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पालिटिशियन और पब्लिक: ओमवीर करन [व्यंग्य]

पालिटिशियन और पब्लिक

-ओमवीर करन


 

जैसे कृष्ण का कंस से, अर्जुन का अश्वत्थामा से, सीता का सुर्पनखा से, राधा का रुक्मणि से, द्रोपदी का दुर्योधन से, राम का रावन से, जैसे संबंध रहे हैं। वैसे संबंध पब्लिक और पालिटिशियन के बीच रहे भी हैं और नहीं भी रहे हैं। दोनों में इतने अंतर्विरोध और समानताएँ  इतनी हैं और गुथी हुई हैं की दोनों के संबंधों को क्या नाम दिया जाये समझ ही नहीं आता है।

            मसलन दोनों ही अब ईमानदार नहीं रहे। दोनों ही समय के हिसाब से खुद को ढाल लेते हैं।चुनाव के समय पालिटिशियन पब्लिक के हाथ पैर जोड़ लेता है और पब्लिक अपना काम कराने के लिए पालिटिशियन के हाथ पैर जोड़ लेती है।

            मीडिया, कार्यपालिका, न्यायपालिका का पब्लिक के ऊपर काफी दबाव रहता है कब कौन  सा पब्लिक का आदमी इनमें पिस जाये कहा नहीं जा सकता। मीडिया ,कार्यपालिका,न्यायपालिका पे पालिटिशियन का दबाव रहता है,हालांकि तीनों पब्लिक के सामने दबाव लेने से और पालिटिशियन दबाव देने से इंकार करते रहते हैं। इस दबाव लेने-देने के खेल में पब्लिक पिसती रहती है,और इस दबाववाली पिसाई का पब्लिक के पास कोई सबूत नहीं होता है, सिर्फ अनुभव होता है,हमारे लोकतन्त्र में बिना सबूत के अनुभव का महत्व पब्लिक की तरह दो कोड़ी का ही रहता है, कुल मिलाकर लोकतंत्र की चार पाटोंवाली चक्की में पिसना पब्लिक को ही है।

            गरीबी हटाओ के नारे से अच्छे दिन आनेवाले हैं नारे तक पब्लिक इतनी समझदार हो गई है कि उसे नासमझ होने का नाटक करना पड़ता है ,इसके सिवा उसके पास चारा ही कहाँ है ? कई पालिटिशियन नासमझ होते हुए भी समझदार होने का दावा करते रहते हैं। उनकी ये समझदारी पब्लिक चुनाव में उतार देती है और नागनाथ कि जगह सापनाथ को चुन लेती है पब्लिक बेचारी लोकतंत्र में इससे ज्यादा उखाड़ भी क्या सकती है ....?

            उखाड़ तो पालिटिशियन भी कुछ नहीं पाये हैं या वो कुछ उखाडना ही नहीं चाहते हैं या वो जानते हैं कि कुछ उखाड़ दिया तो वो खुद भी उखाड़ सकते हैं। इसलिए वो पब्लिक को रोटी,कपड़ा,मकान मुहैया कराने कि जगह मज्जिद मंदिर देने का दावा करते हैं हालाकि वो जानते हैं कि  पब्लिक को ये भी दे दिया तो बाद में पब्लिक रोटी कपड़ा मकान मांगने लगेगी और आज़ादी के बाद से अबतक का विकास जोकि पोलिटिशियनों ने अपने लिए किया है वो धरा रह जायेगा। पब्लिक तो पिछड़ी हुई ही है पोलिटिशियनों का पिछडना देश के लिए शुभ संकेत नहीं है।                                           

            पब्लिक ये बात अच्छे से जानती है कि रोटी कपड़ा मकान तो उन्हें मिलनेवाला नहीं है लेकिन जीने के लिए कुछ तो चाहिए बकौल ग़ालिब “ हमें मालूम है जन्नत कि हकीकत ग़ालिब लेकिन सोचने को ये ख्याल अच्छा है’’ कि तर्ज पे मंदिर मज्जिद के मुद्दे पे आपस में लड़कर खुश हो लेती है। बहुत सी पब्लिक बेईमान है जंहा से आजकल पालिटिशियन, डाक्टर, इंजीनियर, जज आदि निकल रहे हैं और कुछ को परिस्थितियों ने बेईमान बना रखा है जिन्हें गरीब बेरोजगार या छोटा मोटा चोर आदि कह सकते हैं।

       हमारे शहर में  सदियों से लदा ट्रक पलट गया था बजाये ड्राइवर कि सहायता करने के पब्लिक ट्रक को द्रोपदी समझके दुशासन की तरह साडियां लूटने में व्यस्त हो गई और उन्हें पता ही नहीं चला की कब ट्रक उनके ऊपर पलट गया और कब वे नरकवासी से स्वर्गवासी हो गये।उनके परिजनों ने चोरी पे सीनाजोरी करते हुए सरकार से मुआवजा ले लिया और पोलिटिशियनों ने दिलवा भी दिया।

        ना जाने क्यों मुझे लगता है लोकतंत्र के चारों पहियों की खराबी के कारण लोकतंत्र पलटा पड़ा है और पालिटिशियन इसे लूटे जा रहे हैं और जब भी लोकतंत्र अपने को बचाने के लिए पलटी लेता है और कुछ पालिटिशियन इसकी चपेट में आ जाते हैं यानि चुनाव हार जाते हैं तो वो लोग मुआवजा लेकर कहीं के अध्यक्ष, राज्यसभा सांसद, राज्यपाल तक हो जाते हैं।

 

 

[ओमवीर करन]

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