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सौंदर्य की नदी नर्मदा [लेखक- अमृतलाल वेगड़]: समीक्षा: रीना पारीक (यात्रा वृन्तात)

 ‘सौंदर्य की नदी नर्मदा’ यात्रा वृतांत में चित्रित लोकजीवन

                                                                                                  -रीना पारीक


 

अमृतलाल वेगड़ का यात्रा वृतांत ‘सौन्दर्य की नदी नर्मदा’ लोकजीवन की एक रोचक झलक प्रस्तुत करता है। लेखक का उद्देश्य केवल नर्मदा नदी की यात्रा का वर्णन करना ही नहीं है बल्कि लोकजीवन की झाँकियों को भी प्रस्तुत करना हैं।लोक प्रचलित मान्यताएँ, लोक विश्वास व लोक संस्कृति किसी भी क्षेत्र या समुदाय की विशिष्ट पहचान होते हैं जो कि उन्हें दूसरों से भिन्न एक विशेष स्वरुप प्रदान करते हैं। लेखक दस वर्षों की अपनी ग्यारह नर्मदा की यात्राओं का चित्रण करते हुए वहाँ के समाज एवं जनजीवन की भी तस्वीर प्रस्तुत करते है। लेखक की यात्रा ग्रामीण जीवन के अभावों एवं संस्कृति को रोचक अंदाज में प्रस्तुत करने का प्रयास है।

             लेखक की यात्रा जबलपुर से शुरू होकर भरूच में समाप्त होती है। इसी दौरान लेखक विभिन्न अंचलों के लोकजीवन को अपने यात्रा वृतांत में चित्रित करता है। लेखक की यह यात्रा मध्यप्रदेश ,महाराष्ट्र व गुजरात राज्य के अंचलों की है लेकिन नर्मदा का बहुत बड़ा भाग मध्यप्रदेश में होने से यात्रा वृतांत में मध्यप्रदेश के लोकजीवन का ही चित्रण मुख्य रूप से हो पाया है।  यात्रा वृतांत के अंत में महाराष्ट्र एवं गुजरात के ग्रामीण जीवन की झलक भी देखने को मिलती है। लोक कलाओं का हमारे समाज और जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। लोक नृत्य, लोकगीत, व हस्तशिल्प इत्यादि में स्त्री एवं पुरुष दोनों ही रूचि रखते हैं। जबलपुर से पांठा गाँव पहुँचने पर लेखक वहाँ की स्त्रियों द्वारा आगामी दीवाली पर्व के लिए घर की दीवारों व फर्श पर बनाये गये माण्ड़नो व रंग –बिरंगें चित्रों से रूबरू होते  है। आँवरीघाट गाँव में भी दीवाली के पर्व के लिए तैयार रंगोली एवं घर की भित्तियों पर बनाये गये माण्ड़नें दिखायी पड़ते हैं जो कि आकर्षक व मोहक हैं।प्राचीनकाल से ही हमारे समाज में लोक कलाएं प्रचलित हैं तथा ये समाज में धरोहर के रूप में हमेशा संरक्षित रहती हैं। लेखक अपनी यात्रा के दौरान ग्रामीण अंचलों में हाथ से बनाये गये चित्रों एवं उनमें भरे गये विविध रंगों का पूर्ण मनोभाव से चित्रण करता है साथ ही इनको उकेरने वाली स्त्रियों एवं बालाओं के उत्साह का भी।

            यात्रा वृतांत में अंचल विशेष के लोक नृत्यों का भी लेखक ने सुंदर चित्रण किया है। छिनगाँव में स्त्रियाँ भोर के समय ‘रीना’ गाती हैं जो की वहाँ का प्रचलित लोकगीत है। स्रियाँ समूह में काम करती हुई  गीत भी गाती रहती हैं। लेखक के शब्दों में, “वे गाती जा रही थी। भोर में यह सब कितना भला लग रहा था।”1 मुंडीगाँव में भी स्त्री व पुरुष द्वारा अलग-अलग प्रकार के नृत्य किये जाते हैं जिसमे पुरुष वहाँ का प्रचलित नृत्य ‘सैला’ करते हैं। इसी नृत्य की कुछ पंक्तियाँ लेखक ने प्रस्तुत भी की है जो की वहाँ की स्थानीय भाषा में हैं जो कुछ  इस प्रकार हैं -  

                                                               “तरीना को नारा रे , मोर हासिल सुआ।”2

स्त्रियाँ वहाँ का प्रचलित नृत्य ‘रीना’ करती हैं। वैसे तो दोनों का अलग-अलग नृत्य हैं लेकिन कभी-कभी साथ में भी ‘करमा’ नृत्य किया जाता हैं। ये लोक नृत्य ,लोकगीत स्थानीय लोगों में जीने का विश्वास एवं उमंग पैदा करतें हैं इसीलिए  ये लोग अभावों में भी खुशियाँ ढूँढ़ लेते हैं। यात्रा वृतांत में लेखक भी इस ओर इंगित करता है –“दिनभर कड़ी मेहनत करने के बाद और रुखा –सूखा खाने के बाद भी ये लोग जीवन का रस लेना जानते हैं।”3 यात्रा वृतांत में लोक मान्यताएँ  व लोक विश्वास भी कम नही हैं। प्रत्येक समुदाय या क्षेत्र के अपने-अपने विश्वास व मान्यताएँ हैं जो कभी-कभी अंधविश्वास की तरफ भी ले जाती हैं। मध्यप्रदेश के कछारी गाँव में लोगों की मान्यता हैं कि खेत-खलिहानों में नंगे पैर ही चलना चाहिए।  स्थानीय महिला लेखक के जूते खेत से बाहर उतरवा देती है यह कहते हुये कि “खेत खलिहान लक्ष्मी होते हैं वहाँ जूते पहनकर नही चलते।”4 छीरपानी गाँव में अंधविश्वास की एक घटना भी यात्रा वृतांत में देखने को मिलती है। जब साधु द्वारा लेखक को बताया जाता है कि “यह सिद्धों की भूमि है। वहाँ अपने आप दीये जलते हैं । अपने आप आग जलती है।”5 यात्रा वृतांत में ऐसी  लोक मान्यताएँ भी देखने को मिलती हैं जो की बेहद आश्चर्यजनक है। मध्यप्रदेश के ही किरंगी गाँव में आम के पेड़ का विवाह चमेली की बेल से करवाने की मान्यता है। ऐसा नहीं होने पर उस पेड़ के आम नहीं खाये जा सकते।इसमें लोगों का विश्वास हैं कि ऐसा नहीं किये जाने पर अनहोनी हो सकती है। यात्रा वृतांत में यथार्थ के साथ लोक मान्यताओं का बड़ा रोचक चित्रण हुआ हैं।

         लोकसंस्कृति किसी भी क्षेत्र या समुदाय को विशेष पहचान प्रदान करती है तथा इनकी अपनी –अपनी वेशभूषा ,खान-पान  व  रहन सहन होता है। यात्रा वृतांत में भी लेखक नर्मदा यात्रा के अनुभवों के साथ- साथ रास्ते में पड़ने वाले ग्रामीण अंचलों के रीति रिवाजों को भी रोचकता के साथ प्रस्तुत करता है। यात्रा वृतांत में गारमाकट्टा गाँव के विशेष रिवाजों का वृतांत देखने को मिलता है। यहाँ का रिवाज है कि शादी के वक़्त चार फेरे लड़की के घर तथा तीन फेरे लड़के होते हैं। इसके साथ ही एक रस्म ऐसी भी है जिसमे शादी के बाद अतिथि दुल्हन के पैर छूते हैं और उसके हाथ में दस रुपये रखते हैं। इन ग्रामीण अंचलों मे बाल विवाह जैसी कुरीति  भी देखने को मिलती है जो कि स्थानीय लोग में एक मान्यता के रूप में प्रचलित है। रीति रिवाज जहाँ हमारे समाज की पहचान हैं वहीँ कभी – कभी समाज के लिये घातक भी साबित हो जाते हैं। जैसे बाल विवाह आज के सभ्य समाज के लिए अभिशाप बन गयी। भँवरला गाँव में स्त्रियों की वेशभूषा का चित्रण भी यात्रा वृतांत में देखने को मिलता है। यहाँ की स्त्रियों की वेशभूषा की मनोरम छवि लेखक के शब्दों में, “जिप्सियों जैसे बड़े घेर के पिंडलियों तक के लहँगे, रंग-बिरंगी चोली, छोटी –सी ओढ़नी।”6

                    यात्रा वृतांत में लेखक द्वारा स्थानीय समुदाय के लोगों में त्योहारों एवं मेलों के प्रति उमंग का चित्रण भी किया गया है। पांठा गाँव में लगे मेले व उत्साहित लोगों का चित्रण यात्रा वृतांत में हुआ है जो लोगों की मेलों के प्रति रूचि को अभिव्यक्त करता है। गरीब से गरीब व्यक्ति भी मेले का आनंद जरुर लेता है। त्योहारों के प्रति उत्साह भी यहाँ के लोगों में देखने को मिलता है।  हम भौतिक युग में जी रहे हैं लेकिन फिर भी हमारी परम्पराएँ, मान्यताएँ  आज भी जीवित हैं। मध्यप्रदेश का छोटा सा ग्रामीण अंचल आँवरीघाट जहाँ बैल पूजा का उत्साह देखते ही बनता है। दीवाली की पूजा के बाद लोगों में बैलो को नहलाकर सजाने – सँवारने का सिलसिला शुरू होता है तत्पश्चात उनकी पूजा की जाती हैं। स्त्रियाँ दीये जलाकर नर्मदा नदी में प्रवाहित करती हैं तथा मंगल की कामना करती हैं। यात्रा वृतांत में स्थानीय भाषा के प्रचलित शब्दों का भी यदा – कदा प्रयोग हुआ हैं। परकम्मा , ढिबरी ,मूसल ,माई इत्यादि जैसे ग्रामीण आंचलिक शब्द देखने को मिलते हैं। कहीं – कहीं लोकप्रचलित उक्तियाँ भी दिखायी पड़ती हैं जैसे आठहूँ  पहर मस्ताना माता रहै। यात्रा वृतांत ‘सौन्दर्य की नदी नर्मदा’ केवल लेखक की नर्मदा यात्रा नहीं है अपितु ग्रामीण जनजीवन का भी दस्तावेज है। यात्रा वृतांत में नर्मदा की यात्रा के दौरान पड़ने वाले गाँवों के जनजीवन का यथार्थ चित्रण है।लेखक ने लोक मान्यताएँ ,लोक विश्वास .लोक संस्कृति आदि सभी का आँखों देखा चित्रण किया है। लेखक ने इन अंचलों के अच्छे बुरे सभी रीति रिवाजो का चित्रण सच्चाई के साथ किया हैं। आधुनिक युग की भौतिकता की चकाचौंध में जीवन मूल्यों के प्रति आग्रह का भाव इस यात्रा वृतांत में गूंजता है।


 

सन्दर्भ ग्रन्थ :-  

1.वेगड़, अमृतलाल-सौदर्य की नदी नर्मदा- प्रकाशक, मध्यप्रदेश हिंदी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल, सं.-2014, पृ.स. - 21

  1. वहीं -  पृष्ठ संख्या - 55
  2. वहीं - पृष्ठ संख्या -64
  3. वहीं - पृष्ठ संख्या -30
  4. वहीं - पृष्ठ संख्या -53
  5. वहीं - पृष्ठ संख्या - 111

 

रीना पारीक (शोधार्थी ), महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय अजमेर राजस्थान,

ई मेल –reenapareek94@gmail.com

मो .न.-7023907409