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प्रशंसा: विजयानंद विजय [लघुकथा]

प्रशंसा

- विजयानंद विजय


 

"पहचाना सर आपने?" पोस्ट आफिस काउंटर से जब वह मुड़ा, तो अचानक एक युवक ने आकर उसके पैर छू लिए थे।

"नहीं तो !"

"आपके स्कूल में मेरा मैट्रिक बोर्ड का सेंटर था, सर।और, आपकी ड्यूटी मेरे कमरे में थी।” उसने याद दिलाने की कैशिश की।मगर उन्हें याद नहीं आया।सेंटर तो हर साल रहता है।कितने छात्र हर साल परीक्षा देते हैं।सबके नाम व चेहरे थोड़े याद रहते हैं ? लेकिन जब वह इतना आदर कर रहा था, तो उसने भी उसे पहचानने का अभिनय किया -” अच्छा...! हाँ...।”

"जी सर।विशाल...।” वह खुश हो गया कि उन्होंने उसे पहचान लिया है।वह आगे कहने लगा -   “ ......साइंस का पेपर था, सर।मैं नकल कर रहा था और...आपने मुझे पकड़ लिया था...।आपने मेरी कॉपी छीनते हुए कहा था कि तुम्हारी हैंडराइटिंग तो बहुत सुंदर है।नकल क्यों करते हो ? मेहनत करो।ईमानदार बनो।जीवन में कुछ बन जाओगे।” उसने एक ही साँस में सारी बात कह डाली, तो उनकी आँखों के सामने वो गोरा-चिट्टा, मासूम और प्यारा-सा चेहरा घूम गया,जो उस दिन परीक्षा में डरा, सहमा-सा पुर्जे निकालकर नकल करने की असफल कोशिश कर रहा था।

विशाल कह रहा था -” सर, उस दिन से मैंने मेहनत और ईमानदारी से पढ़ाई शुरु कर दी, और आपके आशीर्वाद से आज मेरा सेलेक्शन सिविल सर्विसेज में हो गया है।” कहते-कहते विशाल की आँखें भर आई थीं, और वह उनके चरणों में झुक गया था।

उन्होंने दोनों कंधे पकड़कर विशाल को उठाया, अपनी डबडबा आई आँखों से उसकी आँखों में देखा और कसकर अपने सीने से लगा लिया।उनका सीना भी गर्व से चौड़ा हो गया था।


 

- विजयानंद विजय, "आनंद निकेत”, बाजार समिति रोड, बक्सर (बिहार)- 802103, मो. - 9934267166

ईमेल - vijayanandsingh62@gmail.com