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अधिया: अमरेश गौतम [लघुकथा]

अधिया

-अमरेश गौतम


 

उमड़-घूमड़ घिरते बादलों और बीच-बीच में मेघों का गर्जन के साथ तडि़त की चटकती ध्वनि जैसे बुधिया को आनन्दित और उत्साहित कर रही थी।

                 आषाढ़ का महीना लगभग आधा बीत चुका था। इस बार बुधिया ने एक दो जमीदारों से कुछ खेत और अधिया ले लिया था, पिछली बार अच्छी खासी खेती जो हो गई थी,लेता क्यों न। आगाज़ तो इस बार भी अच्छा ही होगा ऐसा अनुमान इन बादलों के बदलते स्वरूप से उसने लगा लिया था जैसे, उसका ठीक ही रहा बारिश खूब हुई, सारे नदी नाले लबालब और लगभग बाढ़ की नौबत आन पडी़।

बुधिया एक छोटा किसान था, उसका अपना भी चार बीघा खेत था और बाकी अधिया लेकर अपना काम चलाता था। जीवनोपार्जन के लिए उसकी पत्नी बनी-कूता भी करती। बच्चे गाँव ही सरकारी स्कूल में पढ़ते थे।

                  इस बार की शुरुआती बरसात से उसे पिछले साल की तरह ही लाभ की उम्मीद नज़र आई। अपने खेत के साथ-साथ अधिया के सारे खेत भी बोया और ये खुशखबरी गाँव में सबसे, खासकर अपने प्रतिस्पर्धी समई से भी बता आया। उसकी खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था। फसलें अच्छी हुयीं और लहलहाती फसलों को देख उसकी खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था। ऐसे गर्व महसूस कर रहा था जैसे पहली ही कोशिश में बेटा कलेक्टर बन गया हो और उसे पारितोषिक मिल रहा हो। लोगों के बार-बार तारीफ की वज़ह से खेत में उसने काले मुँह वाले पुतले को भी गाड़ दिया था ताकि किसी की नज़र न लगे, लेकिन नज़र तो लग चुकी थी क्योंकि उस प्रथम बारिश के बाद अब बादलों का जैसे हड़ताल सा हो गया हो। अब सुबह से ही बैसाख जेठ की तरह धूप निकल जाती। धीरे-धीरे बदलते मौसम को देख बुधिया का मन अधीर होने लगा और जैसे समई को भगवान ने उपहास का मौका दे डाला हो। वो रोज़ बुधिया का छटाँग भर खून जलाता।

          हालत ये हो गई कि बुधिया को लगा कि बीज भी वापस नहीं मिलेंगे। मालिक को बीज के भी पैसे न देने पड़े, फायदे की तो बात ही दूर थी। जो लोग बोरिंग कराये थे वो मोटर से सींच-सींच कर जिला रहे थे लेकिन बुधिया, वो तो बस भगवान भरोसे ही था। उसका मन कचोटता रहा कि क्या करे।

एक दिन पति-पत्नी खूब विचार करके गाँव के एक जमीदार  जिनके मोटर घर से उसका खेत पास में था के पास गये और अपना खेत सींचने की गुहार लगाया।

कई बार की मिन्नतों के बाद जमींदार राजी हुआ किन्तु एक घण्टे की सिंचाई का पैसा सुनकर बुधिया का जैसे कलेजा ही फट गया। बताता हूँ कहकर बुधिया और उसकी पत्नी वहाँ से चले गये। दोनों वहाँ से अपने खेत पर जाकर सूखते खेत और पियराती धान देख अन्दर से टूट से गए और रुआसी आवाज़ में दोनों बोले मैं अपनी धान नहीं सूखने दूँगा, मैं जमींदार को पूरे पैसे दूँगा, मैं अपनी........  मैं नहीं..... मैं पूरे पैसे दूँगा....... मैं अपनी धान नहीं सूखने दूँगा, मैं...... मैं कर्जा लूँगा। हाँ..... हाँ मैं परधान के पास जाऊँगा, वो कुछ मदद करेंगे, ये ये सही रहेगा। हाँ मैं सब जगह जाऊँगा, मैं...... मैं अपनी धान नहीं सूखने दूँगा।

बिलखते बुधिया के आँसू पोछने से पहले गिरा वो आँसू का बूँद जमीन में कुर्बान हो गया।

 

                                                 

          .                                                                -अमरेश गौतम

(कवि/अभियंता)

रीवा, मध्यप्रदेश- 7600461256