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जगूड़ी की भाषा संवेदना: डॉ आलोक कुमार सिंह [लेख]

जगूड़ी की भाषा संवेदना

डॉ आलोक कुमार सिंह

सहायक प्राध्यापक-हिंदी विभाग

नगर निगम डिग्री कॉलेज, लखनऊ


 

‘जिन्हें भाषा की शक्तियों से, शब्दों की निस्सीमता से खेलना आता है, शब्द से अर्थ और अर्थ से अनेक अर्था बना लेने की जिनमें क्षमता है जो शब्दों के बीहड़ से अभिप्रायों की नदी बहा सकता है, जो भाषा को हवा की तरह बॉंध लेने में हुनरमंद है, वह कौन हो सकता है भला--लीलाधर जगूड़ी के सिवा’।’ जगूड़ी के विषय में ओम निश्चल द्वारा कही गयी ये पंक्तिया जगूड़ी की भाषा का सटीक मूल्यांकन करती है ।

जगूड़ी की कविता का प्रारम्भ साठ के आस पास हुआ है। यह समय राजनैतिक और सामाजिक के साथ ही साहित्यिक स्तर पर भी मोह भंग का समय था। साहित्य की सभी विधाओं में यह परिवर्तन देखा गया। फिर परिवर्तन चाहे वस्तु का हो अथवा शिल्प का। साहित्य के क्षेत्र में शिल्प परिवर्तन का खुला पत्र अज्ञेय के ‘मैले उपमान और प्रतीकों’ को छोड़ने की बात के साथ सामने आता है । इस संदर्भ में जगूड़ी भी विशेष सतर्क दिखाई देते हैं। उनके लिए कविता मात्र ‘अनुभवों की तत्काल अदायगी’ भर नहीं है बल्कि वह ‘लम्बे जीवन अनुभवों की परिपक्व अभिव्यक्ति’ होती है।

जगूड़ी की कविता की सबसे बड़ी विशेषता है उसका नयापन। वह भाषा-संवेदना के स्तर पर हर बार नवीनता लिए हुए दिखाई देते हैं। यही कारण है कि उनकी कविता हर बार नया अर्थ देती हैं। इसका एक प्रमुख कारण यह भी है कि उनकी कविताओं में विषयगत भिन्नता है। उनमें प्रकृति है, प्रेम है, आक्रोश है, व्यवस्था के प्रति असंतुष्टि का भाव भी है। वह बाजार की नीतियों पर लिखते है और विज्ञापन संस्कृति को भी कविता का विषय बनाते हैंद्य ‘खबर का मुँह विज्ञापन से ढका है’ बाजार के चरित्र को रेखांकित करती है। ‘अंतर्देशीय’ कविता इमरजेंसी के आतंक को केंद्र में रख कर लिखी गयी है।

उन्होंनें कहा है कि ‘भाषाएं भी अलग-अलग रौनकों वाले पेड़ों की तरह हैं. सबका अपना अपना हरापन है, कुछ उन्हें काट कर उनकी छवियों का एक ही जगह बुरादा बना देते हैं।’ निश्चित रूप से भाषा का अपना अलग स्वरूप होता है। यह निर्भर करता है कवि की क्षमता पर कि वह भाषा के हरेपन को बचाए रख पता है या उसे दुसरे स्वरूप में ढाल देता है।

जगूड़ी नें अपने कविताओं के माध्यम से सदियों से चले आ रहे परम्परागत मानक को तोड़ा है। उनके लिए अनुभूति तो प्रमुख है ही साथ ही अभिव्यक्ति के सभी औजार भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं। उनके लिए विषय की गूढता से भी कही अधिक उस विषय को इमानदारी के साथ अभिव्यक्त कर पाना अधिक अहम् दिखाई देता है। उनके लिए प्रत्येक शब्द महत्त्व रखता है। वह मानते हैं की हर शब्द जरूरी है। ‘आत्मविलाप’ कविता में वह कहते हैं-

‘अपनी छोटी और अंतिम कविता के लिए

मुझमें जो थोड़ा सा रक्त शेष है

मैं कोशिश करूँगा वह दौड़ कर

शब्द के उस अंग को जीवित कर दे

जो भाषा की हवा से मर गया है।’

उनके भाषा से सम्बंधित प्रयोग कभी भी सायास प्रतीत नहीं होते। वह स्वाभाविक ही लगते हैं। घनानंद की एक उक्ति है कि- ‘लोग हैं लागि कवित्त बनावत/मोहे तो मोरे कवित्त बनावत’ की ही तर्ज पर जगूड़ी की भाषा-संवेदना भी है। वह भाषा से कविता नहीं बनाते बल्कि उनकी कविता से भाषा निस्रत होती है। उनकी कुछेक कविताएं तो इस द्रष्टि से नए मानक तैयार करती है। ‘खबर का मुँह विज्ञापन से ढका है’ संग्रह की कविताओं के विषय में कहा जा सकता है कि यह जगूड़ी की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्तियाँ हैं।

ओम निश्चल नें जगूड़ी की कविताओं की समीक्षा करते हुये लिखा है कि ‘हिंदी में कविता का समाज दिनोदिन सिकुड़ता जा रहा है। कविता का समाज विकसित हो, हृदय-संवेद्य कविता से लेकर बौद्धिकता से निर्मित कविता तक को सुनने-सराहने वाला समाज बन सके, ऐसा कोई उद्यम हिंदी हल्के में नहीं हुआ। ऐसे में लीलाधर जगूड़ी की कविताएं, उनकी ही नहीं, हिंदी कविता के ढाँचे और साँचे से बिल्कुल अलग नजर आती हैं, लगभग अलग तरह के अनुभवों, संशयों, तार्किकताओं, वक्रताओं और प्रेक्षणों की उपज हैं, बल्कि कहें कि उनकी कविताएं स्वनिर्मित काव्य भाषा का विरल उदाहरण हैं। अपने काव्यात्मलक कौशल से आर्जित यह काव्य भाषा प्रेक्षण के बहुस्तरीय प्रयत्नों का प्रतिफल लगती है जहाँ कोई भी शब्द भावना के वशीभूत होकर किसी कविता में नहीं आ टपकता, बल्कि उसका होना, कविता के स्थापत्य के औचित्य से सुनिश्चित होता है। कहना न होगा कि कविता में यह विरल लीक जगूड़ी ने खुद के बलबूते खींची है जो अब एक अकेले कवि की परंपरा बनती जा रही है, और यह अच्छी बात है।’ इसके साथ ही वह यह भी कहते हैं कि- ‘कबीर अपने को बाजार में खड़ा पाते थे, लेकिन जगूड़ी अपने को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में खड़ा पाते हैं। कबीर के हाथ में लुकाठी थी, जगूड़ी के हाथ में भाषा का कैमरा है, जो मनुष्य और मनुष्यता के अंतिम पतन-बिन्दु तक उसका पीछा करता है।’

उनका शब्दों का चयन विशिष्ट है। जो शब्द जहां होना चाहिए वहीं है। कविता पढ़ कर ऐसा लगता है जैसे हर शब्द को सोच समझ कर उस जगह स्थापित किया गया है। आधुनिकता को कई स्तर पर परिभाषित किया गया है। इस विषय/शब्द पर कई कई ग्रन्थ भी लिखे जा चुके हैं। कोई शब्द किस तरह अचानक पूरी विचारधारा को बदल सकता है। उनकी एक कविता है ‘आधुनिक शब्द’ जिसमें वह आधुनिक शब्द के विषय में कहते हैं-

‘आधुनिक शब्द में ही ठोकर सी है

जिससे चाल बदल जाती है

और देखना सँभल जाता है..।’

कविता में औचित्य का प्रश्न तो संस्कृत काव्यशास्त्र से चली आ रही है। जगूड़ी की कविताओं को पढ़ कर लगता है कि कहीं न कहीं ये उसी का पालन कर रही हैं।  उनकी एक कविता की कुछ पंक्तियाँ हैं-

‘जब उसने कहा कि अब सोना नहीं मिलेगा

तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा

पर अगर वह यह कहता कि अब नमक नहीं मिलेगा

तो शायद मैं रो पड़ता’

इस कविता में ‘सोना’ और ‘नमक’ शब्दों का चयन और उनका स्थान सोच समझ कर निर्धारित किया गया है। यह अचानक नहीं हुआ है। ‘नमक’ और ‘सोने’ का मूल्य सभी को पता है। दोनों की तुलना नहीं की जा सकती किन्तु यह विडम्बना सामाजिक के साथ ही राजनैतिक स्तर पर भी समय से सवाल खड़े करती है। शब्दों के औचित्य का यह सटीक उदाहरण है। कवि के शब्द ही उसकी आवाज है जो पाठक के ह्रदय तक कवि की आवाज पहुंचाते हैं। जगूड़ी इस और विशेष सजग हैं। उनकी अनेक कवितायें भी शब्दों की महत्ता को लेकर लिखी गयी हैं। उनकी एक कविता है ‘देखने का बोलना’ इसमें वह कहते हैं-

‘आँखों के देखे हुए को बताने के लिए

जुबान को खोलने पड़ते हैं भाषा के ताले

देखना भी बोलने लगता है

अनुभूति का यह खेल अजब है

बातों ही बातों में पंक्ति दर पंक्ति बन जाती है

शब्दों की

कई-कई आँखें दिखने लगती हैं

कई-कई निगाहों के साथ ।’

बारीक सी बात कहने के लिए शब्दों की कितनी गजब कारीगरी है इस कविता में। शब्दों की पंक्ति दर पंक्ति बनाने का यह खेल कवि के लिए कितना आवश्यक है क्योकि आँखों द्वारा देखे गए को बताने के लिए उसे शब्दों की आवाज चाहिए। यह सतर्कता सब में नहीं होती। ‘पलटवार’ शीर्षक कविता में उन्होंने लिखा है-

‘पीटे जा रहे शरीफ आदमी को लगा कि कर्मठ कल्पकनाशील जीवन

जिसके लिए मॉ-बाप दवा और दुआ करते नहीं थकते

फिचकुर फेंकता जिबह होने जा रहा है

अगली चोट ने मौत की आखिरी चेतावनी दी

जीवित रहने की अंतिम इच्छा ने वहीं के वहीं पलटवार किया

पता नहीं कैसे हत्यारे के हथियार ने ही हत्यारे की हत्या कर दी....’

 

‘हत्यारे के हथियार से हत्यारे की ही हत्या’ का विधान रचना सरल नहीं है। फिर भी इस विसंगति को चित्र रूप में सजीव किया गया है। उनकी एक कविता की पंक्तियाँ हैं- ‘खबर वाले जानते हैं यह किस मतलब का विज्ञापन है/विज्ञापन वाले जानते हैं, यह किस मतलब की खबर है.’ यहाँ भी शब्दों की बाजीगरी बरबस ध्यान आकर्षित करती है। यह तीन शब्द ‘खबर’, ‘मतलब’ और ‘विज्ञापन’ दोहराव के साथ ही अपना अर्थ बदल देते हैं और हमारे सामने नया ही अर्थ प्रस्फुटित हो जाता है।

उनके विषय में ठीक ही कहा गया है की ‘जगूड़ी एक ट्रेंड-सेटर कवि के रूप में अग्रगामी रहे हैं। चाहे आजादी के बाद का अकाल, भुखमरी, अव्यरवस्था और बेराजगारी हो, चाहे आपातकाल का समय हो, उन्होंने हर बार एक नई काव्यनभाषा अर्जित करके हिंदी कविता के अभिव्यंक्ति कौशल को अत्यधिक सामयिक रखते हुए भी अपने समय को लाँघने की मार्मिकता के साथ रचा है। उनकी कविताओं से नए शब्दों, मुहावरों का चयन किया जाए तो एक अलग कोश बनाने लायक सम्पदा वहाँ है। उनकी कविताओं में सूक्तिपरकता और उद्धरणीयता इतनी अधिक है कि सूक्तियों का भी एक अलग कोश तैयार किया जा सकता है। आपातकाल में रात अब भी मौजूद है, बची हुई पृथ्वी और घबराए हुए शब्द के माध्यम से उन्होंने चिडिया, माँ, फूल, चाँद, बच्चे और बलदेव खटिक जैसी रचनाएं देकर एक बार हिंदी में इन शब्दों को ही मुहावरे में बदल दिया था। प्रकृति के बिम्ब उन दिनों कविता से विदा हो चुके थे।’

भाषा अभिव्यक्ति का सबसे प्रथम और प्रमुख साधन है। उत्कृष्ट साहित्य सृजन के लिए आवश्यक है कि भाषा साहित्यिक, गूढ़, गंभीर तथा भावों व विचारों के तदनुकूल प्रवाहमय हो। भाषा कभी अपनी इच्छानुसार सरल एवं बोल चाल की नहीं बनाई जाती है अपितु वह भावों के साथ ढ़लती जाती है। यदि भावों में गूढ़ता, गम्भीरता एवं सशक्तता है तो भाषा में स्वयं गूढ़ता, गम्भीरता एवं ओजस्विता आती चली जाती है। जिस मनुष्य का हृदय जितना गहरा होता है उसकी भाषा एवं भाव में उतनी ही गम्भीरता होती है। भाषा के प्रति विशेष सतर्कता बरतने वाले कवियों में जगूड़ी प्रमुख हैं।