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जनकृति का जनवरी 2018 (अंक 33) आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है। अंक में प्रकाशित सामग्री आप विषय सूची के अनुरूप बायीं ओर विविध स्तम्भ में पढ़ सकते हैं। फरवरी अंक हेतु रचनाएँ, शोध आलेख भेजने की अंतिम तिथि 10 फरवरी है।

मीडिया में महिला

मीडिया में महिला

                                                                                            प्रतिभा

 शोधार्थी- भारतीय भाषा केंद्

 जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय

                                                                          नई दिल्ली-110067


 

मीडिया लोकतंत्र का चौथा खम्भा है. इसमें कोई संदेह नहीं है कि लोकतंत्र को बनाए रखने में मीडिया की अपनी अहम भूमिका है, लेकिन ऐसी क्या आवश्यकता जान पड़ी कि जर्मन दार्शनिक और समाज वैज्ञानिक हेबरमास को कहना पड़ा कि, ‘जन संपर्क के साधन (Media of Mass communication) सूचना (Information) के प्रयास और तर्क-वितर्क (Reasoning) के प्रोत्साहन का उद्देश्य पूरा नहीं करते, बल्कि व्यापारिक हितों (Business Interest) और मनोरंजन (Entertainment) के उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं. यही कारण हैं कि आज के युग में लोकतंत्र का रूप विकृत हो गया है.’ जाहिर सी बात है कि मौजूदा समय में जनसंपर्क के माध्यम यानी मीडिया का रूप स्वयं विकृत हो गया है. जिसका सबसे बड़ा कारण भूमंडलीकरण, आर्थिक उदारीकरण और निजीकरण है. जिसने मीडिया को अपने पूंजीतंत्र और राजनीति तंत्र में इस कदर जकड़ा है कि अब प्रिंट मीडिया खासकर टीवी मीडिया में चेहरा/सुन्दरता/आकर्षण और उत्तेजक सेक्स अपील को प्राथमिकता दी जाने लगी है. इस जरुरत को उस बाज़ार ने पैदा की है. जिस बाज़ार से मीडिया को पूँजी मुनाफ़े के तौर पर वापस आनी है. इसमें सबसे अधिक नुकसान अगर किसी का हो रहा है तो वह हैं महिलाएं. देश में महिलाओं की आधी आबादी होने के बावजूद भी उन्हें आज भी सभी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिनकी वजह से वे सदियों पहले हाशिये पर थी. यह सही है कि इस समय कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जिसमें महिलाएं सफलता के झंडे न गाड़े हों. बावजूद इसके वे आज भी समाज में अपनी स्वतंत्र अस्तित्व नहीं बना पाई हैं और इसके लिए कोई एक कारण उत्तरदायी नहीं है. लेकिन जनसंपर्क के माध्यमों के जरिये प्रारंभ में महिलाओं की स्थिति में जो सकारात्मक बदलाव आए, उनकी वजह से लोगों की अपेक्षाएं मीडिया से बढ़ गई थीं. कई मामलों में मीडिया आज भी महिलाओं के विकास एवं उनके सशक्तिकरण में अपनी सकारात्मक भूमिका निभा रहा है लेकिन साथ ही समाज में महिलाओं के प्रति स्टीरियोटाइप्ड भी गढ़ रहा है, जो महिलाओं के विकास एवं सशक्तिकरण के राह में सबसे बड़ा रोड़ा बनकर खड़ा हो जाता है.

भारत में पूँजीपतियों-कारपोरेट घरानों, राजसत्ता और नौकरशाही के बीच नापाक गठबंधन शुरु से रहा है. मीडिया में कमोबेश अस्सी फिसदी हिस्सेदारी देशी-विदेशी पूंजीपतियों की है, जब पूँजी और बाज़ार में चरित्र, वसूल, सिद्धांत और आदर्श खतरे में हैं फिर उसके निवेशकों से नैतिकता की उम्मीद कैसे की जा सकती हैं साथ में उसके पोषकों से भी. मौजूदा मीडिया में पूँजी और मुनाफे का वर्चस्व जैसे-जैसे बढ़ा है, वैसे-वैसे नैतिक पतन का ग्राफ भी बढ़ा है. तहलका के मुख्य संपादक तरुण तेजपाल के मामले को इसी निगाह से देखा जा सकता है. कारपोरेट पत्रकारिता में बहुत सारे मामले दफन हो जाते हैं, जो खुल कर सामने नहीं आते. अधिकतर महिला पत्रकार और कर्मी करियर इसके शिकार हो चले हैं और आज भी हो रहे हैं. इनके शिकार होने की सबसे बड़ी कमजोरी है भविष्य की चिंता में श्रम-शोषण, दैहिक शोषण और यौन शोषण के ख़िलाफ खुला विद्रोह नहीं कर पाती. जिस दिन उन्हें निष्पक्ष न्याय की गारंटी मिल जाए, उस दिन आश्चर्यजनक आंकड़े सामने आ सकते हैं.

बेशक आज मीडिया समाज में महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने की बात करता है लेकिन आज मीडिया में ही महिलाओं को बराबरी का दर्जा नहीं हैं. आज भी कई मीडिया संस्थान हैं जो अपने महिला मीडिया कर्मचारी को ‘मेटरनिटी लीव’ तक नहीं देते.

स्वतंत्रता के सात दशक बीत जाने के बाद भी भारत में इस समय की सबसे बड़ी जरुरत बनी हुई है महिलाओं के विकास एवं सशक्तिकरण की. कई ऐसी समस्याएं हैं जो देश के विकास में बाधक हैं, उनका समाधान महिला सशक्तिकरण किये बगैर संभव नहीं है. अर्थव्यवस्था या राजनीति हो या शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्ता में सुधार की बात हो, महिलाओं की भूमिका के बगैर संभव नहीं है  लेकिन जहाँ अस्सी प्रतिशत ग्रामीण महिलाएं निरक्षर हैं, उनसे इन सभी भूमिकाओं को निभाने की उम्मीद तभी की जा सकती है जब उन्हें अपनी इन क्षमताओं एवं अहमियत का पता हो.

संविधान ने महिलाओं को सभी तरह के अधिकार भले ही दे दिए हो, इन अधिकारों के लिए कानून भी बना दिए हो, लेकिन इनका लाभ तो वह तभी प्राप्त होगा जब महिलाओं को इनकी जानकारी होगी और यहाँ पर महत्वपूर्ण हो जाती है मीडिया की भूमिका. यद्यपि जनसंचार के माध्यम महिलाओं में जागरूकता लाकर उन्हें अपने अधिकारों एवं भूमिका के बारे में सजग बना रहे हैं. लेकिन साथ ही महिलाओं की एक नकारात्मक छवि भी गढ़ रहे हैं. इसलिए महिलाओं की वर्तमान स्थिति को देखते हुए कहा जा सकता है कि अभी इस मुद्दे पर मीडिया में काफी कुछ किया जाना शेष है. “स्विट्जरलैंड के ठिकाने से काम करने वाली एक गैर सरकारी संस्था के 136 देशों के अध्ययन के मुताबिक स्त्री-पुरुष के बीच अंतर की वैश्विक सूची में भारत एक सौ एकवें स्थान पर है. महिलाओं के स्वास्थ्य एवं जन्म के बाद उनके जीवित रहने के मामले में भारत एक सौ पैंतीसवे यानी नीचे से दूसरे स्थान पर है. आर्थिक भागीदारी में एक सौ चौबीसवें और शैक्षणिक उपलब्धियों के लिहाज से एक सौ बीसवें नम्बर पर है.”1 हमारा देश प्रगति तब तक नहीं कर सकता जब तक हम राजनीति से लेकर अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य से लेकर शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं की आधी आबादी को सशक्त नहीं बना देते. शासन और नीतियों के स्तर पर कई बार हमें प्रगति के तत्व देखने को भले ही मिल जाते हैं लेकिन इसके बावजूद सच्चाई तो यह है कि महिलाएं आज भी व्यावहारिक जीवन में हर तरह की समस्याओं से जूझ रही हैं. जिस संसद में बैठ कर हम नीतियों का गठन करते हैं आज उसी संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्त्व ग्यारह प्रतिशत है. माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा में महिलाओं की पहुँच केवल साढ़े छब्बीस प्रतिशत है और दुनिया भर के कुपोषण से मरने वाले बच्चों की तादाद भारत में ही सबसे ज्यादा हैं, जिसमें अधिकतर संख्या बच्चियों की है. इसीलिए हमें इन सब बातों को समझना पड़ेगा कि कोई परिवार, समाज या देश महिलाओं को शिक्षित, स्वस्थय एवं वित्तीय रूप से सशक्त बनाए बगैर देश के विकास और उन्नति की कोरी कल्पना कैसे कर सकता है?

यद्यपि जनसंचार के विभिन्न माध्यमों में लगातार महिलाओं से सम्बन्धित कार्यक्रमों के प्रसारण हो रहे हैं. प्रिंट मीडिया से लेकर रेडियो और दूरदर्शन इस विषय पर काम करता रहा है, प्राइवेट चैनलों ने भी महिलाओं से सम्बन्धित कार्यक्रमों का प्रसारण आरंभ किया और इस दिशा में काफी बदलाव भी हुए. लेकिन इसके बावजूद आखिर क्या वजह है कि इस क्षेत्र में अब तक कोई सार्थक सफलता नहीं मिली? यहाँ सीधे-सीधे प्रश्न यह उठता है कि विभिन्न जनसंचार के माध्यमों में आखिर महिलाओं की प्रस्तुति किस प्रकार की जा रही है. इसका विश्लेषण करना अत्यंत आवश्यक हो जाता है. “समकालीन सन्दर्भ में जनसंचार के विभिन्न माध्यमों में विज्ञापनों ने महिलाओं को उपभोग की वस्तु के रूप में लगातार प्रस्तुत कार नकारात्मकता पैदा करने का काम किया है. विज्ञापनों देखें तो उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए महिलाओं के शरीर का उपयोग किया जा रहा है.”2 यदि समाचार-पत्रों से लेकर विभिन्न इलेक्ट्रानिक माध्यमों के विज्ञापनों पर नज़र डालें तो ऐसे विज्ञापन गिने-चुने ही मिलते हैं, जिनमें स्त्री को उपभोग की वस्तु और पारंपरिक रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाता है, विज्ञापन कंपनियों का उद्देश्य अपने कंपनी के सामानों को बढ़ाना होता है न कि महिला सशक्तिकरण कारण करना. “अक्सर सीधे लेकिन कौशलपूर्ण ढंग से उपभोक्ता को अभिभूत करना ही विज्ञापन का लक्ष्य है.”3 इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि विज्ञापन में प्रभावित करने की अकूत ताकत है. जिसके बल पर वह दिनोंदिन नए प्रतीकात्मक अर्थों की संरचना कर रहा है. चाहे-अनचाहे ये छवियाँ, ये शब्द हमें घेरे हुए हैं. यह यथार्थ का अलग स्तर है जो हमारी वास्तविकताओं से टकराता हुआ सामाजिक स्टीरियोटाइप गढ़ रहा है. इस दृष्टि से स्त्री सबसे संवेदनशील वर्ग है.

विज्ञापन स्त्री की जिस छवि का निर्माण करता है उसमें स्त्री की स्वतंत्र अस्मिता या वैयक्तिकता की पहचान नहीं होती. ये छवियाँ सामान्य, सामूहिक, वर्ग, चरित्र केन्द्रित है जो समाज में स्टीरियोंटाइप्स गढ़ता है. अधिकांश विज्ञापनों में स्त्री की छवि कोमल, कमसिन, भावुक दिखाई जाती है. वह प्रमुखतः ममतामयी माँ, आज्ञाकारी सुशील पत्नी या बहू है जो परिवार में सबका ख़याल रखती है. परिवार की जरूरतों को पूरा करते-करते उसे अपने विषय में सोचने का वक्त ही नहीं मिलता. विज्ञापन में उसकी एक जगह और है, उसका एन्द्रीय रूप, जहाँ वह गुड़िया सी हसीन, जवानी की उमंग से चहकती-किलकती दिखाई पड़ती है. शेविंग क्रीम से लेकर कार तक सभी विज्ञापनों में स्त्री का मुस्कुराता, लुभाता चेहरा अवश्य चिपका रहता है. “इस स्थिति के विरुद्ध स्त्रीवादी संगठनों ने बार-बार आवाज़ उठाई. विज्ञापन के निर्माताओं ने अपने बचाव में यह दलील दी कि इन उत्पादकों की उपभोक्ता भले ही स्त्री न हो, लेकिन इनसे उभरने वाली पुरुष छवि स्त्री को आकर्षित करने के लिए है. इसलिए इन विज्ञापनों में स्त्री के मुस्कुराते चेहरे की उपस्थिति है.”4  “विज्ञापनों में प्रस्तुत स्त्री की छवि बहुत सीमित है. इसका प्रयोग या तो उसके देह सौन्दर्य की प्रस्तुति के लिए होता है या फिर परम्परागत पारिवरिक ढांचे में वह पुरुष की सच्ची अनुगामिनी बनकर उभरती है. इन विज्ञापनों में उसके अपने सवाल, अपने मुद्दे या उसका अपना स्पेस नहीं है (सिवया सैनेटरी नैपकिन जैसे विज्ञापनों के, जहाँ वह अपना खास स्त्री अनुभव अन्य स्त्रियों से बाँटती दिखाई पड़ती है.) इस सारी गढ़ंत का सम्बन्ध किसी भी रूप में हमारी सामाजिक सच्चियों से जुड़ा हुआ नहीं है.”5 हमारे समाज में स्त्री के अनके चहरे हैं जो कड़ी मेहनत करती हैं. वो स्त्रियाँ विज्ञापन में चित्रित चतुर सुजान स्त्रियाँ नहीं हैं. वो बसों में लटकती यात्रा करती हैं. घर-बाहर तमाम कठिनाइयों का सामना करती हैं, अपमान झेलती हैं, हिंषा की शिकार होती हैं. विज्ञापन में ऐसे चेहरे बहुत ही मुश्किल से दिखाई पड़ते हैं. व्यावसायिक उद्देश्यों से अनुप्राणित विज्ञापन जगत के सरोकार सामाजिक अन्तर्सम्बन्धों से अलग ही एक दुनिया का निर्माण करते हैं.

विज्ञापन और स्त्री को लेकर जो अध्ययन हुए हैं उन्होंने यह सिद्ध किया है कि विज्ञापनों में एक ख़ास किस्म की लिंग आधारित सोच काम करती है जो स्त्री के लिए असमानता-धर्मी और पतनशील हैं. स्त्री को लेकर यहाँ जो मिथ रचे जाते हैं वे हमारी ह्रासशील मानसिकता का पता देते हैं. ‘फेयर एण्ड लवली’ गोरेपन के क्रीम के सभी विज्ञापनों पर वर्षों से बहस होती रही है. इस ब्रांड के लिए तैयार किए गए सभी विज्ञापन इस बात पर बल देते हैं कि अगर लड़की गोरी है तो वह अपने सपनो को पा सकती है. उसकी शादी हो सकती है, वह फिल्म में हीरोइन बन सकती है. यह विज्ञापन जिन भ्रांतियों को जन्म देता है उसमें मुख्य है कि योग्यता खूबसूरती की मोहताज है और खूबसूरती का एक ही मानदंड है गोरापन. गोरापन हमारे औपनिवेशिक इतिहास का उच्द्रिष्ट है. जिसे यह कंपनी खूबसूरती का पैमाना बनाकर स्त्री पर इस कदर लादती है कि देश भर की सांवली-श्याम-वर्णी स्त्रियों को अपना रंग लज्जास्पद लगने लगता है. जीवन की सुन्दरता उसकी विविधता में है, लेकिन विज्ञापन सौन्दर्य की सहजता को नष्ट कर सब में एक ही जैसी सुन्दरता प्रतिस्थापित करने की चेष्टा करता है. इसमें रंग-भेदी एवं लिंग-भेदी वर्चस्व-क्षेत्र भी पैदा होते हैं, जो जाने-अनजाने पित्र्सत्तातामक सामाजिक संरचनाओं को पुष्ट करते हैं.

आज महिला विकास और सशक्तिकरण के प्रयासों पर विभिन्न जनमाध्यमों के इन विज्ञापनों का बहुत ही नकारात्मक प्रभाव पड़ा है. आज हम अपने समाज को  महिलाओं के प्रति संवेदनशील बनाने की चाहे जितनी भी बातें कर लें, लेकिन सच्चाई तो यह है कि एक बच्चे से लेकर वयस्क तक इन विज्ञापनों के माध्यम से जाने-अनजाने महिलाओं को उपभोग की वस्तु के रूप में ही देखने लगता है. इतना ही नहीं कहीं-न-कहीं ये विज्ञापन दर्शकों के मस्तिष्क पर ऐसा गहरा असर डालते हैं कि एक लड़की भी जाने-अनजाने अपने आप को उसी रूप में देखना शुरू कर देती है. यदि समाचार-पत्रों की बात करें तो लगभग सभी समाचार-पत्रों का पाठक वर्ग मुख्यतया शिक्षित वर्ग होता है. इन पत्रों का प्रमुख उद्देश्य समाचारों को लोगों तक पहुँचाना होता है. ये समाचार पत्र महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन ज्यादातर समाचार-पत्र यथास्थिति को बनाए रखने का ही काम कर रहे हैं. दुखद यह है कि इन पत्रों में महिलाओं से सम्बन्धित हिंसक और पैशाचिक घटनाएं ख़बर जरुर बन जाती हैं लेकिन महिलाओं के उत्थान विकास की ख़बरों को कम ही तवज्जो मिल पाती है. महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए यह आवश्यक है कि समाचार-पत्रों में महिलाओं से सम्बन्धित सकारात्मक ख़बरों को भी तवज्जो मिले. प्रेरणास्पद महिलाओं के संघर्ष और उनकी जीवन-गाथा के जरिए मीडिया महिलाओं के विकास में एवं उनको सशक्त बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.

कुछ समाचार-पत्रों में महिलाओं के लिए अलग से पन्ने हैं, लेकिन उनमें अब भी अधिकतर निर्णायक स्तर पर पुरुषों की ही पहुंच है और इस विषय पर उनका रवैया उदासीनता का है. हाँलाकि पहले की अपेक्षा मीडिया उद्योग में महिलाओं की संख्या बढ़ी है और उनके द्वारा भी महिला सशक्तिकरण जैसे विषयों पर काम करने की पहल हुई है लेकिन अधिकतर जगहों पर उनसे उम्मीद की जाती है कि वे फैशन, खान-पान, सौन्दर्य जैसे विषयों तक ही स्वयं को सीमित रखें. उन्हें निर्णायक पदों तक पहुँचने के लिए एक बार फिर उसी पुरुष प्रधान सोच से लड़ाई करनी होती है.

महिला विशेष पत्रिकाओं की बात की जाए तो वहाँ भी वैसे लेखों और ख़बरों की संख्या अधिक है जो महिलाओं को अपने शारीरिक सौन्दर्य, घरेलू कामों एवं पारम्परिक भूमिका में ज्यादा प्रस्तुत करता है. अधिकतर महिलाएं तो इन बातों से वाकिफ़ भी नहीं हैं कि उनकी स्थिति कितनी दयनीय है. अश्लील साहित्य और सिनेमा तो महिलाओं की बिल्कुल ही घिनौनी तस्वीर प्रस्तुत करने में लगा है और वह भी धड़ल्ले से पाठकों और दर्शकों के लिए उपलब्ध है. दूसरी तरफ समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं के साथ एक समस्या यह भी है कि महिलाओं तक इसकी सीधी पहुँच काफ़ी सीमित है क्योंकि भारत जैसे देश में निरक्षर महिलाओं की संख्या लगभग अस्सी प्रतिशत है. रेडियो, टेलीविज़न की पहुंच आज शहरों के साथ-साथ गाँवों में भी व्यापक रूप में हो गई है. जो महिलाओं के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं. “हाल ही में डी. डी. न्यूज़ के शो में ‘तेजस्विनी’ के सौ एपिसोड पुरे होने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में भारत के सूचना एवं प्रसारण मंत्री वेंकैया नायडू ने मीडिया से अपील की कि ‘वह महिलाओं को उनके अधिकारों  के प्रति जागरूक करने में भी अपनी अहम् भूमिका निभाएं. उनका कहना था कि देश में महिला सशक्तिकरण (Women Empowerment), उदारवाद (Emancipation) और समानता (Equality) के अधिकार की स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है. इसीलिए महिलाओं को उनके अधिकारों के बारे में बताने के लिए मीडिया को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए और विभिन्न मीडिया प्लेटफॉर्म पर नारी शक्ति वाले कार्यक्रमों को बढ़ावा देना चाहिए. साथ ही देश की प्रभावशाली महिलाओं के उदाहरणों को सामने लाना चाहिए. ताकि महिलाएं इससे प्रेरित होकर अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो सकें.”6 आज चौबीस चल रहे मनोरंजन चैनलों पर अधिकतर महिलाओं को पारम्परिक रूप में ही दिखया जा रहा है. जबकि जरूरत इस बात की है कि यदि महिलाओं की स्थिति में सुधार लाना है तो उनकी सशक्त छवि को भी प्रस्तुत किया जाना चाहिए. सफल महिलाओं के संघर्ष की कहानियों को वृत्तचित्र के रूप में दिखाने का काफी प्रेरणादायक असर हो सकता है. महिलाओं में सारी क्षमताएं हैं, जनमाध्यमों को जरूरत है उसे प्रेरित करके बहार निकालने की. रेडियो और टेलीविज़न समाज की कुरीतियों, अंधविश्वासों के ख़िलाफ अभियान चलाकर उन्हें जागरूक कर सकते हैं. गाँवों एवं कस्बों में महिलाओं की सफलता एवं संघर्ष सम्बंधी वृत्तचित्र आदि महिलाओं के प्रेरणास्रोत बन सकते हैं.

समाचार-पत्रों, रेडियो एवं टेलीविज़न के अलावा सिनेमा में भी कम ही महिलाओं को सशक्त रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है. हालांकि हाल के कुछ  सिनेमा में महिलाओं को सशक्त रूप में प्रस्तुत करने की पहल अवश्य हुई है. जैसे-क्वीन, पिंक, कहानी और अनारकली ऑफ आरा आदि. लेकिन दूसरी तरफ इन सिनेमा में धड़ल्ले से महिलाओं को आइटम नंबर के रूप में भी प्रस्तुत किया जा रहा है. जबकि इसके विपरीत उन्हें काफी सशक्त रूप में प्रस्तुत कर समाज के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है. मुख्याधारा की मीडिया रेडियो, टेलीविज़न और समाचार-पत्रों से लोगों ने महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने की अपेक्षा की. लेकिन इस मीडिया ने यथास्थिति को ही बनाए रखा और महिलाओं की सामाजिक स्थिति में बहुत सकारात्मक परिणाम आते हुए नहीं दिखे. आज डिजिटल क्रांति के युग में नई मीडिया से एक नई उम्मीद बनी है कि यह एक ऐसा प्लेटफार्म है जिससे महिलाओं की स्थिति में सुधार की सम्भावना काफी हद तक की जा रही है, लेकिन क्या नई मीडिया वाकई में महिलाओं स्थिति में सुधार ला पा रहा है? यह एक बड़ा प्रश्न है. “नई मीडिया एक ऐसा माध्यम है जहाँ कोई किसी की पहुँच या अभिव्यक्ति की आज़ादी को सीमित नहीं कर सकता है. नई मीडिया इंटरनेट आधारित एक ऐसा संचार है जिसमें इसे इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति ऑनलाइन समुदाय बनाकर उनके साथ किसी भी तरह के सुचना, विचार, व्यक्तिगत संवाद, विडियो और आडियो संवाद शेयर कार सकता है. ब्लॉग, वेबसाइट, फेसबुक, हाइक, इंस्टाग्राम आदि प्रचलित नई मीडिया है.”7 बेशक, आज की तारीख में नई मीडिया महिलाओं के पक्ष में बहुत प्रभावकारी हथियार के रूप में उभरा है. यद्यपि इस मीडिया ने महिलाओं को अभिव्यक्ति की आज़ादी दी है. वो बिना किसी मध्यस्थ के अपनी सोच, अपने विचार को लोगों के सामने रख सकती हैं. जिसे महिलाओं के सकारात्मक पक्ष के रूप में देखा जा सकता है. लेकिन नई मीडिया के कई नकारात्मक पहलू भी हैं, जो महिलाओं की स्थिति पहले से भी बत्तर बना दे रहा है. हाल ही में गुरमेहर कौर केस में देखा जा सकता है कि सोशल मीडिया में महिलाओं की क्या स्थिति है? गुरमेहर कौर द्वारा अपनी राय प्रकट करने के बाद जिस तरह से समाज ने अपनी प्रतिक्रिया प्रकट की है वह इसका आईना है कि समाज में हम आज भी औरतों को किस दर्जे में रखते हैं? यह घटना तो महज एक उदाहरण भर है. अगर सोशल मीडिया को खंगालने की कोशिस करें तो पाएंगे कि स्त्री-मुक्ति, स्त्री-सशक्तिकरण की तमाम बहसों के बीच स्त्रियों के प्रति पुरुष मानसिकता में बहुत अधिक परिवर्तन नहीं आया है . कामकाज और समाज के हर क्षेत्र में आज स्त्रियों की भागीदारी बढ़ रही है, लेकिन वे कहीं भी सुरक्षित महसूस नहीं करती हैं.

आज सोशल मीडिया पर अगर कोई स्त्री मुखर होकर अपनी प्रतिक्रिया देती है तो उसे मर्यादा का पाठ पढ़ाने वाले ही नहीं, उसके ऊपर निजी अमर्यादित टिप्पणीयां करने वाले भी सामने आते हैं. गुरमेहर कौर का प्रकरण कोई अकेला उदाहरण नहीं है. समाज के किसी भी वर्ग की स्त्री को इस तरह की प्रतिक्रियाओं से बख्शा जाता है. यहाँ तक कि लेखिकाओं  और महिला पत्रकारों को भी नहीं छोड़ा जाता है. “ ‘मैकब्रिज कमीशन’ ने अपने शोध के तथ्यों की पुष्टि करते हुए कहा है कि विकसित देश हो या विकाशील देश स्त्री की छवि के निर्णायक तंतु सामाजिक सोच पर निर्भर करते हैं और मीडिया इस क्षेत्र में एक बड़ा जिम्मेदार कारक माना जाता है, जो समाज में स्त्री-विषयक सोच को गंभीर तथा छिछले सतहों; दोनों स्तरों पर आधिकारिक रूप से प्रभावित करता है.”8 यद्यपि मीडिया ने देश में एक क्रांति लाकर विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, न केवल समाज के जरूरी, गैर-जरूरी मुद्दों को उठाया है बल्कि उनमें उचित व सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिले हैं. लेकिन समाज की आधार-स्तंभ महिलाओं की स्थिति में आज भी बहुत अधिक बदलाव नहीं हुए हैं और जिन क्षेत्रों में बदलाव हुए भी हैं तो उनमें महिलाओं के लिए एक नई समस्या उठ खड़ी हुई है. अत: मीडिया की जिम्मेदारी अभी खत्म नहीं हुई है, खासकर महिलाओं के मुद्दों को लेकर मीडिया को और अधिक गंभीरता से सोचने की जरूरत है.


सन्दर्भ-सूची:-

  1. निभा सिन्हा, (05/10/2015), महिला विकास और सशक्तिकरण एवं जनमाध्यम, newswriters.in.
  2. , newswriters.in. (05/10/2015).
  3. सेठी, डॉ. रेखा, विज्ञापन डॉट कॉम, वाणी प्रकाशन, 2012, पृ. सं. 211.
  4. वही, पृ. सं. 221
  5. वही, पृ. सं. 222.
  6. samachar4media.com, 07/03/2017.
  7. newswriters.in, 01/02/2016.
  8. शुक्ला, सुधा, महिला पत्रिकारिता, प्रभात प्रकशन, 2012, पृ. सं. 198.