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समाज में बढ़ रहा अपराध और मीडिया

समाज में बढ़ रहा अपराध व मीडिया

प्रो. रीना कौर ढिल्लों

पत्रकारिता एंव जनसंचार विभाग

माता गुजरी कालेज

फतेहगढ़ साहिब, पंजाब

09780022733


 

जैसे-जैसे हमारी संस्कृति का विकास होता गया, जैसे-जैसे इंसान पशु से मानव बनने का सफर तय करता गया, वैसे-वैसे समाज में अपराध का रंग-रुप भी बदलता रहा। हमारी सभ्यता ने हमें संतोषी, सहनशील व धैर्यवान बनना सिखाया है लेकिन  पश्चिम में देरी से परन्तु तेजी से हुए विकास ने पूंजीवाद को जन्म दिया है।

अब लगभग सारा विश्व ही पूंजीवाद की दौड़ में शामिल हो चुका है और इस पूंजीवाद की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि इंसान पैसा कमाने व बनाने के लिए नैतिक सिद्धांतों को ताक पर रखकर जघन्य से जघन्य और घृणित से घृणित अपराध करने से भी हिचकचाता नहीं।

रोजाना के समाचार इस बात के साक्षी हैं कि हमारे समाज में अपराध दिन-ब-दिन बढते जा़ रहें हैं । कोई भी देश, प्रांत, क्षेत्र, शहर या गांव ऐसा नहीं जहां खड़े होकर हम यह कह सकते हैं कि मैं पूरी तरह से सुरक्षित हूँ। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की रिर्पोट के अनुसार 2016 में कुल 48,31,515 अपराध के केस दर्ज किए गए जिनमें से 29,75,711 अपराधिक मामले भारतीय दंड संहिता के अंत्तगर्त सम्मिलित हैं और 18,55,804 अपराधिक मामले विशेष व स्थानीय कानूनों के अंत्तगर्त शामिल हैं। जबकि वर्ष 2015 में 47,10,676 अपराध के केस दर्ज किए गए थे जिनमें से 29,49,400 अपराधिक मामले भारतीय दंड संहिता के अंत्तगर्त सम्मिलित थे और 17,61,276 अपराधिक मामले विशेष व स्थानीय कानूनों के अंत्तगर्त शामिल थे। भाव यह है कि एक वर्ष में 2.6 प्रतिशत अपराध के केसों में वृद्धि हुई है, भारतीय दंड संहिता के अंत्तगर्त सम्मिलित अपराध के केसों में 0.9 प्रतिशत और विशेष व स्थानीय कानूनों के अंत्तगर्त सम्मिलित अपराध के मामलों में 5.9 प्रतिशत वृद्धि हुई है।  

मीडिया की बात करें तो मीडिया का कर्तव्य है लोगों को शिक्षित करना व जागरुक करना। मीडिया की उत्पत्ति ही समाज में बुराइयों का विरोध करने हेतु हुई थी। हमें आजादी दिलाने में मीडिया ने ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन समय के साथ-साथ मीडिया की भूमिका में भी बदलाव आया है। मिशन के रुप में कार्य करने वाला मीडिया आज अधिकतर संगठनों व लोगों के लिए लाभ कमाने का प्रोफैशन बन कर रह गया है।

बहुत सारे मीडिया सगंठन अपने फायदे व लाभ के लिए अपराध बेच रहे हैं। 95 प्रतिशत अपराध समाचारों को सनसनी फैलाने वाली भाषा में पेश किया जाता है जो आग में घी का काम करती है।

अपने लाभ को बढ़ाने के लिए मीडिया का सारा ध्यान 4 सी (ब्) भाव क्रिकेट (ब्तपबामज), सिनेमा(ब्पदमउं), हास्य(ब्वउमकल) और अपराध (ब्तपउम) पर ध्यान केंद्रित है। ऐसे लगता है कि पत्रकारिता ने भी पूंजीवाद के आगे घुटने टेक दिए हैं । अधिकतर मीडिया संगठनों में संपादकों का स्थान सी.ई.ओ. ने ले लिया है। इन संगठनों की संपादकीय नीतियों का निर्माण भी व्यवसायिक हितों को ध्यान में रख कर किया जाता है। कहना गलत न होगा कि अधिकतर मीडिया समाज के प्रति अपनी जिम्मेवारियों से विमुख होता जा रहा है। संवाददाताओं का दायित्व होता है अपराध के विभिन्न पहलुओं से परिचित करवाना। लेकिन आज का मीडिया इस बारे में जानकारी कम देता है कि अपराध कैसे समाप्त किया जाए और यह जानकारी अधिक दे रहा है कि अपराध किया कैसे जाए। अपराध समाचार में सूचनाएं व तथ्य कम और मसाले अधिक होते हैं।

एक और मुद्दा जो चर्चा का विषय है कि हम हमेशा उन अपराधों की बात करते हैं जो कानून के दायरे में आते हैं, लेकिन उन अपराधों पर खामोश बैठे हैं जो नैतिक स्तर पर हो रहे हैं। मीडिया में अपराध के शिकार हुए व्यक्ति के निजी जीवन से जुड़े पहलुओं को सरेआम दिखाया जाता है  जो उनके परिवार के लिए कई बार असहनीय हो जाता है। क्या यह नैतिक अपराध नहीं है?

एक सामान्य व्यक्ति जिसे हर रोज न जाने कितने ऐसे अपराधों से दो चार होना पडता है, मीडिया उन पर चुप्पी साधे बैठी है। किसी सरकारी कार्यालय में काम करवाना हो या पुलिस ने रास्ते में रोक लिया हो, वहां ऐसी भाषा का प्रयोग किया जाता है जो आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाती है। क्या यह अपराध नहीं है? बिल्कुल, यह एक अपराध है जो शरीर को तो घायल नहीं करता लेकिन आत्मा को करता है।

समाज में पनप रहे अपराधों के लिए कई कारण जिम्मेवार हैं। कई गैर सरकारी संगठन व व्यक्ति अपराध को रोकने के लिए कार्यरत हैं, बस जरुरत है हमें भागीदार बनने की। मीडिया संगठनों को इस सम्बन्ध में सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए। इस मरह के समाचारों को अधिक पेश करना चाहिए जिससे लोगों को  अधिकारों, कानूनों और दायित्वों का पता चले और समाज में नई सोच विकसित हो। इसके लिए स्वयं इंसान को आगे आना चाहिए। हमें अपने अंदर के जानवर को मारना चाहिए तभी हम दूसरे व्यक्ति के भीतर के पशु को समाप्त कर सकते हैं। अगर हर एक व्यक्ति अपने आप में सुधार ले आएगा तो समाज में सुधार आने लगेगा और एक ऐसे समाज का निर्माण होगा जहां नफरत से अधिक प्यार, धोखे से अधिक विश्वास और अपराध की जगह विकास होगा