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ग़ज़ल: संदीप सरस

 

 

पत्थर देखेंगे

 

ख्वाबों  को  अक्सर  देखेंगे।

पहले   से   बेहतर   देखेंगे।

 

उम्मीदें  जब  थक  जाएँगी,

तब  जाकर  बिस्तर  देखेंगे।

 

नींद  हमारी  ख्वाब  हमारे,

क्यों खुद को कमतर देखेंगे।

 

अपने  हिस्से के जीवन में,

जीने  के  अवसर  देखेंगे।

 

धरती पर हम पाँव जमा लें,

फिर अम्बर जी भर देखेंगे।

 

अंदाजा कद का  हो  जाये,

उतनी    ही   चादर   देखेंगे।

 

जब भी सत्य होंठ पर होगा,

माथे   पर   पत्थर   देखेंगे।

 

संदीप सरस

बिसवां, सीतापुर

उ प्र~261201

मो- 9450382515