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पटना का गोलघर: प्रदीप श्रीवास्तव [पर्यटन]

बीजापुर के गुम्बद से भी दोगुना ऊँचा है पटना का गोलघर

-प्रदीप श्रीवास्तव 


 

  गोलघर के सामने खड़ा हूँ, ऊँचा सा गुम्बद नुमा घर (यही कहें तो ठीक होगा ) सामने दूर गंगा का तट, लगभग गंगा जी यहाँ सूखी   सी दिखाती हैं । टिकट खिड़की से प्रवेश के लिए टिकट लेता हूँ, और अन्दर । परिसर बहुत ही साफसुथरा, मन मोह लेता है, वहां का वातावरण । देखरेख करने वाले कर्मचारियों से गोलघर का इतिहास जानना चाहता हूँ, तो एक टूक जवाब मिलता है की पर्यटन कार्यालय जाइये, वहां आप को जानकारी मिल जायेगी । मजे की बात यह है कि गोलघर स्थित टिकट घर में भी जानकारी की कोई पुस्तक व प्रपत्र नहीं है । गोलघर के प्रांगण में पर्यटक न के बराबर, कुछ युवा जोड़े (स्कूल के ही लड़के-लड़कियां )गलबहियां डाले अपनी दुनिया में मशगूल, मानों सातों जन्म की बातें आज ही कर डालेंगे, जिसे देख कर कर अपना भी छात्र जीवन (इस तरह का तो नहीं ) याद आ जाता है, वहां के एक कर्मचारी से इस बाबत पूछता हूँ तो वह कहता है, कैसे आप इन्हें रोकोगे, घर से निकले तो माँ - बाप ने सोचा होगा कि पढ़ने गएँ होंगे, लेकिन उन्हें क्या पता कि उनके बच्चे तो यहाँ मस्ती कर रहे होंगे, साहब खाना तक साथ लाते और शाम को ही वापस लौटते हैं, ख़ैर ।।अप्रैल माह का तीसरा सप्ताह, सूर्य देवता पूरे शबाब पर, एक शादी में शामिल होने पटना आया हूँ, वह भी लगभग तीस साल बाद, जहाँ तक याद आ रहा है सन 1986 में आया था । तब के और आज के पटना में कितना बदलाव आ गया है, गली –मोहल्लों ने कंक्रीट का जंगल अपना लिया है ।जगह -जगह गगन चुम्बी इमारतों ने अपनी पैठ बना ली है ।जो रही सही जगह थी उसे फ्लाई ओवरों ने पूरी कर दी । एक दिन का समय है, सोचा पटना घूमा जाए। मन में आया कि क्या देखें, चलो गोलघर ही देखते हैं । बेली रोड से टेम्पो पकड़ा, वाही डग्गामार (आज भी पटना की सड़कों पर निःसंकोच दौड़ती हैं, जैसे 31 साल पहले ) टैम्पो वाले से  गाँधी  मैदान चलने को कहता हूँ । गोलघर पर उतरना चाहता हूँ तो टेम्पो वाला कहता है कि साहब आज तो बंद है, यह पूछने पर कि क्यों, तो जवाब मिलता है कि आज महावीर जयंती है । लेकिन में यह सोच कर वापस गोलघर लौटता हूँ कि पुरातत्व के अधीन आने वाले स्मारक तो केवल शुक्रवार को छोड़ कर बंद नहीं रहते ।

गोलघर के ठीक नीचे खड़ा हूँ, अन्दर खोखला भवन, जिसमे प्रकाश व ध्वनि के माध्यम से गोलघर के इतिहास की जानकारी दी जाती है ।गोलघर के ऊपर जाने के लिए दोनों तरफ से घुमावदार जीने बने  है, जिसके रख-रखाव व रंग रोगन का काम आजकल चल रहा है ।लखोरी ईटों से बने गोलघर की उचाई 96 फीट, व्यास 109 फीट और दीवार की मोटाई 12 फीट 4 ईंच है। जिसपर चढ़ने के लिए दोनों तरफ बने जीनों की संख्या 145 है, जिस पर चढते – चढते हाफा आने लगता है, ऊपर पहुँच कर पटना शहर देखते बनता, सामने गंगा का विशाल तट, पीछे देखें तो पटना शहर, गाँधी मैदान का विशाल प्रांगण, जहाँ सभाएं व रैलियां होती हैं। गुम्बद के बीचो बीच 2 फीट 7 इंच का एक सुराख़ नुमा जगह, जिसे अब बंद किया जा चूका है। कहते हैं कि इसी सुराख़ से अन्दर अनाज डाला जाता था।अनाज निकलने के लिए नीचे के दरवाजों का प्रयोग किया जाता था। लेकिन इस बात की पुष्टि कोई नहीं कर पाता कि वास्तव में कभी ऊपर से अनाज भरा गया हो।कहते हैं कि 1770 में पड़े सूखे के बाद ब्रिटिश कैप्टन जान हास्टिंन ने गोलघर अनाज रखने (ब्रिटिश आर्मी के लिए) के लिए बनवाया था। इसमें 14 लाख टन अनाज रखा जा सकता है। यह 20 जुलाई 1786 में बना था। इसकी मरम्मत 2002 में करवाई गई ।  परिसर में लगे शिलापट्ट पर जगह खाली पड़ी है, पर अंग्रेजी में यह जरुर लिखा है कि ‘ सामान्य योजना के तहत गवर्नर जनरल के आदेश से इस क्षेत्र में पड़ने वाले अकाल से निपटने की लिए इस गल्ला भंडारण का निर्माण किया गया। जिसका निर्माण कैप्टन जॉन गैरस्टीन द्वारा 1784 में शुरू करवाया था जो दो साल बाद 20 जुलाई 1786 में बन कर तैयार हुआ। 

गोलघर को मै अपलक निहार रहा हूँ, विश्वास ही नहीं हो रहा कि बिना बिम्बों के यह गुम्बद बना होगा । वास्तविकता भी यही है कि यह सिर्फ एक गुम्बद हे, किसी ईमारत का हिस्सा नहीं ।बताते हैं कि दुनिया में सबसे ऊँचा माना जाने वाला येरुशलम के गुम्बद ‘’ डोम आफ रॉक’’ से 40 फीट ऊँचा एवं कर्णाटक के बीजापुर गुम्बद से इसकी ऊँचाई दोगुना अधिक है। मुझे इस बात का आश्चर्य हो रहा हे कि अपने आकर -प्रकार से दुनिया में यह गुम्बद अकेला है लेकिन विडम्बना यह है इसे आज तक वह मान्यता नही मिली है, जिसकी यह हक़दार है ।सदियों बाद आज भी गोलघर सरकारी उपेक्षा का शिकार ही है ।गोलघर के भीतर माचिस की तीलियों के जलने की गूंज आप कभी भी जलाकर सुन सकते है ।इसके अन्दर पैदा होने वाली गूंज लखनऊ के भूलभुलैया की याद दिलाने लगती  है।इतिहास के पन्नों को पलटें तो सबसे पहले 1806 में श्रीमती शेरवुड ने इस गूंज का उल्लेख किया था ।श्रीमती शेरवुड ने उस समय इसकी तुलना लन्दन के सेंट पाल गिरजाघर गुम्बद से की थी। उनके बाद 1824 में जब बिशप हेवर पटना आये तो उन्हों ने भी इस गूंज की बात कही, लेकिन हेवर ने इसकी तुलना किसी से नहीं की।कहते हैं कि गोलघर का निर्माण अंग्रेजों द्वारा 1770 में बंगाल में पड़े आकाल के बाद गल्ला भण्डारण की जरुरत को महसूस करते हुए 1786 में किया गया था। गोलघर में ऐसे तो ईंटों का प्रयोग हुआ है लेकिन इसके शिखर पर लगभग तीन मीटर तक ईंट की जगह पर पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। कहा जाता है कि मजदूर एक ओर से अनाज लेकर गोलघर के शीर्ष पर पहुंचते थे और वहां बने दो फीट सात इंच व्यास के छिद्र में अनाज डालकर दूसरी ओर की सीढ़ी से उतरते थे।वैसे बाद में इस छिद्र को बंद कर दिया गया। 145 सीढ़ियों को तय कर गोलघर के ऊपरी सिरे पर पहुंचा जा सकता है। यहां से शहर के एक बड़े हिस्से खासकर गंगा तट के मनोहारी दृश्य को देखा जा सकता है। सरकार ने इस स्मारक पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया। वर्ष 1979 में राज्य संरक्षित स्मारक तो इसे घोषित कर दिया गया परंतु स्मारक के चारों ओर बढ़ी आबादी और सड़कों के निर्माण से स्मारक प्रभावित हुआ। कहते  है कि भवनों के निर्माण से भी गोलघर की नींव और दरारें प्रभावित हुईं।   

19वीं सदी के अंत में डॉ आर वैडल ने संभवतः पहली बार यह बात उठाई कि यह भवन बौध स्तूप की नक़ल है ? तभी से इस बात की चर्चा जोरों से पकड़ ली कि यह भवन वास्तव में स्तूप ही है ।इस बात की पुष्टि 1997 में पटना में आयोजित एक सेमिनार में पटना संग्रहालय के इतिहासकार अरविन्द महाजन ने भी करते हुए इसे “अम्ल्का स्तूप” बताया, जिसकी चर्चा चीनी यात्री फाहियान ने अपनी यात्रा संस्मरण में इसे सम्राट अशोक के पगोड़ा के रूप में की है।वहीँ  ह्वेनसांग ने भी अपने संस्मरण में इसे “अम्ल्का स्तूप” लिखा है । ह्वेनसांग लिखते हैं कि अम्ल्का स्तूप पाटलिपुत्र नगर के दक्षिण –पूर्व में स्थित है। 

गोलघर के परिसर में घूमते – घूमते एक कोने में बने नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री बी।पी।कोईराला की मूर्ति के पास पहुंचता हूँ ।जिसे देख कर सोच में पड़ जाता हूँ कि यहाँ पर इस मूर्ति की क्या जरुरत ।कोईराला जी का क्या योगदान था इस जगह के लिए ? अगर इस जगह पर नेपाल के जांबाज जंग बहादुर की मूर्ति लगी होती तो कोई बात थी।कहते हैं कि नेपाल के जंगबहादुर ने घोड़े पर सवार हो कर एक तरफ के जीने से गोलघर के ऊपर चढ़ कर दूसरी तरफ के जीने से उतरने का कारनामा कर दिखाया था । इस बात का उल्लेख 1919 में प्रकाशित बाबू राम लाल सिन्हा की पुस्तक ‘पाटलिपुत्र’ मे मिलता है । प्रांगण से बाहर निकलने की सोच ही रहा था कि पेड के नीचे एक वृद्ध महिला बैठी दिख जाती है।सोचता हूँ की शायद वह यहाँ के बारे में कुछ बता सकें, उनके बगल में जा कर बैठ जाता हूँ। 

फिर शुरू हो जाता है बातचीत का शिलशिला ।।।

अम्मा, आप कब से यहाँ आ रहीं है ?

वह कहने लगती हैं, बेटा बचपन से आ रही हूँ, इसी गोलघर के नीचे अब्बा, दादा सहित परिवार के साथ रात में सोते थे, दादा की रेलवे स्टेशन पर दुकान थी, हम लोग क्या, पूरा मोहल्ला यहीं सोता था, तब तो बिजली थी नहीं, न ही इतने मकान बने थे, सामने गंगा नदी बहती थी, ठंडा रहता था यहाँ पर ।

अम्मा, आप का नाम ?

बेगम खातून मुझे कहते हैं, अब्बा ने यही पर शादी कर दी, यहीं के होकर रह गए, परिवार है लेकिन दिन में एक बार यहाँ आये बिना मन नहीं मानता, इसी लिए चली आती हूँ ।

पूछता हूँ, अन्दर आने के लिए टिकट लेती हैं क्या ?

इतना पूछते ही वह चीख कर वहां काम कर रहे कर्मचारियों की तरफ इशारा करते हुए कहने लगती हैं की कौन मांगेगा टिकट, कुछ गाली के शब्दों का प्रयोग करने लगती है ।जिसे सुनकर कर्मचारी मुस्कराते हुए निकल लेते है ।

फिर पूछता हूँ, आप की उम्र कितना होगी अम्मा ?

वे बोलती हैं, सन वन तो याद नहीं, अंग्रेजों का शासन था, लगभग 103 तो होगी। 

गोलघर के बारे में कुछ बताइए ?

वे कहती हैं इतना याद कि है बैलगाड़ियों में अनाज भर कर आता था और इसी गोलघर में रखा जाता था, बाद में निकाल कर ले जाते थे, कहाँ ले जाते यह नहीं मालूम। इससे अधिक अम्मा कुछ नहीं बताती, बातों को घूमते हुए परिसर से लगे मजारों के विषय में बताने लगती है, जिसका उल्लेख फिर कभी करूँगा ।सूरज पश्चिम दिशा में छिपने को लालायित हैं, और में गोलघर से बाहर  निकल कर टैम्पो की तलाश में सड़क के किनारे खड़ा हो जाता हूँ ।

 

प्रदीप श्रीवास्तव, ''उदगम'', 537-F /64 A, इंद्रपुरी कॉलोनी , सुभाष चंद्र बोस अकादमी के बगल, आई.आई.एम.-हरदोई रोड , बिठोली  तिराहा, लखनऊ -226013 , उत्तर प्रदेश , सम्पर्क 8604408528

pradeepsrivastava2@gmailcom