन्ट्स , द्वारका , सैक्टर १० 

दिल्ली ११००७५ 

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